जिज्ञासुओं के मार्गदर्शन के लिए

जिज्ञासुओं के मार्गदर्शन के लिए

मार्च 11, 2024

राधास्वामी सत्संग ब्यास


विषय सूची

इस पुस्तिका का उद्देश्य

उपदेश का सार

चार शर्तें

  1. शाकाहारी भोजन अपनाना
  2. शराब, तंबाकू तथा अन्य नशीले पदार्थों से परहेज़
  3. निर्मल और नैतिक जीवन जीना
  4. भजन‑सुमिरन का रोज़ाना अभ्यास

संतमत: एक जीवन शैली

आलोचक – मेरा मित्र

आवेदन की प्रक्रिया

  1. नामदान के लिए आयु‑सीमा
  2. पहली तीन शर्तों का पालन
  3. संतमत संबंधी साहित्य का अध्ययन
  4. सतगुरु के प्रतिनिधि से मिलना
  5. आवेदन पत्र की कार्यवाही
  6. आवेदन स्वीकृत होने पर नामदान के लिए तैयारी

आम पूछे जानेवाले प्रश्न

संपर्क संबंधी जानकारी और अन्य सूचना


इस पुस्तिका का उद्देश्य

यह पुस्तिका भारत से बाहर रहनेवाले उन सच्चे जिज्ञासुओं के लिए लिखी गई है जिनकी आयु कम से कम 22 वर्ष है और जो संतों के मार्ग को अपनाने और नामदान प्राप्त करने के इच्छुक हैं। इस पुस्तक को जान‑बूझकर संक्षिप्त बनाया गया है; इसमें मुख्य रूप से उन चार शर्तों की जानकारी दी गई है जो जिज्ञासुओं के सामने नामदान की प्राप्ति के समय रखी जाती हैं जिनका उनके लिए जीवनभर पालन करना आवश्यक है; साथ ही नामदान के लिए आवेदन करने की विधि को भी स्पष्ट किया गया है।

लगनशील जिज्ञासु को इस पुस्तिका के अलावा संतमत की अन्य पुस्तकों का भी विस्तार से अध्ययन करना चाहिए ताकि वह परमात्मा से साक्षात्कार के इस उपदेश को अच्छी तरह समझ सके। इसमें संतमत के परिचय से संबंधित पुस्तकों की सूची भी दी गई है।

सतगुरु इस बात पर बल देते हैं कि नामदान के लिए आवेदन करने से पहले जिज्ञासु को बौद्धिक रूप से संतुष्ट हो जाना चाहिए और उसके मन में उपदेश को लेकर कोई भी शंका नहीं रहनी चाहिए। एक देहधारी सतगुरु द्वारा नामदान प्राप्त करना किसी जिज्ञासु के जीवन की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना है। जो जिज्ञासु नामदान प्राप्त करने का निर्णय लेते हैं, उन्हें अपने अंतर में पक्का भरोसा होना चाहिए कि यह मार्ग उनके लिए सही मार्ग है। इसके साथ ही उन्हें दृढ़ निश्चय कर लेना चाहिए कि वे संतमत के महान सिद्धांतों का पालन करने का प्रयास जी‑जान से करेंगे।


उपदेश का सार

संतमत यानी संतों का उपदेश या संतों का मार्ग अध्यात्म को जानने का एक व्यावहारिक मार्ग है। इस मार्ग की जानकारी हमें देहधारी सतगुरु से मिलती है। सतगुरु द्वारा बताई गई विधि को अपनाकर हम स्वयं अपनी शरीररूपी प्रयोगशाला में उस शाश्वत परम‑सत्य को प्रमाणित कर सकते हैं जो अधिकांश धर्मों और बहुत‑सी दार्शनिक विचारधाराओं का मूल आधार है और सबसे ऊपर है।

संतमत, जिसे राधास्वामी उपदेश यानी आत्मा का विज्ञान अथवा सुरत‑शब्द योग कहा जाता है, वास्तव में प्रेम का मार्ग है। ‘राधास्वामी’ का शाब्दिक अर्थ है आत्मा (राधा) का परमात्मा (स्वामी) से मिलाप। इस मार्ग का लक्ष्य है आत्म‑साक्षात्कार द्वारा परमात्मा से मिलाप करना। देहधारी सतगुरु ही इस मार्ग का मूल आधार हैं।

सतगुरु इस संसार में मनुष्य‑देह धारण करके आते हैं यानी वह ‘देहधारी शब्दरूप’ होते हैं। उनका इस संसार में आने का केवल एक ही उद्देश्य होता है – आत्माओं को परमपिता परमात्मा के पास वापस ले जाना। जब सतगुरु किसी व्यक्ति को नामदान देते हैं तो वह उस आत्मा को उसके निजघर पहुँचाने का वचन देते हैं और उस क्षण से वह कभी अपने शिष्य का साथ नहीं छोड़ते। सतगुरु अपने नूरी स्वरूप में शिष्य के अंग‑संग रहते हैं और अंतर की यात्रा में तथा इस संसार में निरंतर उसका मार्गदर्शन तथा सहायता करते हैं। लेकिन अपनी महान आध्यात्मिक शक्तियों से भरपूर होते हुए भी सतगुरु बड़ी नम्रता तथा लगन के साथ एक सेवक के रूप में अपना कार्य करते हैं।
इस संसार में तथा उच्च मंडलों में वह जो भी कार्य करते हैं केवल अपने शिष्यों की भलाई के लिए करते हैं; उनका अपने शिष्यों के प्रति इतना प्रेम होता है जिसकी इस संसार में कोई मिसाल नहीं है।

सतगुरु समझाते हैं कि सृष्टि के आरंभ से ही सभी संतों का एक ही उपदेश रहा है, क्योंकि परमात्मा ने अपने साथ मिलाप का तरीक़ा ख़ुद ही बनाया है। वह यह भी स्पष्ट करते हैं कि परमात्मा एक है और सभी जीव उसी एक परमात्मा का अंश हैं, इसी लिए उस तक पहुँचने का रास्ता भी एक ही हो सकता है।

इसलिए यह मार्ग परमात्मा से मिलाप का वही मार्ग है जिसका उपदेश जीसस क्राइस्ट, महात्मा बुद्ध, लाओ‑त्ज़ू, गुरु नानक, मौलाना रूम आदि कई संत‑महात्माओं ने दिया है। देहधारी सतगुरु का होना इसलिए आवश्यक है, क्योंकि मनुष्य केवल मनुष्य से ही निर्देश तथा मार्गदर्शन प्राप्त कर सकता है। जिस प्रकार कोई बीमार व्यक्ति उस डॉक्टर से इलाज नहीं करवा सकता जो अब इस दुनिया में नहीं है, उसी प्रकार कोई जीवित व्यक्ति देहधारी सतगुरु की मौजूदगी से ही पूरा लाभ उठा सकता है।

संतमत के मूल सिद्धांत इस प्रकार हैं:

  1. आत्मा का अपने रचयिता परमात्मा के पास वापस पहुँचना ही मनुष्य‑जीवन का उद्देश्य है। यह उद्देश्य देहधारी सतगुरु से नामदान प्राप्त करके ही पूरा हो सकता है, क्योंकि वही शिष्य की आत्मा को शब्द‑धुन के साथ जोड़ सकते हैं।
  2. शब्द जिसे नाद, शब्द, परमात्मा की आवाज़, जीवनदायिनी दिव्य‑धुन, लॉगॉस, टाओ, नाम और कई अन्य नामों से पुकारा जाता है, वास्तव में परमात्मा की सृजनात्मक शक्ति का प्रकट रूप है। यह दिव्य‑धुन संपूर्ण सृष्टि में गूँज रही है। प्रत्येक जीव दोनों आँखों के मध्य, थोड़ा‑सा ऊपर ध्यान एकाग्र करके इस मधुर दिव्य‑धुन के साथ संपर्क कर सकता है। यह कोई शारीरिक बिंदु नहीं है बल्कि आंतरिक आध्यात्मिक केंद्र है। इसे तीसरा तिल, तीसरी आँख या शिव‑नेत्र भी कहते हैं।
  3. देहधारी सतगुरु द्वारा बताई गई विधि के अनुसार साधना करके जब मन पूरी तरह निश्चल हो जाता है, तभी शब्द सुनाई देता है। काम, क्रोध, लोभ, मोह तथा अहंकाररूपी पाँच विकारों के महाजाल में जकड़ा हुआ मन, इंद्रियों के अधीन होकर युगों‑युगों से इस भौतिक जगत में भटक रहा है और मन की करतूतों के कारण ही हमारी आत्मा देहरूपी बंदीख़ाने में क़ैद है।
  4. आवागमन के चक्र में फँसी हुई हर आत्मा यहाँ अनगिनत बार जन्म ले चुकी है। जन्मों‑जन्मों से मनुष्य अच्छे‑बुरे कर्म करता आया है, उन कर्मों के फल का भुगतान उसे कभी न कभी करना ही पड़ता है। हर जन्म में कर्मों का इतना अधिक बोझ इकट्ठा हो जाता है कि इसके भुगतान के लिए जीव इस संसार में एक के बाद एक, कई जन्म लेने के लिए विवश हो जाता है। लेकिन पिछले कर्मों का भुगतान करते‑करते जीव कई नए कर्म इकट्ठे कर लेता है।
  5. आत्मा के लिए किसी की सहायता के बिना अपने ही प्रयासों से आवागमन के चक्कर से छुटकारा पाना असंभव है। ऐसा केवल देहधारी सतगुरु की सहायता से ही संभव हो सकता है।
  6. जब कोई जीव देहधारी सतगुरु से नामदान प्राप्त करता है तो उस आत्मा की मुक्ति निश्चित हो जाती है; आत्मा जन्म‑मरण के चक्कर से छूट जाती है और अंत में उस परमपिता परमात्मा में समा जाती है, जो केवल प्रेम और आनंद-रूप है।
  7. नामदान के समय सतगुरु शिष्य की आत्मा को शब्द के साथ जोड़ देते हैं, भजन‑सुमिरन करने की हिदायतें देते हैं और संतमत के अनुसार जीवन जीने का सुझाव देते हैं।
  8. नामदान के समय जिज्ञासु को चार शर्तें जीवनभर निभाने का दृढ़ संकल्प करना होता है। नामदान के लिए आवेदन पत्र देने से पहले कुछ समय तक जिज्ञासु के लिए पहली तीन शर्तों का पालन करना ज़रूरी है। शिष्य सतगुरु के सामने इन चार शर्तों को निभाने का वायदा करता है क्योंकि इस मार्ग पर उन्नति के लिए इनका पालन करना अत्यंत आवश्यक है।

इस पुस्तिका में इन चार शर्तों की आगे व्याख्या की गई है। ये शर्तें हैं:

  1. शाकाहारी भोजन अपनाना जिसमें दूध तथा दूध से बनी वस्तुएँ भी शामिल हैं।
  2. शराब, तंबाकू तथा अन्य नशीले पदार्थों से परहेज़।
  3. संसार में अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभाते हुए एक निर्मल, नैतिक जीवन जीना।
  4. नामदान के समय बताई गई विधि के अनुसार पूरी लगन और ईमानदारी के साथ रोज़ ढाई घंटे भजन‑सुमिरन को देना।

नामदान के समय किए गए ये चार वायदे आपके जीवन के सबसे महत्त्वपूर्ण वायदे होंगे जिनका आपको दृढ़ता से पालन करना होगा। ये अपने अंतर में किए गए संकल्प हैं, केवल मौखिक रूप से या दिखावे के लिए किए गए वायदे नहीं। आपको ज़ोर देकर यह सलाह दी जाती है कि नामदान के लिए आवेदन करने से पहले अपने मन को पूरी तरह टटोलकर यह निश्चित कर लें कि आपने इन वायदों को पूरी तरह से समझ लिया है और आप इनका पालन करने और इनके अनुसार जीवन बिताने के लिए तैयार हैं। इस पुस्तिका में जो भी लिखा है, उसे नामदान के लिए आवेदन करने से पहले भलीभाँति समझ लें। सतगुरु जिज्ञासुओं को हमेशा यही सलाह देते हैं कि पूरी तरह सोच‑विचार करके ही क़दम उठाएँ और जल्दबाज़ी न करें। जैसा कि हुज़ूर महाराज चरन सिंह जी ने एक जिज्ञासु को लिखे पत्र में कहा है:

परमात्मा को प्राप्त करने के संतों के इस मार्ग के प्रति आपकी रुचि की मैं सराहना करता हूँ , पर ऐसा महत्त्वपूर्ण क़दम जल्दबाज़ी में या भावना की उत्तेजना में आकर नहीं उठाना चाहिये। संतमत के उपदेश को पूरी तरह समझना चाहिये और बुद्धि को हर तरह से संतुष्ट करना चाहिये। व्यक्ति को स्वयं इस बात का विश्वास हो जाना चाहिये कि उसके लिये इसके सिवाय दूसरा कोई मार्ग नहीं है। इसके बाद ही इस मार्ग को अपनाने के प्रश्न पर विचार करना चाहिये।

संतमत के कुछ सिद्धांत ऐसे हैं जिनका जीवन में अनुसरण करना पड़ता है और इन्हें भली प्रकार समझ लेना चाहिये। इस मार्ग को आधे मन से स्वीकार करने में किसी को कोई लाभ नहीं होगा। कृपया पुस्तकों को सावधानीपूर्वक पढ़ें और हर तरह से अपने आप को संतुष्ट कर लें। मांस आदि सब तरह के अनुचित भोजन, नशीले पेय और नशीली चीज़ों से दूर रहते हुए संतमत की रहनी पर चलने की कोशिश करें। सदाचार के युगों पुराने नियमों के अनुसार स्वच्छ नैतिक जीवन बिताएँ। जब आपको लगे कि आप हर प्रकार से तैयार हैं और सत्य की खोज करने के लिये अंतर से आपका मन बोलने लगे, तब अगला क़दम उठाएँ। यह सलाह आपके अपने भले के लिये है। बिना अच्छी तरह सोचे‑समझे अगर हम किसी मार्ग को अपनाते हैं, तो परिणाम संतोषप्रद नहीं होते।
प्रकाश की खोज, पत्र 419


चार शर्तें

1. शाकाहारी भोजन अपनाना
यदि आप नामदान के इच्छुक हैं तो आपको नामदान के लिए आवेदन करने से कम से कम एक साल पहले से लेकर, नामदान के बाद जीवनभर पूरी तरह शाकाहारी भोजन अपनाना होगा। शाकाहारी भोजन में मांस, मछली, पक्षियों का मांस, अंडे (सजीव या निर्जीव दोनों) तथा कोई भी ऐसे खाद्य‑पदार्थ जिनमें ये चीज़ें शामिल हों, खाने की मनाही है।

शाकाहारी भोजन में बहुत‑से स्वास्थ्यवर्धक, स्वादिष्ट तथा पौष्टिक खाद्य‑पदार्थ हैं जिनमें फल तथा सब्ज़ियाँ, दूध तथा दूध से बनी वस्तुएँ (दही, मक्खन, पनीर आदि), अनाज (जिनमें एग नूडल्स को छोड़कर अधिकांश ब्रेड और पास्ता शामिल हैं), दालें, मेवे, खानेवाले बीज, बीन्स और बिना मदिरा वाले पेय‑पदार्थ शामिल हैं। इन सीमाओं में रहते हुए हमें तरह‑तरह के स्वादिष्ट व्यंजन बनाने में कोई परेशानी नहीं होती। ऐसे भोजन में सभी आवश्यक प्रोटीन, मिनरल, विटामिन और ऐंज़ाइम होते हैं जिनकी हमें आवश्यकता होती है।

अपने स्पॉन्सर (Sponsor) और अन्य सत्संगियों से बातचीत करके आपको पता चल जाएगा कि शाकाहारी भोजन पर कई बढ़िया पुस्तकें उपलब्ध हैं जिनमें शाकाहारी व्यंजन बनाने की विधियाँ दी गई हैं। ये पुस्तकें लगभग सभी दुकानों में, ऑनलाइन वेबसाइट्‌स (Online Websites) पर, पौष्टिक खाद्य‑पदार्थों की दुकानों (Health Food Stores) के भोजन और सेहत से संबंधित विभाग में आसानी से मिल जाती हैं।

हुज़ूर महाराज चरन सिंह जी द्वारा लिखे पत्रों में से नीचे कुछ उद्धरण दिए गए हैं जिनमें शाकाहारी भोजन और उसके महत्त्व के बारे में विस्तार से चर्चा की गई है:

इस संसार में हम बिना किसी के प्राण लिये जी नहीं सकते, इसलिये संत हमें शुद्ध शाकाहारी बनने का आदेश देते हैं। हम शाकाहारी भोजन से स्वास्थ्यपूर्ण जीवन बिता सकते हैं और साथ ही अपने कर्मों के बोझ में भी कम से कम वृद्धि करते हैं, क्योंकि हम केवल एक तत्त्व वाले जीव (फल और सब्ज़ी) के ही प्राण लेते हैं। इस प्रकार हम अपनी ज़िंदगी में कम से कम कर्मों का बोझ इकट्ठा करते हैं। …

लेकिन अगर हमें अपने लक्ष्य की कोई परवाह और चिंता ही नहीं है और अपना पेट भरने के लिये पशुओं, पक्षियों, मछलियों आदि को मारते हैं या उनकी मौत का कारण बनते हैं, तो इन बुरे कर्मों का हिसाब हमें ज़रूर देना पड़ेगा और इनका बोझ इतना भारी हो जाएगा कि दौड़ पाना तो दूर रहा, हम खड़े भी न हो सकेंगे। मनोरंजन, खेल या शिकार के लिये जानवरों को मारना तो आहार के लिये इन्हें मारने से भी ज़्यादा बुरा है और इसका बोझ कहीं ज़्यादा होता है। …

हमें सलाह दी जाती है कि हम शाकाहारी रहकर कम से कम कर्मों को इकट्ठा करें। हमारे कर्मों का भंडार इतना भारी है यानी कर्मों का पहले ही हम पर इतना अधिक भार है कि अपनी ज़िंदगी में इसे बढ़ाने के बजाय घटाने की कोशिश करनी चाहिये।
दिव्य प्रकाश, पत्र 444

आपकी संतमत में रुचि और नाम पाने की इच्छा के संबंध में मेरे लिये यह कहना आवश्यक है कि शाकाहारी भोजन की शर्त में छूट नहीं दी जा सकती। मांस, मछली, अंडे और साथ ही शराब तथा इनसे बनी हुई चीज़ों का नामदान की प्राप्ति से पहले ही त्याग, एक ज़रूरी शर्त है। जहाँ तक हमारा अनुभव है, शाकाहारी भोजन, पूर्व और पश्चिम दोनों देशों के सत्संगियों के लिये अनुकूल और फ़ायदेमंद साबित हुआ है। यह मन और शरीर को शुद्ध करता है। … जब तक आप बताए गए भोजन पर नहीं रहते हैं, तब तक आपको शब्द के मार्ग में शिष्य के रूप में स्वीकार कर सकना संभव नहीं है।
संतमत दर्शन, पत्र 5

शाकाहारी भोजन का एक और लाभ यह भी है कि हमारे मन में सभी जीवधारियों के प्रति सम्मान की भावना उत्पन्न होती है। साथ ही शाकाहारी बनने से भजन‑सुमिरन में बहुत लाभ होता है।

मांस और अंडे का आहार वृत्तियों को उत्तेजित करता है, जबकि अपनी आध्यात्मिक प्रगति के लिये हमें अनुत्तेजक आहार चाहिये जो शांति और सहजता पैदा करे। हमारे आहार का हम पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है और जैसा आहार करते हैं, वैसा ही मन बनता है, ‘जैसा खावे अन्न, वैसा होवे मन।’ मांस और मदिरा ध्यान को फैलाते हैं और एकाग्रता में बाधा डालते हैं। … जानवरों की हत्या करने तथा मांस का आहार करने से मन और आत्मा में कठोरता आ जाती है। उस प्रभु के यहाँ, जो ख़ुद प्रेम, करुणा, उदारता और दया का मूर्त रूप है, ऐसे लोगों को कोई स्थान नहीं मिलता।
प्रकाश की खोज, पत्र 501

शाकाहारी भोजन का दृढ़ता से पालन करने के अलावा हमारे अंदर ज़िंदगी की क़ीमत का एहसास बना रहे, इसके लिए हमें कुछ और निर्णय भी लेने होंगे। हमें यह तय करना होगा कि चमड़े की वस्तुएँ पहनने और कीड़े‑मकौड़ों का नाश करने जैसे विषयों को लेकर कहाँ तक हम अपनी सीमा निर्धारित करें। हुज़ूर महाराज चरन सिंह जी ने नीचे दिए गए उद्धरणों में इसी विषय को स्पष्ट किया है:

चमड़े के जूतों का उपयोग सैद्धांतिक दृष्टि से शायद उचित न हो, परंतु हमें इस दुनिया में रहना है और कहीं न कहीं तो सीमा बाँधनी ही पड़ेगी। चमड़े के लिये हमेशा पशुओं का वध नहीं किया जाता, बहुत‑से जानवर क़ुदरती मौत भी मरते हैं और उनका चमड़ा जूते बनाने के काम में आता है। यों भी हम रोज़ाना अनेक जीवों का नाश करते हैं। क्योंकि वायुमंडल जीवों से भरा हुआ है, इसलिए हमारे साँस लेने से भी अनेक जीव मरते हैं। इसलिए इस संसार में एक जीव दूसरे जीव पर पलता है और किसी हद तक जीवन नष्ट किये बिना यहाँ जीना असंभव है।
दिव्य प्रकाश, पत्र 125

जानवरों के बालों (फ़र) से बने वस्त्र, जूते, बटनों इत्यादि के बारे में आपने पूछा है। लेकिन ज़िंदगी में इतनी ज़्यादा बाल की खाल निकालने से गुज़ारा नहीं हो सकता। अगर हम इस प्रकार सोचने लगें तो हमें नंगे पाँव चलना पड़ेगा। … कभी‑कभी हमें उन ख़तरनाक और ज़हरीले जीवों को मारना पड़ता है जो मानव जीवन के लिये ख़तरा बन जाते हैं, किंतु केवल मज़ा लेने और शिकार के लिये अथवा भोजन के लिये उन्हें मारना दूसरी बात है और संतमत में ऐसी हत्या की कोई माफ़ी नहीं है। हम घरों, खेतों या उन स्थानों को जहाँ लोग एकत्रित होते हैं या ठहराए जाते हैं, सफ़ाई और स्वास्थ्य के लिये कीड़े‑मकौड़े तथा अन्य जीवाणुओं से मुक्त रखते हैं, क्योंकि उनकी उपस्थिति मनुष्य जीवन के लिये ख़तरनाक है।
प्रकाश की खोज, पत्र 219

मांस, मछली, पक्षियों का मांस और अंडे आदि के अलावा कुछ और भी खाद्य-पदार्थ हैं जिनमें पशुओं के शरीर से ली गई सामग्री का प्रयोग होता है; शाकाहार अपनाने वाले नये जिज्ञासु को इनकी जानकारी होनी चाहिए:

  1. जिन खाद्य‑पदार्थों पर शॉर्टनिंग अथवा प्योर शॉर्टनिंग (चरबी) का लेबल लगा होता है, उनका खाने में प्रयोग नहीं करना चाहिए। कुछ ऐसे खाद्य‑पदार्थ भी हो सकते हैं जिन पर वेजिटेबल शॉर्टनिंग या बटर शॉर्टनिंग का विशेष लेबल न लगा हो, परंतु उनमें सुअर अथवा किसी दूसरे जानवर की चरबी के इस्तेमाल की संभावना हो सकती है।
  2. जिन खाद्य‑पदार्थों में जिलेटिन का प्रयोग हो, उनका सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि जिलेटिन आम तौर पर पशुओं के अंगों, उनकी हड्डियों या खुरों से निकाली जाती है। जैली (Jello) अकसर जिलेटिन से ही बनाई जाती है। जिलेटिन सब्ज़ियों तथा फलों से भी प्राप्त होती है जैसे पेकटिन तथा विशेष प्रकार की समुद्री घास (Sea Weed) से (अगर‑अगर, चाइना‑ग्रास, कैरागीनन) इनका प्रयोग किया जा सकता है लेकिन उन पर शाकाहारी स्रोत का लेबल लगा होना चाहिए। लेसिथिन, ग्लिस्रीन और रैनेट जिनका चीज़ (Cheese) में प्रयोग किया जाता है; आम तौर पर जानवरों से ही प्राप्त किए जाते हैं।
    जब तक यह स्पष्ट न हो कि इन्हें सब्ज़ियों आदि से प्राप्त किया गया है, इनका प्रयोग नहीं करना चाहिए। हलाल और कोशर जिलेटिन भी प्राय: जानवरों से ही मिलती है।
  3. कई खाद्य‑पदार्थों में लेबल नहीं लगा होता लेकिन उनमें अंडे अथवा अंडे के सफ़ेद भाग का इस्तेमाल किया जाता है। इनमें तरह‑तरह की ब्रेड, ब्रेड से बने व्यंजन, क्रैकर, बेकरी के अधिकतर खाद्य‑पदार्थ, पेस्ट्री (केक, पाई, बिस्कुट, कुकीज़ वग़ैरा) मेयोनेज़, मार्श‑मैलो, सलाद ड्रेसिंग, कई तरह की आइसक्रीम और शरबत तथा कई प्रकार की कैंडी और मीठी गोलियाँ शामिल हैं।
  4. विटामिन तथा सप्लीमैंट लेते समय इस बात का पूरा ध्यान रखना चाहिए कि कहीं इनमें जानवरों से लिया गया कोई अंश तो शामिल नहीं है। उदाहरण के लिए विटामिन ए और ओमेगा‑3 का स्रोत आम तौर पर मछली का तेल होता है। विटामिन डी और कैल्शियम का स्रोत भी पशु हो सकते हैं।
    आजकल कई क़िस्म के शुद्ध शाकाहारी अथवा वीगन विटामिन बाज़ार में उपलब्ध हैं।
  5. ऐसे खाद्य‑पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए जिन्हें तैयार करने में वाइन अथवा शराब जैसे अन्य नशीले पेय‑पदार्थों का इस्तेमाल किया गया हो।

अगर आप किसी विशेष खाद्य‑सामग्री में शामिल पदार्थों के बारे में जानना चाहते हैं कि यह सामग्री जानवरों से अथवा फल‑सब्ज़ियों से प्राप्त की गई है तो आप उस पदार्थ को बनानेवाली कंपनी से यह जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। यह जानकारी आम तौर पर आसानी से मिल जाती है। कोई भी ऐसा खाद्य‑पदार्थ जिसके शाकाहारी होने में संदेह हो, नहीं खाना चाहिए।

आहार को लेकर ज़्यादा सनकी या हठी होने की कोई ज़रूरत नहीं है। सतगुरु केवल आध्यात्मिक पहलू को ध्यान में रखते हुए ही अपने शिष्यों को ऐसा भोजन लेने के लिए मना करते हैं जिसे तैयार करने के लिए जानवरों की हत्या की जाए। यह ज़रूरी नहीं है कि आप केवल फल या बिना पका हुआ भोजन खाएँ या फिर केवल जैविक रूप (Organic) से तैयार किए गए खाद्य‑पदार्थ ही लें। सतगुरु परामर्श देते हैं कि भोजन के लिए ऐसे खाद्य‑पदार्थों का चुनाव करें जो हलके हों, पौष्टिक हों और जो आसानी से हज़म हो जाएँ। संतमत के अन्य पहलुओं की तरह आहार के बारे में भी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि सतगुरु के आदेश के अनुसार आप शाकाहार के वायदे का कितनी दृढ़ता से पालन करते हैं और ऐसा करने में आप कितना अधिक प्रयास करते हैं।

2. शराब, तंबाकू तथा अन्य नशीले पदार्थों से परहेज़
नामदान के लिए आवेदन करने से कम से कम एक साल पहले हर प्रकार के नशीले पदार्थों, तंबाकू से बनी वस्तुओं (जिनमें इलैक्ट्रॉनिक यानी ई‑सिगरेट शामिल है) और सभी नशीली तथा मन पर बुरा प्रभाव डालनेवाली दवाइयों (मारुह्वाना, कोकेन, हेरोइन, एल.एस.डी. आदि) से परहेज़ करना है और नामदान प्राप्त करने के बाद इन्हें सदा के लिए छोड़ देना है।

रूहानी नज़रिए से हमें हर उस आदत से दूर रहना चाहिए जिसका हम पर बुरा असर पड़ता है। अपने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल ठीक तरह से करना हमारा फ़र्ज़ है। धूम्रपान और तंबाकू से बने पदार्थ लेने की आदत आसानी से बन जाती है जो हमारे मन पर गहरा असर डालती है। इसकी वजह से मन और शरीर में ऐसी ज़बरदस्त तलब उठती है जो हमारे मनोबल को कमज़ोर कर देती है। परमार्थ के मार्ग पर चलने, ज़िंदगी का सामना करने और अपने उसूलों पर क़ायम रहने के लिए हमें दृढ़ इच्छाशक्ति की ज़रूरत है। धूम्रपान हमें शारीरिक और मानसिक तौर से कमज़ोर बना देता है और इसका हानिकारक असर हमारी रूहानी तरक़्क़ी पर पड़ता है।

धूम्रपान एक ख़तरनाक आदत है, यह धीमी गति का ज़हर है जो कई गंभीर रोगों को जन्म देता है। इसलिए बेहतर है कि हम ऐसी आदतों से दूर रहें। हम ज़ोर देकर यह सुझाव देते हैं कि जो भी आदत हमें अपने वश में कर लेती है और हमारी सेहत के लिए हानिकारक है, उससे हमें सख़्त परहेज़ करना चाहिए।
जी. एस. ढिल्लों

स्पिरिच्युल डिस्कोरसेज़, वॉल्यूम 1 (Spiritual Discourses, Vol. 1) के अध्याय द डिसाइपल्ज़ वे ऑफ़ लाइफ़ (The Disciple’s way of Life) में हुज़ूर महाराज चरन सिंह जी इस शर्त के बारे में बताते हुए कहते हैं:

मादक पेय और नशीले पदार्थों आदि का प्रयोग करना छोड़ दो क्योंकि ये निश्चित रूप से सबसे तेज़ ज़हर हैं। इनसे केवल पल भर के लिए ख़ुशी मिलती है। नशे की लत का परिणाम लंबी बीमारी और पछतावा ही है। इनका प्रयोग हमारी सोच को इतना धुँधला कर देता है और हमारे विवेक पर ऐसा परदा डाल देता है कि हम अच्छे‑बुरे, सही‑ग़लत, न्याय‑अन्याय में अंतर नहीं कर पाते। परिणाम यह होता है कि हम ऐसे कर्म कर बैठते हैं जो हमें मुश्किलों में डाल देते हैं। मादक पेय वास्तव में सभी बुराइयों की जड़ हैं। ये हमें बुरे कर्म करने के लिए उकसाते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि पल भर की ख़ुशी दु:ख और पीड़ा का महाजाल बुन देती है।

कई बार डॉक्टर कोई दर्द की दवाई या फिर कोई ऐसी दवाई देता है जिसमें कुछ मात्रा में नशीला पदार्थ भी मिला होता है। विशेष परिस्थितियों में डॉक्टर के परामर्श के अनुसार ये दवाइयाँ ली जा सकती हैं। लेकिन यह बात मेडिकल मारुह्वाना पर लागू नहीं होती, भले ही डॉक्टर आपको इसके प्रयोग के लिए कहे। यही बात सिंथेटिक (Synthetic) दवाइयों पर भी लागू है जिनमें टी.एच.सी. कंपाउंड मिला होता है। सत्संगी अथवा जिज्ञासु को मारुह्वाना का सेवन करने की इजाज़त कभी नहीं दी गई और ऐसा केवल इसलिए नहीं कि यह ग़ैरक़ानूनी है। सतगुरु ने यह भी स्पष्ट किया है कि मारुह्वाना या भाँग से बने पदार्थों का, चाहे उनमें टी.एच.सी. (THC) हो या न हो, दवाई के तौर पर भी प्रयोग न किया जाए। इनमें कैनाबीनोइड के सभी पदार्थ जैसे सी.बी.डी. (CBD) और इनसे बने तेल और क्रीम जैसे पदार्थ भी शामिल हैं।

जो जिज्ञासु नामदान के लिए आवेदन करते हैं लेकिन चिकित्सा के लिए मारुह्वाना या कैनाबीनोइड से बने सी.बी.डी. (CBD) जैसे पदार्थों का सेवन करते हैं, उन्हें नामदान के लिए स्वीकार नहीं किया जाएगा।

सबसे पहले हमें यह देखना है कि हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है। सतगुरु हमेशा कहते हैं कि सत्संगी का सबसे पहला कर्तव्य भजन‑सुमिरन है। अगर हमारा मन निर्मल और एकाग्र होगा, तभी हम सही तरीक़े से भजन‑सुमिरन कर पाएँगे। मारुह्वाना एक ऐसा नशीला पदार्थ है जो भ्रमित कर देता है। इसके कुछ बुरे प्रभाव इस प्रकार हैं: याददाश्त पर बुरा असर, एकाग्रता में कमी, मनोदशा में उतार‑चढ़ाव, सोच‑समझ और शारीरिक गतिविधियों पर बुरा प्रभाव। यह हमारे विवेक और तर्कशक्ति को प्रभावित करता है। यह हमारी स्पष्ट सोच और मन की एकाग्रता को दुर्बल कर देता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि कई बार हमें दर्द से आराम पाने के लिए या फिर किसी और बीमारी के कारण दवाइयाँ लेनी पड़ती हैं। इनमें से कुछ दवाइयाँ हमारे मन तथा हमारी एकाग्रता की शक्ति को प्रभावित भी करती हैं। लेकिन अगर हमारा इरादा पक्का है तो हम ऐसी दवाइयाँ ढूँढ़ ही लेंगे जिनका कम से कम दुष्प्रभाव हो और हम पूरी कोशिश करेंगे कि इन दवाइयों को कम से कम समय तक लेना पड़े। जो सत्संगी भजन‑सुमिरन के प्रति पूरी तरह समर्पित हैं, वे दवाइयों के इन दुष्प्रभावों से बचना चाहते हैं। भले ही ये दवाइयाँ किसी डॉक्टर ने ही क्यों न दी हों, तब भी उनके बदले में कोई दूसरी दवाई ढूँढ़ लेनी चाहिए।

सतगुरु स्पष्ट करते हैं कि नशीले पदार्थों अथवा दवाइयों के प्रभाव से होनेवाले अनुभवों का भजन‑सुमिरन के दौरान होनेवाले आंतरिक अनुभवों से कोई संबंध नहीं है। ऐसे नशीले पदार्थ वास्तव में “इस मार्ग की बहुत बड़ी रुकावटें हैं … और आंतरिक उन्नति को पूरी तरह रोक देते हैं।”

नीचे महाराज चरन सिंह जी के पत्रों में से कुछ उद्धरण दिए जा रहे हैं। इनमें शराब तथा नशीले पदार्थों की सख़्त मनाही के कारण बताए गए हैं:

शराब से परहेज़ के पक्ष में ज़्यादा तर्क और दलील की ज़रूरत ही नहीं है। हम सभी जानते हैं कि शराब पीकर लोग किस तरह अक़्ल खो देते हैं और इसके नशे में क्या‑क्या बेवकूफ़ियाँ और गुनाह कर बैठते हैं।
दिव्य प्रकाश, पत्र 351

कृपया याद रखें कि रूहानी अनुभव की प्राप्ति किन्हीं भौतिक साधनों के द्वारा नहीं हो सकती, चाहे ये साधन एल.एस.डी. या ऐसी कोई भी वस्तु क्यों न हो। इन चीज़ों का संबंध शरीर और मन से है, जबकि परमात्मा इन दोनों से परे है। मानसिक और आध्यात्मिक रूप से खोखला बनाने के अतिरिक्त ये नशीली चीज़ें व्यसनी के शारीरिक स्वास्थ्य को बुरी तरह जर्जर कर देती हैं। अनेक युवा व्यक्ति इन दवाओं के प्रभाव के कारण पागल हो चुके हैं और आत्मघात तक कर चुके हैं। केवल किसी दवा या नशीली वस्तु के लेने से ही यदि परमात्मा को पाया जा सकता तो इस संसार में कौन उसे प्राप्त किये बिना रहता, फिर तो यह बड़ा आसान तरीक़ा होता। किंतु परमात्मा को पाने का मार्ग यह नहीं है बल्कि यह तो हमें परमात्मा से और दूर ले जाता है।
प्रकाश की खोज, पत्र 164

हुज़ूर महाराज चरन सिंह जी द्वारा लिखे गए एक पत्र में इस विषय तथा इससे संबंधित अन्य विषयों पर कुछ निर्देश मिलते हैं। आपको सलाह दी जाती है कि आप इस पत्र को ध्यानपूर्वक पढ़ें, क्योंकि इसमें पहली तीन शर्तों के बारे में सतगुरु के निर्देश शामिल हैं:

मैं युवा सत्संगियों के बारे में आपकी चिंता को समझ सकता हूँ , क्योंकि उनमें से अधिकांश युवा फिर से नशीली दवाओं के सेवन और नैतिक मूल्यों की परवाह न करते हुए अपने पुराने मौज‑मस्ती के तौर‑तरीक़ों की ओर मुड़ रहे हैं। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि आधुनिक समाज में नैतिक मूल्यों का कोई महत्त्व नहीं रहा है और नशीली दवाओं का सेवन इस हद तक बढ़ गया है कि प्रतिष्ठित युवा लोग भी मारुह्वाना के सेवन में कोई बुराई नहीं समझते। आधुनिक स्वछंद समाज (Permissive Society) आज के युवाओं के लिए विनाशकारी साबित हो रहा है। आपने जो लिखा है, उसे ध्यान में रखते हुए मुझे लगता है कि आवेदकों की और भी कड़ी जाँच‑पड़ताल करना आवश्यक है। उनकी पूरी तरह छानबीन करें, उनके परिवेश का पता लगाएँ , उनके वातावरण को देखें और यह जानकारी प्राप्त करें कि वे कितने समय से नशीली दवाएँ ले रहे थे और उन्होंने कब से इनका सेवन बंद किया है, उनकी संगति कैसी है और उन्हें किस बात में दिलचस्पी है। इस जानकारी से आपको यह बेहतर पता चल जाएगा कि संतमत को अपनाने के प्रति वे कितने ईमानदार हैं।

जो लोग मांस, अंडे आदि खाते हैं, मादक पेय और मारुह्वाना, हेरोइन, एल.एस.डी. आदि नशीली दवाइयों का सेवन करते हैं, साथ ही ऐसा अनैतिक (अस्वाभाविक और ग़ैरक़ानूनी संगति) जीवन जी रहे हैं जिसकी संतमत इजाज़त नहीं देता, ऐसे व्यक्तियों को नामदान के लिए आवेदन करने से पहले यह निश्चित कर लेना चाहिए कि उन्होंने यह सब कुछ हमेशा के लिए छोड़ दिया है और संतमत के उपदेश के अनुसार एक संयमित जीवन जी सकते हैं या नहीं।

नामदान की तैयारी के दौरान एक ऐसा वक़्त आता है जब जिज्ञासु स्वयं अपनी परख कर सकता है कि क्या वह संतमत के अनुसार जीवन गुज़ार सकेगा या नहीं। इसके अतिरिक्त उसे एक मज़बूत आधार और स्थिरता प्राप्त होगी जो आध्यात्मिक उन्नति के लिए बहुत ज़रूरी है।

3. निर्मल और नैतिक जीवन जीना
नैतिक जीवन का मूल आधार स्त्री‑पुरुष का मर्यादापूर्ण शारीरिक संबंध है। इसलिए नामदान के लिए आवेदन करने से कम से कम एक साल पहले और नामदान की प्राप्ति के बाद जीवनभर इस मर्यादा का पालन करना है।

सतगुरु क़ानूनी दृष्टि से स्वीकार्य विवाह के अंतर्गत ही स्त्री‑पुरुष के शारीरिक संबंध को मंज़ूरी देते हैं। विवाह किए बिना अवैध रूप से स्त्री‑पुरुष के एक साथ रहने की प्रथा को सतगुरु मंज़ूरी नहीं देते, भले ही कुछ देशों में क़ानूनी तौर पर इसकी इजाज़त दी गई है।

स्त्री‑पुरुष के मर्यादापूर्ण शारीरिक संबंध के विषय पर सतगुरु द्वारा कहे गए कुछ वचन नीचे दिए गए हैं:

काम और वासनाएँ आध्यात्मिक प्रगति के अत्यंत शक्तिशाली शत्रु हैं। संतमत काम की सहज प्रवृत्ति की निंदा नहीं करता, किंतु विवाहित जीवन के दायरे में रहते हुए उचित सीमा में इसके उपयोग की राय देता है। काम की प्रवृत्ति हमें केवल इंद्रिय‑सुखों में लिप्त रहने के लिये नहीं दी गई है। इसका प्रयोजन संयम में रहते हुए केवल वंशवृद्धि करना है। इस सहज प्रवृत्ति का बे‑लगाम उपयोग शारीरिक एवं आध्यात्मिक विकास के लिये अत्यंत हानिकारक है।

अपने विचार स्वच्छ रखें, भली संगति में रहें, अच्छी पुस्तकें पढ़ें, परमात्मा को सदा याद रखें और उससे दया‑मेहर के लिये प्रार्थना करें। अपने मन से साफ़‑साफ़ और दृढ़तापूर्वक कह दें कि आप उसे ऐसी नीच भावनाओं और वासनाओं में नहीं फँसने देंगे। ये कुछ ऐसे उपाय हैं जिनका मैं नेक जीवन के लिये सुझाव दे सकता हूँ। मन की यह प्रवृत्ति है कि आप अपनी इच्छा के अनुसार जैसी चाहें अच्छी‑बुरी आदतें डाल सकते हैं। मन हमेशा भोगों की ओर जाना चाहता है, किंतु थोड़े‑से संकल्प और प्रयास के द्वारा हम इसके रुख़ को दूसरी ओर मोड़ सकते हैं।
प्रकाश की खोज, पत्र 238

काम‑वासना में बहुत अधिक लगे रहने का अर्थ है, इस वासना में अंधाधुंध उलझे रहना। इससे व्यक्ति का पतन होता है और मन की वृत्तियाँ पतित हो जाती हैं। काम की प्रवृत्ति का सीमा के अंदर उपयोग अनुचित नहीं है। अधिकांश सतगुरु गृहस्थ थे और उनके परिवार थे। संतमत यह नहीं कहता कि संसार छोड़ दो और एकांतवासी बन जाओ। संसार के पदार्थों तथा व्यक्तियों से दूर भागना असली त्याग नहीं है। मुख्य बात तो मन की वृत्ति है। हमें संसार में रहते हुए भी संसार का नहीं बनना है। जीवन के हर क्षेत्र में हमें अपनी ज़िम्मेदारी निभानी है और साथ ही यहाँ की असलियत को भी याद रखना है। प्रत्येक वस्तु नाशवान और क्षणभंगुर है। …

इसमें कोई संदेह नहीं कि काम का आवेग प्रबल होता है और उसके दमन से कभी‑कभी गंभीर उलझनें पैदा हो जाती हैं। उचित सीमाओं में रहते हुए विवेकपूर्ण ढंग से इसका प्रयोग करना चाहिये, तब आध्यात्मिक प्रगति में यह बाधक नहीं होता। यह सब धीरे‑धीरे होगा। आप रातों‑रात इन पाँच विकारों से मुक्त नहीं हो सकते। समस्त चिंताएँ छोड़कर प्रेम तथा भक्तिपूर्वक अपना भजन और सिमरन प्रतिदिन करें।
प्रकाश की खोज, पत्र 461

हालाँकि स्त्री‑पुरुष का मर्यादापूर्ण शारीरिक संबंध, निर्मल और नैतिक जीवन का एकमात्र पहलू नहीं है, फिर भी यह एक महत्त्वपूर्ण पहलू अवश्य है और सतगुरु चाहते हैं कि नामदान के लिए आवेदन करने से पहले कम से कम एक साल तक जिज्ञासु इसका दृढ़ता से पालन करें।

संतमत की पुस्तकों में नैतिकता के दूसरे पहलुओं की भी विस्तार से चर्चा की गई है। इन्हें संतमत के अन्य ज़रूरी उसूल कहा जाता है और इनमें मुख्य रूप से ये उसूल शामिल हैं: संसार में अपना कामकाज करते हुए ईमानदार और स्पष्टवादी होना, अपनी जीविका ख़ुद कमाना और व्यर्थ ही किसी पर बोझ न बनना, दयालु और स्नेहशील होना और दूसरों के प्रति क्षमा भाव रखना। सतगुरु का कहना है कि हमें अपने परिवार‑जनों, मित्रों और कारोबार में सहयोगियों के प्रति अपने कर्तव्य ठीक से निभाते हुए अपने आध्यात्मिक कर्तव्यों को भी पूरा करना है और इस प्रकार एक सामान्य जीवन व्यतीत करना है। डॉ. जूलियन जॉनसन अपनी पुस्तक अध्यात्म मार्ग में इस जीवन‑शैली का इस प्रकार वर्णन करते हैं:

निर्मल नैतिक आचरण का अर्थ है कि इनसान दूसरों के प्रति सद्‌भावना रखनेवाला, ईमानदार, निष्ठावान, सच्चाई पर चलनेवाला, न्यायप्रिय और दयालु हो। वह अपने संबंधों और व्यवहार में स्वार्थी न हो। यदि इनसान ख़ुद काम कर सकता है, तो उसे दूसरों पर निर्भर नहीं रहना चाहिये। यह नियम आदमी और औरत दोनों पर लागू होता है। जहाँ तक हो सके हर किसी को अपनी जीविका ख़ुद कमानी चाहिये। जो भी सेवा का अवसर मिले उससे लाभ उठाना चाहिये। यदि वह धनी है तो उस धन का प्रयोग अच्छे कार्यों के लिये करना चाहिये, केवल अपने स्वार्थ पूरे करने के लिये नहीं। उसे सादा जीवन व्यतीत करना चाहिये और दूसरों के लिये एक श्रेष्ठ उदाहरण बनना चाहिये। अपनी सोच और व्यवहार में पवित्र होना चाहिये। अपने वैवाहिक संबंध में भी भोग‑विलास में लीन रहने से बचना चाहिये। दूसरे शब्दों में उसे सांसारिक दृष्टि से अच्छा इनसान बनना चाहिये, ऐसा इनसान जो विषय‑भोगों का ग़ुलाम न हो। जो ऐसा जीवन अपना लेता है, समझो कि वह इस मार्ग पर अगला क़दम उठाने के लिये तैयार है।
अध्यात्म मार्ग, निर्मल नैतिक आचरण

नामदान प्राप्त करने के इच्छुक हर व्यक्ति की यह ज़िम्मेदारी है कि वह रोज़मर्रा के जीवन के उन सभी पहलुओं से परिचित हो, जो निर्मल और नैतिक आचरण की प्रेरणा देनेवाले इस वायदे में शामिल हैं। यह वास्तव में ऐसा जीवन है जिसे सतगुरु ‘आदर्श रहनी’ कहते हैं। डॉ. जॉनसन कहते हैं:

जिज्ञासुओं को याद रखना चाहिये कि कोई व्यक्ति जिसने अभी इस मार्ग पर चलना शुरू ही किया है, उससे हम दोषरहित आचरण की आशा नहीं कर सकते। … मार्ग पर लंबे समय तक अभ्यास करने के बाद ही पूर्णता आती है, न कि शुरुआत में। इसलिये यह आशा करना बहुत बड़ी भूल है कि दीक्षा से पहले जिज्ञासु का आचरण पूरी तरह से निर्मल हो। वह इसी लिये तो दीक्षा प्राप्त करना चाहता है, ताकि सतगुरु के शिष्य के रूप में अपना जीवन सुधार सके। कोई भूखा‑प्यासा व्यक्ति यह इंतज़ार नहीं करता कि पहले उसमें ताक़त आ जाए और फिर वह खाना खाए। वह तो ताक़त पाने के लिये ही भोजन करता है।
अध्यात्म मार्ग, निर्मल नैतिक आचरण

4. भजन‑सुमिरन का रोज़ाना अभ्यास
परमार्थी के लिए भजन‑सुमिरन को रोज़ ढाई घंटे का समय देने की चौथी शर्त को पूरा करने के लिए पहली तीन शर्तें नींव का काम करती हैं। संतमत दर्शन के पत्र न. 315 में हुज़ूर महाराज चरन सिंह जी लिखते हैं: ‘सही तरीक़े से जीवन जीना, सही ढंग से भजन‑सुमिरन करने का आधार है।’ नामदान के समय भजन‑सुमिरन की विधि बताई जाती है और इसके लिए निर्देश भी दिए जाते हैं। नामदान से पहले भजन‑सुमिरन का अभ्यास नहीं करना चाहिए।

नामदान के लिए आवेदन करने से पहले आपको यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि नामदान के बाद आपको भजन‑सुमिरन के लिए हर रोज़ कितना समय देना होगा, ताकि आप इस शर्त को तथा अन्य तीन शर्तों को पूरा करने के लिए हर संभव कोशिश करने के लिए तैयार हों।

भजन‑सुमिरन को पूरा समय देना चाहिए , चाहे मन लगे या न लगे। अभ्यास से ही पूर्णता प्राप्त होती है और नियम से तथा समय पर भजन‑सुमिरन करने से धीरे‑धीरे, लेकिन निश्चित रूप से भटकता हुआ मन एकाग्र होने लगता है। जिस प्रकार लगातार बहनेवाली पानी की धारा कठोर से कठोर पत्थर को भी नरम कर देती है, ऐसे ही लगातार सिमरन करने से मन की भागदौड़ भी कम होने लगती है। इंद्रियाँ हर पल मन को धोखा दे रही हैं, लेकिन यदि हम ईमानदारी से एक सच्चे सत्संगी का जीवन जीते हैं तो हम इनके जाल से छूट जाएँगे, हमें भजन‑सुमिरन में आनंद भी आने लगेगा और हम मन द्वारा खड़ी की हुई बाधाओं पर विजय हासिल कर लेंगे। वास्तव में मन ही सारी मुसीबतों की जड़ है। यह आपसी मतभेद पैदा करता है और हमारे अंदर जड़‑पदार्थों को हासिल करने की ललक पैदा करता है।
स्पिरिच्युल डिस्कोरसेज़, वॉल्यूम 1

सतगुरु चाहते हैं कि हम प्रतिदिन भजन‑सुमिरन के लिए कम से कम ढाई घंटे अवश्य दें। भजन‑अभ्यास के बारे में हुज़ूर महाराज चरन सिंह जी के कुछ उद्धरण नीचे दिए जा रहे हैं:

सत्संगी से यह अपेक्षा की जाती है कि वह प्रतिदिन कम से कम ढाई घंटे भजन‑सिमरन में लगाए। हो सकता है कि शुरू में यह संभव न हो, पर किसी भी दिन नाग़ा नहीं होना चाहिये और समय को धीरे‑धीरे तब तक बढ़ाते जाना चाहिये, जब तक प्रतिदिन आप ढाई घंटे तक भजन‑सिमरन न करने लगें। जब तक संतमत का हम सही ढंग से पालन करने की कोशिश नहीं करते और अपना कर्तव्य ईमानदारी और श्रद्धापूर्वक नहीं निभाते, तब तक इस मार्ग से अधिक लाभ प्राप्त नहीं कर सकते और इस हालत में हमारा शिकायत करना कोई मायने नहीं रखता। सिमरन तो सारा दिन आपके साथ रहना चाहिये और अभ्यास के लिये रोज़ की नियमपूर्वक बैठक में कभी नाग़ा नहीं होना चाहिये।
प्रकाश की खोज, पत्र 435

हर व्यक्ति को भजन‑सुमिरन के लिए वातावरण बनाना है। आपको घर में, अपने कार्य करने के स्थान पर और परिचितों के बीच ऐसा अनुकूल वातावरण बनाकर अपने आप को इसके अनुरूप ढालना है। ज़िंदगी में कुछ छोड़ना पड़ेगा, कुछ अपनाना पड़ेगा और कई बातें अपने अंदर विकसित करनी पड़ेंगी। आपको संतमत के साहित्य का अध्ययन करना होगा और साथ ही साथ भजन‑सुमिरन भी करना होगा। भजन‑सुमिरन का मतलब यह नहीं कि आँखें बंद करके कुछ घंटों के लिए एक कमरे में बैठ जाएँ और बाक़ी समय इसके बारे में पूरी तरह भूल जाएँ। आपको पूरा दिन भजन‑अभ्यास के माहौल में रहना होगा यानी अपना जीवन उसी ढंग से जीना होगा। जब हम संतमत के अनुरूप जीवन बिताएँगे तो इसका मतलब है कि हम भजन‑सुमिरन के माहौल में जी रहे हैं। ऐसा करने पर हम भजन‑सुमिरन को दिनभर नहीं भूलेंगे।
पश्चिमी लोगों के साथ मीटिंग, नवंबर 26, 1985

अगर आप नियमित रूप से भजन-सुमिरन करेंगे तो आप अपने चारों ओर ऐसा वातावरण बना लेंगे जिससे आपको अपने अंदर आनंद और शांति का अनुभव होने लगेगा। अपने दैनिक जीवन और कारोबार में तथा लोगों के साथ व्यवहार करते हुए हमें संतमत के आदर्श, शिक्षा और अभ्यास तथा संतमत की रहनी को याद रखते हुए, उसी शांति तथा आनंद के वातावरण में रहने की कोशिश करनी चाहिए। इस प्रकार हम भजन के वातावरण को अपने साथ‑साथ रख सकते हैं।
जीवत मरिए भवजल तरिए, प्रश्न 259

यहाँ इस संसार में और इसके बाद भी केवल नाम ही हमारा सच्चा मित्र है। यह सदा हमारे साथ रहता है, हमारा एकमात्र आधार है, हमारा मार्गदर्शक है और हमारी एकमात्र ओट है, इसलिए हमें पूरी लगन से इसका अभ्यास करना चाहिए। इस संसार के दोस्त और रिश्तेदार वास्तव में मतलब के ही यार‑दोस्त हैं। वे तो जीते‑जी ही हमारा साथ छोड़ देते हैं, परंतु नाम मृत्यु के बाद भी हमारा साथ नहीं छोड़ता।
स्पिरिच्युल डिस्कोरसेज़, वॉल्यूम 1


संतमत: एक जीवन शैली

हुज़ूर महाराज जी अकसर कहा करते थे: संतमत मन की अवस्था है जिसे विकसित करना है और जीने का एक ढंग है जिसे अपनाना है। दूसरे शब्दों में, सत्संगी के लिए केवल इतना ही काफ़ी नहीं कि वह इन चार शर्तों का बिना सोच‑विचार किए मशीन की तरह पालन करे और संतों के संपूर्ण उपदेश को रोज़मर्रा की ज़िंदगी में न अपनाए। सत्संगी को सतगुरु के उपदेश को इस प्रकार अपनाना है कि ज़िंदगी के हर क्षेत्र में, उसके आचरण में इन उच्च नैतिक मूल्यों का प्रभाव दिखाई दे।

संत‑सतगुरु हमेशा इस बात पर बल देते हैं कि जिज्ञासुओं के लिए संतमत के साहित्य का अध्ययन करना और सत्संग सुनना बहुत ज़रूरी है। हुज़ूर महाराज चरन सिंह जी सत्संग को भजन‑सिमरनरूपी फ़सल की बाड़ कहते थे और स्पष्ट करते थे कि सत्संग में जाने से शिष्य को भजन में बड़ी सहायता मिलती है:

अगर आप नियम से सत्संग के लिए जाते हैं और संतमत के साहित्य का अध्ययन करते हैं तो आपकी सारी शंकाएँ दूर हो जाती हैं तथा परमात्मा की खोज करने की चाह बढ़ती जाती है।

इस मार्ग का अनुसरण करने से आपके परिवार, यार‑दोस्तों अथवा सहयोगियों के साथ आपका तालमेल नहीं बिगड़ना चाहिए। इस संसार में कैसे रहना है, इस विषय पर अपने विचार प्रकट करते हुए हुज़ूर महाराज चरन सिंह जी कहते हैं:

अच्छे नागरिक बनें, लेकिन इन बातों में इतने न उलझ जायें कि अपने आप को ही भूल जायें, अपना चैन खो बैठें। ज़रूरी तो यह है कि हम अपने आप में सुकून से रहें। हमें अपने भजन‑सिमरन के दायरे में रहना चाहिये। यह न हो कि हम इन दुनियावी बातों में इतने फँस जायें कि ये हमारे ध्यान को नीचे खींच लायें और हम अपने मनुष्य‑जीवन के असली मक़सद को ही भूल जायें। यह हर किसी के अपने हालात पर निर्भर करता है कि उसे इन बातों से कितना मतलब रखना चाहिये और कितना इनसे परे रहना चाहिये। इन चीज़ों के बारे में कोई कड़ा नियम नहीं बनाया जा सकता। हमें किसी न किसी मुल्क में रहना है और उस मुल्क के अच्छे नागरिक बनने की कोशिश करनी है, पर यह हमारे हालात, हमारी भावनाओं पर निर्भर करता है कि हमें किस हद तक इन बातों में उलझना है।
संत संवाद, भाग 3, प्रश्न 234

हम इस संसाररूपी रंगमंच पर पति या पत्नी के रूप में, बेटा या बेटी के रूप में, क़र्ज़दार या लेनदार के रूप में अपनी‑अपनी भूमिका निभाते हैं और जब हमारा रोल ख़त्म हो जाता है तो हम नाटक के पात्रों की तरह रंगमंच छोड़ देते हैं, इस महत्त्वपूर्ण तथ्य को हमें पूरी तरह से समझना होगा। संत यह नहीं कहते कि हम अपना घर‑परिवार छोड़ दें, अपने कर्तव्यों और ज़िम्मेदारियों से भागें या फिर जंगलों‑पहाड़ों में किसी गुफा में जाकर छिप जाएँ। वे स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि हमें इस संसार में रहने का सही ढंग सीखना है लेकिन संसार में रहते हुए इसमें लिप्त नहीं होना है।
स्पिरिच्युल डिस्कोरसेज़, वॉल्यूम 1

मनुष्य को सही ढंग से पोशाक पहननी चाहिये और लोगों के सामने सही ढंग से पेश आना चाहिये। बेशक, स्वच्छता तो ज़रूरी है ही। संसार में हरेक सभ्य व्यक्ति के लिये यह बहुत ज़रूरी है। संतमत में पहरावे तथा रूप के संबंध में कोई विशेष या अलग नियम नहीं हैं, लेकिन सामान्य शालीनता के ख़्याल से यह ज़रूरी है कि मनुष्य इस ढंग से रहे कि किसी भी समाज में कहीं भी उसे तिरस्कार या नापसंदगी का पात्र न बनना पड़े।
प्रकाश की खोज, पत्र 298

सतगुरु हमेशा इस बात की ओर हमारा ध्यान खींचते हैं कि जिस तरह की हमारी संगति होती है और जिन लोगों के साथ हमारा उठना‑बैठना होता है, उनका हम पर बहुत प्रभाव पड़ता है। नीचे दिए गए पत्र में हुज़ूर महाराज चरन सिंह जी इस बात को स्पष्ट करते हैं:

सत्संगी के लिये ‘बुरी संगति’ की कोई परिभाषा नहीं है। हमें ऐसे व्यक्तियों से दूर रहना चाहिये जिनकी आदतें, चरित्र या रहनी अच्छी न हों, जिनका जीवन या आचरण हमें विचलित करे, हमारी सुख‑शांति और मानसिक संतुलन में बाधा पहुँचाए  , जो पूरी तरह सांसारिक भोगों में लिप्त हों और अपनी इंद्रियों के दास बन गए हों। ऐसी संगति से सत्संगी के मन में भी उसी तरह के विचार उठने लगते हैं और वे विचार उसे भजन‑सिमरन से तथा अनासक्ति की भावना से जिसे वह अपने अंदर पैदा करने की कोशिश कर रहा है, दूर कर देते हैं। सही संगति खोजने के लिये कोई नपे‑तुले नियम नहीं हैं। आपका अपना हृदय आपका मार्गदर्शन कर सकता है।
प्रकाश की खोज, पत्र 375

जब आप दुविधा में हों कि इस कार्य को करें या नहीं, तो आप हमेशा इस अचूक कसौटी द्वारा परख कर सकते हैं। अगर यह कार्य आपके भजन‑सुमिरन में बाधा डालता है तो बेझिझक इसका विचार छोड़ दें।

हालात चाहे कैसे भी हों, हमें अपनी ओर से पूरा प्रयास करना चाहिए और परिणाम सतगुरु के हाथों में सौंप देना चाहिए। निष्कर्ष यही है कि संतमत प्रेम का मार्ग है। हर शिष्य का सतगुरु के साथ निजी संबंध है। सतगुरु जिस शिष्य को नामदान देते हैं, उनका उस शिष्य के प्रति अथाह प्रेम होता है। हुज़ूर महाराज सावन सिंह जी ने परमार्थी पत्र भाग 2, पत्र 117 में बताया है कि शिष्य का कर्तव्य है कि वह अपने सतगुरु के प्रति प्रेमभाव विकसित करे। वह फ़रमाते हैं: “आपकी चिंता और परेशानी सतगुरु की चिंता और परेशानी है। उन सब चिंताओं को गुरु के हवाले कर दीजिए और बेफ़िक्र होकर गुरु के लिए प्रेम बढ़ाइए , जो आपका फ़र्ज़ है।”


आलोचक – मेरा मित्र

नामदान के लिए आवेदन करने का निर्णय लेने से पहले ज़रूरी हो जाता है कि हम जिस मार्ग को अपनाना चाहते हैं, पहले उसकी पूरी छानबीन कर लें। हर किसी जिज्ञासु ने प्राय: मार्ग के सकारात्मक पहलू के बारे में ही सुना होता है। यार‑दोस्तों, परिवार‑जनों और सहयोगियों द्वारा या सत्संगों में जाकर या फिर सतगुरु से मिलकर हमें केवल वही पहलू दिखाई देता है जिससे प्रभावित होकर हम नामदान की इच्छा ज़ाहिर करते हैं।

सतगुरु हमें इस बात के लिए प्रोत्साहित करते हैं कि हम पूरी तरह सचेत होकर इस मार्ग की छानबीन करें और इस ओर आने से पहले इस मार्ग के सभी पहलुओं पर विचार कर लें। हमारी विवेकशक्ति जितनी अधिक परिपक्व होगी उतनी ही अच्छी तरह से हम यह समझ पाएँगे कि परमात्मा से मिलाप करने के इस मार्ग को अपनाने का क्या मतलब है। सबसे पहली बात तो यह है कि हमें सतगुरु तथा उनका उपदेश अच्छा लगे और हम महसूस करें कि यह उपदेश तर्कपूर्ण और सच्चा है, नहीं तो हम सतगुरु के विश्वास और उनके उपदेश पर खरे नहीं उतर पाएँगे और न ही अपने साथ न्याय कर पाएँगे। अगर हमारा विश्वास पक्का नहीं है तो हमारी नींव हमेशा कमज़ोर ही रहेगी क्योंकि जीवन के किसी भी पड़ाव पर हमें अपने सारे प्रश्नों के उत्तर नहीं मिल सकते। ऐसे में हम जीवनभर जिज्ञासु ही रहेंगे और कभी भी ‘पूर्ण ज्ञान’ की अवस्था तक नहीं पहुँच पाएँगे।

हुज़ूर महाराज चरन सिंह जी कहा करते थे कि हमारे आलोचक ही हमारे सबसे अच्छे मित्र हैं। ‘किसी न किसी प्रकार की आलोचना तो होगी ही। लेकिन सच्चे जिज्ञासुओं और सही खोजबीन करनेवालों की तरफ़ से होनेवाली आलोचना का स्वागत करना चाहिए। कोरे अंधविश्वास से वह सच्चा विश्वास अधिक महत्त्वपूर्ण है जो संतमत के सिद्धांतों की विवेकपूर्ण परख पर आधारित है।’ हमारे आलोचक हमें गहराई से सोचने की प्रेरणा देते हैं, हमें उन बातों का ध्यान दिलाते हैं जो हम पर लागू होती हैं और सही मार्ग पर टिके रहने में हमारी सहायता करते हैं। केवल आलोचक ही वे मुद्दे उठा सकते हैं जिन्हें कोई दूसरा उठाने की हिम्मत नहीं कर पाता।

इसलिए अध्यात्म के इस मार्ग को अपनाने से पहले इसकी आलोचना के बारे में भी अध्ययन करना सहायक होगा। इस जानकारी को निष्पक्ष रूप से देखते हुए हमें गहराई से सोच‑विचार करने में सहायता मिलेगी कि हम नामदान क्यों लेना चाहते हैं, नाम से हम क्या समझते हैं, सतगुरु की क्या भूमिका है और हम इस मार्ग को क्यों अपनाना चाहते हैं? अध्यात्म मार्ग को अपनाने के लिए जल्दबाज़ी करने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि आध्यात्मिकता तो सदैव विद्यमान है। हमें तो केवल इसकी पहचान करने की तैयारी करनी है। अगर आलोचनाओं पर ध्यानपूर्वक विचार करने से हमारे मन में ऐसी शंकाएँ पैदा हो जाती हैं जो मिटाई नहीं जा सकतीं, तो यह हमारे हित के लिए ही है, क्योंकि तब हम जीवन में ऐसा मार्ग नहीं अपनाना चाहेंगे जिस पर चलना हमारे लिए नामुमकिन है। अगर हम देखते हैं कि इन आलोचनाओं का नामदान प्राप्त करने के हमारे निर्णय पर कोई प्रभाव नहीं हो रहा तो हम जान जाएँगे कि मार्ग के प्रति हमारी निष्ठा कितनी दृढ़ है और कितनी गहरी है।

सारी शंकाएँ मिट जाने पर हमारे अंदर विश्वास और भरोसा आ जाता है कि हम सतगुरु की शरण में सही मार्ग पर हैं। ऐसा विश्वास होना बहुत ज़रूरी है क्योंकि इससे हम उस सच्चे उपदेश का पालन करने के लिए दृढ़‑संकल्प हो जाते हैं, जिसके मूर्त रूप केवल सतगुरु होते हैं। हमारी शंकाएँ या तो नामदान प्राप्त करने की हमारी इच्छा को और मज़बूत कर देंगी या फिर हमारी खोज हमें किसी और दिशा में ले जाएगी।

मन में उभरने वाले कुछ ख़ास सवाल:

  • क्या गुरु वास्तव में सच्चा और पूर्ण है?
  • क्या सतगुरु का व्यवहार हमारी जाँच‑परख पर सही उतरता है?
  • क्या अन्य मतों की तरह यह भी एक और मत है?
  • क्या यह मत वह सब देता है जिसका वायदा करता है?
  • उन शिष्यों के क्या विचार हैं जो इस मार्ग से निराश हो चुके हैं?
  • क्या शिष्यों को सम्मोहित किया जाता है या फिर ज़बरदस्ती उनके विचारों को बदलने की कोशिश की जाती है?
  • क्या इस विचारधारा के अनुसार ज़मीन‑जायदाद ख़रीदना उचित है?
  • इस पूरी जानकारी द्वारा हम किस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं?

छानबीन करने के बाद हमें अपने आप से ये सवाल पूछने चाहिएँ:

  • क्या हम अब भी संतमत के उपदेश का पालन करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं?
  • क्या हम आलोचनाओं से वाक़िफ़ होने के बावजूद इस मार्ग पर आगे बढ़ना चाहते हैं?
  • क्या हमें पूरा विश्वास हो गया है कि यही वह मार्ग है जिसकी हमें तलाश थी?
  • क्या हमें किसी ने ख़ुशामद करके, मजबूर करके या फिर प्रभावित करके तैयार किया है?
  • क्या इस मार्ग के प्रति हमारा दृष्टिकोण परिपक्व और संतुलित है?

याद रखें कि संतमत के सिद्धांतों के अनुरूप चलने का पूरा‑पूरा प्रयास हमें ही करना होगा। लोग चाहे इसे अच्छा कहें या बुरा, यह तो हमें ही देखना है कि जीने का यह ढंग हमें अच्छा लगता है या नहीं। नामदान की प्राप्ति का अर्थ है जीवनभर के लिए वचनबद्ध होना। जिस काम की हम ज़िम्मेदारी ले रहे हैं उसके लिए लगातार प्रयास और समर्पण की आवश्यकता है।

अपना निर्णय लेने से पहले अपने सवालों के जवाब ढूँढ़ने में, दूसरों से सलाह‑मश्वरा करने में और पुस्तकों का अध्ययन करने में हमें जल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिए। हमें इंटरनेट के द्वारा भी आलोचकों के विचारों की जानकारी ले लेनी चाहिए। हमें इस सारी प्रक्रिया को एक अवसर समझना चाहिए जहाँ हम आलोचकों की कही बातों पर सोच‑विचार करें, इसके बाद पूरी खोजबीन करके ही निर्णय करें कि सच्चाई क्या है।

इंटरनेट पर राधास्वामी सत्संग ब्यास से संबंधित वेबसाइट (Website) खोजने के लिए कई संकेतशब्दों (Keywords) का प्रयोग किया जा सकता है: राधास्वामी सत्संग ब्यास (Radha Soami Satsang Beas), राधास्वामी (Radha Soami), ब्यास के संत‑सतगुरु (Beas Masters), संतमत (Sant Mat), आत्मा का विज्ञान (Science of the Soul), सुरत‑शब्द योग (Surat Shabd Yoga), सत्संग (Satsang) आदि। कई वेबसाइट्‌स पर सरसरी नज़र डालते हुए आपको जानकारी देने के लिए और भी बहुत‑सी वेबसाइट्‌स मिल जाएँगी।


आवेदन की प्रक्रिया

नामदान के लिए आवेदन करने के इच्छुक जिज्ञासु के लिए आवश्यक है कि उसकी आयु नामदान के लिए निश्चित की गई आयु‑सीमा के अनुसार हो, वह पिछले एक साल से इस पुस्तक में बताई गईं पहली तीन शर्तों का पालन कर रहा हो और उसने संतमत संबंधी कम से कम पाँच पुस्तकें पढ़ी हों।

1. नामदान के लिए आयु‑सीमा:
भारत के अलावा सभी देशों में नामदान के लिए आयु-सीमाः

22 वर्ष – पुरुष और स्त्रियाँ (विवाहित या अविवाहित)

भारत में नामदान की आयु‑सीमा (भारतवासियों तथा प्रवासी भारतीयों के लिए जो नामदान के लिए भारत आते हैं) इस प्रकार है:

  • 22 वर्ष   पुरुष/विवाहित स्त्री‑पुरुष/स्त्रियाँ जिनके पति नामदान प्राप्त कर चुके हैं। (अविवाहित पुरुष नौकरीपेशा या विद्यार्थी होने चाहिएँ)
  • 25 वर्ष   स्त्रियाँ (यदि विवाहित हैं लेकिन पति को नामदान नहीं मिला है)
  • 25 वर्ष   स्त्रियाँ (अविवाहित हैं लेकिन आत्मनिर्भर हैं)
  • 27 वर्ष   स्त्रियाँ (यदि अविवाहित हैं और आत्मनिर्भर नहीं हैं)

इसके अतिरिक्त बाहर के देशों में और भारत में गर्भवती महिलाओं को केवल पहले चार महीने के दौरान ही नामदान दिया जाएगा। चौथे महीने के बाद नामदान की प्राप्ति के लिए उन्हें डिलिवरी तक प्रतीक्षा करनी होगी।

2. पहली तीन शर्तों का पालन

  • नामदान के लिए आवेदन करने के कम से कम एक साल पहले से आपको शाकाहारी भोजन अपनाना होगा और नामदान प्राप्ति के बाद आजीवन शाकाहारी रहना होगा।
  • नामदान के लिए आवेदन करने के कम से कम एक साल पहले से आपको शराब, तंबाकू, अन्य नशीले पदार्थों और सभी तरह के कैनाबीनोइड मारुह्वाना आदि से बने सी.बी.डी. पदार्थों के सेवन से परहेज़ करना होगा और नामदान प्राप्ति के बाद हमेशा के लिए इन्हें त्याग देना होगा।
  • नामदान के लिए आवेदन करने के कम से कम एक साल पहले से आपको क़ानूनी मान्यता प्राप्त विवाह के अतिरिक्त अनुचित संबंधों का त्याग करना होगा और नामदान प्राप्ति के बाद उन्हें सदा के लिए त्यागना होगा या फिर क़ानूनी तौर पर विवाह करना होगा।

3. संतमत संबंधी साहित्य का अध्ययन
सतगुरु चाहते हैं कि जिज्ञासु नामदान के लिए आवेदन करने से पहले संतमत से संबंधित कम से कम पाँच पुस्तकों (इस पुस्तिका सहित) को गहराई से पढ़ें ताकि वे संतमत के उपदेश को पूरी तरह समझ सकें, बौद्धिक स्तर पर संतुष्ट हो जाएँ और संतमत के सिद्धांतों को लेकर उनके मन में कोई शंका न रहे। नीचे दी गई पहली पुस्तक सूची में से सब पुस्तकों का पढ़ना ज़रूरी है और दूसरी सूची में दी गई पुस्तकों में से कम से कम दो पुस्तकें अवश्य पढ़ें:

नीचे लिखी सभी पुस्तकों को पढ़ना ज़रूरी है:

  • जिज्ञासओं के मार्गदर्शन के लिए
  • जिज्ञासुओं के लिए
  • हक़‑हलाल की कमाई
  • परमार्थ परिचय

नीचे दी गई पुस्तकों में से कम से कम दो पुस्तकें अवश्य पढ़ें:

  • परमार्थी पत्र, भाग 2
  • प्रभात का प्रकाश
  • आत्म‑ज्ञान
  • दिव्य प्रकाश
  • प्रकाश की खोज
  • संत संवाद, भाग 1-3
  • नाम‑भक्ति: गोस्वामी तुलसीदास
  • अध्यातम मार्ग
  • संत समागम
  • मेरा सतगुरु
  • अमृत नाम
  • गुरु नानक का रूहानी उपदेश
  • संत कबीर
  • परम पारस गुरु रविदास
  • मीरा: प्रेम दीवानी
  • हज़रत सुलतान बाहू

4. सतगुरु के प्रतिनिधि से मिलना
इन आवश्यक शर्तों को पूरा करने के बाद आपका अगला क़दम है – सतगुरु के प्रतिनिधि (Representative) से या प्रतिनिधि द्वारा नियुक्त स्थानीय संगत के सेक्रेटरी से संपर्क करना। आप अपने नज़दीकी सत्संग‑सेंटर से जानकारी ले सकते हैं या सीधे प्रतिनिधि से संपर्क कर सकते हैं। इस मुलाक़ात का अर्थ है कि आपने उपदेश को अच्छी तरह समझ लिया है। प्रतिनिधि अथवा सेक्रेटरी तय करेंगे कि अब आप नामदान के लिए आवेदन कर सकते हैं या नहीं। प्रतीक्षा करने के लिए तैयार रहें क्योंकि नामदान प्राप्त करना किसी का अधिकार नहीं है। नामदान तो एक सौग़ात है और इसके लिए कोई दावा नहीं कर सकता।

5. आवेदन पत्र की कार्यवाही
अगर प्रतिनिधि अथवा सेक्रेटरी कह दें कि आप नामदान के लिए आवेदन कर सकते हैं तो वे आपको इसकी विधि बताएँगे जिसके अंतर्गत आपको एक आवेदन पत्र भरना होता है। उस आवेदन पत्र पर प्रतिनिधि के, सेक्रेटरी के तथा आपके स्पॉन्सर के हस्ताक्षर होंगे। आवेदन पत्र भरने के बाद प्रतिनिधि इसे सतगुरु के पास भेज देता है। सतगुरु आपकी स्वीकृति या अस्वीकृति की सूचना प्रतिनिधि को देते हैं, फिर यह सूचना आप तक पहुँचाई जाती है।

6. आवेदन स्वीकृत होने पर नामदान के लिए तैयारी
विश्वभर में अधिकांश स्थानों पर लगभग हर तीन से छ: माह के बीच नामदान का कार्यक्रम लगातार चलता है। नामदान‑प्राप्ति के लिए आपको उस स्थान पर पहुँचना होगा जहाँ नामदान का कार्यक्रम होगा। नामदान के लिए स्वीकार किए जाने के बाद अगर आप लगातार दो बार नामदान के कार्यक्रम में नहीं पहुँच पाते तो प्रतिनिधि आपको फिर से आवेदन करने के लिए कह सकते हैं।

संतमत में नामदान के लिए कोई पैसे नहीं लिए जाते, न ही संस्था कोई धन माँगती है। यहाँ तक कि किताबें और टेप वग़ैरा भी लागत से कम दाम में बेचे जाते हैं।

संतमत के मूलभूत सिद्धांतों में एक सिद्धांत यह है कि शिष्यों को अपना निजी ख़र्च ख़ुद उठाना होगा। किसी को यह आशा नहीं करनी चाहिए कि स्पॉन्सर, सेक्रेटरी या स्थानीय सत्संग‑सेंटर नामदान‑प्राप्ति में होनेवाले आपके निजी ख़र्चे का ज़िम्मा लेंगे। इसमें पुस्तकें और टेप वग़ैरा ख़रीदना और नामदान‑प्राप्ति के लिए निश्चित स्थान पर पहुँचने की यात्रा का ख़र्च भी शामिल है।

आवेदक को यह समझ लेना चाहिए कि नामदान परमात्मा का दिया एक दुर्लभ और बहुमूल्य उपहार है और उसे इसके लिए साधारण‑सा ख़र्च ख़ुशी‑ख़ुशी करना चाहिए।

नामदान सतगुरु से मिलनेवाली एक भेंट है और यह अवसर मनुष्य के जीवन का सबसे पावन अवसर है।

मालिक के द्वार सबके लिये खुले हैं। उससे मिलने की हममें जितनी चाह है, उससे कहीं ज़्यादा चाह उसे हमसे मिलने की है। वह प्रभु ही हमारे हृदय में उससे मिलने की प्रेरणा उत्पन्न करता है।
प्रकाश की खोज, पत्र 118


आम पूछे जानेवाले प्रश्न

राधास्वामी सत्संग ब्यास

राधास्वामी सत्संग ब्यास के प्रमुख आजकल कौन हैं?
श्री गुरिंदर सिंह ढिल्लों राधास्वामी सत्संग ब्यास के मौजूदा संत-सतगुरु हैं। संगत इन्हें प्यार से बाबाजी बुलाती है।

क्या परमात्मा की प्राप्ति केवल राधास्वामी सत्संग ब्यास के उपदेश पर चलकर ही हो सकती है?
परमात्मा की प्राप्ति के कई मार्ग हैं। आम धारणा है कि आध्यात्मिक खोज की शुरुआत अपने अंतर में आध्यात्मिक साधना द्वारा ही होती है।

क्या संतमत कोई धर्म, संप्रदाय या गुट है?
संतमत न तो कोई धर्म है, न ही संप्रदाय या गुट। असल में संतमत ज़िंदगी जीने का एक ढंग है। यह संस्था न तो अपने सदस्य बढ़ाना चाहती है, न कोई फ़ीस लेती है और न ही किसी से कोई फ़ायदा उठाना चाहती है। यह किसी की निजी ज़िंदगी में दख़ल नहीं देती और न ही जिज्ञासुओं या संगत को अपना धर्म छोड़ने के लिए कहती है। संतमत कर्मकांड का समर्थन नहीं करता और न ही संगत को कोई विशेष पहनावा पहनने के लिए कहा जाता है। संतमत के अनुसार ज़िंदगी उच्च नैतिक सिद्धांतों और निजी रूहानी अभ्यास पर आधारित होनी चाहिए। संतमत में आकर हमें जीवन के असली उद्देश्य का पता चलता है और साथ ही वक़्त के गुरु यानी देहधारी सतगुरु की देखरेख में जीवन को सही ढंग से जीने में मदद मिलती है।

क्या राधास्वामी संस्था अपनी सेवाओं के लिए कोई फ़ीस लेती है?
नहीं, यह संस्था किसी भी सेवा के लिए कोई फ़ीस नहीं लेती।

राधास्वामी सत्संग ब्यास को जो पैसा सेवा में (दान) मिलता है उसका इस्तेमाल यह संस्था किस प्रकार करती है?
इसका इस्तेमाल संगत की भलाई और विकास के लिए किया जाता है। इन पैसों से कुछ चैरिटेबल अस्पताल खोले गए हैं। भूचाल या बाढ़ से पीड़ित इलाक़ों में शरणार्थी शैडों और स्कूलों का निर्माण किया गया है। इस संस्था के हैडक्वार्टर ब्यास में हर साल क़रीब पचास लाख लोगों की मुफ़्त रिहाइश और उनके खाने-पीने का इंतज़ाम किया जाता है।

विश्व के विभिन्न देशों में राधास्वामी सत्संग ब्यास के विकास की वजह से क्या इसके बुनियादी रूहानी मूल्यों में कोई बदलाव या कमी आ गई है?
विश्व में संतमत का प्रसार बदलते वक़्त का संकेत है। भारत और विश्व के देशों में संतमत के ज़बरदस्त विकास के कारण यह ज़रूरी हो गया था कि जो संगत संतमत की शिक्षा और रहनी अपना रही है उनकी ज़रूरतों का ख़याल रखा जाए। इसी लिए सत्संग-सेंटर खोले गए हैं। सत्संग-सेंटर जाने से संगत में आपसी प्रेम-भावना जागती है, उन्हें वहाँ सेवा का मौक़ा मिलता है जिससे संगत में एकता बढ़ती है। सेवा और आंतरिक साधना के इस मार्ग में सत्संग-सेंटर इन्हीं मूल्यों और सिद्धांतों पर बल देते हैं।

संतमत की जानकारी के लिए आप कौन-सी किताबें पढ़ने का सुझाव देते हैं?
संतमत के परिचय के लिए आम तौर पर इन किताबों को पढ़ने का सुझाव दिया जाता है — संत मार्ग, हक़-हलाल की कमाई, परमार्थ परिचय और संत संवाद । इसके बारे में अधिक जानकारी के लिए आप अपने पास के सेंटर के सेक्रेटरी से मिल सकते हैं।

क्या मेरे लिए अन्य गुरुओं के प्रवचन सुनना उचित है, जैसे ईश्वर पुरी जी के?
हम हमेशा लोगों को सत्संग सुनने के लिए प्रेरित करते हैं ताकि हम अपना दायरा खुला रखें और हमें सही आध्यात्मिक उपदेश प्राप्त हो सके। यहाँ यह भी स्पष्ट किया जाता है कि राधास्वामी सत्संग ब्यास (RSSB) का ईश्वर पुरी जी अथवा किसी अन्य व्यक्ति या संस्था के साथ कोई संबंध नहीं है।

इस संस्था की जानकारी प्राप्त करने के लिए सबसे अधिक विश्वसनीय Website कौन-सी है?
राधास्वामी सत्संग ब्यास के बारे में आप सही और विश्वसनीय जानकारी उनकी अपनी Website www.rssb.org से प्राप्त कर सकते हैं।

संतमत की शिक्षा के प्रचार के लिए सतगुरु Social Networking Sites और Group Chat Sites को बढ़ावा क्यों नहीं देते?
Social Networking Sites आजकल के समाज का हिस्सा है, लेकिन सतगुरु के अनुसार Internet पर इस तरह की चर्चाएँ संगत की ज़रूरतों को सही ढंग से पूरा नहीं कर पातीं। इस संस्था के अंतर्गत ऐसी व्यवस्था की गई है ताकि संगत की इन ज़रूरतों को पूरा किया जा सके। नब्बे से ज़्यादा देशों में सत्संग की व्यवस्था की गई है। राधास्वामी सत्संग ब्यास द्वारा प्रकाशित अंग्रेज़ी और अन्य भाषाओं में उनके अनुवाद सहित 100 से ज़्यादा पुस्तकें उपलब्ध हैं। इन साधनों के ज़रिए सतगुरु अपनी देखरेख में संतमत के उपदेश के प्रचार की मंज़ूरी देते हैं।

सतगुरु

सतगुरु की क्या भूमिका है?
सतगुरु का मुख्य कार्य शिष्य को आंतरिक साधना के लिए नामदान (दीक्षा) देना है। नामदान के समय वह शिष्य को शब्द या दिव्य धुन से जोड़ते हैं। यह शब्द आत्मा का मार्गदर्शन करता हुआ उसे अपने असली घर, अविनाशी लोक में ले जाता है। जीवन के हर पहलू में सही राह पर चलने के लिए हमें सहायता और मार्गदर्शन की ज़रूरत होती है। परमार्थ की यात्रा के लिए तो यह बहुत ज़रूरी है क्योंकि केवल देहधारी सतगुरु ही हमें अंतर में परम सत्य से जोड़ सकता है।

क्या यह सच है कि नामदान के बाद सतगुरु हमारे कर्मों का भार उठा लेते हैं?
सतगुरु यह ज़िम्मेदारी लेते हैं कि वह हमें अपने असली घर पहुँचाने में मदद करेंगे। उनके प्यार, सहारे और दया-मेहर से हम बड़े साहस और सहज भाव से अपने कर्मों का भुगतान करते हैं। वह परमार्थ के सफ़र में हमारा मार्गदर्शन करते हैं ताकि हमारे कर्म निर्मल हो जाएँ लेकिन वह हमारे कर्मों का भार नहीं उठाते। हर एक को ख़ुद ही अपने कर्मों का भुगतान करना पड़ता है, यह सृष्टि का नियम है।

सतगुरु और शिष्य के रिश्ते का क्या महत्त्व है?
सतगुरु की ज़िम्मेदारी है कि वह शिष्य के आंतरिक सफ़र में मार्गदर्शन करें और उसे ऊँचे रूहानी मंडलों में ले जाएँ ताकि उसे मुक्ति प्राप्त हो जाए। जब शिष्य सतगुरु के उपदेश का पालन करता है, तो वह परमात्मा के हुक्म में रहना सीख जाता है। सतगुरु को हम अपना दोस्त, बड़ा भाई या गुरु, कुछ भी मान सकते हैं।

‘पूर्ण देहधारी गुरु’ का वास्तव में क्या मतलब है?
‘पूर्ण देहधारी गुरु’ शब्द उन संत-सतगुरुओं के लिए इस्तेमाल होता है जो साधना द्वारा उच्च आध्यात्मिक अवस्था प्राप्त कर चुके हैं और अपने अंतर में हमेशा शब्द से जुड़े होते हैं, इसलिए वे पूर्ण कहलाते हैं। हिंदू धर्मग्रंथों में इस अवस्था के लिए पूर्ण शब्द का प्रयोग किया गया है।

वास्तव में सच्चा गुरु क्या है?
सच्चा गुरु शब्द है, वह शरीर नहीं है। सच्चा शिष्य भी सुरत है, शरीर नहीं है। जब हम अंतर्मुख साधना से अपनी सुरत या चेतना को जाग्रत करते हैं तब हमारी सुरत दिव्य धुन की मदद से अनुभव करती है कि सतगुरु वास्तव में शब्द है।

क्या एक ही समय में एक से ज़्यादा पूर्ण संत-सतगुरु इस संसार में हो सकते हैं?
संसार में किसी भी वक़्त में एक से ज़्यादा पूर्ण संत-सतगुरु मौजूद होते हैं।

जब कोई सतगुरु अपनी देह त्याग देते हैं तो क्या होता है?
सतगुरुओं का संबंध रूहानी मंडलों से होता है, इसलिए उनका रूहानी स्वरूप अमर है, जो कभी नष्ट नहीं होता। परंतु अगर संतों की किसी परंपरा ने अभी और आगे चलना है तो मौजूदा सतगुरु अपनी देह त्यागने से पहले अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर देते हैं।

क्या कभी कोई महिला संत भी हुई हैं?
जी हाँ। महिला संतों में स्पेन की टेरिसा ऑफ़ अविला, इराक़ की राबिया बसरी और भारत की सहजोबाई, बहिणाबाई और मीराबाई शामिल हैं।

राधास्वामी सत्संग ब्यास को जो पैसा सेवा यानी दान के रूप में मिलता है, क्या उसमें सतगुरु को कोई निजी लाभ होता है?
सतगुरु इस बात पर बहुत बल देते हैं कि हमें अपनी हक़-हलाल की कमाई पर ही गुज़ारा करना चाहिए, चाहे वह ख़ुद की कमाई हो या परिवार से मिली हो। सतगुरु स्वयं अपने इस उपदेश के जीते-जागते उदाहरण हैं।

संत-सतगुरु सफ़ेद कपड़े ही क्यों पहनते हैं?
जिस तरह मौक़े के अनुसार हम अपने कपड़ों का चुनाव करते हैं, जैसे जिम जाने के लिए ट्रैक सूट, फ़िल्म देखने के लिए रोज़ पहनने वाले कपड़े, ऑफ़िस के लिए बिज़नस सूट और शादी के लिए फ़ॉर्मल कपड़े, इसी तरह सतगुरु भी समय के मुताबिक़ आरामदेह और सादा लिबास ही पहनते हैं। वह यात्रा के समय जीन्‌स, सैर करने के लिए ट्रैक सूट, आराम के वक़्त शॉर्ट्‌स पहनते हैं। अगर उन्हें लगे कि सफ़ेद लिबास उनके लिए सबसे सुविधाजनक और आरामदेह है तो वे उसे रोज़ भी पहन सकते हैं।

नामदान

नामदान प्राप्त करने से क्या अभिप्राय है?
नामदान के समय सतगुरु शिष्य को आंतरिक अभ्यास की वह युक्ति समझाते हैं जो सुरत (आत्मा) को शब्दधुन से जोड़ती है, ताकि वह परमात्मा से मिलाप कर सके। नामदान के समय जिज्ञासु भी संतमत की चार शर्तों को जीवनभर निभाने का वायदा करते हैं।

नामदान के समय कौन-कौन से वायदे किए जाते हैं?
अपनी आध्यात्मिक उन्नति के लिए नामदान के समय जिज्ञासु चार शर्तों को निभाने का वायदा करते हैं:
  • शाकाहारी भोजन अपनाना यानी ऐसा कोई खाद्य-पदार्थ न खाना जिसमें मांस, मछली, अंडा या इनका कोई अंश मिला हो।
  • तंबाकू से बनी वस्तुओं, शराब, मन पर बुरा प्रभाव डालनेवाले नशीले पदार्थों और सभी कैनाबीनोइड पदार्थ जैसे सी.बी.डी. (CBD) से परहेज़ करना।
  • उच्च नैतिक मूल्यों के अनुसार अपना जीवन जीना तथा क़ानूनी तौर पर विवाह किए बिना किसी से भी शारीरिक संबंध क़ायम न करना।
  • हर रोज़ भजन-सुमिरन को ढाई घंटे देना।

नामदान के समय जो पाँच नाम बताए जाते हैं उनका महत्त्व क्या है?
नामदान के समय देहधारी सतगुरु शिष्य को जो नाम देते हैं, उसमें सतगुरु की शक्ति निहित होती है जो अभ्यास के समय सुरत को शब्द से जोड़ती है। इन पाँच नाम के सुमिरन से हम परमात्मा को याद करते हैं। इस सुमिरन से अपने मन को स्थिर करते हैं और ध्यान को तीसरे तिल पर एकाग्र करते हैं जहाँ से हमारी आध्यात्मिक यात्रा शुरू होती है।

हम नामदान से पहले अपने आप को किस प्रकार तैयार कर सकते हैं?
हमें संतमत का साहित्य पढ़ना चाहिए, सत्संग सुनने चाहिएँ, मन में उठे किसी तरह के सवाल का जवाब पूछना चाहिए। हमें अपने परिवार और दोस्तों के साथ रहते हुए प्रेम-प्यार का माहौल बनाए रखना चाहिए। साथ ही हमें यह ख़ुद देखना है कि क्या हम जीवन में नामदान की पहली तीन शर्तों को निभा पाएँगे या नहीं। जिज्ञासुओं को यह सुझाव भी दिया जाता है कि वे अन्य रूहानी मार्गों की जानकारी प्राप्त करें ताकि उन्हें इस बात पर पूरा विश्वास हो जाए कि वे संतमत ही अपनाना चाहते हैं।

नामदान से पहले क्या हम भजन-सुमिरन का अभ्यास कर सकते हैं?
हमें नामदान से पहले भजन-सुमिरन का अभ्यास नहीं करना चाहिए। भजन-सुमिरन की विधि तो केवल देहधारी सतगुरु या उनके प्रतिनिधि ही नामदान के समय सिखाते हैं। सुमिरन के लिए अगर हम राधास्वामी या कोई और दूसरे शब्दों का इस्तेमाल करेंगे तो हमारे मन को आदत पड़ जाएगी और फिर जब हमें अपना असली भजन-सुमिरन शुरू करना होगा, तब हमें इस आदत को बदलना मुश्किल हो जाएगा।

नामदान प्राप्त करने के एक साल पहले से नामदान की इन शर्तों का पालन करना क्यों ज़रूरी है?
इन शर्तों को नामदान प्राप्त करने के एक साल पहले से निभाना इसलिए ज़रूरी है ताकि हम ख़ुद तय कर सकें कि हम इन शर्तों का जीवन भर पालन कर सकते हैं या नहीं।

नामदान के लिए आयु-सीमा की पाबंदी क्यों रखी गई है और इसके लिए कम से कम उम्र क्या है?
नामदान के लिए कम से कम उम्र 22 वर्ष है, परंतु भारत में शादीशुदा और कुँवारी लड़कियों के लिए आयु-सीमा कुछ अलग रखी गई है। उम्र की पाबंदी इसलिए है ताकि इनसान सोच-समझकर निर्णय ले सके।

जिनकी उम्र 22 वर्ष से कम है, उन जिज्ञासुओं को आप क्या सुझाव देना चाहेंगे?
कम उम्र के जिज्ञासुओं को चाहिए कि वे अपनी पढ़ाई पर पूरा ध्यान दें, माता-पिता का कहना मानें, रहमदिल हों और सभी से प्रेम-प्यार से बरताव करें। वे अपनी रहनी को पहली तीन शर्तों के अनुसार ढालने की कोशिश करें — शाकाहारी भोजन अपनाएँ, तंबाकू, शराब और मन पर बुरा प्रभाव डालनेवाली दवाइयों से परहेज़ करें और निर्मल तथा नैतिक जीवन जीने का अभ्यास करें।

अगर हम नामदान लेना चाहते हैं परंतु हमारे परिवार वालों को इससे आपत्ति हो, तो हमें क्या करना चाहिए?
हमें अपने परिवार वालों के सामने अपनी नामदान लेने की इच्छा ज़ाहिर कर देनी चाहिए और अपना निर्णय लेने से पहले उनसे बातचीत करके उनकी राय जान लेनी चाहिए।

अगर हमारे परिवार में सबने नामदान लिया हो तो क्या यह ज़रूरी है कि हम भी नाम लें?
यह रिश्ता आत्मा और परमात्मा का रिश्ता है। हमारे नामदान लेने या न लेने के फ़ैसले पर परिवार या मित्रों का प्रभाव नहीं होना चाहिए।

क्या यह ज़रूरी है कि पति-पत्नी एक साथ नामदान लें?
आंतरिक अभ्यास एक निजी यात्रा है, निजी अनुभव है, इसलिए यह ज़रूरी नहीं है कि पति-पत्नी एक साथ नामदान लें।

यह निर्णय आख़िरकार कौन करता है कि हम नामदान लेने के लिए तैयार हैं या नहीं?
नामदान लेने के लिए हम तैयार हैं या नहीं, इसका निर्णय सिर्फ़ देहधारी सतगुरु ही लेते हैं।

क्या प्रतिनिधि से नामदान लेने में और सतगुरु से नामदान लेने में कोई फ़र्क़ है?
जब किसी को सतगुरु द्वारा नियुक्त किए गए प्रतिनिधि से नामदान मिलता है तो इससे बिलकुल कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।

अगर हमें सतगुरु के प्रतिनिधि से नामदान मिला हो तो क्या यह ज़रूरी है कि हम सतगुरु द्वारा दिए गए नामदान में भी हाज़िर हों?
अगर हमें नामदान प्रतिनिधि द्वारा मिला है तो हमें सतगुरु द्वारा दिए गए नामदान में (जिसे अकसर री-सिटिंग कहा जाता है) हाज़िर होना ज़रूरी नहीं है, क्योंकि वास्तव में नाम तो सतगुरु ही देते हैं।

नामदान मिलने के बाद क्या हम अपने धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन कर सकते हैं?
संतमत का अनुसरण करते हुए धार्मिक रीति-रिवाजों के पालन में कोई पाबंदी नहीं है।

नामदान मिलने के कितने हफ़्तों, महीनों या सालों के बाद अंतर में ज्ञान होने लगता है?
नामदान के कितने समय बाद हमें अंतर में ज्ञान का अनुभव शुरू होगा, इसका कोई निश्चित समय नहीं है। हमारी आध्यात्मिक उन्नति कितनी जल्दी या देर से होगी, यह इस बात पर निर्भर है कि हम कितनी मेहनत करते हैं। इसमें समय का कोई महत्त्व नहीं है। इस रास्ते पर आगे बढ़ने के लिए हमारी अपनी मेहनत और इस मार्ग पर होनेवाले निजी अनुभव ही हमें मंज़िल की तरफ़ प्रेरित करते हैं।

नामदान प्राप्त होना क्या परमात्मा से मिलाप की गारंटी है?
परमपिता परमात्मा में तो देर-सवेर सभी समा जाएँगे। इसके लिए कोई निश्चित समय नहीं है, क्योंकि आध्यात्मिक उन्नति हमारी अपनी कोशिश पर निर्भर है। हम अपनी आध्यात्मिक उन्नति का हिसाब नहीं लगा सकते। हमारा लक्ष्य केवल यही होना चाहिए कि हम बिना किसी शर्त के परमात्मा से मिलाप के लिए अपने आप को समर्पित कर दें।

क्या यह सच है नामदान के बाद हमें केवल चार जन्म और वह भी मनुष्य जन्म ही मिलते हैं ताकि जन्म-मरण के चक्कर से आज़ाद हो जाएँ?
देहधारी सतगुरु जिनको नामदान देते हैं वे इस अथाह दु:ख के भवसागर से पार होकर हमेशा के लिए मुक्त हो जाएँगे। अगर हम रूहानी अभ्यास करके मनुष्य जन्म का लाभ उठाएँ तो इस मनुष्य जन्म का महत्त्वपूर्ण उद्देश्य पूरा हो जाएगा। मनुष्य जन्म में ही हमें यह अवसर प्राप्त होता है कि हम संयम से एक ऐसा जीवन जियें जिसमें हमें अपने असली उद्देश्य का ज्ञान हो और हम जीवन के उस उद्देश्य के प्रति जागरूक हों क्योंकि केवल मनुष्य को ही बुद्धि और विवेक की शक्ति प्राप्त है। लेकिन मुक्ति प्राप्त होने में हमें और कितने जन्म लगेंगे, यह फ़ैसला इस बात पर निर्भर करता है कि हम कितनी लगन से भजन-सुमिरन करके अपना ध्यान तीसरे तिल पर एकाग्र करते हैं। जैसे-जैसे रूहानी अभ्यास करते हैं, हम निर्मल होते जाते हैं।

नामदान लेने के बाद भी क्या हमारा जन्म पशु-पक्षियों की योनि में हो सकता है?
कर्म हमारा जीवन निर्धारित करते हैं। इस असलियत से हम मुँह नहीं मोड़ सकते कि हमारी करनी या कर्म ही यह तय करते हैं कि हमारा अगला जन्म मनुष्य का होगा या फिर हमें पशु-पक्षियों की योनि में भेज दिया जाएगा। अगर हम अपनी सोच को पशुओं जैसी बना लेंगे तो फिर हमारा अगला जन्म भी उसी सोच के अनुसार होगा। हमारा अगला जन्म हमारी सोच पर आधारित है और हमारी सोच हमारे कर्मों के अनुसार बनती है। स्पष्ट है कि हम जिस तरह का बीज बोयेंगे वैसा ही फल मिलेगा।

भजन-सुमिरन

भजन-सुमिरन करके हमें क्या हासिल होगा?
भजन-सुमिरन का उद्देश्य परमात्मा की प्राप्ति है। अंतर में शब्द से जुड़कर हम मन और माया से ऊपर उठ जाते हैं और अपने मूल स्रोत परमात्मा में समाकर उससे एक हो सकते हैं।

शब्द या धुन क्या है?
शब्द, धुन या वर्ड वह शक्ति है जिसने सृष्टि की रचना की और जो उसका पालन करती है, यह परमात्मा की सृजनात्मक शक्ति है। बाइबल में कहा गया है: आदि में शब्द था, शब्द परमात्मा के पास था और शब्द ही परमात्मा था (जॉन 1:1)। सृष्टि और हर जीव का आधार शब्द है, उसके बिना किसी की भी हस्ती क़ायम नहीं रह सकती।

क्या शब्द का ज़िक्र रूहानियत के अन्य मतों और धर्मों में भी हुआ है?
जी हाँ, बहुत-से रूहानी मार्गों और धर्मों में शब्द का ज़िक्र आता है। उनमें शब्द को कई अलग-अलग नामों से पुकारा गया है जैसे वर्ड, लॉगॉस, होली स्पिरिट, टाओ, दिव्य शक्ति, हुक्म, कलमा आदि।

क्या शब्द हर व्यक्ति में मौजूद है या सिर्फ़ उन लोगों में जो संतमत पर चलते हैं?
शब्द वह जीवनदायिनी शक्ति है जो हर इनसान में मौजूद है, संपूर्ण सृष्टि में व्याप्त है। इसके बिना सृष्टि क़ायम नहीं रह सकती।

जब हम परमात्मा में समा जाएँगे तो क्या हमारी हस्ती ख़त्म हो जाएगी?
जब हम परमात्मा में समा जाते हैं तो हमारी असली हस्ती ख़त्म नहीं होती बल्कि अपने अहंकार और अस्तित्व को खोकर ही हमें अपने सच्चे स्वरूप का ज्ञान होता है और हम अपने स्रोत में समा जाते हैं।

क्या भजन-सुमिरन को हर रोज़ ढाई घंटे का पूरा वक़्त देना ज़रूरी है?
जीवन में अगर हम कुछ करना चाहते हैं तो उसकी नींव लगन और अभ्यास से ही बनती है। इसी तरह नामदान के समय हमने जो 2 ½ घंटे रोज़ भजन-सुमिरन करने का वायदा किया था उसको निभाना ज़रूरी है।

क्या भजन-सुमिरन सुबह अमृत वेला में ही करना ज़रूरी है या किसी भी वक़्त किया जा सकता है?
भजन-सुमिरन के लिए कोई भी वक़्त अच्छा है, परंतु अमृत वेले का सुझाव इसलिए दिया जाता है क्योंकि मन इस समय तरोताज़ा होता है, ज़्यादा बिखरा हुआ नहीं होता और ध्यान में बाधा डालनेवाला बाहर का शोरगुल भी इस समय कम होता है।

अभ्यास के समय नींद आ जाने से हम अपने को किस तरह रोक सकते हैं?
आम तौर पर लोगों को इस समस्या का सामना करना पड़ता है। हमें पूरी कोशिश करनी चाहिए कि हम सजग रहें और हमारा ध्यान एकाग्र हो। निरंतर कोशिश और दृढ़ संकल्प से हम नींद पर क़ाबू पा सकते हैं।

भजन-सुमिरन के अभ्यास के समय स्थिर होने के लिए कहा जाता है। इसका क्या मतलब है?
स्थिर होने से अभ्यास में पूर्ण एकाग्रता प्राप्त होती है। मन को स्थिर करने के लिए पहले शरीर स्थिर करना चाहिए। अभ्यास से जब हमारा तन और मन दोनों स्थिर हो जाते हैं तब हमारी सुरत शब्द से जुड़ जाती है।

क्या हम भजन-सुमिरन के अभ्यास द्वारा अपना भाग्य बदल सकते हैं?
हमारा भाग्य तो हमारे कर्मों की वजह से पहले से ही तय हो जाता है; हम इसे बदल नहीं सकते। लेकिन भजन-सुमिरन के अभ्यास से हमें अंतर में इतना बल और धीरज मिलता है कि हम ज़िंदगी की मुश्किलों को बड़े सकारात्मक ढंग से सुलझा लेते हैं।

कर्म सिद्धांत

कर्मों का क़ानून या सिद्धांत क्या है?
कर्मों के सिद्धांत के अनुसार हम जैसी करनी करते हैं हमें वैसा ही फल भोगना पड़ता है। हज़रत ईसा ने फ़रमाया है, ‘मनुष्य जो बोयेगा, वही काटेगा।’

संसार में इतना अन्याय क्यों है?
इस पूरे संसार में जो कुछ भी हो रहा है उसके पीछे कर्मों की क्रिया और प्रतिक्रिया यानी कर्मों का सिद्धांत काम कर रहा है। हमें भले ही ऐसा लगता हो कि अन्याय बढ़ रहा है, परंतु कर्मों के क़ानून के कारण ही इस सृष्टि में संतुलन बना हुआ है।

पुनर्जन्म क्या है? क्या हमारे कर्मों का हिसाब-किताब जन्म-जन्मांतर तक हमारे साथ ही रहता है?
मौत के बाद आत्मा को अपने कर्मों के क़र्ज़ के कारण फिर से नया जन्म लेना पड़ता है और इस नए जन्म में उसका भाग्य पिछले जन्म के कर्मों के अनुसार ही बनता है। जन्म-मरण के चक्र में फँसी आत्मा के बार-बार जन्म लेने को पुनर्जन्म कहते हैं। जन्म और मरण का यह सिलसिला तब तक चलता रहता है जब तक आत्मा भजन-सुमिरन के अभ्यास द्वारा निर्मल और पवित्र होकर फिर से अपने स्रोत में समा नहीं जाती।

हमें यह कैसे पता चलेगा कि हम नए कर्म बना रहे हैं या फिर अपने पुराने कर्मों का हिसाब-किताब दे रहे हैं?
हमें यह पता नहीं चल सकता कि हम नए कर्म कर रहे हैं या यह पुराने कर्मों का फल है। इसलिए हमें सुझाव दिया जाता है कि हम अपने कर्मों, विचारों और वचनों के प्रति सजग और सचेत रहें ताकि नए कर्म बनाने से बचें।

क्या हमारी कोई स्वतंत्र इच्छा है?
कर्मों के कारण जन्म-मरण के चक्र में फँसकर हमने कई बार जन्म लिया है। इसी से हमारा भाग्य तय हुआ है। इसलिए हमारी स्वतंत्र इच्छा का दायरा बहुत सीमित है, हर स्थिति में हमारी सोच और नज़रिया सीमित है।

सृष्टि की रचना का उद्देश्य क्या है और हमें यहाँ क्यों भेजा गया था?
सही मायने में सृष्टि की रचना के रहस्य को समझना आसान नहीं है। सृष्टि के रहस्य को समझने के लिए हमें अपनी चेतना को परमात्मा के स्तर तक ले जाना होगा।

शाकाहारी भोजन अपनाना, शराब तथा नशीले पदार्थों से परहेज़

शाकाहारी भोजन अपनाना क्यों ज़रूरी है? अगर हम किसी जानवर की हत्या ख़ुद नहीं करते तो उसका मांस खाना ग़लत क्यों समझा जाता है?
संतमत की शिक्षा है कि जब हम किसी को जीवन नहीं दे सकते तो हमें किसी का जीवन लेने का भी कोई हक़ नहीं है। हमें बताया जाता है कि अगर हम अपने कर्मों के भार को और नहीं बढ़ाना चाहते, तो हमें न तो किसी की हत्या करनी चाहिए और न ही किसी की हत्या का कारण बनना चाहिए। मांस खाने से हम हिंसा तथा हत्या में फँसकर अपने कर्मों का बोझ बढ़ा लेते हैं। संतमत हमें शाकाहारी भोजन अपनाने की सलाह देता है जिसमें दूध तथा दूध से बनी वस्तुएँ शामिल हैं। शाकाहारी भोजन अपनाते वक़्त हमें ध्यान रखना होगा कि हम ऐसे खाद्य-पदार्थों से परहेज़ करें जिनमें जानवरों से प्राप्त सामग्री का प्रयोग होता है, जैसे जिलेटिन, अंडे और लार्ड (शॉर्टनिंग)। यह जानकारी कई जगह से मिल सकती है कि किस खाद्य-सामग्री में जानवरों से लिया गया कोई अंश शामिल है या नहीं। हाल ही में की गई मेडिकल रिसर्च के अनुसार शाकाहारी भोजन स्वास्थ्यप्रद और पौष्टिक है। इसका एक और लाभ यह भी है कि इससे हमारे अंदर सभी जीवों के प्रति आदर की भावना उत्पन्न होती है।

क्या हम उन खाद्य-पदार्थों का सेवन कर सकते हैं जो ऐसी फ़ैक्ट्री में तैयार किए गए हों जहाँ जानवरों से प्राप्त पदार्थ और अंडे इस्तेमाल किए जाते हों?
अगर जानवरों से प्राप्त खाद्य-पदार्थों को शाकाहारी खाद्य-सामग्री में नहीं मिलाया जाता तो हम उन्हें खा सकते हैं। इस नियम का पालन करना सही होगा, ‘जिस खाद्य-पदार्थ के शाकाहारी होने पर संदेह हो उसे नहीं खाना चाहिए’।

सजीव या निर्जीव अंडों को खाने में क्या नुक़सान हो सकता है?
अंडे का मतलब ही है कि उसमें से एक और जीव तैयार होगा। इसलिए चाहे ये सजीव हों या निर्जीव, इनसे परहेज़ रखना चाहिए।

परिवार में अगर किसी का पति या उसकी पत्नी एक दूसरे को मांसाहारी भोजन पकाने के लिए मजबूर करें तो उसे क्या करना चाहिए?
हमारी पूरी कोशिश होनी चाहिए कि हम अपने घर का माहौल ख़ुशहाल रखें और अपने विचार तथा विश्वास अपने परिवार वालों पर न थोपें। इसलिए अगर परिवार के सदस्यों के लिए मांस पकाना ‘ज़रूरी’ हो जाए तो हम ऐसा कर सकते हैं, लेकिन इस बात का ध्यान रहे कि हम इसे न खाएँ।

जब हम लोगों को या पालतू जानवरों को मांसाहारी भोजन अपने पैसों से ख़रीद कर खिलाते हैं तो क्या हमारे कर्मों का बोझ बढ़ता है?
हमें सलाह दी जाती है कि हम मांसाहारी भोजन से ख़ुद भी दूर रहें और दूसरों की वजह से भी इससे कोई नाता न रखें। जब हम लोगों को या जानवरों को मांस या उससे बनी कोई चीज़ परोसते हैं तो हम इन मांसाहारी पदार्थों की माँग को बढ़ावा दे रहे हैं, साथ ही अपने कर्मों का बोझ भी बढ़ा रहे हैं।

अगर मुझे अपने व्यवसाय में ऐसे लोगों को खिलाना पड़ता है जो मीट और शराब के चाहवान हैं तो मुझे क्या करना चाहिए?
हम ऐसे लोगों को किसी शाकाहारी रेस्तराँ में ले जा सकते हैं। हमें मांसाहारी भोजन की क़ीमत न चुकाने की सलाह दी जाती है; ऐसा इसलिए क्योंकि अगर हम क़ीमत चुकाते हैं तो हम उस जानवर की हत्या का कारण बनते हैं। हम ‘माँग’ और ‘उसको पूरा करने’ की ज़ंजीर की एक कड़ी बन जाते हैं। इस तरह हम अपने कर्मों का बोझ बढ़ा लेते हैं।

क्या ऐसे कारोबार जो मांसाहार या उससे बने पदार्थों से संबंध रखते हैं, उन्हें चलाना या उनमें काम करना संतमत के सिद्धांतों के ख़िलाफ़ है?
हमें किसी भी हालत में ऐसा कारोबार नहीं करना चाहिए जिसका संबंध मांस या उससे बने पदार्थों से हो। अगर किसी की ऐसी नौकरी है कि उसे मांस पकाना पड़ता है तो उसे कोई और काम ढूँढ़ लेना चाहिए। अगर किसी का कार्य मांसाहारी खाना परोसना है तो वह यह कार्य कर सकता है बशर्ते कि वह ख़ुद ऐसा खाना न खाए।

अगर हमारे बच्चे मीट खाते हों तो इसका हम पर क्या असर होगा? क्या हम शाकाहार अपनाने के लिए उन्हें मजबूर करें?
माता-पिता होने के नाते हमारा फ़र्ज़ बनता है कि हम एक अच्छा उदाहरण बनें। हमारी कोशिश होनी चाहिए कि हम बच्चों को शाकाहारी भोजन ही खिलाएँ। लेकिन अगर हम उन्हें अपने विचारों को अपनाने के लिए मजबूर करते हैं या उन पर दबाव डालते हैं तो हो सकता है कि बड़े होकर उनका नज़रिया नकारात्मक हो जाए। माता-पिता होने के नाते हम ज़्यादा से ज़्यादा उनके सामने एक अच्छा उदाहरण पेश कर सकते हैं लेकिन हमें उनके फ़ैसले का आदर करना चाहिए।

हम अगर ग़लती से कोई ऐसी चीज़ खा लें जिसमें मीट या अंडा हो तो उससे क्या होगा?
हम मीट या अंडा चाहे ग़लती से खाएँ या जान-बूझकर खाएँ, इससे हमारे कर्मों का बोझ तो बढ़ेगा ही। उदाहरण के लिए अगर कोई व्यक्ति ज़हर खा लेता है, तो चाहे उसने ज़हर ग़लती से खाया हो या जान-बूझकर, उसके शरीर पर असर तो होगा ही।

क्या हम ऐसी दवाइयाँ ले सकते हैं जिनमें जानवरों से प्राप्त अंश हों या जो जिलेटिन के कैप्सूल में हों?
हमें इन दवाइयों का और जिलेटिन कैप्सूल का शाकाहारी विकल्प ढूँढ़ने की कोशिश करनी चाहिए, मांसाहारी चीज़ों को खाने से हमारे कर्म ज़रूर बढ़ेंगे।

चमड़े की बनी चीज़ों से परहेज़ करना कितना ज़रूरी है?
जानवरों से बनी चीज़ों से परहेज़ करना और उनको न ख़रीदना हमारे हित में है क्योंकि ऐसा करने से हम कर्मों के परिणाम से बच सकते हैं। हम सभी को विवेक की शक्ति दी गई है और उसके इस्तेमाल से हमें अन्य विकल्प ढूँढ़ने की कोशिश करनी चाहिए।

क्या डॉक्टर द्वारा बताई गईं दर्द से राहत पानेवाली दवाइयाँ जिनमें मारुह्वाना भी शामिल है, ली जा सकती हैं?
डॉक्टर के निर्देश के अनुसार दर्द से राहत पाने के लिए और मानसिक समस्याओं के समाधान के लिए दवाइयाँ ली जा सकती हैं। लेकिन मेडिकल मारुह्वाना का सेवन कभी नहीं करना चाहिए चाहे वह डॉक्टर के नुसख़े के अनुसार ही क्यों न हो।

संतमत में धूम्रपान करना, शराब पीना और माइंड ऑल्टरिंग ड्रग्स (Mind Altering Drugs) का सेवन मना क्यों है?
शराब या नशीले पेय और मौजमस्ती के लिए ली गई ड्रग्स (माइंड ऑल्टरिंग ड्रग्स) के प्रयोग से मन पर बुरा प्रभाव पड़ता है। ये दवाइयाँ मन में चंचलता और बेचैनी पैदा करके मन को इन दवाइयों के अधीन कर देती हैं। शराब, ड्रग्स और तंबाकू की आदत स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, ये इच्छाशक्ति को निर्बल कर देते हैं जिससे भजन-सुमिरन के अभ्यास में रुकावटें पैदा होती हैं।

संतमत की रहनी

सत्संग क्या है और इसे सुनने का क्या लाभ है?
सत्‌ के संग को सत्संग कहते हैं; इसका मतलब संत-महात्माओं की संगति करना है, ताकि हम उनके ज्ञान, अनुभव और प्रवचनों से सीखें। सत्संग में नियमित रूप से जाने से हमारे मन में उनके उपदेश की याद बनी रहती है और हमें ऐसे वातावरण में रहने का अवसर मिलता है जो हमें भजन-सुमिरन के लिए प्रेरित करता है।

सेवा का क्या महत्त्व है?
निष्काम भाव से यानी किसी फल की उम्मीद किए बिना किसी भी कार्य को करना सेवा कहलाता है। जब हम बिना किसी स्वार्थ के सेवा करते हैं तब हम प्रेम-प्यार और नम्रता से ज़िंदगी जीना सीखते हैं।

क्या जीवन में महत्त्वाकांक्षी होने के बावजूद भी हम संतमत पर चल सकते हैं?
संतमत पर चलने का मतलब यह नहीं है कि हम दुनिया को छोड़ दें। संतमत की रहनी के अनुसार जीने का मतलब है कि हम चार शर्तों के दायरे में रहते हुए जीवन के हर पहलू का आनंद लें यानी नौकरी करते हुए, खेलते हुए, परिवार या दोस्तों के साथ रहते हुए ख़ुशी से ज़िंदगी बिताएँ।

क्या संतमत के नैतिक मूल्य आज भी मायने रखते हैं?
जी हाँ, ये मूल्य किसी भी समाज के लिए महत्त्वपूर्ण हैं। ये आध्यात्मिक जीवन का आधार हैं। ये हमें बुरा कर्म करने से बचाते हैं और इनसे भजन-सुमिरन करने में भी मदद मिलती है।

क़ानूनी तौर पर शादी करना इतना ज़रूरी क्यों माना जाता है, शादी किए बिना भी साथ रहकर ज़िंदगी गुज़ारी जा सकती है?
क़ानूनी शादी इसलिए ज़रूरी मानी जाती है ताकि हम अपनी ज़िम्मेदारी को गहराई से समझें और निभाएँ। एक मुहावरा है ‘अगर हम चाहते हैं कि जूता खुल न जाए तो तस्मों को कसकर बाँधना ज़रूरी है।’

क्या हम अपने पति या पत्नी की आमदनी पर गुज़ारा कर सकते हैं?
जी हाँ, परिवार की आमदनी और संपत्ति का साँझे रूप से इस्तेमाल किया जा सकता है।

क्या हमें दूसरे लोगों को संतमत में लाने की कोशिश करनी चाहिए?
हमें दूसरों पर अपने विचार थोपने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। हमें उनके विचारों का उसी तरह आदर करना चाहिए जैसा कि हम चाहते हैं कि वे हमारे विचारों का आदर करें।

बच्चों का पालन-पोषण करते वक़्त क्या हमें यह कोशिश करनी चाहिए कि वे संतमत की शर्तों का पालन करें और सत्संग जाएँ?
अगर हम अपने जीवन में नैतिक गुणों को अपनाकर ख़ुद एक उदाहरण बनेंगे और अपने घर में प्रेम-प्यार और मेलजोल का वातावरण रखेंगे तो हमारे बच्चे अपने आप ही इन गुणों को अपना लेंगे। लेकिन हमारी यही कोशिश होनी चाहिए कि हम अपने बच्चों को बिना किसी पारिवारिक मनमुटाव या विरोध के ख़ुद ही किसी भी आध्यात्मिक मार्ग या धर्म का चुनाव करने का फ़ैसला करने दें।

अगर हमारा बच्चा अपनी जाति या समाज के बाहर शादी करना चाहता हो और इसके बारे में घर में मनमुटाव चल रहा हो तो हम इस स्थिति का कैसे सामना करें?
जाति, धर्म या सामाजिक ऊँच-नीच का संतमत से कोई लेना-देना नहीं है। संतमत सहनशीलता, धीरज और आपसी सद्‌भावना सिखाता है। संतमत के नज़रिए से देखा जाए तो शादी में जाति और समाज का कोई महत्त्व नहीं है। महत्त्व है इनसान के गुणों का, लड़का-लड़की के आपसी तालमेल का। बहस करने के बजाय बेहतर होगा कि हम खुले दिल से एक दूसरे का सम्मान करते हुए इस मुद्दे को समझने की कोशिश करें।

ज्योतिषियों और हस्तरेखा पढ़नेवालों के प्रति आपका नज़रिया क्या है?
आज की दुनिया में बहुत कम लोगों को ज्योतिष विद्या या हस्तरेखा का पूर्ण ज्ञान है। भविष्य को जानने की कोशिश के बजाय बेहतर होगा कि हम अपने भजन-सुमिरन पर ध्यान दें और अपने अंतर में ताक़त हासिल करें ताकि हम किसी भी परिस्थिति का सामना कर सकें। क्योंकि किसी भी हालत में हम अपने प्रारब्ध को तो बदल नहीं सकते।

क्या काले जादू या शाप का हम पर कोई प्रभाव हो सकता है?
नियमित रूप से किए गए भजन-सुमिरन से और निरंतर सुमिरन से हमारा मनोबल इतना बढ़ जाता है कि हमें सही और ग़लत का स्पष्ट ज्ञान होने लगता है और अपने दृढ़ संकल्प से हम ग़लत धारणाओं और अंधविश्वास के चक्कर में नहीं फँसते। हम अगर अंदर से दृढ़ होंगे तो हम पर कोई भी चीज़ असर नहीं कर सकती।

क्या भूत-प्रेत सचमुच होते हैं और क्या वे हमें प्रभावित कर सकते हैं?
नियमित रूप से भजन-सुमिरन करने से हमारा मनोबल इतना बढ़ जाता है कि इन भ्रमों और वहमों का असर नहीं होता। अगर हम अंदर से मज़बूत रहेंगे तो कोई भी चीज़ हमें प्रभावित नहीं कर पाएगी।

Living Wills या Do Not Resuscitate Orders यानी ज़िंदगी को बचाने की कोशिश न करने के बारे में सतगुरु की क्या राय है?
मनुष्य जन्म एक परम सौभाग्य है इसलिए हमें हमेशा मौत के बजाय ज़िंदगी का चुनाव करना चाहिए। इस बात को अगर हम एक बार समझ लेते हैं तो बाक़ी यह हमारे ऊपर निर्भर है कि हम अलग-अलग हालात में क्या निर्णय लेते हैं। अगर कोई हमें अपनी ज़िंदगी के आख़िरी फ़ैसले लेने की ज़िम्मेदारी सौंपे तो हमें उससे साफ़ कह देना चाहिए कि हम कोई भी ऐसा निर्णय नहीं लेंगे जो इस नियम के विरुद्ध होगा।

अगर लाइलाज बीमारी (Terminally ill) के रोगी अपनी इच्छा से ज़िंदगी ख़त्म (Euthanasia) करना चाहते हैं ताकि उनका दु:खों से छुटकारा हो जाए तो क्या हमें उनसे सहमत होना चाहिए?
हमारी ज़िंदगी और मौत हमारे भाग्य यानी कर्मों के क़ानून के अनुसार तय होती है। मौत का वक़्त पहले से ही निश्चित होता है। जब हम ख़ुद अपनी ज़िंदगी ख़त्म करने की सोचते हैं तो हम कर्मों के क़ानून के विरुद्ध जा रहे हैं और ऐसा करना ठीक नहीं है।

अगर हमारे पालतू जानवर बहुत बीमार और बूढ़े हो गए हों तो क्या हम उन्हें ख़त्म कर सकते हैं?
हमें ज़िंदगी लेने का कोई हक़ नहीं है, फिर चाहे वह किसी की भी ज़िंदगी क्यों न हो। पालतू जानवरों के भी अपने कर्म होते हैं जो उन्हें भोगने पड़ते हैं। जब हमें उनके साथ की ज़रूरत थी तब हमने उनकी कितनी देखभाल की, इसलिए अब भी हमें उनके आख़िरी वक़्त तक पूरी देखभाल करनी चाहिए जब तक उनकी स्वाभाविक रूप से मौत नहीं हो जाती।

अगर हम नामदान के समय किए गए वायदों को निभाना छोड़ दें तो क्या होगा?
जो भी फ़ैसला हम करते हैं हम उसी से बँध जाते हैं। हमें उसका नतीजा तो भुगतना ही पड़ेगा। अगर हम उन शर्तों का पालन नहीं करेंगे तो हमारे अमर धाम तक का रूहानी सफ़र और भी लंबा हो जाएगा।


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