भाग 22 • अंक 5
सितंबर अक्टूबर 2026
प्यार सहित आपका
आपका कहना है कि आपको नाम लिए आठ हफ़्ते हो गए, लेकिन आपने कुछ भी तरक़्की नहीं की है। …
उसके प्रेम के साँचे में ढले
हमारी भावनात्मक मज़बूती और आत्म-विश्वास की बुनियाद उन लोगों द्वारा बनाई जाती है जो हमारे …
विचार करने योग्य
सत्संगी को चाहिए कि वह सब परिस्थितियों का विश्वास और साहस के साथ सामना करे, हिम्मत न हारे …
फिर से शुरुआत करना
हम सब को जीवन के किसी न किसी पड़ाव पर वीडियो गेम खेलना याद होगा। किसी एक गेम को चुनना, किसी लक्ष्य को लेकर शुरुआत …
क्या आप जानते हैं?
इनसान को यह शक्ति प्राप्त है कि वह शरीर और मन दोनों के मोह से अलग हो सके, इसलिए उसका यह …
जटिल भ्रम से सरल सत्य की ओर
इस मायामय जगत में हम युगों-युगों से और अनगिनत जन्मों से रह रहे हैं। हालाँकि हम जानते हैं कि हमारे …
रूहानी फुलझड़ियाँ
…
निराशा
महाराज सावन सिंह जी द्वारा की गई व्याख्या …
संतुलन की युक्ति
सबसे पहले तुम प्रभु के साम्राज्य में पहुँचने का यत्न करो, फिर तुम्हें सब कुछ अपने आप प्राप्त हो जाएगा। …
अंतर्मुख होना
सबसे मुश्किल कामों में से एक है बुरे कर्म करने की प्रवृत्ति से छुटकारा पाना। हमें अपने हर विचार, शब्द …
सतगुरु के उत्तर
महाराज चरन सिंह जी के साथ हुए कुछ चुनिंदा सवाल-जवाब …
सदा का सुख
मिस्र के प्रसिद्ध स्फिंक्स का सिर मनुष्य का और शरीर शेर का है। कहा जाता है कि दुनिया-भर से …
आज्ञाकारी होना
आधुनिक समय में ‘आज्ञाकारी होना’ एक चुनौती बन गया है। मुख्य तौर पर युवावस्था के शुरुआती वर्षों …
प्यार की भावना
अनमोल ख़ज़ाना में से एक अंश …
सरल रखना
एक चीनी लोककथा है जिसमें एक अधिकारी ने अपने कर्मचारियों को पेय से भरी एक सुराही दी। …
याद रखने योग्य कथन
सतगुरु कभी अपने शिष्य का साथ नहीं छोड़ते और हमेशा उस पर दया-मेहर करते रहते हैं …
अनुशासन
भजन-सिमरन करना खाइयाँ खोदने, अँगूरों के बाग़ में काम करने और किसी तालाब में से …
दिल से दिल की बात
एक बार स्वामी जी महाराज ने दो-तीन दिन के लिए अपनी कोठरी में एकांत में बैठकर भजन करने का …
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प्यार सहित आपका
आपका कहना है कि आपको नाम लिए आठ हफ़्ते हो गए, लेकिन आपने कुछ भी तरक़्की नहीं की है। संतमत समय की अवधि निश्चित नहीं करता। हमें ज़रा अपनी हालत को समझना चाहिए। अपने जन्म के वक़्त से, जब से हमने तीसरे तिल को छोड़ा है और बाहर आकर इस दुनिया से संबंध जोड़ लिया है तब से, हम तीसरे तिल के अंदर वापस नहीं गए हैं। कभी-कभी जब हमें किसी कठिन समस्या को सुलझाना पड़ता है, तब हम अपनी आँखों को बंद करके अपने पूरे ख़याल को आँखों के पीछे लाकर सोचने की कोशिश करते हैं। ऐसा हम कुछ वक़्त के लिए करते हैं, लेकिन फिर बाहर भाग जाते हैं क्योंकि हमें तीसरे तिल से बाहर भटकने की बुरी आदत पड़ी हुई है।
कवि, चित्रकार और गायक इसी केंद्र से प्रेरणा प्राप्त करते हैं। सभी महान् विचारक अपने विचारों की स्पष्टता के लिए इसी केंद्र से मदद पाते हैं। दुनिया में जो भी वैज्ञानिक उन्नति हुई है, तीसरा तिल ही उसका केंद्र है। आँखों के पीछे का यह केंद्र सभी प्रेरणाओं का स्रोत है जिससे संसार के सब श्रेष्ठ ग्रंथ उत्पन्न हुए हैं। भविष्य में भी हम जो उन्नति करेंगे, उसके लिए भी ज्ञान और प्रेरणा का स्रोत यही बिंदु रहेगा। आध्यात्मिक संघर्ष में लगे हुए मनुष्य से मिलने के लिए परमात्मा की किरण ऊपर के मंडलों से उतरकर इसी केंद्र में आती है।
कौन-सी चीज़ हमें तीसरे तिल से बाहर रखती है? क्यों नहीं दुनिया का हर इनसान अपनी पूरी कोशिश और शक्ति के साथ इस प्रेरणा और ज्ञान के चमत्कारपूर्ण भंडार में प्रवेश करने की कोशिश करता? क्योंकि हमारा ख़याल हमेशा से हमारे शरीर, नज़दीकी रिश्तेदारों, घर, देश और दुनियावी सुखों और कभी-कभी दु:खों और मुसीबतों में लगा रहा है और अभी भी लगा हुआ है और हमने अपने आपको इन चीज़ों में इतना उलझा लिया है कि अपनी पहचान खो बैठे हैं। जब तक हम अपने को इस बाहरी जंजाल से अलग करने की कोशिश नहीं करेंगे और अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ ख़याल को ऊपर ले जाने और नीचे उतारने का अभ्यास पक्का नहीं कर लेंगे तब तक हम इस मार्ग पर तरक़्क़ी नहीं कर सकेंगे।
हमें अपनी सोई हुई रूहानियत को फिर से जगाना होगा ताकि हम मन और शरीर पर अधिकार प्राप्त कर लें। जब हम मन से काम लेना चाहें, तभी मन को काम करना चाहिए और जब हम इसे स्थिर करना चाहें, तब इसे स्थिर होकर बैठ जाना चाहिए। जब हम इस दुनिया में काम करना चाहें, तो हमारे ख़याल को इस शरीर में लौट आना चाहिए और जब हम ऊपरी मंडल में काम करना चाहें तो इसको इस शरीर से सिमटकर ऊपर उठ जाना चाहिए। यह ख़याल ही है जो अंदर जाएगा और वहाँ देखेगा और जब तक यह बाहर दौड़ रहा है, तब तक अंदर कौन देखेगा? अगर एक मकान का मालिक अपने घर के बाहर जाकर बैठा रहे और शिकायत करे कि अंदर क्या-क्या हो रहा है, इसका उसे पता नहीं है कि तो उसकी यह शिकायत सही नहीं है।
दुनिया से ख़याल का संबंध तोड़ने का काम धीरे-धीरे होता है। पुरानी आदतें हमारा स्वभाव बन जाती हैं। नई आदत डालने में वक़्त लगता है। लेकिन धीरे-धीरे लगातार कोशिश से जीत हासिल होती है और अभ्यास से पूर्णता प्राप्त होती है। आप अपने मन की एक पल के लिए चौकीदारी कीजिए और देखिए कि कौन-सी वस्तु इसे केंद्र से दूर रखती है। जो वस्तु हमें तीसरे तिल से बाहर रखे, उससे दूर रहना चाहिए और जो वस्तु हमें अंदर ले जाए, उसका स्वागत करना चाहिए। सन्तों का साधन – जो मैं पहले ही बता चुका हूँ – बहुत लंबे अनुभव पर आधारित है।
अगर हम निश्चित रूप से जानते हैं कि हम सही मार्ग पर चल रहे हैं, तब अगर हम हर रोज़ सिर्फ़ एक क़दम भी चलेंगे तो भी मंज़िले-मक़सूद के नज़दीक होते जाएँगे और एक दिन वहाँ ज़रूर पहुँच जाएँगे चाहे वह मंज़िल कितनी भी दूर क्यों न हो। आप शायद कहेंगे, “मैं किस तरह इस बात को जानूँ कि मैं ठीक मार्ग पर हूँ।” मैं आपको इसे ख़ुद जाँचने का साधन बताता हूँ। जब तक आपने ख़ुद किसी चीज़ की जाँच नहीं की है, तब तक आपको सिर्फ़ विश्वास के आधार पर काम करना होगा, ठीक वैसे ही जैसे हम यह विश्वास रखकर पुल बनाते हैं कि हम उसे पार कर जाएँगे।
महाराज सावन सिंह जी, परमार्थी पत्र, भाग 2
***
भले ही ऐसा लगे कि सफलता नहीं मिल रही है, फिर भी विश्वास और लगन के साथ अभ्यास करते रहना चाहिए। मन अनगिनत युगों से बाहर भटकने का आदी हो चुका है और हर बार यह अधिक फैलता गया है। हमारा उद्देश्य मन को समेटकर तीसरे तिल पर लाकर शब्द से जोड़ना और निज-घर की ओर यात्रा शुरू करना है। तीसरे तिल तक आना पहला क़दम है; यही सबसे कठिन है। यहाँ तक पहुँचने में कितना समय लगता है, यह हमारे पिछले कर्मों के फल और दृढ़ता, सच्चाई तथा लगन के साथ सतगुरु के हुक्म के अनुसार अभ्यास करने पर निर्भर करता है। करनी और दया-मेहर साथ-साथ चलते हैं। जितना अधिक हम प्रयत्न और मेहनत करते हैं, उतनी ही अधिक दया-मेहर हमें तब तक प्राप्त होती रहती है जब तक हम अपनी मंज़िल पर नहीं पहुँच जाते।
महाराज चरन सिंह जी, सन्तमत दर्शन
उसके प्रेम के साँचे में ढले
हमारी भावनात्मक मज़बूती और आत्म-विश्वास की बुनियाद उन लोगों द्वारा बनाई जाती है जो हमारे जीवन के शुरुआती वर्षों में हमारी परवरिश करते हैं। गहराई से अध्ययन करने पर यह तथ्य सामने आया है कि अगर बचपन में हमारी परवरिश बिना नुक़्ताचीनी के तथा प्रेम-प्यार से की जाती है तो मुश्किल हालात से उबरने की हमारी क्षमता और आत्म-विश्वास बढ़ने लगता है। वहीं अगर हमें वह प्यार और सहारा नहीं मिलता तो हम असुरक्षित व डरपोक बन जाते हैं और हम आसानी से हार मान लेते हैं।
रूहानी मार्ग पर चलते हुए, सतगुरु का प्रेम ही हमारे जीवन को सही दिशा देता है, हमें सहारा और आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। आज अगर हम कोई भी क़ुर्बानी देने और कड़ी मेहनत करने के लिए तैयार हैं; अगर हम नए जगत की खोज करने के लिए अपने ‘कम्फर्ट ज़ोन’ से बाहर निकलने का साहस रखते हैं तो उसकी वजह सिर्फ़ यह है कि सतगुरु का प्रेम हमें ऐसा करने के लिए प्रेरित कर रहा है।
हम सब ने कई तरह से उनके प्रेम को अनुभव किया है – मुश्किल समय में उनका मार्गदर्शन, बार-बार पूछे जानेवाले एक ही तरह के सवालों का धैर्यपूर्वक जवाब देना, हमारे लिए उनकी प्यारी-सी मुस्कान और उनकी प्यार-भरी दृष्टि। इस तरह के अनुभव शिष्य को बहुत कुछ सिखाते हैं।
सतगुरु का प्रेम हमें ख़ुशी देता है, हमें उम्मीद देता है और हमारे अंदर ऐसी गहरी लगन या जुनून पैदा कर देता है कि हमें पता भी नहीं चलता कि कब हम अपनी कमज़ोरियों और कमियों के बावजूद, उस पूर्ण प्रेम को पाने के सपने देखने लगते हैं और इसके लिए संघर्ष और कुछ भी क़ुर्बान करने के लिए तैयार हो जाते हैं।
रूमी ने सतगुरु को ‘साक़ी’ कहा है क्योंकि वह अपने दिल के जाम से मदहोश कर देने वाले दिव्य प्रेम के आनंद को शिष्य के दिल में उड़ेल देता है। एक बार जब हम उस प्रेम का अनुभव कर लेते हैं तो फिर हमारा किसी दूसरी चीज़ से संतुष्ट होना बहुत मुश्किल हो जाता है।
यह मुनासिब नहीं कि साक़ी तुझ-सा हो और हम होश में रहें!
जलाल अल-दीन रूमी
बेशक़ इसका मतलब यह नहीं कि हमें अपने रूहानी सफ़र में कभी भी बेबसी और निराशा का सामना नहीं करना पड़ता लेकिन सतगुरु का प्रेम हमें लगातार संघर्ष करते रहने की प्रेरणा देता है। चाहे हमें यह पसंद हो या न हो, चाहे हमें इस बात का एहसास हो या न हो, हमारी आत्मा बलवान हो रही है और हम सच्चे प्रेमी बनना सीख रहे हैं– ऐसे प्रेमी जो थोड़ी-सी मुश्किल आने पर न तो कोशिश करना छोड़ते हैं और न ही हिम्मत हारते हैं।
हे ईसा! यदि तुमसे प्रेम करने की इच्छा ही इतनी आनंददायक है तो उस प्रेम को पाना और उसका आनंद लेना कितना सुखद होगा? मेरे जैसी अपूर्ण आत्मा पूर्ण प्रेम को पाने की आकांक्षा कैसे कर सकती है?…मैं बाज़ नहीं हूँ, मेरे पास सिर्फ़ उस जैसी आँखें और दिल है। बहुत अधिक तुच्छ होने के बावजूद, मैं उस दिव्य सूर्य, प्रेम के सूर्य को देखने का साहस करती हूँ और मेरा दिल अपने भीतर बाज़ की सारी आकांक्षाओं को महसूस करता है।…फिर इसका क्या होगा? क्या यह ख़ुद को इतना बेबस महसूस करते हुए दु:ख से मर जाएगा? अरे नहीं! इस छोटे-से पक्षी को तो कोई परेशानी भी नहीं होगी। पूरे समर्पण के साथ, यह अपने दिव्य सूर्य को निहारते रहना चाहता है। इसे कुछ भी डरा नहीं पाएगा, न हवा, न बारिश और यदि काले बादल आकर प्रेम के उस सितारे को छिपा लें, तो भी यह छोटा-सा पक्षी अपनी जगह से नहीं हिलेगा क्योंकि इसे पता है कि बादलों के उस पार उसका सूर्य अब भी चमक रहा है।
लिसिएक्स की सेंट थेरेसी, स्टोरी ऑफ़ ए सोल
प्रेम होने पर सब कुछ बहुत सहज हो जाता है। एक प्रेमी मुश्किल से मुश्किल कार्य को भी बड़ी आसानी से कर लेता है। प्रेम से नामुमकिन कार्य भी मुमकिन हो जाता है। प्रेम हर डर को बाहर निकाल देता है।
हज़रत मुहम्मद के साथी कवच के बग़ैर
जंग के मैदान में कूद गए।
वे उनके इश्क़ के नशे में पूरी तरह मस्त और मदहोश थे।
जलाल अल-दीन रूमी
मन के साथ हमारा संघर्ष लगातार जारी रहता है; यह हमें बार-बार इंद्रियों की ओर खींचता है, यह मार्ग के प्रति हमारी दृढ़ता को लेकर संदेह पैदा करता है, यह हमारे अंदर डर पैदा करता है, इसकी वजह से ही हम मायूस और बेचैन रहते हैं। दूसरी ओर अपने सतगुरु की संगति में होनेवाले अनुभव – उनका साथ, उनकी प्यार-भरी देखभाल और उनकी रूहानी शक्ति – यक़ीन मानिए कि सब कुछ हमारे हित में है।
बेक़रार करने वाली तेरे इश्क़ की आग में,
मैंने बहुतों को बेक़रार मगर साकिन देखा है।
जलाल अल-दीन रूमी
मन हमारे ध्यान को तीसरे तिल से भटकाता रहता है मगर इसके बावजूद हम स्थिर होकर बैठने और भजन-सिमरन के लिए निश्चित समय देने की कोशिश करते हैं। क्या ऐसा इसलिए नहीं है कि हम अपने सतगुरु की ख़ुशी प्राप्त करना चाहते हैं? क्या उनका प्रेम ही हमारी प्रेरणा का स्रोत नहीं है?
सतगुरु का प्रेम ही हमें भजन-सिमरन करने के लिए प्रेरित करता है। भजन-सिमरन करने की हर छोटी से छोटी कोशिश हमारी आत्मा की क़ामयाबी में बहुत बड़ी भूमिका निभाती है जिससे हम साहसी, प्रसन्नचित्त और दृढ़ निश्चयी बन जाते हैं।
जो आशिक़ कोशिश करते हैं,
उन पर हर लम्हा महबूब तोहफ़े निसार करता है।
वही है दिलो-जान रूह की
जो जान डाल देता है दिल में, इश्क़ के।
जलाल अल-दीन रूमी
कभी-कभी हो सकता है कि हम सतगुरु को याद न करें और शारीरिक तौर पर हम अपने प्रियतम से जुदा हों लेकिन उनका प्रेम सदा क़ायम रहता है। सतगुरु का प्रेम सच्चा और नि:स्वार्थ होता है।
ऐ शम्से-तब्रीज़ी, अल्फ़ाज़ नहीं हैं तुझे बयान करने के लिए –
सिवा इसके कि, ख़ुदा क़सम, क्या ख़ूब यार है तू,
क्या ख़ूब यार है तू!
जलाल अल-दीन रूमी
जीवन के उतार-चढ़ाव की वजह से अगर हम कभी हिम्मत हारकर निराश हो जाएँ तो सिर्फ़ उनके प्रेम को याद करें – जो उनकी अपार दया-मेहर से हम पर बरस रहा है भले ही हम उसके लायक़ न हों।
हाँ, मेरे प्रियतम, इसी प्रकार मेरा जीवन समर्पित होगा। आपके प्रति अपने प्रेम को साबित करने का मेरे पास और कोई ज़रिया नहीं है, सिवाय फूल बिखेरने के –यानी एक छोटा-सा बलिदान भी हाथ से न जाने देना, एक नज़र, एक शब्द भी नहीं; छोटी से छोटी बात का लाभ उठाना और उन्हें प्रेम के साथ करना…चाहे मुझे काँटों के बीच में से फूल इकट्ठा करने पड़ें, मैं फिर भी गाती रहूँगी और मेरा गीत उतना ही सुरीला होगा, जितने बड़े और तीखे वे काँटे होंगे।
लिसिएक्स की सेंट थेरेसी, स्टोरी ऑफ़ ए सोल
विचार करने योग्य
सत्संगी को चाहिए कि वह सब परिस्थितियों का विश्वास और साहस के साथ सामना करे, हिम्मत न हारे और भजन-सिमरन में तो कभी भी लापरवाही न करे। अगर लापरवाही हो जाए तो उसे जितनी जल्दी दूर किया जा सके उतना ही अच्छा है। भजन-सिमरन में नियमित रहने से ऐसा विश्वास और बल मिलता है जिसे और किसी भी तरह से प्राप्त करना कठिन है। भजन से ही आपको यह भी पता चलेगा कि सतगुरु किस प्रकार हमारी सहायता और सँभाल कर रहे हैं।
महाराज चरन सिंह जी, सन्तमत दर्शन
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आपको ख़ुद मालिक ने दया-मेहर करके अपने निज-धाम का रास्ता दिया है और अनामी राधास्वामी का धाम, जो सबसे परे है, वह मिला है, इसलिए उसकी कमाई करो और प्रेम-प्यार पक्का रखो, भरोसा पक्का रखो कि एक दिन इसी देह में निज धाम पहुँचा देंगे। निज मन की लाग, सुरत और निरत लगाकर प्रेम-प्रीत से शब्द-धुन की आवाज़ को सुनो। पिंडी मन (स्थूल मन) की वासना को छोड़कर यह अभ्यास रोज़-रोज़ करो, चाहे थोड़ा ही करो। सबको यह ताकीद है कि भजन और सिमरन रोज़-रोज़ करना।
बाबा जैमल सिंह जी, परमार्थी पत्र, भाग 1
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दूसरों की मदद करना और निस्स्वार्थ होना निश्चित रूप से अच्छी बात है लेकिन ऐसे कार्यों को बँधन नहीं बना लेना चाहिए। हमें निर्लेप होकर दूसरों की मदद इस हद तक करनी चाहिए कि यह हमारे मन पर बोझ न बने। अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारियाँ तथा अन्य कर्तव्य पूरे करते रहें, परंतु अंतर में जाने के अपने असल कार्य को न भूलें। दूसरे लफ़्ज़ों में, दुनियावी बंधनों में न फँसें। ऐसे मामलों में किसी भी काम की परख ख़ुद से यह सवाल पूछकर करनी चाहिए कि क्या यह काम मेरे भजन-सिमरन में बाधा तो नहीं बन रहा? यदि कोई काम भजन-सिमरन में बाधा डाले तो निस्संकोच उसे त्याग देना चाहिए।
सरदार बहादुर जगत सिंह जी, द साइंस ऑफ़ द सोल
फिर से शुरुआत करना
हम सब को जीवन के किसी न किसी पड़ाव पर वीडियो गेम खेलना याद होगा। किसी एक गेम को चुनना, किसी लक्ष्य को लेकर शुरुआत करना और उस लक्ष्य तक पहुँचने के लिए हड़बड़ी में कंट्रोलर पर बटन दबाते रहना। लेकिन जब हमसे गलती हो जाती थी या कोई ऐसी रुकावट आ जाती थी जिसे पार करना नामुमकिन लगने लगता था तब हम क्या करते थे? हम अकसर ‘रिसेट’ बटन दबाकर गेम को फिर से शुरू कर देते थे और कभी-कभी हमें महसूस होता था कि दूसरी या तीसरी बार में उस गेम को खेलना आसान हो गया है।
हमारा जीवन भी एक वीडियो गेम की तरह ही है जिसमें बहुत-से खिलाड़ी एक साथ खेलते हैं। हम खेल शुरू करते हैं और हमारा एक अंतिम लक्ष्य होता है। इस खेल के दौरान जो लोग, चीज़ें और परिस्थितियाँ हमें हमारे लक्ष्य की ओर बढ़ने की प्रेरणा देते हैं, वे हमारी शक्ति को बढ़ाते हैं। साथ ही इस खेल में हमें ऐसे लोगों, चीज़ों और परिस्थितियों का सामना भी करना पड़ता है जो हमारे खेल में अड़चनें पैदा करके हमें आगे बढ़ने से रोकते हैं। वीडियो गेम की तरह ही हमारे जीवन में भी एक रिसेट बटन है। यह रिसेट बटन भले ही जो कुछ घट चुका है उसे बदल न सके, लेकिन यह हमें फिर से शुरुआत करने का मौक़ा देता है। तो जीवन में इस रिसेट बटन को कैसे दबाया जाए?
फिर से शुरुआत करने का पहला क़दम अपने जीवन के मक़सद की पहचान करना है। दुनिया की रोज़मर्रा की भागदौड़ में हम बड़ी आसानी से अपने असल मक़सद को भूल जाते हैं।
ज़िंदगी का असली मक़सद परमात्मा से मिलाप करना है। परमात्मा ने सिर्फ़ इनसान को ही यह हक़ दिया है। यह मनुष्य-शरीर सृष्टिरूपी सीढ़ी का सबसे ऊपरी डंडा है। यहाँ से या तो हम फिसलकर निचली योनियों में जा सकते हैं या फिर इससे ऊपर उठकर परमात्मा से मिलाप करके जन्म-मरण के चक्कर से छुटकारा पा सकते हैं। हम इस दुनिया में चाहे दूसरी योनियों में भी आए हों, बाक़ी सब चीज़ें तो हमें वहाँ भी मिलती रही हैं।
महाराज चरन सिंह जी, संत संवाद, भाग 1
अगला क़दम रूहानी अभ्यास को समय देना है। जो कुछ हमने सीखा है, उस पर अमल करना है। हमें यह याद रखना चाहिए कि हमारा रूहानी अभ्यास दिन के कुछ घंटों तक ही सीमित नहीं होना चाहिए बल्कि हम जो कुछ भी करते हैं उसमें से इसकी झलक दिखाई देनी चाहिए।
जब हम दिन में अपने दुनियावी काम शुरू करते हैं तो हमें भजन-सिमरन को भूल नहीं जाना चाहिए। इसका प्रभाव हमारे साथ बना रहना चाहिए। भजन-सिमरन हमारे अंदर नेक विचार, अच्छी सोच और अच्छे उसूल क़ायम करता है और हमें अपने रोज़मर्रा के कामकाज के दौरान इन सबको नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। हमारे जीवन के सभी कार्यों में हमारे भजन-सिमरन की झलक दिखायी देनी चाहिए।
महाराज चरन सिंह जी, संत संवाद, भाग 2
तीसरा क़दम अपनी कोशिशों को जारी रखना है। रूहानी तरक़्क़ी की कोशिश के बावजूद जब हमें रूहानी तरक़्क़ी होती दिखाई नहीं देती तब हम निराश हो सकते हैं। फिर भी इस वजह से हमें कोशिश करना छोड़ नहीं देना चाहिए। आख़िरकार, लगातार कोशिश करते रहने से यह हमारी आदत बन जाता है। महाराज चरन सिंह जी एक शिष्य के सवाल का जवाब देते हुए फ़रमाते हैं:
आदतें आसानी से पड़ जाती हैं और जल्दी ही हमारी रोज़ की दिनचर्या का हिस्सा बन जाती हैं और फिर अगर हम रोज़ की आदत के मुताबिक़ कोई काम न करें, तो ऐसा लगता है कि कुछ ऐसा है जो हम नहीं कर रहे। इसी तरह हर रोज़ एक ही समय पर बैठने से भजन-सिमरन हमारी दिनचर्या का हिस्सा बन जाता है। मिसाल के तौर पर, हमें चाहे भूख लगी हो या न लगी हो, हम दोपहर को एक बजे खाने की मेज़ पर जा बैठते हैं; या फिर जैसे ही घड़ी में सुबह के ग्यारह बजते हैं, आप कॉफ़ी पीने बैठ जाते हैं। ये बातें आदत बनकर हमारी दिनचर्या का एक हिस्सा बन जाती हैं। इसी तरह भजन-सिमरन भी हमारी आदत और दिनचर्या का हिस्सा बन जाना चाहिये। अगर आप भजन-सिमरन को ज़िंदगी के बाक़ी कामों से कम अहमियत देंगे और सोचेंगे कि चलो, जब वक़्त मिलेगा भजन कर लेंगे, या जब दिल चाहेगा तब भजन में बैठेंगे, तो आप कभी भजन-सिमरन कर ही नहीं सकेंगे। इसलिए आपको इसे अपनी ज़िंदगी का एक ज़रूरी हिस्सा बना लेना चाहिए।
महाराज चरन सिंह जी, संत संवाद, भाग 2
इसके बाद हमें अपनी नकारात्मकता को ख़त्म करने की ज़रूरत है। ज़िंदगी सदा हमारे सामने चुनौतियाँ खड़ी करती है और अकसर उस समय जब हमें इनकी बिलकुल उम्मीद नहीं होती। ऐसी स्थिति में या तो हम बिलकुल निराश हो सकते हैं क्योंकि चीज़ें हमारी मर्ज़ी के मुताबिक़ नहीं हो रहीं या फिर हम हिम्मत जुटाकर आशावादी दृष्टिकोण अपना सकते हैं। अपने सीमित नज़रिए की वजह से शायद हमें अपनी तरक़्क़ी दिखाई नहीं देती, लेकिन सतगुरु हमें यक़ीन दिलाते हैं कि यदि हम हमेशा अपनी तरफ़ से पूरी ईमानदारी से कोशिश करते रहें तो हम हमेशा तरक़्क़ी करते हैं, भले ही वह थोड़ी-सी ही क्यों न हो।
अगर हम अभी तक संघर्ष कर रहे हैं तो भी हमें कोशिश करते रहना चाहिए। हमें हर पल, हर दिन नई शुरुआत करने का मौक़ा मिलता है। पिछली कमियों और कमज़ोरियों को पकड़कर बैठे रहना तो आसान है लेकिन हमें उन चीज़ों को छोड़ देना चाहिए जिन्हें हम बदल नहीं सकते या जिन पर हमारा कोई वश नहीं चलता। हमें कोशिश करते रहना चाहिए – हमसे बस यही उम्मीद की जाती है।
तो चलिए, ज़िंदगी की नई शुरुआत करने के लिए थोड़ा-सा समय निकालें – अपने मक़सद को पहचानें, भजन-सिमरन करें, उसे करते जाएँ, नकारात्मकता को ख़त्म करें और फिर से कोशिश करें।
क्या आप जानते हैं?
इनसान को यह शक्ति प्राप्त है कि वह शरीर और मन दोनों के मोह से अलग हो सके, इसलिए उसका यह कर्तव्य है कि वह उस शक्ति को विकसित करे और शरीर और मन के दु:खों से आज़ाद हो जाए। इसका सबसे आसान तरीक़ा यह है कि हम उससे प्रेम करें जो मन और शरीर के दायरे के पार का हो और वह शब्द-धुन है। धुन के साथ जितना गहरा प्रेम होगा, मन और शरीर से उतना ही ज़्यादा मोह टूटता जाएगा।
महाराज सावन सिंह जी, परमार्थी पत्र, भाग 2
***
आम तौर पर जब मन चिंतित और परेशान हो तो एकाग्रता प्राप्त कर सकना कठिन होता है क्योंकि ऐसे समय में ध्यान ऊपर तीसरे तिल की ओर उठने के बजाय हृदय चक्र में अटका रहता है। कठिनाइयों का सामना करने के लिए उचित उपाय करने चाहिएँ और फिर चिंता नहीं करनी चाहिए। शेष सब सतगुरु की मौज पर छोड़ देना चाहिए; वे जो ठीक समझें, करें।
सरदार बहादुर जगत सिंह जी, आत्म-ज्ञान
***
संतों के सत्संगी को मरते वक़्त तकलीफ़ नहीं होती, बल्कि और शूरता आ जाती है, क्योंकि वह पहले से मौत को याद रखता है और संसार में कारज मात्र बरतता है। उसकी संसार की जड़ पहले से कटी हुई है। जैसे कटे हुए दरख़्त की हरियाली चंद रोज़ की है, इस तरह संतों के सत्संगी का संसारी व्यवहार समझना चाहिए।
स्वामी जी महाराज, सारबचन राधास्वामी वार्तिक
जटिल भ्रम से सरल सत्य की ओर
इस मायामय जगत में हम युगों-युगों से और अनगिनत जन्मों से रह रहे हैं। हालाँकि हम जानते हैं कि हमारे आसपास का माहौल हमें बहुत प्रभावित करता है और हमारी सोच को निर्धारित करता है, फिर भी हम में अपनी इच्छाओं के अनुसार धारणाएँ बनाने की अद्भुत क्षमता है। इस मायामय जगत का हिस्सा होने के कारण हम अकसर ख़ुद ही अपने लिए भ्रम के जाल बुन लेते हैं।
भर्म का बाँधा ई जगत्, येहि बिधि आवे जाय।
मानुष जीवन पाय के, नर काहे जहँड़ाय॥
कबीर साहिब
बदक़िस्मती से, यह हमारे रूहानी जीवन को भी प्रभावित करता है जिससे हमारे लिए संतमत के सरल-से उपदेश को समझना मुश्किल हो जाता है तथा हम माया के जाल में और ज़्यादा उलझ जाते हैं।
सत्य सरल है, भ्रम इसे अत्यंत जटिल बना देता है।
मेहर बाबा, कॉन्सेप्ट्स एण्ड इल्यूजन्स: ए पर्सपेक्टिव
किताब-ए-मीरदाद में एक कहानी है। उस कहानी में एक महात्मा ने प्रवचन समाप्त करने के बाद अपने शिष्यों की ओर देखा ताकि अगर किसी को कोई सवाल पूछना हो या कोई शंका दूर करनी हो तो वह कर सके। तभी उनमें से एक शिष्य उठकर खड़ा हुआ और हिम्मत जुटाते हुए बोला, “गुरु जी, आप जो कुछ भी कहते हैं, वह हमें हमेशा उलझन में डाल देता है क्योंकि आप हमें ऐसी बातें समझाते हैं जो कभी किसी व्यक्ति ने नहीं की या किसी किताब में नहीं लिखी गईं।” दूसरे शिष्यों ने आगे से कहा, “आप जो भी समझाते हैं, हमें कम से कम उसका कोई सबूत तो दीजिए ताकि हम उस पर आसानी से भरोसा कर सकें और उसे अमल में ला सकें।”
इसके जवाब में उस महात्मा ने बड़े प्यार से कहा, “तुमने बिलकुल ठीक कहा। दरअसल, तुम्हारे पास बहुत-से कान हैं, इसलिए तुम सुन नहीं पाते। अगर तुम्हारे पास सुनने और समझने के लिए सिर्फ़ एक कान होता तो तुम्हें किसी सबूत की ज़रूरत न पड़ती।”
कन्फ़्यूशियस का कथन है:
जीवन असल में बहुत सरल है लेकिन हम इसे जटिल बनाने में लगे रहते हैं।
लाइफ़’ज़ टू शॉर्ट टू फोल्ड फिटेड शीट्स’ पुस्तक में से उद्धृत
अगर जीवन सरल है तो क्या रूहानी जीवन के रहस्य को समझना भी सरल नहीं होना चाहिए?
रूहानियत परम सत्य का मार्ग है जिसके सिद्धांत इस प्रकार हैं:
- परमात्मा की दया-मेहर, जिससे सतगुरु से मिलाप होता है;
- सतगुरु, जो हमें नाम से जोड़ते हैं;
- नाम, जो परमात्मा या ‘शब्द’ है।
सचै सबद सची पति होई॥ बिन नावै मुकति न पावै कोई॥
बिन सतिगुर को नाउ न पाए प्रभ ऐसी बणत बणाई हे॥
गुरु अमर दास जी, आदि ग्रंथ
पूर्ण सतगुरु ही नाम के इस रहस्य को समझने में हमारी मदद करते हैं। वह हमें इस भ्रमपूर्ण दुनिया से मुक्ति के दरवाज़े तक पहुँचने का मार्ग दिखाते हैं और उसे खोलने की सरल युक्ति भी समझाते हैं।
नउ दर ठाके धावत रहाए॥ दसवै निज घर वासा पाए॥
ओथै अनहद सबद वजहि दिन राती गुरमती सबद सुणावणिआ॥
गुरु अमर दास जी, आदि ग्रंथ
संत-सतगुरु हमें समझाते हैं कि सत्य और असल आनंद दसवें दरवाज़े यानी तीसरे तिल में जाकर ही प्राप्त होता है। जब तक हम अपने ध्यान को अंदर तीसरे तिल पर केंद्रित करके वहाँ मौजूद दिव्य ध्वनि और प्रकाश से नहीं जुड़ जाते तब तक हमें सदा का सुख प्राप्त नहीं हो सकता। ध्यान के एकाग्र होने पर आत्मा को शब्द की वह दिव्य-धुन सुनाई देने लगती है जिसे आत्मा अपनी सुनने की शक्ति ‘सुरत’ द्वारा सुनती हुई वापस निज-घर पहुँच जाती है। धीरे-धीरे आत्मा अपनी देखने की शक्ति ‘निरत’ द्वारा उस प्रकाश को देखने लगती है जो आत्मा के मार्ग को और ज़्यादा प्रकाशवान करता है। जब आत्मा अपनी मंज़िल पर पहुँचकर परमात्मा में अभेद हो जाती है तब वह अकथनीय शांति और परम आनंद के लोक में पहुँच जाती है। फिर वहाँ से इसे मायामय संसार में वापस नहीं लौटना पड़ता क्योंकि फिर यह मृत्यु और पुनर्जन्म के बंधन से मुक्त हो जाती है। नीचे दिया कथन बड़े सुंदर ढंग से गुरु नानक देव जी के उपदेश का सार व्यक्त करता है:
बिन नावै को संग न साथी मुकते नाम धिआवणिआ॥
आदि ग्रंथ
संत-सतगुरु हमें बार-बार नियमित रूप से भजन-सिमरन करने की नसीहत देते हैं जबकि हमें लगता है कि उनके मार्गदर्शन से हमें तुरंत आत्म-ज्ञान प्राप्त हो जाएगा। लेकिन जब ऐसा नहीं होता तब हम यह मान लेते हैं कि हम भजन-सिमरन में असफल हो गए हैं।
एक बार एक महात्मा ने अपने शिष्य को एक बहुत बड़े पत्थर को धकेलने के लिए कहा। समर्पित शिष्य होने के कारण उसने तुरंत यह काम शुरू कर दिया। उसने पत्थर को धकेलने की बहुत कोशिश की लेकिन वह हिला तक नहीं। उसने कई घंटों तक उस पत्थर को हिलाने के लिए पूरी कोशिश की – मगर वह उस पत्थर को इंच-भर भी न हिला सका।
वह निराश होकर अपने गुरु के पास वापस आया और उसने उन्हें अपनी असफलता के बारे में बताया। पर वह महात्मा अपने शिष्य की लगन और मेहनत से बहुत ख़ुश हुए और उन्होंने कहा, “मेरे बच्चे! मैंने तुम्हें पत्थर हिलाने के लिए नहीं, बस धकेलने के लिए कहा था!”
संत-सतगुरु हमेशा इस बात पर ज़ोर देते हैं कि इस मार्ग पर कोई असफल नहीं होता लेकिन परमात्मा से मिलाप के लिए यह ज़रूरी है कि हम सतगुरु द्वारा दी गई हिदायतों का पालन करें और रूहानी अभ्यास द्वारा मन को निर्मल करें। वे समझाते हैं कि भजन-सिमरन हमारे रूहानी सफ़र में बहुत अहम है। हमें नियमित रूप से बस अपने भजन-सिमरन के लिए बैठना है और अपने मन रूपी बर्तन को साफ़ रखना है। हमारी ज़िम्मेदारी सिर्फ़ कोशिश करना है और इस सफ़र में हम जिस भी मुक़ाम पर हैं उसके लिए शुक्रगुज़ार होना है यानी कि हमें परमात्मा की रज़ा में राज़ी रहना है।
सतगुरु हमें यक़ीन दिलाते हैं कि प्रेम और श्रद्धा-भाव से किये गए नियमित अभ्यास से परमात्मा की दया-मेहर सहज रूप से प्राप्त होती है जो हमें हमारी अंतिम मंज़िल पर पहुँचा देती है। हुज़ूर महाराज चरन सिंह जी हमेशा इन शब्दों द्वारा हमें पहला क़दम उठाने के लिए प्रेरित करते थे:
हमारी जड़ें यहाँ इतनी गहरी हो गई हैं कि उन्हें उखाड़ना इतना आसान नहीं है। इसलिए हमारा एक क़दम बढ़ाना भी बहुत बड़ी बात है … उसकी ओर बढ़ाया हमारा एक क़दम भी काफ़ी है।
महाराज चरन सिंह जी, संत संवाद, भाग 2
रूहानी मार्ग सिर्फ़ बातों का नहीं बल्कि करनी का मार्ग है। एक चीनी कहावत इसे बहुत सटीक और संक्षिप्त रूप में पेश करती है: “मैं सुनता हूँ और भूल जाता हूँ, मैं देखता हूँ और याद रखता हूँ, मैं करता हूँ और समझ जाता हूँ।”
सत्य की पहचान तभी हो सकती है जब हम पूरे विश्वास और प्रेम द्वारा अज्ञानता और भ्रम की दीवारों को गिरा देते हैं। सच्ची लगन और भजन-सिमरन के लिए की गई निरंतर कोशिश आख़िरकार हमें जटिल भ्रम से सरल सत्य की ओर ले जाती है जैसा कि पुस्तक कॉन्सेप्ट्स एण्ड इल्यूजन्स: ए पर्सपेक्टिव में दर्ज इस ज़ेन कहानी में बताया गया है। किसी शिष्य ने अपने गुरु से पूछा: “क्या यह सच नहीं कि इनसान के सफ़र की आख़िरी मंज़िल परमात्मा से मिलाप है?” गुरु ने जवाब दिया: “इनसान के सफ़र की आख़िरी मंज़िल परमात्मा से मिलाप नहीं है क्योंकि जुदाई तो कभी थी ही नहीं। हमारे पास सिर्फ़ अंतर्दृष्टि होनी चाहिए ताकि हम इसका अनुभव कर सकें।”
रूहानी फुलझड़ियाँ
निराशा
महाराज सावन सिंह जी द्वारा की गई व्याख्या
पता करने पर मुझे मालूम हुआ कि आप बहुत मायूसी का अनुभव कर रहे हैं। इस मायूसी की वजह एकाग्रता की कमी और दु:ख है। आप जानते हैं कि हम सत्संगी इसलिए बनते हैं कि हम परमार्थ की दौलत पाकर दुनिया और इसके पदार्थों को महत्त्व न दें, सिर्फ़ अपनी ज़रूरत के अनुसार इनका इस्तेमाल करें। हमें संतोष और कृतज्ञता के साथ सभी दुनियावी चोटों, दु:खों, ख़ुशियों, तंदुरुस्ती, बीमारियों और कष्टों और जो कुछ भी हमारी राह में आए, उसको सहन करना चाहिए। बल्कि अभ्यासी का बर्ताव तो ऐसा होना चाहिए कि अगर उसे सारी दुनिया का राज मिल जाए, तो भी बहुत ख़ुश न हो और उस राज के वापस ले लिए जाने पर ज़रा भी उदास न हो।
अभ्यासी को इस दुनिया के सागर में दु:ख और सुख, आदर और निरादर, ख़ुशी और ग़म के भँवरों में से होकर निकलना होगा। अगर अभ्यासी डरपोक और कमज़ोर है तो वह सफल नहीं होगा। उसे रूहानी अभ्यास द्वारा अपने दिल को मज़बूत करना चाहिए और साहस और धैर्य के साथ ज़िंदगी के हालात का मुक़ाबला करना चाहिए। यह समझते हुए कि सभी कार्यों के पीछे मालिक का हाथ है, उसे मालिक की मौज में ख़ुश रहना चाहिए। इसलिए मायूस न होइए। दिल में धैर्य और संतोष रखिए और अपने दुनियावी फ़र्ज़ अदा करते जाएँ। सभी चिंताओं को भूल जाएँ और अपने रोज़ के काम करते जाएँ।
मालिक की ओर से जो कुछ भी हमारी ज़िंदगी में आता है, वह हमारे पिछले कर्मों का नतीजा होता है और उनका भुगतान सिर्फ़ हमारे फ़ायदे के लिए ही कराया जाता है। कई बार उसे सहन करना ज़रा मुश्किल हो जाता है, फिर भी मालिक की मौज में रहने की कोशिश करनी चाहिए। अगर अभ्यासी दुनियावी घटनाओं से विचलित हो जाता है और अपनी एकाग्रता खो देता है और सुख-दु:ख का अनुभव करता है, तो इससे यह साफ़ ज़ाहिर है कि सत्संग का अभी उस पर असर नहीं हुआ है। हिम्म्त रखिए, मन को मज़बूत कीजिए और ऊँचा उठाइए तथा अपना कर्तव्य निष्ठापूर्वक करते जाएँ।
परमार्थी पत्र, भाग 2
संतुलन की युक्ति
सबसे पहले तुम प्रभु के साम्राज्य में पहुँचने का यत्न करो, फिर तुम्हें सब कुछ अपने आप प्राप्त हो जाएगा।
बाइबल, सेंट मैथ्यू
हम अकसर अपने बड़े-बुज़ुर्गों को यह कहते हुए सुनते हैं, “हमें संतुलित जीवन जीना चाहिए।” संतुलन क्या है? सरल शब्दों में कहें तो संतुलन का मतलब है किसी चीज़ को इस तरह से टिकाना कि वह गिरे नहीं। हममें से बहुत-से लोग रोज़मर्रा की ज़िंदगी में चीज़ों का संतुलन बनाना जानते हैं जैसे कि ट्रे पर पानी का गिलास रखकर ले जाना या साइकिल चलाते हुए अपने शरीर का संतुलन क़ायम रखना। भले ही ये बातें सुनने में सरल लगती हों लेकिन शुरुआत में यह सब मुश्किल हो सकता है पर अभ्यास द्वारा धीरे-धीरे ऐसा करना आसान हो जाता है।
संतुलित जीवन के बारे में हर किसी की अपनी राय है। हम दुनिया और इसके शक्लों-पदार्थों के लिए भटकते हुए अपना जीवन बर्बाद कर लेते हैं। जैसे-जैसे जीवन आगे बढ़ता है और साल बीतते जाते हैं, हम दुनियावी मसलों में और अधिक उलझकर ग़लत चीज़ों को प्राथमिकता देने लग जाते हैं। संपूर्ण रूप से देखें तो जीवन में संतुलन बनाए रखने का मतलब है दुनियावी और परमार्थी दोनों लक्ष्यों को हासिल करना।
संत-सतगुरु ने हमें हर रोज़ ढाई घंटे भजन-सिमरन करने की रूहानी युक्ति बता दी है। यह हमें हमारे असल वुजूद के प्रति जागृत करता है। लेकिन फिर वही बात, यह कहने में जितना सरल लगता है, करने में उतना आसान है नहीं। सवाल-जवाब के हर सत्र के दौरान हमने अकसर शिष्यों को सतगुरु से यही कहते सुना है कि हम ढाई घंटे भजन-सिमरन के लिए नहीं बैठ पाते। सवाल भी अकसर यही होता है और जवाब भी हमेशा वही होता है।
आइए एक पतंग का उदाहरण लेते हैं जो एक डोर से बंधी हुई है जिसे हमने अपने हाथ में मज़बूती से थामा हुआ है। अब यदि हम इस डोर को थोड़ा-सा ढीला छोड़ दें तो पतंग थोड़ा ऊपर उठने लगेगी। जितना ज़्यादा हम डोर को ढीला छोड़ते जाएँगे, पतंग उतनी ही ऊपर उड़ती जाएगी। आत्मा के साथ भी कुछ ऐसा ही है; हम जितना अधिक अपने लक्ष्य पर ध्यान देंगे और भजन-सिमरन करेंगे, हमारी आत्मा धीरे-धीरे उतना ही ऊपर उठकर परमात्मा की ओर बढ़ने लगेगी। संत-सतगुरु अकसर इस बात पर ज़ोर देते हैं कि हमें छोड़ना सीखना चाहिए; जितना ज़्यादा हम अपनी डोर को दुनिया से बाँधे रखेंगे, उतनी ही हमारी आत्मा यहाँ फँसी रहेगी। आत्मा बड़ी मज़बूती से परमात्मा से बँधी हुई है; हमें भजन-सिमरन द्वारा आत्मा को धीरे-धीरे परमात्मा की ओर जाने देना है।
शिष्य और गुरु का रिश्ता बिलकुल माँ और बच्चे जैसा होता है। एक माँ का फ़र्ज़ अपने बच्चे को तब तक गोद में उठाना होता है जब तक कि वह चलना नहीं सीख लेता। फिर बच्चा छोटे-छोटे क़दमों से चलना शुरू करता है और धीरे-धीरे ठीक से चलना और आगे बढ़ना सीख लेता है। ठीक इसी प्रकार, शिष्य भी सतगुरु के मार्गदर्शन में अभ्यास द्वारा अपने ध्यान को एकाग्र करना सीख लेता है। शिष्य जितना अधिक समय उस अभ्यास में लगाता है, वह दुनियावी और परमार्थी जीवन के बीच उतनी ज़्यादा मज़बूती से संतुलन क़ायम कर पाता है।
हमारा सकारात्मक नज़रिया जीवन में संतुलन क़ायम करने में बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है जैसा कि इस सुप्रसिद्ध कहानी में दर्शाया गया है:
एक कारोबारी पहाड़ों पर छुट्टियाँ बिताने के लिए गया। वह वहाँ के ख़ूबसूरत नज़ारों का आनंद ले रहा था। उसने वहाँ एक किसान को घोड़ा गाड़ी लेकर पहाड़ी से नीचे उतरते देखा। उसने ताज़ी सब्ज़ियों से भरी गाड़ी को देखकर किसान की तारीफ़ की और पूछा कि इतनी सारी फसल की कटाई में उसे कितना समय लगा। किसान ने जवाब दिया, “ज़्यादा नहीं।” कारोबारी ने पूछा, “तो फिर तुमने ज़्यादा देर तक कटाई क्यों नहीं की?” किसान ने उसे इसका कारण समझाते हुए कहा, “क्योंकि मेरे और मेरे परिवार के लिए यह काफ़ी है।” कारोबारी ने पूछा, “तो फिर तुम अपने बाक़ी समय में क्या करते हो?” किसान ने कहा, “मैं काफ़ी देर तक सोता हूँ, कुछ समय खेत में हल चलाता हूँ, फिर मैं अपने बच्चों के साथ खेलता हूँ, बंदगी करता हूँ और पत्नी के साथ समय बिताता हूँ। शाम को मैं गाँव में दोस्तों से मिलने चला जाता हूँ, अच्छा खाना खाता हूँ और संगीत बजाता हूँ। मैं जीवन का भरपूर आनंद ले रहा हूँ।” यह सुनकर कारोबारी हैरान रह गया। उसने कहा, “मेरे पास एम. बी. ए. की डिग्री है और मैं तुम्हारी मदद कर सकता हूँ। तुम्हें खेती-बाड़ी में अधिक समय बिताना चाहिए, फिर तुम अतिरिक्त फ़सल बेच सकते हो, अधिक पैसा कमा सकते हो और एक बड़ा खेत ख़रीद सकते हो।” “और उसके बाद?” किसान ने पूछा।
“बड़े खेत से मिलने वाले अतिरिक्त पैसे से, तुम और खेत ख़रीद सकते हो और अंतत: उन्हें सँभालने के लिए और लोगों को काम पर रख सकते हो। अपनी फ़सल को बिचौलियों को बेचने के बजाय, तुम सीधे सुपरमार्केट के साथ सौदा कर सकते हो। कुछ समय बाद तुम ख़ुद का फ्लैगशिप स्टोर खोलने के क़ाबिल हो जाओगे। फिर तुम इस गाँव को छोड़कर शहर जा सकते हो और अंतत: पूरी कंपनी को चला सकते हो।” “इस सबमें कितना समय लगेगा?” किसान ने पूछा।
“बीस से पच्चीस साल।” “और उसके बाद?” “मेरे दोस्त, असली मज़ा तो तभी शुरू होता है। जब कारोबार वास्तव में बड़ा हो जाता है, तुम अपनी कंपनी को शेयर बाज़ार में दर्ज करवाकर लाखों रुपये कमा सकते हो!”
“वाह, लाखों-करोड़ों! उसके बाद क्या होगा?” किसान ने पूछा। “उसके बाद तुम किसी गाँव में एक आरामदायक रिटायर्ड जीवन बिता सकते हो, हर दिन देर तक सो सकते हो, थोड़ी खेती कर सकते हो, अपने पोते-पोतियों के साथ खेल सकते हो, बंदगी को समय दे सकते हो और पत्नी के साथ वक़्त गुज़ार सकते हो। शाम को तुम बाहर खाने पर जा सकते हो और अपने दोस्तों के साथ गीत गा सकते हो।” इस पर किसान ने उत्तर दिया, “यह तो बिलकुल मेरी मौजूदा ज़िंदगी जैसा ही है!” और वह वहाँ से चला गया।
इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि इनसान की मानसिक स्थिति और जीवन के प्रति उसका नज़रिया उसके द्वारा कमाए धन और उसे मिली सफलता से ज़्यादा मायने रखता है। परमात्मा ने हमें मनुष्य-जन्म का उपहार दिया है। यक़ीनन, हमें इस अनमोल उपहार के लिए शुक्रगुज़ार होना चाहिए। इसके अलावा, संतुलित जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए परमात्मा ने हमें दिन में पर्याप्त समय दिया है जिसमें हम न सिर्फ़ अपने निजी कर्तव्यों और ज़िम्मेदारियों को पूरा कर सकते हैं बल्कि परमात्मा के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को भी निभा सकते हैं यानी कि अपना भजन-सिमरन कर सकते हैं।
जिसे यह एहसास हो जाता है कि जो कुछ उसे मिला है, पर्याप्त है, उसे कभी कमी महसूस नहीं होती।
ताओ ते चिंग, लिविंग मेडिटेशन से उद्धरित
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दुनिया में संतुलन बनाए रखने के लिए आपको चाहिए कि अपना ध्यान तीसरे तिल पर टिकाए रखें। अगर आप ऐसा करेंगे और अंतर में नाम से जुड़े रहेंगे, तो आप दुनिया में अपना संतुलन बनाए रखने के क़ाबिल बन सकेंगे। आप अपने दुनियावी फ़र्ज़ भी निभाते रहेंगे और अपने उस मक़सद को भी पूरा कर सकेंगे जिसके लिए आपको यह मनुष्य-जन्म बख़्शा गया है। संतुलन बनाए रखने का यही मतलब है।
महाराज चरन सिंह जी, संत संवाद, भाग 3
अंतर्मुख होना
सबसे मुश्किल कामों में से एक है बुरे कर्म करने की प्रवृत्ति से छुटकारा पाना। हमें अपने हर विचार, शब्द और कर्म को लेकर सतर्क रहना चाहिए क्योंकि हमने निर्मल नैतिक जीवन जीने का संकल्प लिया है। लेकिन हम आसानी से डगमगा जाते हैं और सच के रास्ते पर चलते रहना मुश्किल हो जाता है, ख़ासकर तब जब हमें नेकी का सिला नेकी से नहीं मिलता या मुश्किल हालात हमारा इम्तिहान लेते हैं। फलस्वरूप, कर्म के नियम के मुताबिक़ हम अपने अच्छे और बुरे दोनों तरह के कर्मों का हिसाब देने के लिए जन्म-मरण के इस चक्र में फँसे रहते हैं। हम अकसर देखते हैं कि सजग रहने के बावजूद पुण्यों के बजाय हमारे पापों का पलड़ा अकसर भारी रहता है। अपने कर्मों का भुगतान देते हुए हम कई बार व्याकुल और परेशान हो जाते हैं। लेकिन ख़ुशक़िस्मती से हमारे पास एक ऐसा सहारा है जिससे हम मदद ले सकते हैं।
अगर बच्चा ग़लती करता है, शरारत करता है, कानून को भी तोड़ता है, तब भी बाप कभी उसे पुलिस के हवाले नहीं करता। बाप कभी नहीं चाहता कि बच्चा जेल जाए, पर वह यह तो चाहता ही है कि बच्चा सुधर जाए। इसलिए चाहे वह उसे पुलिस के हवाले न भी करे, जेल न भिजवाए, पर सज़ा ज़रूर देता है। इसका यह मतलब नहीं कि अगर हम भजन-सिमरन नहीं करते, फिर भी हमें स्वीकार कर लिया जाएगा और वापस ले जाया जाएगा। हमें सज़ा तो भुगतनी पड़ती है। कई बार बाप की सज़ा पुलिस की सज़ा से भी ज़्यादा कड़ी हो सकती है, पर उसके पीछे सुधार के इरादे के साथ-साथ प्यार भी होता है, बदले की भावना नहीं होती। बाप चाहता है कि बेटा सुधर जाए और एक बेहतर इनसान बने, पर वह अपने बेटे को पुलिस या जेल के अफ़सरों के हवाले नहीं करेगा।
महाराज चरन सिंह जी, संत संवाद, भाग 2
देहधारी सतगुरु की शरण में जाने का अर्थ है कि हम अपने कर्मों के भुगतान की ज़िम्मेदारी उन्हें सौंप देते हैं। अंग्रेज़ी भाषा में छपी पुस्तक ‘जप जी’ की शब्दावली हमारे कर्मों के निपटारे में सतगुरु की भूमिका पर प्रकाश डालती है:
जिस जीवात्मा को पूर्ण सतगुरु से नामदान मिल जाता है फिर उसके कर्मों का लेखा-जोखा धर्मराय के पास नहीं रहता क्योंकि सतगुरु ख़ुद उसके कर्मों के निपटारे की ज़िम्मेदारी ले लेते हैं, वह न्याय नहीं, दया-मेहर करके अपने शिष्य को बख़्श लेते हैं। धरम राए दर कागद फारे जन नानक लेखा समझा॥
गुरु रामदास जी, संत-मार्ग से उद्धरित
इसका मतलब यह बिलकुल नहीं है कि सतगुरु हमारे कर्मों को एकदम निपटा देते हैं। वे निष्पक्षता और सूझ-बूझ के साथ हमारे कर्मों का निपटारा करते हैं और साथ ही अपनी दया-मेहर के ज़रिए हमारे सख़्त कर्मों के प्रभाव को भी कम करते हैं। हम अकसर सुनते हैं कि सतगुरु कुम्हार की तरह होते हैं। कुम्हार मिट्टी को आकार देने के लिए उसे ज़ोर से थपथपाता है। वह बाहर से चोट मारता है जबकि उसका दूसरा हाथ मिट्टी को सही आकार देने के लिए अंदर से मज़बूती से सहारा देता है।
दिलचस्प बात यह है कि ‘टेम्परिंग’ का एक और अर्थ भी है जो मिश्रित धातु (alloys) जैसे कि स्टील या लोहे पर इस्तेमाल होने वाली तपाने की तकनीक से जुड़ा है ताकि धातु के कड़ेपन को कम करके उसे ज़्यादा लचीला बनाया जा सके। तपाने की इस प्रक्रिया से मिश्रित धातु का भुरभुरापन कम हो जाता है और वह अधिक लचीली बन जाती है मगर उसकी मज़बूती में कोई कमी नहीं आती।
नामदान के बाद जब सतगुरु हमारे कर्मों के निपटारे की ज़िम्मेदारी ले लेते हैं तब हमारे साथ भी यही होता है। वह निज-घर लौटने में हमारी मदद करने की ज़िम्मेदारी ले लेते हैं। वह हमें अपना प्रेम, सहारा और दया-मेहर प्रदान करते हैं ताकि हम संतुलन खोए बिना साहस के साथ अपने कर्मों का भुगतान कर सकें। उनके द्वारा तपाने वाली इस प्रक्रिया (अनुशासन) से गुज़रने के लायक़ बनने के लिए, और ज़्यादा शक्ति, मज़बूती तथा साहस प्राप्त करने के लिए, अपनी सुरत को अपने अंदर गूँज रही नाम या शब्द की दिव्य ध्वनि के साथ जोड़ने के लिए ही हम भजन-सिमरन करते हैं।
हुज़ूर महाराज चरन सिंह जी भजन-सिमरन की शक्ति को बयान करते हुए फ़रमाते हैं:
नाम की कमाई का थोड़ा-सा, ज़रा-सा अंश हमारे लाखों-करोड़ों कर्मों को भस्म कर सकता है। हम वाक़ई इन कर्मों का नाश करके इनसे ऊपर उठ जाते हैं और इस तरह नए कर्म भी जमा नहीं होते।….जब नाम और शब्द की कमाई से हमारा मन अपने ठिकाने पर पहुँच जाता है, तो ये नष्ट हो जाते हैं। छुरी पर चाहे कितना ही जंग लगा हो, जब आप उस छुरी को सान पर रगड़ते हैं तो सारा जंग उतर जाता है। वह एक नई छुरी की तरह फिर से चमकने लगती है। वह बिलकुल साफ़ हो जाती है।
संत संवाद, भाग 2
संत-महात्मा अकसर इस बात पर ज़ोर देते हैं कि भजन-सिमरन हमें अपना संतुलन खोए बिना प्रारब्ध का भुगतान करने की ताक़त देता है। जीवन में जैसी भी परिस्थितियाँ आती हैं भजन-सिमरन हमें उन्हें स्वीकार करना सिखाता है। जीवन में बहुत-से ऐसे सवाल और बहुत-सी ऐसी समस्याएँ हैं जिनका कोई समाधान नजर नहीं आता लेकिन भजन-सिमरन की मदद से हम उनसे ऊपर उठ सकते हैं।
हम भजन-सिमरन द्वारा अपने ध्यान को अंतर्मुख करके अपने पापों का प्रायश्चित करते हैं। हम अपने आप को बिना किसी शर्त सतगुरु के हवाले कर देते हैं और वह जिस प्रकार भी हमारे कर्मों का निपटारा करते हैं हम ख़ुशी-ख़ुशी स्वीकार कर लेते हैं। तब हमें इस बात की तसल्ली होती है कि हमारा निज-घर वापसी का सफ़र उनकी योजना के अनुसार और उनके हिसाब से तय हो रहा है। इसके अलावा, हम इस बात के लिए शुक्रगुज़ार होते हैं कि उन्होंने हमें जैसे हम हैं, वैसे ही स्वीकार कर लिया है और हम पर नामदान की बख़्शिश कर दी है।
हे प्रभु, यदि आप सहारा न बनें तो कोई निर्मल नहीं हो सकता। यदि आप मार्गदर्शन न करें तो बुद्धि काम नहीं कर सकती। यदि आप रक्षा करना बंद कर दें तो हमारे अंदर कोई हिम्मत क़ायम नहीं रह सकती। यदि आप हमें बुराई से न बचाएँ तो हम निर्मल नहीं बन सकते। हमारी अपनी कोई भी सावधानी हमें बचा नहीं सकती, जब तक कि आप हमारी रक्षा नहीं करते; क्योंकि यदि आप हमें छोड़ दें, तो हम डूब जाएँगे और तबाह हो जाएँगे। लेकिन यदि आप हमारे अंग-संग रहें तो हम फिर से उठकर खड़े हो जाएँगे और एक बार फिर से जी उठेंगे।
थॉमस ए केम्पिस, द इमिटेशन ऑफ़ क्राइस्ट
सतगुरु के उत्तर
महाराज चरन सिंह जी के साथ हुए कुछ चुनिंदा सवाल-जवाब
प्रश्न: क्या आप अपने शिष्यों को निजी तौर से जानते हैं या औपचारिक रूप से? उदाहरण के लिए, जब आप मुझे देखते हैं तो क्या आप मेरे बारे में सब कुछ जान लेते हैं, मेरे दु:ख, मेरे शक, मेरा अतीत, मेरा भविष्य आदि? मैं यह सब इसलिए पूछ रहा हूँ क्योंकि जब लोग ऐसा कहते हैं कि सतगुरु सब कुछ जानते हैं तो मुझे शक होता है। मैं यह समझ नहीं पाता कि इसे कैसे स्वीकार करूँ? क्या कृपया आप इस बारे में समझाएँगे?
उत्तर: सतगुरु आत्मा और परमात्मा के बीच एक ज़रिया हैं। सतगुरु का संबंध आत्मा से है, उसकी तरक़्क़ी में सहायता करना और उसे परमात्मा के स्तर तक पहुँचाना। आत्मा देह के बंधन और मन की ग़ुलाम होने के कारण कर्मों के जाल में फँसी हुई है। इसीलिए इसे कुछ ख़ास कर्मों को भुगतना पड़ता है, नहीं तो कोई भी देह में न रहता। इसे ही भाग्य या प्रारब्ध कहते हैं।
सतगुरु चाहे जानते हों या न जानते हों, इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। लेकिन यह निश्चित है कि सतगुरु आत्मा की रूहानी तरक़्क़ी में सहायता करते हैं, न कि दुनियावी पदार्थों को पाने में। हमने दया-मेहर और सहायता को भौतिक पदार्थों से जोड़ा हुआ है यानी कि हमारी सांसारिक कामनाओं, सांसारिक क़ामयाबियों और सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति से। लेकिन सतगुरु का मक़सद यह नहीं होता। वह सब तो पहले से ही तय है, हमें अपने प्रारब्ध को तो भोगना ही होता है।
सतगुरु का मक़सद बस यही होता है कि आत्मा का रूहानी विकास कैसे करना है। वे आत्मा को अंतर में रूहानी विकास करने के लिए हिम्मत बख़्श देते हैं ताकि यह परमात्मा के स्तर तक ऊपर उठ जाए और मन के पंजे से आज़ाद होकर जन्म-मरण के चक्कर से छूट जाए। यह उनकी ज़िम्मेदारी है। हमारा असली गुरु शब्द है, जो हम सबके अंदर है और ऐसा कुछ भी नहीं है, जो शब्द से छिपा हो। अगर वह सिरजनहार है तो वह सर्वव्यापक और सर्वज्ञाता भी है।
वह शब्द जिसने सारी सृष्टि की रचना की है, वही हमारा असल गुरु है और वह हम सब के अंदर है। इसलिये वही रचयिता है, वह सब कुछ जानता है और सर्वव्यापक है, उससे कुछ भी छिपा हुआ नहीं है। सतगुरु ने देह में रहते हुए अंतर में उस शब्द को प्रकट कर लिया है और हम उनके ज़रिए शब्द से जुड़े होते हैं।
संत संवाद, भाग 1
प्रश्न: महाराज जी, यदि भजन करते हुए हमें कोई उन्नति होती दिखाई न दे, लेकिन ऐसा महसूस हो कि ज़िंदगी में कोई दिव्य ताक़त हमारी सहायता कर रही है, तो क्या उस ताक़त का सहारा लेना चाहिए या उसकी ओर कोई ध्यान नहीं देना चाहिए?
उत्तर: हमें पता लगे या न लगे पर सतगुरु की रहमत का हाथ हर हालत में हमारे सिर पर होता है। भजन करते हुए भी हमें अंतर में चाहे कोई रूहानी तरक़्क़ी महसूस हो या न हो, फिर भी हम अपने जीवन में उसका प्रभाव अवश्य महसूस करेंगे। चाहे अंदर तरक़्क़ी होती दिखाई दे या न दे पर अपने स्वभाव में, लोगों के साथ अपने व्यवहार में हम भजन का असर ज़रूर महसूस करेंगे, एक तरह से जीवन के प्रति हमारा पूरा रुख़, हमारा संपूर्ण दृष्टिकोण ही बदल जाएगा। हमें तरक़्क़ी की ज़्यादा चिंता नहीं करनी चाहिए क्योंकि तरक़्क़ी तो हो ही रही है। भजन का प्रभाव तो पड़ेगा ही, वह हमेशा रहेगा। उसका असर होना तो लाज़िमी है।
जीवत मरिए भवजल तरिए
प्रश्न: महाराज जगत सिंह जी की पुस्तक आत्म-ज्ञान (Science of the Soul) में हमने पढ़ा था कि एक शिष्य द्वारा दूसरे शिष्य की निंदा करना बहुत बड़ा पाप है। जो दूसरों की निंदा करता है उसे इसका क्या परिणाम भोगना पड़ता है?
उत्तर: सभी संत हमें एक ही बात समझाते आए हैं। क्राइदस्ट ने भी कहा है कि तुम्हें अपनी आँख का शहतीर तो दिखाई नहीं देता लेकिन दूसरे की आँख का तिनका भी दिखाई देता है। सरदार बहादुर महाराज जी के कहने का अभिप्राय था कि दूसरों की निंदा करने के बदले हमें अपनी निंदा करनी चाहिए कि हममें वह कौन-सी कमी है जिसके कारण हमारा किसी के साथ गुज़ारा नहीं होता। अगर कोई हमें सहयोग नहीं दे रहा तो इस बात के लिए उसकी निंदा करने के बजाय हमें ही उसे सहयोग देना चाहिए। हमें परिस्थिति के अनुसार अपने आप को ढालना होगा, परिस्थिति हमारे मुताबिक़ नहीं ढल सकती। दूसरों से अच्छे व्यवहार की आशा करने के बजाय हमें ख़ुद दूसरों के साथ अच्छा व्यवहार करना चाहिये। हमारी दूसरों से हमेशा यही अपेक्षा रहती है कि वे हमारे साथ शालीनता से पेश आएँ और उनका व्यवहार अच्छा और प्रेमपूर्ण हो। लेकिन हम यह नहीं समझते कि उस सबकी शुरुआत हमें ही करनी होगी। उनके कहने का यही अभिप्राय है कि अपने अंदर झाँके बिना और अपने दोष देखकर उन्हें सुधारने के बजाय, बेवजह किसी की निंदा करना पाप है।
जीज़स क्राइस्ट का उपदेश: सेंट मैथ्यू, भाग 2
सदा का सुख
मिस्र के प्रसिद्ध स्फिंक्स का सिर मनुष्य का और शरीर शेर का है। कहा जाता है कि दुनिया-भर से बहुत-से लोग इसके पास अपनी मन्नतें लेकर आते हैं क्योंकि ऐसा माना जाता है कि स्फिंक्स मनोकामनाएँ पूरी कर सकता है। स्फिंक्स की दिलचस्प बात यह है कि उसके चेहरे पर तराशी गई व्यंग्य-भरी मुस्कान मानो उन लोगों का उपहास कर रही हो जो उसके पास अपनी मन्नतें लेकर आते हैं। मगर बहुत-से लोगों का ध्यान इस ओर नहीं जाता क्योंकि उनकी इच्छाओं ने उन्हें अँधा कर रखा है।
एक व्यक्ति स्फिंक्स के पास आता है और एक सुंदर स्त्री से विवाह के लिए मन्नत माँगता है। उसकी मन्नत पूरी हो जाती है और उसका विवाह एक बहुत ख़ूबसूरत स्त्री से हो जाता है लेकिन वह बहुत घमंडी और स्वार्थी होती है। उसका चेहरा तो सुंदर होता है पर वह ज़िद्दी होती है और उसके दिल में किसी के लिए दया-भाव नहीं होता। धीरे-धीरे अपनी पत्नी के लिए उस व्यक्ति का प्यार कम होने लगता है। तब उसे एहसास होता है कि स्फिंक्स के चेहरे की वह मुस्कान मानो उसे पहले ही बता रही थी कि सिर्फ़ काया के सुंदर होने से सुख नहीं मिल सकता।
एक अन्य व्यक्ति स्फिंक्स के पास धन की कामना लेकर आता है और स्फिंक्स उसकी इच्छा पूरी कर देता है। वह व्यक्ति धनवान बन जाता है लेकिन धीरे-धीरे उसका हृदय पत्थर की तरह कठोर बन जाता है। सोना-चाँदी और हीरे-जवाहरात के रूप में वह जितनी दौलत इकट्ठी करता है, उसके अंदर से दया-भाव उतना ही कम होता जाता है और वह अपने व्यवहार के कारण अपने वफ़ादार मित्रों को खो देता है। उसका हृदय चिंताओं के बोझ और इस भय से ग्रस्त हो जाता है कि कहीं उसका धन चोरी न हो जाए या खो न जाए। तब उसे समझ आता है कि जब वह धन-दौलत माँग रहा था तब स्फिंक्स ने उसे ऐसी नज़रों से क्यों देखा मानो वह कह रहा हो – “जो माँग रहे हो, पहले उस पर फिर से विचार करो।”
तीसरा व्यक्ति स्फिंक्स के पास महान् और प्रसिद्ध बनने की मन्नत लेकर जाता है। किसी तरह उसका ध्यान स्फिंक्स के चेहरे पर उभरे व्यंग्यपूर्ण भाव की ओर जाता है लेकिन वह उसे नज़रअंदाज़ कर देता है। क़िस्मत से वह सच में एक प्रसिद्ध व्यक्ति बन जाता है लेकिन उस प्रतिष्ठा के कारण उसके पास अपने परिवार के लिए बहुत कम समय बचता है। वह अपनी पत्नी और बच्चों की ओर ध्यान नहीं दे पाता, आख़िरकार वे उसे छोड़कर चले जाते हैं। जब वह बिलकुल अकेला हो जाता है तब उसे एहसास होता है कि प्रसिद्धि में भी सुख नहीं है।
ख़ुशी अंदर से आती है। यह इंद्रियों के भोगों से या बाहर से नहीं मिलती। आप बाहर से कभी सुख प्राप्त नहीं कर सकते। चाहे आपको अपने काम से कितनी ही संतुष्टि क्यों न मिले, चाहे आप कितनी ही समाज सेवा क्यों न करें, आप किसी भी पेशे में हों, आपको इन सब से कभी स्थायी सुख नहीं मिलेगा, क्योंकि आत्मा हमेशा अपने स्रोत के लिए तड़पती है। जब तक आत्मा अपने स्रोत में समा नहीं जाती, यह कभी सुखी नहीं होगी।
महाराज चरन सिंह जी, संत संवाद, भाग 1
हम अकसर सुख, आराम और चिंतामुक्त जीवन को ही सच्ची ख़ुशी समझ बैठते हैं। पर असल में परियों की कहानियों के नायक और नायिकाओं के सिवाय इस मायामय दुनिया में कोई भी सदा सुखी नहीं रहता। कुछ लोगों को यह बात जल्दी समझ आ जाती है, कुछ लोगों को इसे समझने में देर लगती है। माया का मतलब है भ्रम यानी कि जो चीज़ आती है और चली जाती है।
मैं सच उसे कहता हूँ जो कभी नहीं बदलता। जो सच है, सिर्फ़ वही असल है। बाक़ी सब भ्रम है। केवल परमात्मा सच है। आत्मा सच है। बाक़ी सब कुछ बदलता रहता है।
महाराज चरन सिंह जी, संत संवाद, भाग 1
ऐसा समय भी आता है जब दुनिया से प्राप्त होनेवाले सुखों को लेकर हम सवाल करने लगते हैं। दुनिया एक हाथ से देती है और दूसरे हाथ से छीन लेती है। देर-सवेर हमें एहसास होता है कि इच्छाओं की पूर्ति से मिलने वाली ख़ुशी भी समय पाकर बोझ बन जाती है। हुज़ूर महाराज जी अपने सत्संगों में फ़रमाया करते थे कि जिस चीज़ को हासिल करने के लिए हम पाँच साल प्रार्थना करते हैं, फिर उसी से छुटकारा पाने के लिए अगले दस साल प्रार्थना करते रहते हैं।
एक सवाल जो अकसर हमें दु:खी करता है जिसका जवाब हम सब जानते हैं, फिर भी आशा करते रहते हैं कि शायद यह सच न हो। असल में हमारा अपना है क्या, जो सदा हमारे साथ रहेगा?
वास्तव में इस संसार की कोई भी वस्तु नहीं!
हुज़ूर महाराज जी एक बहुत सुंदर उदाहरण दिया करते थे कि एक बच्चा अपने पिता की अँगुली पकड़कर मेले में जाता है। वह मेले की चमक-दमक – झूलों, रंग-बिरंगी टिमटिमाती रोशनियों, रोमांच से भर देनेवाली सवारियों और मिठाइयों तथा खिलौनों से सजी दुकानों को देखकर मोहित हो जाता है। लेकिन जब उसके हाथ से अपने पिता की अँगुली छूट जाती है और वह मेले में खो जाता है तब वह रोने लगता है। फिर वह उस मेले की उन आकर्षक चीज़ों को देखना भी गवारा नहीं करता; तब उसे सिर्फ़ अपना पिता चाहिए। उस वक़्त उसे एहसास होता है कि मेले से उसे ख़ुशी तब तक ही मिल रही थी जब तक उसने अपने पिता का हाथ पकड़ा हुआ था।
यही वह पल है जब माया का भ्रम टूटता है और हमें सत्य का बोध होता है।
जब हम परमात्मा का हाथ थाम लेते हैं, जब हमारा ध्यान उसकी तरफ़ होता है, तब हम संतुलन खोए बिना ज़िंदगी गुज़ार सकते हैं। अगर हम उसे बिलकुल भूल जाते हैं तो हम इस दुनिया में दु:खी ही रहते हैं।
महाराज चरन सिंह जी, संत संवाद, भाग 1
क्या हमने कभी सोचा है कि हमारी आत्मा क्या चाहती है? आत्मा अपनी ख़ुराक चाहती है। जब मन स्थिर होता है तभी आत्मा अपने भीतर मौजूद शब्द, उस दिव्य शक्ति के आनंद का अनुभव कर सकती है।
असल में, हम सब जाने-अनजाने इसी दिव्य शक्ति की खोज कर रहे हैं मगर बजाय इसके हम दुनियावी सुखों के पीछे भागते रहते हैं जोकि आरज़ी हैं।
संत-महात्मा हमें बार-बार समझाते हैं कि सच्चा सुख अंदर है और यह दुनिया हमारा असल घर नहीं है। यहाँ सिर्फ़ आरज़ी सुख प्राप्त हो सकते हैं। आख़िर वह जगह सुख का स्थान कैसे हो सकती है जहाँ बड़े जीव ज़िंदा रहने के लिए छोटे जीवों को खाते हैं; जहाँ तूफ़ान, भूकंप और आपदाएँ पल-भर में हमारे घर-परिवार उजाड़ देती हैं; जहाँ बीमारी और मृत्यु का ख़तरा सदा बना रहता है?
इसलिये संत कहते हैं कि यह दुनिया आपके रहने लायक़ नहीं है, इसमें हासिल करने लायक़ ख़ास कुछ नहीं है, इस रचना को छोड़कर हमें अपने पिता के पास वापस जाना चाहिए।
महाराज चरन सिंह जी, संत संवाद, भाग 1
इस रूहानी मार्ग पर चलते हुए हम यह भूल गए हैं कि हमारी आत्मा हमारे चंचल मन से कहीं अधिक शक्तिशाली है। सतगुरु ने नामदान देकर हर रोज़ भजन-सिमरन के ज़रिए हमें स्वयं को सशक्त बनाने की युक्ति समझा दी है।
अपनी आत्मा की भलाई के लिए हमें ऐसे कर्म करने चाहिएँ जो हमें परमात्मा की ओर ले जाएँ। हमें शरीर की देखभाल भी करनी चाहिए पर इस ढंग से कि वह हमारी आत्मा की सेवा बन जाए। तभी हम असल में सदा के लिए सुखी हो सकते हैं।
हम तभी सुखी हो सकते हैं जब हमारा मनुष्य-शरीर में आने का मक़सद पूरा हो जाता है। और यह मक़सद तभी पूरा हो सकता है, जब हम अपने ख़याल को अंदर की तरफ़ मोड़कर वहीं परमात्मा की तलाश करने की कोशिश करें। जब तक हमारा उससे मिलाप नहीं हो जाता, हम सच्चा सुख, सच्चा आनंद प्राप्त नहीं कर सकते और न ही जन्म-मरण के चक्कर से छुटकारा पा सकते हैं।
महाराज चरन सिंह जी, संत संवाद, भाग 1
आज्ञाकारी होना
आधुनिक समय में ‘आज्ञाकारी होना’ एक चुनौती बन गया है। मुख्य तौर पर युवावस्था के शुरुआती वर्षों में बच्चों के लिए इसकी बड़ी अहमियत है। एक बार जब उनमें सोचने-समझने की शक्ति विकसित हो जाती है और वे समझदार हो जाते हैं तब हर सभ्यता और समाज के युवा अपने फ़ैसले ख़ुद लेना चाहते हैं और अपने विचारों को बिना झिझक व्यक्त करना चाहते हैं। हर व्यक्ति अपनी ‘मैं’ को सबसे अहम समझता है, भले ही यह हमारे आदर्शों के मुताबिक़ न हो।
आज के इस दौर में अपनी हौमैं को बढ़ावा देने के प्रचलन के बावजूद, जिन लोगों का झुकाव रूहानियत की ओर है उनके लिए आज्ञाकारी होना और समर्पण करना आज भी बहुत अहम हैं। सभी रूहानी मार्ग परमात्मा के अस्तित्व को स्वीकार करते हैं और ऐसा मार्ग दिखाते हैं जिसमें हौमैं को महत्त्व नहीं दिया जाता। असल में हम रूहानी तौर पर जाग्रत होकर निर्मल ही तब होते हैं जब हम अपनी हौमैं को छोड़कर परमात्मा की रज़ा में रहते हुए सतगुरु के उपदेश का पालन करते हैं।
संतमत में आज्ञा यानी हुक्म का पालन करना बेहद अहम गुण है क्योंकि यह हमारे ग़रूर और अहंकार को नियंत्रित करने और दिव्य प्रेम के अर्थ को समझने की कुंजी है।
हुक्म मानना आत्मसमर्पण करने का दूसरा नाम है और आत्मसमर्पण हौमैं को बाहर निकालने का दूसरा नाम है। जब हमारे अंदर घमंड होता है, हौमैं होती है, तब हम किसी के आगे समर्पण करना नहीं चाहते, किसी का हुक्म मानने के लिए तैयार नहीं होते। दूसरे शब्दों में, हुक्म मानने का मतलब है अपनी इच्छा को दूसरे की इच्छा में लीन कर देना। अपनी ख़ुदी को अपने अंदर से निकाल देना, अपनी इच्छा को दूसरे की इच्छा में लीन कर देना ही हुक्म मानना है।
महाराज चरन सिंह जी, संत संवाद, भाग 3
रूहानी मार्ग दिव्य प्रेम की खोज और पहचान का मार्ग है, इसकी झलक हमारे दैनिक जीवन में दिखाई देनी चाहिए। सभी रूहानी मार्ग हमें इसी दिव्य प्रेम के बारे में समझाते हैं जो हमें परमात्मा की ओर ले जाता है। यह रूहानी खोज का सफ़र है जबकि हममें से ज़्यादातर लोग इसे दुनियावी प्रेम जैसा ही समझते हैं क्योंकि हम सिर्फ़ इसी से परिचित हैं।
सतगुरु से मिलाप हो जाने पर, संतमत के उपदेश को स्वीकार कर लेने और शर्तों तथा जीवनशैली को अपनाने पर हमें उस दिव्य प्रेम का एहसास होता है। हमें अपने अंदर ऐसी कशिश महसूस होती है जिससे हम सतगुरु की ओर खिंचे चले जाते हैं और वह हमारे प्रेरणा स्रोत बन जाते हैं। अंतत: हम उनके हुक्म का पालन करने लगते हैं और अपने आप को उनके अनुसार ढालने लगते हैं।
जब परमात्मा चाहेगा कि आप उससे प्यार करें तो वह आपके मन में प्रेम जाग्रत कर देगा। लेकिन यह प्रेम देहधारी सतगुरु के उपदेश के अनुसार भजन-सिमरन करने से ही आता है।
महाराज चरन सिंह जी, संत संवाद, भाग 2
भजन-सिमरन द्वारा ही असल बदलाव आता है। स्थिर बैठकर पाँच नाम का सिमरन करने से मन एकाग्र होने लगता है और बाहर भटकना बंद कर देता है। भजन-सिमरन द्वारा आत्मा के रुख़ को अंदर और ऊपर की ओर मोड़ने में मदद मिलती है। इससे मन वश में आ जाता है और हमारा ध्यान दुनिया के बजाय सतगुरु की तरफ़ होने लगता है। जब हमारा ध्यान सतगुरु पर ही केंद्रित रहता है तो यह धीरे-धीरे प्रेम में बदलने लगता है। यही प्रेम आख़िरकार हमें हौमैं – ख़ुद के प्रति हमारे प्रेम – से बेलाग कर देता है और हमें सबसे निर्मल और मीठे से मीठे प्रेम का अनुभव होने लगता है।
जब हमारे अंदर सतगुरु और परमात्मा के लिए प्यार पैदा हो जाता है तो दूसरे सब गुण भी अपने आप हमारे अंदर जाग्रत हो जाते हैं।…
जब वह प्यार हमारे अंदर आ जाता है तो बाक़ी सब चीज़ें अपने आप ही बाहर निकल जाती हैं। फिर आज्ञापालन, समर्पण, समझदारी, ये सब अच्छे गुण अपने आप ही जाग्रत हो जाते हैं।
महाराज चरन सिंह जी, संत संवाद, भाग 3
असल में, जब वह प्रेम प्रफुल्लित होने लगता है तो हम पहले से बेहतर इनसान बन जाते हैं और हम अपना जीवन संतमत के उपदेश के मुताबिक़ जीने लगते हैं, जहाँ तक हो सके हम सतगुरु के हुक्म के अनुसार सब कुछ करने लगते हैं। हमारे अंदर संतोष आ जाता है और हम हुक्म को मानने लग जाते हैं फिर चाहे हालात अच्छे हों या बुरे, हम ख़ुश रहने लगते हैं। इसी प्रेम के द्वारा हम दुनियावी चुनौतियों का धैर्य और सहज-भाव से सामना करते हैं, इस विश्वास के साथ कि जो कुछ भी हमारे साथ होता है उसी में हमारी भलाई है। आख़िरकार हुक्म का पालन परमात्मा के प्रति हमारे प्रेम की पहचान बन जाता है।
प्यार की भावना
अनमोल ख़ज़ाना में से एक अंश
सेवा और उसके फल के संबंध में शाम की मीटिंग में एक प्रश्न का उत्तर देते हुए महाराज जी ने कहा, “प्रेमी कभी माँगता नहीं, प्रेमी कभी हिसाब-किताब नहीं करता।”
पुरानी बातें याद करते हुए महाराज जी ने कहा, “मुझे डेरे आए पैंतीस वर्ष से ज़्यादा हो गए हैं और इस दौरान मुझे कई अनुभव हुए हैं। संगत की भावनाएँ, संगत के प्रेम का वर्णन मैं कर ही नहीं सकता।” महाराज जी की आवाज़ प्रेम और सराहना की भावना से ओत-प्रोत थी।
“सन् 1955 में लंगर-घर बहुत छोटा था। उसका सिर्फ़ एक छोटा-सा दरवाज़ा था और बड़े महाराज जी के जन्मदिन के भंडारे पर दो लाख के क़रीब सत्संगी आ जाते थे। इतने लोगों को खाना खिलाने में रात के दो बज जाते थे। यह देखकर रात को मैं अपने सोने के कमरे में बेचैन रहता और सोचता कि बड़े महाराज जी की याद में आई हुई संगत की बराबर देखभाल करने के लिए क्या किया जाए।”
“इस समस्या पर ट्रस्ट की वार्षिक सभा में चर्चा हुई और श्री आहलूवालिया ने जो उस समय सेक्रेटरी थे, सुझाव रखा कि सारे भंडारों को बंद कर दिया जाए ताकि एक समय में इतनी भीड़ इकट्ठी ही न हो। श्री आहलूवालिया ने कहा, ‘संगत जब आना चाहे तब आए; इससे समस्या हल हो जाएगी, क्योंकि तब भंडारे के समय जैसी भीड़ होगी ही नहीं।’” महाराज जी ने बताया कि इस चर्चा के दौरान वह ख़ामोश रहे।
आप ने बाद में फ़रमाया, “सेक्रेटरी के भंडारे बंद करने के प्रस्ताव की ख़बर संगत को लग गई। अगले दिन सत्संगियों ने श्री आहलूवालिया को उनके घर के पास घेर लिया और कहा, ‘क्या हमने कभी किसी बात की शिकायत की है? क्या हमने कभी भी शिकायत की है कि हमें खाना समय पर नहीं मिला? सोने के लिए जगह न मिलने के बारे में कभी कुछ कहा है? हम तो बहुत ख़ुश हैं। जब हमें कोई शिकायत नहीं तो आप क्यों भंडारे बंद करने का सुझाव दे रहे हैं? आप हमें दर्शन और सत्संग से क्यों वंचित करना चाहते हैं?’
“अगले दिन श्री आहलूवालिया मेरे पास आए और बोले, ‘मुझे अफ़सोस है कि मैंने भंडारे बंद करने का प्रस्ताव मीटिंग में रखा, मैं वह प्रस्ताव वापस लेता हूँ।’
“मैंने सिर्फ़ इतना ही कहा, ‘मुझे ख़ुशी है कि आपको इस बात का एहसास हो गया है।’”
कुछ समय ख़ामोश रहने के बाद महाराज जी बोले, “संगत को किसी असुविधा से फ़र्क़ नहीं पड़ता। लोग कच्चे फ़र्श पर सो जाएँगे, बारिश में खुले में सो जाएँगे, पर यहाँ आना कभी बंद नहीं करेंगे। बाबा जी ने इस डेरे की नींव प्रेम और सेवा पर रखी है। मैंने इस प्रेम को लगातार बढ़ते देखा है और अब भी यह बढ़ता ही जा रहा है।
“मंड (जहाँ नदी बहा करती थी) को ही देखो। यह जगह जंगली झाड़ियों, ठूँठों और लंबी घास से भरी हुई थी और यहाँ केवल दलदल था, ऊँची-नीची ज़मीन थी। संगत उन ठूँठों और लंबी घास को लंगर में ईंधन के लिए काटती थी। आज संगत ने इस जगह को समतल भूमि में बदल दिया है और अब यहाँ खेत, सड़कें और पेड़ हैं।
“आज जहाँ लंगर-घर है वहाँ किसी समय गहरे खड्ड थे। संगत ने उन्हें भरकर बराबर कर दिया है। आज जहाँ लंगर का बड़ा शैड है और मैदान है जहाँ बड़े-बड़े पेड़ लगे हुए हैं, वहाँ एक बड़ा गहरा नाला था और जहाँ आज बड़ा मल्टी-परपज़ शैड है, वहाँ भी किसी समय नाला बहता था। संगत ने इन सबको पाँच-छ: फुट मिट्टी से भरकर समतल कर दिया है। यह है सेवा। उस समय आपने डेरा देखा होता तो आप यह सब समझ पाते।…
“संगत यह सारी सेवा किसी पुरस्कार या फल की उम्मीद से नहीं करती। वह तो प्रेम से प्रेरित होकर करती है। सेवा प्रेम है; संगत बदले में कभी कुछ नहीं माँगती और उसे चाहे जो असुविधा हो, वह कभी कोई शिकायत नहीं करती। वह हमेशा संतुष्ट रहती है, हमेशा सेवा करने में ख़ुशी महसूस करती है।”
यह प्रेम की वह शक्ति है जिसके बीज स्वयं सतगुरु बोते हैं और जिसका पोषण संगत करती है। विश्व में इस प्रेम के तुल्य और कोई शक्ति नहीं है।
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जो वह वचन करें, उसको चित्त में रख लो, उसी पर चलो। चाहे घास खोदने का वचन करें तो वही परम पद है जी। उसे दिल में मीठा मानो। अपने मन की ऐसी परख करो, फिर काम पूरा है।
बाबा जैमल सिंह जी, परमार्थी पत्र, भाग 1
सरल रखना
एक चीनी लोककथा है जिसमें एक अधिकारी ने अपने कर्मचारियों को पेय से भरी एक सुराही दी। लेकिन उसमें मौजूद पेय केवल एक ही व्यक्ति के लिए पर्याप्त था, इसलिए कर्मचारियों ने उस पेय के लिए एक प्रतियोगिता करने का फ़ैसला लिया जिसके लिए सब सहमत हो गए। प्रतियोगिता यह थी कि जो व्यक्ति सबसे कम समय में साँप का चित्र बना लेगा, वही विजेता होगा।
प्रतियोगिता शुरू हुई और कुछ ही सेकंड में एक आदमी ने चित्र बना लिया। यह देखकर कि अन्य लोग अभी भी चित्र बना रहे हैं, उस समय अपनी जीत की घोषणा करने के बजाय उसने अपने चित्र को और ज़्यादा सुंदर बनाने का फ़ैसला किया।
जब उसने दोबारा नज़र उठाकर देखा तब उसे पता चला कि किसी और ने पहले ही अपना चित्र पूरा करके दे दिया है और उसे विजेता घोषित कर दिया गया है। उसी समय, उसका एक अन्य साथी कर्मचारी ज़ोर से हँस पड़ा और उसके बनाए चित्र को ऊपर उठाकर कहने लगा, “ज़रा देखो तो सही! पैरों वाला साँप!”
हमें इस कहानी से यह सीख मिलती है कि कई बार सिर्फ़ उतना ही करना काफ़ी होता है, जितना किसी कार्य के लिए ज़रूरी है। दूसरे शब्दों में, चीज़ों को सरल रखना चाहिए। उस व्यक्ति को सिर्फ़ एक साँप का चित्र बनाना था और पेय से भरी उस सुराही को जीतना था। लेकिन शायद वह भटक गया था या ज़रूरत से ज़्यादा आत्मविश्वास और उत्सुकता के कारण उसने सोचा कि वह इसे बेहतर बना सकता है इसलिए वह चित्र पर थोड़ी और कलाकारी करने लग गया। अंतत: उसने पैरों वाला साँप बना दिया। इसलिए वह पेय को जीत न सका और हँसी का पात्र बन गया।
कार्यों को सरल रखना हमारी सोच से कहीं अधिक मुश्किल है। पानी पीने जैसे एक सरल-से काम में इस वजह से देरी हो सकती है क्योंकि हम अपने पसंदीदा गिलास, बोतल या जग को ढूँढ़ने लगते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि किसी भी कार्य को बेहतर ढंग से करने के लिए अधिक ध्यान देने, सोच-विचार करने या मेहनत की ज़रूरत ही नहीं होती। बात बस इतनी-सी है कि हमें हर काम को करने के लिए ज़रूरत से ज़्यादा सोचने और विश्लेषण करने की इतनी आदत पड़ गई है कि हम छोटे-छोटे, सरल-से कार्यों को भी ज़रूरत से ज़्यादा जटिल बना देते हैं। इसी तरह, कंप्यूटर पर काम करते हुए हम संदेशों और सूचनाओं को देखने के लिए बार-बार अपना फ़ोन उठाते रहते हैं। हमें पता ही नहीं चलता कि कब ये आदतें हमें हमारे असल काम से भटका देती हैं।
संतमत में सतगुरु ने हमें सिमरन करने का सरल-सा कार्य सौंपा है – बस परमात्मा के पाँच नाम को सच्चे दिल से निरंतर दोहराते रहना। महाराष्ट्र के संत चोखामेला इस बारे में समझाते हैं:
शांतचित्त हो तन-मन से, मैं ध्यान करूँगा तेरा।
सत नाम का जाप सार है, सब कर्मों का नाश करे।
पल-पल हरि नाम का जाप, यही मुक्ति का साधन एक।
इस मंत्र का जाप सहज ही, पल में तारे पार उतारे।
चोखा कहे
हैं गुरु के वचन यह, सदा करो प्रभु नाम का जाप।
स्वर अनेक, गीत एक
हालाँकि, जब हम सिमरन करते हैं तब भी हमारे मन में तरह-तरह के विचार उठते रहते हैं, हमारी आँखें फड़कती हैं, हमारी नाक में खुजली होती है, हमारे पैरों में झुनझुनी होने लगती है और हमारी सुनने की शक्ति इतनी तेज़ हो जाती है कि हमें गली से आने वाली छोटी से छोटी आवाज़ भी सुनाई देने लगती है। सिर्फ़ इतना ही नहीं तीसरे तिल पर अपने ख़याल को एकाग्र करने के लिए बहुत ज़्यादा यत्न करने के बावजूद जब हमें अंदर प्रकाश या ध्वनि का अनुभव नहीं होता तब हम निराश हो जाते हैं। यही वह समय होता है जब हम ध्यान के भटकने या ज़रूरत से ज़्यादा सोचने के कारण चीनी लोककथा के उस व्यक्ति की तरह ‘साँप के पैर’ बनाने लगते हैं। हम अपने भजन-सिमरन का समय और स्थान बदलते रहते हैं, अपना आसन बदलते रहते हैं, ऐसे तरीक़े खोजते रहते हैं जिनसे सिमरन में मदद मिल सके और हमें हर समय इस बात की चिंता लगी रहती है कि हमने कितनी रूहानी तरक़्की कर ली है।
हमारा सरल-सा कर्तव्य है – अपनी आँखें बंद करके प्रेमपूर्वक अपना सिमरन करते जाना। ‘लिविंग मेडिटेशन’ पुस्तक के लेखक हेक्टर एस्पॉण्डा डबिन लिखते हैं: “सिमरन करने में ही आनंद है। सिमरन द्वारा प्राप्त हुई एकाग्रता सहज आनंद देती है। हमें पहले मन को सिमरन में स्थिर करना चाहिए और कृतज्ञता तथा दीनता के साथ अभ्यास का आनंद लेते हुए इसे सिमरन में लगाए रखना चाहिए।” बाक़ी सब कुछ अपने आप ठीक हो जाएगा।
आइए, हम इसे बिलकुल सरल रखें। संत चोखामेला की वाणी से प्रेरणा लेकर सिर्फ़ एक कार्य करें – अपने ध्यान को सिमरन द्वारा एकाग्र करके परमात्मा और सतगुरु को अंग-संग महसूस करते हुए चुपचाप दृढ़ता से पाँच नाम का सिमरन करते रहें। हुक्म मानने का यह सरल-सा कार्य अपने आप में ही एक रूहानी प्राप्ति है।
याद रखने योग्य कथन
सतगुरु कभी अपने शिष्य का साथ नहीं छोड़ते और हमेशा उस पर दया-मेहर करते रहते हैं, चाहे शिष्य को इसका आभास न भी हो।
महाराज चरन सिंह जी, सन्तमत दर्शन
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साधक को सत्य ग्रहण करना चाहिए और असत्य से बचने का प्रयत्न करना चाहिए। हरएक काम सोच-विचार कर करना चाहिए। वह कोई ऐसा काम न करे जिससे बाद में पछताना पड़े।
महाराज सावन सिंह जी, गुरुमत सार
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कथनी करनी जाकी एक समाना, रहें शांत-चित्त वे सदा सुजाना,
ज्ञान बसै उनके उर-अंतर, पर वे रहें सदा विनम्र।
कोई करे आलोचना या आराधना –
न वे मानें अपमाना, न ही मानें दु:ख भारी।
संत एकनाथ
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तेज़ शस्त्र से शरीर पर किया गया घाव तो समय पाकर भर जाता है, पर ज़बान द्वारा इनसान के दिल पर किया गया ज़ख़्म कभी नहीं भरता। कभी किसी जीव का दिल न दुखाओ। इस बात को भी उतना ही ज़रूरी समझना चाहिए जितने ज़रूरी मांस आदि न खाने के वे प्रण हैं जो हम नामदान के समय लेते हैं।
सरदार बहादुर जगत सिंह जी, आत्म-ज्ञान
अनुशासन
भजन-सिमरन करना खाइयाँ खोदने, अँगूरों के बाग़ में काम करने और किसी तालाब में से पानी निकालने जैसा धीमा और अनुशासन के साथ किया जाने वाला कार्य है। इसके लिए हर पल और जीवन-भर मेहनत करनी पड़ती है।
जॉन कबात-ज़िन, व्हेयरएवर यू गो, देयर यू आर
किसी भी ऊँचे लक्ष्य को हासिल करने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है और ऐसे कार्य को करने के लिए प्रशिक्षण लेने से बहुत अधिक फ़ायदा होता है। यह उन ऊँचे लक्ष्यों को प्राप्त करने में हमारी मदद करता है।
ऐसे कार्य नीरस, उबाऊ और यहाँ तक कि कष्टदायी भी लग सकते हैं लेकिन लगातार अभ्यास करते रहने से वे हमारी आदत बन जाते हैं और फिर उन्हें करना हमें उतना मुश्किल नहीं लगता। इसी प्रशिक्षण को अनुशासन कहा जाता है। यही अनुशासन हमारे छिपे हुए सर्वश्रेष्ठ गुणों को बाहर लाने, कुछ नया सीखने के इस सफ़र का आनंद लेने और अपनी मंज़िल तक पहुँचने का एकमात्र तरीक़ा है।
हम सभी जानते हैं कि यदि हम अपने खान-पान, पढ़ाई और काम करने की आदतों में अनुशासित होते तो हमारा वज़न कम होता, हम अधिक बुद्धिमान तथा शायद अधिक समृद्ध भी होते। हालाँकि, अनुशासन में रहना इतना आसान नहीं होता क्योंकि इसके लिए हमें ध्यान को भटकानेवाली चीज़ों और प्रलोभनों का डट कर सामना करना पड़ता है और अपने ‘कंफर्ट जोन’ को छोड़ना पड़ता है। इन सबसे बढ़कर, हमें इसके लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है।
हमारे व्यक्तित्व के दो पहलू होते हैं: एक, वह जो हम अभी हैं और दूसरा, वह जो हम बनना चाहते हैं। जब तक हम, जो हम बनना चाहते हैं उस दिशा में काम नहीं करते और निरंतर उस लक्ष्य की ओर नहीं बढ़ते तब तक हम हमेशा निराश रहेंगे।
हममें से ज़्यादातर लोग इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि यदि हम नियमपूर्वक अपना भजन-सिमरन करते और इसी के अनुरूप जीवन-शैली को अपनाते तो हम इस मार्ग पर ज़्यादा ख़ुश रहते और ज़्यादा तरक़्क़ी करते। ऐसा नहीं है कि हम कभी अनुशासन में नहीं रहे; यक़ीनन हमने उस समय का भी आनंद लिया है जब हमने हिदायतों का पूरे अनुशासन के साथ पालन किया था – जब हमने हल्का-फुल्का भोजन किया, हम जल्दी सो गए, जल्दी उठ गए, हमने नियम से भजन-सिमरन किया, काम-काज पर गए यहाँ तक कि व्यायाम, परिवार और सेवा – हमने एक ही दिन में हर चीज़ को समय दिया था।
क्या हमें याद है कि हमने तब ख़ुद को कितना सशक्त महसूस किया जब हमने आलस्य और लापरवाही छोड़कर भजन-सिमरन किया था और “मेरा मन नहीं है” वाले रवैये के आगे घुटने न टेककर सतगुरु के साथ किए वायदे को पूरा किया था?
एक बार जब हम रोज़मर्रा के जीवन में अनुशासन का पालन करना छोड़ देते हैं तो फिर से शुरुआत करना मुश्किल हो जाता है। लेकिन इस बात को याद रखने से मदद मिल सकती है कि जब हम एक बार फिर से वह पहला मुश्किल क़दम उठा लेते हैं तब बाक़ी सब आसानी से होने लग जाता है।
अनुशासन एक ऐसा गुण है जिसकी आदत डाली जा सकती है। जब हम कसरत करना शुरू करते हैं तब हमारी मांसपेशियों में दर्द होता है परंतु धीरे-धीरे वे मज़बूत हो जाती हैं और फिर सब आसान हो जाता है। यदि हम कुछ समय के लिए कसरत करना छोड़ दें तो यक़ीनन हमारी मांसपेशियाँ थोड़ी कमज़ोर हो जाती हैं लेकिन यदि हम फिर से कसरत करने लगें तो हमें नए सिरे से शुरुआत नहीं करनी पड़ेगी; अगली बार हम आसानी से वहीं से आगे बढ़ सकेंगे जहाँ हमने उसे छोड़ा था।
इस मार्ग पर चलनेवाले हर साधक के लिए अनुशासन एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण गुण है। हमारी अंतरात्मा हमें लगातार उस कार्य को करने के लिए प्रेरित करती है जो हमें करना चाहिए: खाद्य-पदार्थों के लेबल पर सामग्री-सूची को ध्यान से पढ़ना, गपशप में समय बर्बाद न करना, जल्दी सो जाना, भजन-सिमरन के लिए बैठना। अनुशासन का अर्थ है अंतरात्मा की आवाज़ को सुनना और उस पर अमल करना। जैसे-जैसे हम इसकी नसीहत को मानते हैं और जो करना चाहिए, उसे करने में जुट जाते हैं, हमारा सफ़र न केवल आसान बल्कि आनंदमय भी होने लगता है।
संत-सतगुरु हमेशा समझाते हैं कि भजन-सिमरन छोड़ने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता, बात सिर्फ़ इतनी-सी है कि हमें हार नहीं माननी है। हमें कोशिश करते रहना है; हमें ख़ुद को अनुशासित करना है ताकि हम अपने असल सामर्थ्य को जान सकें और आख़िरकार एक दिन अपने हर प्रकार के संघर्ष से सदा के लिए मुक्ति प्राप्त कर सकें।
दिल से दिल की बात
एक बार स्वामी जी महाराज ने दो-तीन दिन के लिए अपनी कोठरी में एकांत में बैठकर भजन करने का निश्चय किया। आपने हुक्म दिया कि जब तक मैं ख़ुद दरवाज़ा न खोलूँ तब तक कोई भी मेरे पास न आए। आपने द्वार अंदर से बंद कर लिए और भजन में बैठ गए। अगले दिन बाबा जैमल सिंह जी तीन दिन की छुट्टी पर दर्शन के लिए आगरा पहुँचे। उनका नियम था कि वह जब भी आगरा आते तो स्वामी जी महाराज के दर्शन किए बिना, उन्हें माथा टेके बिना कोई भी कार्य नहीं किया करते थे। पन्नी गली पहुँचने पर सेवादारों से स्वामी जी महाराज के हुक्म का पता चला। बाबा जी बग़ैर कुछ कहे और बिना खाए-पीए दो दिन भजन-सिमरन में बैठे रहे। तीसरे दिन कुछ सत्संगियों ने बाबा जी से कहा कि आओ, सीढ़ी लगाकर रोशनदान से दर्शन कर लो। बाबा जी की छुट्टी उस दिन ख़त्म होनेवाली थी। लेकिन बाबा जी ने ऐसा करने से साफ़ इनकार कर दिया और कहा कि गुरु के हुक्म से कभी बाहर नहीं जाना चाहिए। थोड़ी देर बाद स्वामी जी महाराज कोठरी से बाहर आए और बाबा जैमल सिंह जी की गुरुमुखता तथा गुरु-भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें गले से लगा लिया। फिर सतगुरु दीनदयाल ने बाबा जी को प्रसाद दिया और उन्हें समय पर विदा कर दिया ताकि वह झांसी जानेवाली गाड़ी पकड़ सकें।
धरती पर स्वर्ग
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एक बार महाराज जी ने बताया कि जब डेरे में सत्संग-घर बनाया जा रहा था, तब दिल्ली के एक बहुत अमीर और मशहूर ठेकेदार सरदार नारायण सिंह ने, जो बड़े महाराज जी के प्रेमी सत्संगी थे, विनती की कि पूरा सत्संग-घर बनाने की सेवा उन्हें दी जाए। पर बड़े महाराज जी ने इस प्रार्थना को अस्वीकार करते हुए जवाब दिया, “मैं चाहता हूँ कि ग़रीब से ग़रीब सत्संगी को भी सत्संग-घर की सेवा का मौक़ा मिले, चाहे वह सिर्फ़ एक रुपया डाले या आठ आने। मैं चाहता हूँ कि हर सत्संगी, चाहे वह अमीर हो या ग़रीब, जवान हो या बूढ़ा, सत्संग-घर के निर्माण की सेवा में हाथ बँटाए; चाहे वह केवल मुट्ठी-भर मिट्टी या ईंट के कुछ टुकड़े ही उठाए। संगत की छोटी से छोटी सेवा मेरे लिए क़ीमती है, सेवा में बही उनके पसीने की हर बूँद अनमोल है क्योंकि यह प्रेम की सेवा है, भक्ति और समर्पण की सेवा है।”
अनमोल ख़ज़ाना
हर दूसरे महीने प्रकाशित होने वाली पत्रिका, रूहानी रिश्ता, दुनिया भर के विभिन्न देशों के सेवादारों की टीमों द्वारा निर्मित की जाती है। इसके मौलिक लेख, कविताएँ और कार्टून संत मत की शिक्षाओं को अनेक दृष्टिकोणों और सांस्कृतिक परिवेशों से प्रस्तुत करते हैं। नए संस्करण प्रत्येक दूसरे महीने की पहली तारीख को, 1 जनवरी से शुरू होते हुए, पोस्ट किए जाएंगे।
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