Use of Vaccines for Covid-19

Use of Vaccines for Covid-19

There is a lot of confusing information about vaccines in general and, in particular, the new vaccines that have been announced to treat the Covid-19 virus. What adds to the confusion is the vast amount of misinformation and disinformation that probably outweighs the factual information. Being vegetarian often adds an additional layer of complexity to many issues. When it comes to most problems in life, especially medical treatments, as satsangis, like everyone else, we must make our own decisions based on the general guidelines we are given. It is neither practical nor desirable to give specific instructions on every ambiguous issue that arises in life. As a general guideline, the Master is not against vaccines. However, concerning the specifics of various vaccines, it is up to us individually to decide. We must always try to have a balanced and practical approach based on our understanding of our fundamental principles while avoiding too much unnecessary hair-splitting. The potential life-saving benefit of these and other vaccines is also worth considering.

While a number of vaccines are under development, below is the latest information on the two leading Corona-19 virus vaccination options which appear ready for an early release. It is hoped that this information may help you if you are still in the process of making a decision. Concerning these vaccines and other vaccines that already exist or are yet to be developed, it is always up to the individual to do the research to make an informed decision.

Vaccines train the immune system to recognize a virus and stimulate the immune system to protect us in exactly the same way that it does when it encounters a live disease-causing organism. Vaccines against viruses have traditionally contained killed or weakened viruses or purified signature proteins of the virus. Traditional vaccine development is a very time-consuming process and can take years from the initial identification of the virus strain to a deliverable vaccine, which then, of course, has to be extensively tested to show that it is both effective and safe for people.

Unlike the traditional vaccine development process that uses eggs as the medium to produce very large numbers of virus particles, the Pfizer and Moderna are a new generation of vaccines that use laboratory-produced mRNA (a fragment of the virus’s genetic material) that contains information about the coronavirus’s signature spike protein. This spike protein is what the virus uses to enter our cells. If the virus RNA that produces this protein were to mutate, the virus would almost certainly lose its ability to invade our cells and thus become harmless or die out. That means that the vaccines produced today are highly likely to continue to be effective against this harmful version of the virus well into the future.

Both the Pfizer and Moderna vaccines use a snippet of the virus’s genetic code to instruct our own cells to build the spike protein or a fragment of it. When our own cells make this protein, our immune system recognizes it as foreign and begins producing protective antibodies as an immediate response, as well as laying down a memory of the protein in immune cells. This means that, when later faced with the real virus, the immune system can make antibodies and immune cells that can recognize the protein and neutralize the virus. The vaccine does not alter the DNA sequence of a human body; rather it presents the body with instructions that allow our immune system to build a defense.

The Pfizer and Moderna vaccines use synthetic mRNA produced in a laboratory. There is no use of eggs or other animal media to produce the vaccine, and there are no stem cells involved, as is sometimes erroneously reported. As a laboratory-produced product, it is not a living organism and does not involve genetic modification of a living organism.

This note is intended solely to provide objective information and does not promote any particular point of view other than to say that generally speaking, the master does not object to vaccines. Whether you decide to take a vaccine or not is your own individual decision.

Hindi

वैक्सीन को लेकर आम तौर पर बड़ी उलझन भरी जानकारी सुनने को मिलती है, ख़ासकर नई वैक्सीन को लेकर जिसके बारे में घोषणा की गई है कि वो कोविड-19 का इलाज है। हमारी दुविधा और बढ़ जाती है जब ग़लत सूचनाओं और झूठी ख़बरों की भरमार असल तथ्य को छुपा देती है। शाकाहारी होने के नाते ऐसे मामले अकसर और पेचीदा हो जाते हैं। अन्य लोगों की तरह सत्संगियों को भी, दिए गए आम निर्देशों के आधार पर जीवन में आनेवाली समस्याओं, ख़ासकर मेडिकल इलाज, के निर्णय ख़ुद लेने चाहिएँ। जीवन में आने वाली हर समस्या पर विशेष निर्देश देना न तो व्यावहारिक है और न ही ऐसी उम्मीद रखनी चाहिए। आम तौर पर सतगुरु वैक्सीन के ख़िलाफ़ नहीं हैं। फिर भी इन वैक्सीन की संरचना को देखते हुए इनके बारे में निर्णय हमें ही लेना है। हमें अपने बुनियादी सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए हमेशा एक संतुलित और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए, न कि बाल की खाल निकालनी चाहिए। यह भी ख़याल रखना है कि जीवन की सुरक्षा के लिए कोविड वैक्सीन के क्या फ़ायदे हैं।

हालाँकि बहुत सारे वैक्सीन तैयार हो रहे हैं, लेकिन करोना-19 वायरस के उन दो मुख्य वैक्सीन के बारे में यहाँ जानकारी दी गई है जिनकी जल्दी ही उपलब्ध होनेकी उम्मीद है। आशा है कि यह सूचना निर्णय लेने में आपकी सहायता करेगी। यह हर किसी की अपनी ज़िम्मेदारी है कि वह इन वैक्सीन के बारे में तथा अन्य वैक्सीन के बारे में, जो पहले से ही तैयार हैं या फिर तैयार हो रही हैं, ख़ुद खोजबीन करके सही निर्णय लें।

वैक्सीन हमारे इम्यून सिस्टम को इस तरह तैयार करती है ताकि वह वायरस की पहचान करके हमें उसी तरह सुरक्षा प्रदान कर सके जिस तरह यह बीमारी पैदा करने वाले जीवित कीटाणुओं का सामना करके हमारा बचाव करती है। वायरस के लिए बनी वैक्सीन में या तो मरे हुए या कमज़ोर वायरस या फिर वायरस के प्रोटीन की शुद्ध छाप होती है। आम तौर पर वैक्सीन बनाने में बहुत समय लगता है क्योंकि वायरस की शुरुआती पहचान से लेकर वैक्सीन को पूरी तरह तैयार करने में सालों-साल लग जाते हैं और तब इसकी पूरी तरह से जाँच की जाती है ताकि यह निश्चित किया जा सके कि यह लोगों के लिए सुरक्षित और कारगर है।

परंपरागत तरीक़े से वैक्सीन बनाने की प्रक्रिया में अंडों का प्रयोग किया जाता है ताकि अधिक मात्रा में वायरस पार्टिकल्ज़ (virus particles) तैयार हो सकें। फ़ाइज़र और मॉडरना नई पद्धतियों का इस्तेमाल करते हुए वैक्सीन बना रहे हैं जिसमें mRNA (genetic material) को प्रयोगशाला में तैयार किया गया है, इसमें करोना वायरस के स्पाइक प्रोटीन के बारे में मुख्य जानकारी है। वायरस इस स्पाइक प्रोटीन के ज़रिए ही हमारी कोशिकाओं में दाख़िल होता है। वायरस RNA जो प्रोटीन बनाता है अगर उसको बदल दिया जाए तो वायरस हमारी कोशिकाओं पर हमला करने की क्षमता खो देगा, तब यह कोई हानि नहीं पहुँचा सकेगा या फिर ख़त्म हो जाएगा। इसका मतलब है कि ये वैक्सीन जो तैयार की जा रही हैं, वे आनेवाले लंबे समय तक इस हानिकारक वायरस के विरुद्ध कारगर साबित होंगी।

फ़ाइज़र और मॉडरना दोनों वैक्सीन वायरस के जनैटिक कोड के एक अंश का इस्तेमाल करती हुई हमारी कोशिकाओं को स्पाइक प्रोटीन या उसका अंश बनाने का निर्देश देती हैं। जब हमारी कोशिकाएँ यह प्रोटीन बना लेती हैं तो हमारा इम्यून सिस्टम इसे एक बाहरी तत्त्व मानता है और तुरंत ही इसके विरुद्ध सुरक्षित ऐंटीबॉडीज़ बनाना शुरू कर देता है, साथ ही साथ यह इम्यून कोशिकाओं की मेमरी (memory) में भी इस प्रोटीन को रखने लगता है। इसका मतलब है कि बाद में असली वायरस का सामना होने पर इम्यून सिस्टम ऐंटीबॉडिज़ बना सके और इम्यून कोशिकाएँ प्रोटीन को पहचान कर वायरस को बेअसर कर सकें। वैक्सीन इनसान के DNA को नहीं बदलता बल्कि हमारे शरीर को निर्देश देता है ताकि हमारा इम्यून सिस्टम अपनी सुरक्षा तैयार कर सके।

फ़ाइज़र और मॉडरना ने वैक्सीन में प्रयोगशाला में तैयार किए गए कृत्रिम mRNA का इस्तेमाल किया है। इन वैक्सीन को बनाने के लिए अंडों या पशुओं से लिए गए किसी भी पदार्थ का इस्तेमाल नहीं किया गया है, न ही स्टेम सेल का इस्तेमाल किया गया है, जैसी कि कई बार ग़लत सूचना दी गई है। इसे प्रयोगशाला में तैयार किया गया है, इसलिए यह जीवित कीटाणु नहीं है और न ही जनैटिक बदलाव द्वारा बनाया गया कोई कीटाणु है।

यह लेख मात्र एक जानकारी है। यह किसी ख़ास दृष्टिकोण को बढ़ावा नहीं देता। इस लेख का मक़सद इतना ही है कि सतगुरु वैक्सीन के ख़िलाफ़ नहीं है। आप वैक्सीन का प्रयोग करना चाहते हैं या नहीं, इसका निर्णय आपको ही लेना होगा।

Punjabi

ਵੈਕਸੀਨ ਬਾਰੇ ਬਹੁਤ ਸਾਰੀ ਉਲਝਾਉਣ ਵਾਲੀ ਆਮ ਜਾਣਕਾਰੀ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੈ ਅਤੇ ਖ਼ਾਸ ਕਰ ਕੇ ਨਵੀਆਂ ਵੈਕਸੀਨਜ਼ ਬਾਰੇ ਵੀ, ਜੋ ਕੋਵਿਡ-19 ਦਾ ਇਲਾਜ ਕਰਨ ਲਈ ਘੋਸ਼ਿਤ ਹੋਈਆਂ ਹਨ, ਕਾਫ਼ੀ ਪਰੇਸ਼ਾਨੀ ਵਿਚ ਪਾਉਣ ਵਾਲੀਆਂ ਜਾਣਕਾਰੀਆਂ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹਨ। ਇਸ ਪਰੇਸ਼ਾਨੀ ਵਿਚ ਵਾਧਾ ਕਰਨ ਵਾਲੀ ਗੱਲ ਇਹ ਹੈ ਕਿ ਸਹੀ ਜਾਣਕਾਰੀ ਨਾਲੋਂ ਝੂਠੀਆਂ ਅਤੇ ਗ਼ਲਤ ਸੂਚਨਾਵਾਂ ਦੀ ਜ਼ਿਆਦਾ ਭਰਮਾਰ ਹੈ। ਸਾਡਾ ਸ਼ਾਕਾਹਾਰੀ ਹੋਣਾ ਇਸ ਵਿਚ ਹੋਰ ਵੀ ਉਲਝਣਾ ਵਧਾ ਦਿੰਦਾ ਹੈ। ਜਦੋਂ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਦੀਆਂ ਸਮੱਸਿਆਵਾਂ ਆਉਂਦੀਆਂ ਹਨ, ਖ਼ਾਸ ਕਰ ਕੇ ਮੈਡੀਕਲ ਇਲਾਜ, ਤਾਂ ਬਾਕੀ ਸਭ ਲੋਕਾਂ ਵਾਂਗ ਸਾਨੂੰ ਸਤਿਸੰਗੀਆਂ ਨੂੰ ਵੀ ਆਪਣੇ ਫ਼ੈਸਲੇ ਉਪਲਬਧ ਜਾਣਕਾਰੀ ਤੇ ਅਧਾਰਿਤ ਕਰਨੇ ਪੈਂਦੇ ਹਨ। ਇਹ ਨਾ ਤਾਂ ਵਿਹਾਰਕ (practical) ਹੈ ਤੇ ਨਾ ਹੀ ਲੋੜੀਂਦਾ ਹੈ ਕਿ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਵਿਚ ਹਰੇਕ ਅਸਪਸ਼ਟ ਮੁੱਦੇ ਉੱਤੇ ਖ਼ਾਸ ਹਿਦਾਇਤਾਂ ਦਿੱਤੀਆਂ ਜਾਣ। ਆਮ ਸੇਧ ਵਾਸਤੇ ਇਹ ਕਹਿ ਸਕਦੇ ਹਾਂ ਕਿ ਸਤਿਗੁਰੂ ਵੈਕਸੀਨ ਦੇ ਵਿਰੁੱਧ ਨਹੀਂ ਹਨ। ਫਿਰ ਵੀ ਵੈਕਸੀਨ ਨੂੰ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਤੌਰ ਤੇ ਲੈ ਕੇ ਇਹ ਅਸੀਂ ਹੀ ਫ਼ੈਸਲਾ ਕਰਨਾ ਹੋਵੇਗਾ ਕਿ ਅਸੀਂ ਕਿਹੜੀ ਵੈਕਸੀਨ ਚੁਣਨੀ ਹੈ। ਸਾਨੂੰ ਆਪਣੀ ਸੋਚ ਸਮਝ ਅਤੇ ਆਪਣੇ ਮੂਲ ਸਿਧਾਂਤਾਂ ਨੂੰ ਮੁੱਖ ਰੱਖ ਕੇ ਪਰ ਵਾਲ ਦੀ ਖੱਲ ਲਾਹੁਣ ਤਕ ਜਾਣ ਤੋਂ ਸੰਕੋਚ ਕਰਦੇ ਹੋਏ, ਹਮੇਸ਼ਾ ਸੰਤੁਲਨ ਅਤੇ ਅਮਲ ਵਿਚ ਆ ਸਕਣ ਵਾਲਾ ਰਸਤਾ ਅਪਣਾਉਣ ਦੀ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਕਰਨੀ ਚਾਹੀਦੀ ਹੈ। ਜੀਵਨ ਦੇ ਬਚਾਅ ਲਈ ਇਨ੍ਹਾਂ ਅਤੇ ਦੂਜੀਆਂ ਵੈਕਸੀਨਜ਼ ਦੇ ਸੰਭਵ ਫ਼ਾਇਦੇ ਨੂੰ ਵੀ ਧਿਆਨ ਵਿਚ ਰੱਖਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ।

ਭਾਵੇਂ ਕਈ ਵੈਕਸੀਨਜ਼ ਵਿਕਾਸ ਦੀ ਸਥਿਤੀ ਵਿਚ ਹਨ ਪਰ ਕੋਰੋਨਾ-19 ਵਾਇਰਸ ਵੈਕਸੀਨੇਸ਼ਨ ਦੀਆਂ ਦੋ ਵੈਕਸੀਨਜ਼ ਦੀ ਚੋਣ ਬਾਰੇ, ਜੋ ਤਿਆਰੀ ਦੀ ਸਟੇਜ ਵਿਚ ਹਨ, ਤਾਜ਼ਾ ਜਾਣਕਾਰੀ ਹੇਠਾਂ ਦਿੱਤੀ ਜਾਂਦੀ ਹੈ। ਆਸ ਹੈ ਕਿ ਜੇ ਅਜੇ ਤਕ ਤੁਸੀਂ ਕਿਸੇ ਫ਼ੈਸਲੇ ਤਕ ਨਹੀਂ ਅੱਪੜੇ ਤਾਂ ਇਸ ਤੋਂ ਤੁਹਾਨੂੰ ਸਹਾਇਤਾ ਮਿਲੇਗੀ। ਇਨ੍ਹਾਂ ਵੈਕਸੀਨਜ਼ ਅਤੇ ਹੋਰ ਤਿਆਰ ਹੋ ਰਹੀਆਂ ਵੈਕਸੀਨਜ਼ ਬਾਰੇ ਹਰ ਵਿਅਕਤੀ ਨੂੰ ਖ਼ੁਦ ਹੀ ਸਾਰੀ ਪ੍ਰਾਪਤ ਜਾਣਕਾਰੀ ਬਾਰੇ ਘੋਖ-ਪੜਤਾਲ ਕਰ ਕੇ ਸੋਚਿਆ ਸਮਝਿਆ ਫ਼ੈਸਲਾ ਕਰਨਾ ਹੋਵੇਗਾ।

ਵੈਕਸੀਨ ਸਾਡੀ ਰੋਗ ਤੋਂ ਬਚਾਉਣ ਵਾਲੀ ਸੁਰੱਖਿਆ ਪ੍ਰਣਾਲੀ ਨੂੰ ਉਤੇਜਿਤ ਕਰਦੀ ਹੈ ਤਾਂਕਿ ਇਹ ਵਾਇਰਸ ਦੀ ਪਹਿਚਾਣ ਕਰ ਕੇ ਵਾਇਰਸ ਨਾਲ ਲੜਾਈ ਕਰ ਸਕੇ, ਬਿਲਕੁਲ ਉਸੇ ਤਰ੍ਹਾਂ ਜਿਵੇਂ ਕਿ ਇਹ ਉਸ ਵੇਲੇ ਕਰਦੀ ਹੈ ਜਦੋਂ ਇਕ ਬਿਮਾਰੀ ਪੈਦਾ ਕਰਨ ਵਾਲੇ ਜੀਵਾਣੂ ਦਾ ਸਾਹਮਣਾ ਕਰਦੀ ਹੈ। ਆਮ ਤੌਰ ਤੇ ਵੈਕਸੀਨਜ਼ ਵਿਚ ਨਸ਼ਟ ਕੀਤੇ ਹੋਏ ਜਾਂ ਕਮਜ਼ੋਰ ਕੀਤੇ ਹੋਏ ਵਾਇਰਸ ਜਾਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਪ੍ਰੋਟੀਨ ਦੀ ਸ਼ੁਧ ਛਾਪ ਹੁੰਦੀ ਹੈ। ਰਵਾਇਤੀ ਤੌਰ ਤੇ ਵੈਕਸੀਨ ਤਿਆਰ ਕਰਨ ਦੀ ਵਿਧੀ ਬਹੁਤ ਵਕਤ ਲੈਂਦੀ ਹੈ ਅਤੇ ਵਾਇਰਸ ਦੀ ਮੂਲ ਪਹਿਚਾਣ ਤੋਂ ਵੈਕਸੀਨ ਤਿਆਰ ਹਾਲਤ ਵਿਚ ਆਉਣ ਤਕ ਇਸ ਦਾ ਵਿਕਾਸ ਕਰਨ ਵਿਚ ਕਈ ਸਾਲ ਲੱਗ ਜਾਂਦੇ ਹਨ। ਉਸ ਤੋਂ ਪਿਛੋਂ ਬੜੀ ਵਿਆਪਕ ਵਿਧੀ ਅਪਣਾ ਕੇ ਕਈ ਟੈਸਟ ਕੀਤੇ ਜਾਂਦੇ ਹਨ ਤਾਂ ਕਿ ਵੈਕਸੀਨ ਇਨਸਾਨਾਂ ਵਾਸਤੇ ਸੁਰੱਖਿਅਤ ਹੋਵੇ।

ਵੈਕਸੀਨ ਬਣਾਉਣ ਦੀਆਂ ਪਰੰਪਰਾਗਤ ਵਿਧੀਆਂ ਦੇ ਉਲਟ, ਜਿੰਨ੍ਹਾਂ ਵਿਚ ਵਾਇਰਸ ਦੇ ਅਣੂ ਪੈਦਾ ਕਰਨ ਲਈ ਆਂਡੇ ਦੀ ਵਰਤੋਂ ਕੀਤੀ ਜਾਂਦੀ ਹੈ, ਫਾਇਜ਼ਰ ਅਤੇ ਮੌਡਰਨਾ ਅਜਿਹੇ ਆਧੁਨਿਕ ਪੀੜ੍ਹੀ ਦੇ ਵੈਕਸੀਨ ਹਨ ਜਿੰਨ੍ਹਾਂ ਵਿਚ ਪ੍ਰਯੋਗਸ਼ਾਲਾ ਵਿਚ ਪੈਦਾ ਕੀਤੇ mRNA (ਵਾਇਰਸ ਦੇ ਜਨੈਟਿਕ ਮਟੀਰੀਅਲ ਦਾ ਇਕ ਹਿੱਸਾ) ਇਸਤੇਮਾਲ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਜਿਸ ਵਿਚ ਕਰੋਨਾ ਵਾਇਰਸ ਦੀ ਸਪਾਈਕ (spike) ਪ੍ਰੋਟੀਨ ਦੀ ਜਾਣਕਾਰੀ ਹੁੰਦੀ ਹੈ ਇਸ ਸਪਾਈਕ (spike) ਪ੍ਰੋਟੀਨ ਦੇ ਜ਼ਰੀਏ ਹੀ ਵਾਇਰਸ ਸਾਡੇ ਸੈੱਲਜ਼ (cells) ਵਿਚ ਦਾਖ਼ਲ ਹੁੰਦੇ ਹਨ। ਜੇ ਵਾਇਰਸ ਆਰ ਐਨ ਏ (RNA) ਜੋ ਇਹ ਪ੍ਰੋਟੀਨ ਉਤਪੰਨ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਆਪਣਾ ਰੂਪ ਬਦਲ ਲੈਂਦਾ ਹੈ ਤਾਂ ਫਿਰ ਵਾਇਰਸ ਦੀ ਸੈੱਲ ਅੰਦਰ ਦਾਖ਼ਲ ਹੋਣ ਦੀ ਯੋਗਤਾ ਲਗਪਗ ਖ਼ਤਮ ਹੋ ਜਾਵੇਗੀ ਅਤੇ ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਇਹ ਨੁਕਸਾਨ-ਰਹਿਤ ਹੋ ਜਾਵੇਗਾ ਜਾਂ ਖ਼ਤਮ ਹੋ ਜਾਵੇਗਾ। ਇਸ ਦਾ ਭਾਵ ਇਹ ਹੈ ਕਿ ਅੱਜ ਜੋ ਵੈਕਸੀਨ ਬਣਾਏ ਜਾ ਰਹੇ ਹਨ ਉਹ ਇਸ ਵਧੇਰੇ ਨੁਕਸਾਨਦੇਹ ਵਾਇਰਸ ਦਾ ਮੁਕਾਬਲਾ ਕਰਨ ਲਈ ਇਕ ਲੰਮੇ ਸਮੇਂ ਤਕ ਕਾਰਗਰ ਰਹਿ ਸਕਣਗੇ।

ਫਾਇਜ਼ਰ ਅਤੇ ਮੌਡਰਨਾ ਦੋਵੇਂ ਵੈਕਸੀਨ ਵਾਇਰਸ ਦੇ ਜਨੈਟਿਕ ਕੋਡ ਦੇ ਇਕ ਮਾਮੂਲੀ ਜਿਹੇ ਭਾਗ ਦਾ ਇਸਤੇਮਾਲ ਕਰਦੇ ਹਨ ਅਤੇ ਸਾਡੇ ਆਪਣੇ ਸੈੱਲਜ਼ ਨੂੰ ਸਪਾਈਕ ਪ੍ਰੋਟੀਨ ਜਾਂ ਇਸ ਦਾ ਇਕ ਅੰਸ਼ ਪੈਦਾ ਕਰਨ ਲਈ ਨਿਰਦੇਸ਼ ਕਰਦੇ ਹਨ। ਜਦੋਂ ਸਾਡੇ ਆਪਣੇ ਸੈੱਲਜ਼ ਇਹ ਪ੍ਰੋਟੀਨ ਬਣਾ ਲੈਂਦੇ ਹਨ ਤਾਂ ਸਾਡੇ ਇਮਿਊਨ ਸਿਸਟਮ ਦੀ ਸੁਰੱਖਿਆ ਪ੍ਰਣਾਲੀ ਉਸ ਦੀ ਪਛਾਣ ਕਰ ਲੈਂਦੀ ਹੈ ਅਤੇ ਜਵਾਬ ਵਿਚ ਸੁਰੱਖਿਆ ਦੇ ਤੌਰ ਤੇ ਰੋਗਨਾਸ਼ਕ ਅਨਸਰ (anti-bodies) ਪੈਦਾ ਕਰਨ ਲੱਗ ਜਾਂਦੀ ਹੈ ਅਤੇ ਨਾਲ ਹੀ ਸੁਰੱਖਿਆ ਕੋਸ਼ਿਕਾਵਾਂ ਵਿਚ ਇਸ ਪ੍ਰੋਟੀਨ ਦੀ ਯਾਦ (memory) ਵੀ ਰੱਖ ਦਿੰਦਾ ਹੈ। ਇਸ ਦਾ ਮਤਲਬ ਇਹ ਹੋਇਆ ਕਿ ਜਦੋਂ ਬਾਅਦ ਵਿਚ ਅਸਲੀ ਵਾਇਰਸ ਦਾ ਸਾਹਮਣਾ ਹੁੰਦਾ ਹੈ ਤਾਂ ਸਾਡੀ ਸੁਰੱਖਿਆ ਪ੍ਰਣਾਲੀ ਰੋਗਨਾਸ਼ਕ ਅਤੇ ਇਮਿਊਨ ਸੈੱਲ ਪੈਦਾ ਕਰ ਸਕਦੀ ਹੈ ਜੋ ਪ੍ਰੋਟੀਨ ਦੀ ਪਛਾਣ ਕਰ ਕੇ ਉਸ ਨੂੰ ਨਸ਼ਟ ਕਰ ਦਿੰਦੇ ਹਨ। ਵੈਕਸੀਨ ਮਨੁੱਖੀ ਸਰੀਰ ਦੇ ਡੀ ਐਨ ਏ (DNA) ਦੀ ਬਣਤਰ ਨਹੀਂ ਬਦਲਦੇ, ਸਗੋਂ ਇਹ ਸਰੀਰ ਨੂੰ ਇਕ ਹਿਦਾਇਤ ਦਿੰਦੇ ਹਨ ਜੋ ਸਾਡੇ ਇਮਿਊਨ ਸਿਸਟਮ (immune system) ਨੂੰ ਸੁਰੱਖਿਆ ਕਵਚ ਬਣਾਉਣ ਦੇ ਕਾਬਲ ਬਣਾਉਂਦੀ ਹੈ।

ਫਾਈਜ਼ਰ ਅਤੇ ਮੌਡਰਨਾ ਦੀਆਂ ਵੈਕਸੀਨ ਲੈਬ ਵਿਚ ਤਿਆਰ ਕੀਤੀ (synthetic) mRNA ਵਰਤੀ ਜਾਂਦੀ ਹੈ। ਇਸ ਨੂੰ ਬਣਾਉਣ ਲਈ ਕੋਈ ਆਂਡਿਆਂ ਜਾਂ ਜਾਨਵਰਾਂ ਤੋਂ ਤਿਆਰ ਕੀਤੇ ਕਿਸੇ ਪਦਾਰਥ ਨੂੰ ਨਹੀਂ ਵਰਤਿਆ ਜਾਂਦਾ ਅਤੇ ਨਾ ਹੀ ਕੋਈ ਸਟੈੱਮ ਸੈੱਲ ਵਰਤੇ ਜਾਂਦੇ ਹਨ (ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਬਾਰੇ ਕਈ ਵਾਰੀ ਅਫ਼ਵਾਹਾਂ ਸੁਣਨ ਵਿਚ ਆਉਂਦੀਆਂ ਹਨ) ਕਿਉਂਕਿ ਇਸ ਨੂੰ ਲੈਬ ਵਿਚ ਤਿਆਰ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਇਨ੍ਹਾਂ ਵਿਚ ਕੋਈ ਜੀਵਾਣੂ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦੇ ਅਤੇ ਨਾ ਹੀ ਕਿਸੇ ਜੀਊਂਦੀ ਵਸਤੂ ਦੀ ਕਿਸੇ ਕਿਸਮ ਦੀ ਜਿਨੈਟਿਕ ਅਦਲ-ਬਦਲੀ ਕੀਤੀ ਜਾਂਦੀ ਹੈ।

ਇਸ ਸੂਚਨਾ ਦਾ ਸਿਰਫ਼ ਇਹ ਮੰਤਵ ਹੈ ਕਿ ਇਹ ਯਥਾਰਥਿਕ ਪਹਿਲੂਆਂ ਨੂੰ ਮੁੱਖ ਰੱਖਦੀ ਹੈ ਅਤੇ ਇਸ ਦਾ ਮਕਸਦ ਕਿਸੇ ਖਾਸ ਨਜ਼ਰੀਏ ਨੂੰ ਬੜ੍ਹਾਵਾ ਦੇਣਾ ਨਹੀਂ ਹੈ। ਸਧਾਰਣ ਤੌਰ ਤੇ ਇਹ ਕਹਿ ਸਕਦੇ ਹਾਂ ਕਿ ਸਤਿਗੁਰੂ ਵੈਕਸੀਨ ਦਾ ਵਿਰੋਧ ਨਹੀਂ ਕਰਦੇ। ਤੁਸੀਂ ਵੈਕਸੀਨ ਦਾ ਇਸਤੇਮਾਲ ਕਰਨਾ ਚਾਹੁੰਦੇ ਹੋ ਜਾਂ ਨਹੀਂ ਇਹ ਤੁਹਾਡਾ ਆਪਣਾ ਫ਼ੈਸਲਾ ਹੈ।