समय का भ्रम
सदियों से दार्शनिकों, वैज्ञानिकों और धार्मिक मार्गदर्शकों ने अपने-अपने दृष्टिकोण से भौतिक ब्रह्मांड, इसकी रचना, इसके अंत और समय के सिद्धांत का वर्णन करने का यत्न किया है। बाइबल में इस बारे में स्पष्ट रूप से कहा गया है:
आदि में शब्द था और शब्द परमात्मा के पास था, और शब्द ही परमात्मा था।...सब कुछ उसी ने रचा; जो कुछ रचा गया उसमें से कुछ भी ऐसा नहीं है, जो उसने न रचा हो। उसमें जीवन था; और यह जीवन मनुष्यों की ज्योति था।
सेंट जॉनशुरू में, परमात्मा ने स्वर्गों और पृथ्वी की रचना की। पृथ्वी बिना आकार की और शून्य थी, और इसके ऊपर गहरा धुँधुकार छाया हुआ था। और परमात्मा की दिव्य शक्ति जल के ऊपर मंडरा रही थी।
जैनेसिस
सेंट जॉन समझाते हैं कि जो कुछ भी रचा गया है, वह परमात्मा की ही अभिव्यक्ति है। परमात्मा हर चीज़ को जीवन देता है। जैनेसिस में आगे लिखा गया है कि परमात्मा ने छ: दिनों में सारी सृष्टि की रचना की और सातवें दिन उसने विश्राम किया। सवाल यह पैदा होता है: परमात्मा का एक दिन कितना लंबा होता है? एक पल या अरबों वर्ष?
कुछ भारतीय दार्शनिक विचारधाराओं में समय को एक भ्रम माना गया है क्योंकि भूत या भविष्य का कोई अस्तित्व नहीं है जिसे हम अनुभव कर सकें या देख सकें – जो कुछ भी अस्तित्व में है वह है “वर्तमान”। भूत, वर्तमान तथा भविष्य की धारणाओं और समय के माप को लेकर वैज्ञानिक हमेशा से दुविधा में रहे हैं।
आम तौर पर, इंसान समय को, या तो गुज़र रहे या बीत चुके समय के रूप में अनुभव करता है जिसमें एक विशेष पल होता है जो कि न तो अतीत होता है और न ही भविष्य, जिसे हम “वर्तमान” कहते हैं। अभी, आप यह लेख पढ़ रहे हैं, लेकिन आधा घंटा पहले आप कुछ और कर रहे थे। आपने जो कुछ भी किया, उसे बदलने का आपके पास कोई भी तरीक़ा नहीं है क्योंकि असल में वह अब बीत चुका है। और आधे घंटे बाद आप क्या करने वाले हैं, यह आप पर निर्भर करता है लेकिन आप अभी उस बारे में यक़ीन से नहीं कह सकते हैं।
इससे पहले कि हम और अधिक वैज्ञानिक दृष्टिकोणों की तरफ़ बढ़ें, मैं आप सबसे विनती करता हूँ कि आप सेंट जॉन और जैनेसिस के ऊपर दिए गए दोनों उद्धरणों को ध्यान में रखें, ख़ासकर आइंस्टीन के “सापेक्षता के सिद्धांत” (Theory of Relativity) के संदर्भ में। जब तक मुझे आइंस्टीन के इस सिद्धांत की समझ नहीं आई थी तब तक मैंने बाइबल के इन विवरणों पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया था। अब मेरा मानना है कि इन शब्दों के पीछे गहरा अर्थ छिपा है।
जर्मन गणितज्ञ हरमन मिंकोवस्की ने ‘दिक्’ (physical space) के तीनों आयामों (लंबाई, चौड़ाई, ऊँचाई) को समय के साथ संयोजित करके एक चार-आयामी “मिंकोवस्की स्पेस” – दिक्-काल (space-time) का सिद्धांत पेश किया जिसने अल्बर्ट आइंस्टीन के सापेक्षता के विशेष सिद्धांत की गणितीय नींव रखी। आइंस्टीन के “सापेक्षता के सिद्धांत” के अनुसार भौतिक विज्ञान में समय का अर्थ, समय के बारे में हमारी धारणा से अलग है। दूसरे शब्दों में, समय जिस ‘गति’ (rate) से गुज़रता है वह किसी व्यक्ति के दृष्टिकोण (frame of reference) पर निर्भर करता है, यह दृष्टिकोण ही ‘दिक्’ है। काल (समय) और ‘दिक्’ (स्थान) एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं। ‘दिक्’ में हम आगे, पीछे, बाएँ या दाएँ, या ऊपर और नीचे जा सकते हैं। समय में हम केवल आगे ही जा सकते हैं।
हम सोचते हैं कि समय हर व्यक्ति और हर वस्तु के लिए एक जैसा ही है। यदि मेरे लिए एक सेकंड बीता है तो आपके लिए भी एक ही सेकंड बीता है और बादलों के लिए भी एक सेकंड ही बीता है। यह समय को एक विश्वव्यापी मापदंड बना देता है। यह मापदंड, यह मापता है कि कितना समय बीता है और यह भी कि हम सब का “वर्तमान” से क्या अभिप्राय है।
आइंस्टीन समझाते हैं कि ब्रह्मांड एक स्थायी, चार-आयामी ब्लॉक (four-dimensional block) है जिसमें संपूर्ण स्थान और समय एक साथ मौजूद हैं – जहाँ विशेष “वर्तमान” नहीं है। जो किसी प्रेक्षक (observer) के लिए भविष्य है, वह दूसरे के लिए अतीत हो सकता है। इसका मतलब है कि समय का बहाव अतीत से भविष्य की ओर नहीं होता, जिस रूप में हम इसे अनुभव करते हैं। समय के बारे में हमारी धारणा के साथ यह मेल नहीं खाता है।
तो क्या इसका अर्थ यह है कि समय एक आयाम है? क्या अन्य आयाम भी मौजूद हैं? सिर्फ़ आइंस्टीन ही थे जिन्होंने इस बात को समझा कि इससे अभिप्राय यह है कि किसी एक घटना को लेकर सभी प्रेक्षकों का दृष्टिकोण समान रूप से सही है। इसलिए, यदि किसी प्रेक्षक का एक ख़ास दृष्टिकोण है तो वह दृष्टिकोण आपके दृष्टिकोण की तरह ही सही हो सकता है। हो सकता है कि सैद्धांतिक प्रेक्षक (theoretical observer) निर्देशांक प्रणाली (coordinate system) का ही इस्तेमाल करे: यह एक ऐसी प्रणाली है जो कई संदर्भ बिंदुओं (points of reference) या निर्देशांकों (coordinates) का उपयोग करते हुए किसी विशेष बिंदु या स्थान की स्थिति का पता लगाने के लिए इस्तेमाल की जाती है। तो आइंस्टीन की इस मान्यता का मूल रूप से तात्पर्य यह है कि भौतिक वास्तविकता का वर्णन करने के लिए कोई भी निर्देशांक प्रणाली किसी अन्य प्रणाली जितनी ही उपयुक्त होनी चाहिए। और, यदि सभी दृष्टिकोण समान रूप से सही हैं तो फिर कोई यह दावा कैसे कर सकता है कि जो वह देखता या सोचता है वही सत्य है और जो दूसरे देखते हैं वह भ्रम है?
कल्पना कीजिए कि दो घटनाएँ घट रही हैं जो एक-दूसरे से जुड़ी हुई नहीं हैं। आप एक घटना देख रहे हैं और अन्य लोग एक अलग घटना को देख रहे हैं। आइंस्टीन के अनुसार, घटना को देखने वाला घटना जितना ही महत्वपूर्ण हैं। यदि आप सोचते हैं कि आपने जिस घटना को देखा है वह अभी घटी है और अन्य लोग भी यही कहते हैं कि उन्होंने जिस घटना को देखा है वह भी अभी घटी है तो दोनों घटनाएँ “वर्तमान पल” में घटी हैं। या दूसरे शब्दों में कहें तो सभी समय एक ही समय में मौजूद हैं।
आम तौर पर हम “वर्तमान” के बारे में कैसे सोचते हैं? हम हर समय उन चीज़ों के बारे में बात करते हैं जो अभी घटी हैं लेकिन हम कभी भी यह नहीं सोचते कि “वर्तमान पल” कितना लंबा है। यह बहुत अच्छा होता अगर हम “वर्तमान” के किसी एक माप पर सहमत हो पाते और बात वहीं ख़त्म हो जाती। लेकिन यह तय करने के लिए हमें एक कार्य-विधि ढूँढ़नी पड़ेगी कि “वर्तमान” से हमारा क्या अभिप्राय है। इसके लिए हमें माप का एक तरीक़ा खोजना पड़ेगा। गतिहीनता को आप कैसे मापेंगे? स्थिरता? अगर कोई आपकी ओर गेंद फेंकता है तो जैसे-जैसे गेंद आपकी ओर बढ़ती है, वह किस बिंदु पर “वर्तमान” में होती है?
आइंस्टीन ने समझाया कि सभी देखनेवालों के दृष्टिकोण समान रूप से ठीक हैं। इस लिहाज़ से हर किसी का विचार सही है। इसलिए “वर्तमान” की धारणा देखनेवाले पर निर्भर करती है। जैसे कि भौतिक विज्ञानी कहते हैं, यह “प्रेक्षक पर निर्भर करती” है। आपका और मेरा “वर्तमान पल” समान नहीं है भले ही हम एक ही घटना को देख रहे हों। इसके लिए प्रयोग किया जानेवाला तकनीकी शब्द है – “समकालिक सापेक्षता” (relativity of simultaneity)।
कुछ लोगों ने तर्क दिया है कि भविष्य पहले से मौजूद नहीं हो सकता और इसलिए अतीत और भविष्य के बीच एक विशेष पल भी होना चाहिए जो अतीत को भविष्य से अलग कर सके। और शायद ऐसा ही है, लेकिन जहाँ तक हम जानते हैं, अतीत भी वैसे ही मौजूद है जैसे कि वर्तमान और शायद भविष्य भी। वैज्ञानिकों की यह बहस तब तक चलती रहेगी जब तक ब्रह्मांड का अंत नहीं हो जाता और तब सब कुछ स्पष्ट हो जाएगा।
इसलिए चलो सब वैज्ञानिकों की सोच को एक तरफ़ रख देते हैं। समय के भ्रम के बारे में संत-महात्माओं के अपने विचार हैं जो आइंस्टीन के सापेक्षता के सिद्धांत से मिलते-जुलते हैं। आइंस्टीन बताते हैं कि ब्रह्मांड चार-आयामी ब्लॉक है जिसमें दिक् और काल एक साथ मौजूद हैं – बग़ैर किसी विशेष “वर्तमान पल” के। क्या हम परमात्मा के बारे में ऐसा नहीं सोचते? सब कुछ परमात्मा में समाया हुआ है; परमात्मा से बाहर किसी भी वस्तु का कोई अस्तित्व नहीं है। परमात्मा सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान है। वह हर चीज़ में व्याप्त है और सब कुछ जानता है जिसमें भविष्य में क्या होगा भी शामिल है, क्योंकि जो कुछ हो चुका है और आगे होगा, उसी के हुक्म के अनुसार होगा और उसका हुक्म वर्तमान में है।
जो कुछ भी कभी अस्तित्व में था या होगा, वह सब पहले से ही परमात्मा में समाया हुआ है। परमात्मा ही परम “वर्तमान” है। समय का कोई अस्तित्व नहीं है, न ही अतीत या भविष्य का, बस सब कुछ उस परमात्मा के विशाल “वर्तमान” में समाया हुआ है।
क्या यह सृष्टि एक भ्रम है? संत-महात्मा हाँ में उत्तर देते हैं क्योंकि यह परमात्मा के हुक्म (शब्द) की अभिव्यक्ति है और इसकी अपनी कोई हस्ती नहीं है। यदि परमात्मा अपना हुक्म वापस ले ले, तो सब समाप्त हो जाएगा। हम सृष्टि को एक लंबी फ़िल्म समझ सकते हैं जो पहले से ही बन चुकी है और अब हमारे सामने चलाई जा रही है। इसका मतलब है कि फ़िल्म का अंत पहले ही हो चुका है। कोई इत्तेफाक नहीं है, कुछ भी योजना के बिना नहीं है और इसीलिए कोई स्वतंत्र इच्छा भी नहीं है। जबकि अपने भ्रम की वजह से हम फिल्म को एक के बाद एक घटनेवाली घटनाओं के रूप में अनुभव करते हैं जिससे यह आभास होता है कि यह समय के दायरे में है जबकि सब कुछ पहले ही घट चुका है। हममें से हर कोई फिल्म को अपने दृष्टिकोण से देखता है। लेकिन अगर हम गहराई में, सृष्टि को उसकी संपूर्णता में देख पाएँ तो हम सभी का सर्वव्यापक “वर्तमान” या परमात्मा के प्रति एक ही दृष्टिकोण होगा।
निबंध की शुरुआत में दिए बाइबल के उद्धरणों पर फिर से ग़ौर फ़रमाए तो स्पष्ट होता है कि परमात्मा के अलावा किसी का भी कोई अस्तित्व नहीं है। परमात्मा के सृष्टि की रचना करने के “हुक्म” से पहले कुछ भी नहीं था सिर्फ़ अँधेरा और शून्य था। लेकिन “परमात्मा की चेतनधारा” के ज़रिए सृष्टि रची गई। परमात्मा ने सृष्टि को प्रकाश और जीवन दिया और सब कुछ केवल इसलिए अस्तित्व में है क्योंकि यही उसका हुक्म है। इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि सृष्टि एक भ्रम है क्योंकि यह केवल परमात्मा के हुक्म की अभिव्यक्ति, उसका विचार, उसकी लीला है। हालाँकि आइंस्टीन ने परमात्मा का ज़िक्र नहीं किया लेकिन उनका भी यही मानना है क्योंकि वह कहते हैं कि ब्रह्मांड एक सर्वव्यापक चार-आयामवाला ब्लॉक है जिसमें दिक् और काल एक साथ समाहित हैं। यह सब कुछ परमात्मा के अनंत “वर्तमान” को दर्शाता है। जिस रूप में सृष्टि आज है उसकी रचना में कितना समय लगा, यह आज भी वाद-विवाद का विषय है। मेरा अनुमान यह है कि इसमें अरबों वर्ष लगे हैं। मगर परमात्मा के नज़रिए से देखें तो यह एक पल में ही अस्तित्व में आ गई।
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परमात्मा हर एक में मौजूद है। परमात्मा ही एकमात्र सच्चाई है। जहाँ कहीं भी परमात्मा है, वही असलियत है। लेकिन वह शरीररूपी घर जिसमें परमात्मा रहता है, उसकी कोई असलियत नहीं, वह नाश हो जायेगा।...दरअसल परमात्मा ही सच है। बाक़ी सब चीज़ें नाश हो जायेंगी, फ़ना हो जायेंगी। परमात्मा कभी फ़ना नहीं होगा। इसलिये परमात्मा ही सत्य है जबकि बाक़ी सब चीज़ें नाशवान् हैं।
दु:ख की बात तो यह है कि हम जो देखते हैं, महसूस करते हैं और छू सकते हैं, वह सच नहीं है। जो हम नहीं देख पाते, वह सच है। जिसे हम छू नहीं सकते, वह सच है। दु:ख की बात तो यही है कि हम केवल उसी से प्रेम कर सकते हैं जिसे हम देखते हैं, जिसे हम महसूस करते हैं, जिसे हम छू सकते हैं, जिसे हम पकड़ सकते हैं। इसी लिये हम रचना से प्यार करते हैं। जिसे हम देख नहीं सकते, जिसे हम पकड़ नहीं सकते, जिसे हम महसूस नहीं कर सकते, उससे हम प्यार भी नहीं कर सकते। फिर भी हमें उस परमात्मा से प्रेम करना है और रचना से अपने आप को निकालना है। यही तो असली संघर्ष है।
जो हम अपनी अंतर की आँखों से देखेंगे, केवल वही सच होगा। लेकिन वह स्थूल नहीं है।
इसलिये बाहरी आँखें उसे देख नहीं सकतीं। ये हाथ उसे छू नहीं सकते। एक वही सच है।
जो कुछ हम इन आँखों से देखते हैं, इन हाथों से छूते हैं, वह सच नहीं है।
महाराज चरन सिंह जी, संत संवाद, भाग 1, प्रश्न 16