रूहानी योद्धा बनना
एक रूहानी योद्धा को युद्ध जीतने के लिए संघर्ष करना पड़ता है और कई क़ुर्बानियाँ भी देनी पड़ती हैं ताकि वह जीत हासिल करके परमपिता के पास निज-घर वापस लौट सके। योद्धाओं की तरह हमें भी ज़िंदगी की इस रणभूमि में उन दुश्मनों पर जीत हासिल करने के लिए जूझना पड़ता है जो हमारी राह की रुकावट हैं और साथ ही जो इस सफ़र में आगे बढ़ने में हमारी मदद करते हैं उनसे दोस्ती और नाता क़ायम करना पड़ता है। दुश्मन रोज़मर्रा की चुनौतियों के रूप में आते हैं। महाराज चरन सिंह जी इन्हें ‘मीठे ठग’ कहा करते थे। ये मीठे ठग हमारी रूहानी दौलत को लूटने की कोशिश करते हैं ताकि हम मार्ग से भटक जाएँ और हमारा ध्यान अपने लक्ष्य से हट जाए। हम इनसे अच्छी तरह से परिचित हैं क्योंकि हम अकसर इन दुश्मनों – काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार के शिकार हो जाते हैं। लेकिन अगर हम इन्हें अपना दोस्त बनाना चाहते हैं तो हमें इन्हें अपने अधीन करके इन पर जीत हासिल करनी पड़ती है।
काम को परमात्मा के लिए प्रेम में बदलना पड़ता है और इसी प्रेम के ज़रिए हम हर किसी से, हर चीज़ से प्रेम करने लग जाते हैं। क्रोध को करुणा में बदलना पड़ता है ताकि हम बुराई के बजाय अच्छाई की ओर बढ़ पाएँ। लोभ को उदारता में बदलना पड़ता है ताकि हम केवल अपनी ही ज़रूरतों को पूरा करने तक सीमित न रहकर दूसरों की भी मदद करें। मोह को बैराग में बदलना पड़ता है ताकि हम उन सभी बंधनों को ढीला कर पाएँ जो हमें दुनिया की नश्वर चीज़ों से बाँधकर रखते हैं तभी हम उस परमात्मा से जुड़ सकते हैं। हौंमैं की जगह विनम्रता को धारण करना पड़ता है। आख़िर में जब हमें इस बात का एहसास हो जाता है कि हमारी कोई हस्ती नहीं हैं तब हम हौंमैं के चंगुल से सदा के लिए मुक्त हो जाते हैं।
जो चुनौतियाँ हमें इस संसार के साथ बाँधकर रखती हैं, चाहे वे रिश्ते-नाते हों, ऊँची पद्वियाँ हों और दुनियावी चीज़ें हों, जो अंतत: नश्वर और अस्थायी हैं; सिर्फ़ उन पर ध्यान देने के बजाय हमें प्रेम, करुणा, उदारता, बैराग और विनम्रता को धारण करके सत्य की राह पर चलना पड़ेगा।
ऐसा क्या है जो इन दुश्मनों को दोस्त बनाने में और इन पर जीत हासिल करने में हमारी सहायता करता है? एक प्रचलित कहानी है कि इस संसार में दो भेड़िये हैं – एक अच्छा है और एक बुरा। हम जानते हैं कि इस संसार में अच्छाई और बुराई दोनों मौजूद हैं। इस कहानी में एक प्रश्न पूछा गया है कि कौन-सा भेड़िया जीतता है, अच्छा भेड़िया या बुरा? कहानी में यह बताया गया है कि जीत उसी भेड़िये की होती है जिसे हम पालते-पोसते हैं। अब यह हमें तय करना है कि हम किस भेड़िये को पालना चाहेंगे, अच्छे भेड़िये को या बुरे को।
शायद हमें यह लगे कि हमारे पास कोई विकल्प नहीं है क्योंकि हमारा प्रारब्ध तय है और हम अपने कर्मों से बंधे हुए हैं। मगर हमें समझाया जाता है कि हमारे पास सीमित स्वतंत्र इच्छा है। इसी सीमित स्वतंत्र इच्छा द्वारा हम सभी फ़ैसले ले पाते हैं। इसलिए इस बात को मान लेना बहुत ज़रूरी है कि हम सभी के पास विकल्प हैं। हम यह चुन सकते हैं कि जब सुबह हम घर से बाहर निकलें तो गुस्से से भरे हुए जाएँ या फिर मुस्कुराते हुए, प्यार से भरे हुए, रहमदिली के साथ और दूसरों के प्रति संवेदनशील होकर जाएँ। हर रोज़ इस बात का चुनाव करना हमारे हाथ में है। यहाँ तक कि जब हमारा मूड ख़राब हो तब भी हमें अपना गुस्सा दूसरों पर नहीं निकालना चाहिए। जब लोग गुस्से में होते हैं तब क्या होता है? वे परेशान हो जाते हैं या बीमार हो जाते हैं, उनके सिर में तेज़ दर्द होने लगता है और शायद वे गुस्से में चिल्ला उठते हैं। जब गुस्से की वजह से कोई अपना आपा खो बैठता है तब सबसे ज़्यादा नुक़सान किसे होता है? अकसर सबसे ज़्यादा नुक़सान उसी को पहुँचता है जो गुस्सा करता है – उस समय भी और लंबे समय के लिए भी। ख़ासकर अगर क्रोध या इन पाँच शत्रुओं में से कोई एक, हमारी आदत ही बन जाता है तब वह शत्रु हम पर हावी हो जाता है और हमसे जो चाहता है वही करवाता है। हमें याद रखना चाहिए कि हर कर्म का परिणाम होता है। आख़िरकार हमें अपने हर कर्म का नतीजा भुगतना पड़ता है, शायद तब, जब हमें इसकी बिलकुल भी उम्मीद नहीं होती। हम कर्मों से बच नहीं सकते। इसलिए हमारी भलाई इसी में है कि हम सचेत होकर अच्छे भेड़िये को पालें और पाँच दुश्मनों (विकारों) के बजाय पाँच दोस्त (सद्गुण) बनाएँ।
इस संसार में शांति और संतोष के साथ जीना एक बहुत बड़ी चुनौती है और यह एक ऐसा दुर्लभ ख़ज़ाना है जो मालिक की अपार दया से कुछ भाग्यशाली जीवों को ही प्राप्त हो पाता है। संतोष ख़ुद-बख़ुद नहीं आ जाता; इसके लिए हमें मेहनत करनी पड़ती है। दुनिया सुख और दु:ख की नगरी है और जीवन की घटनाओं पर हमारा कोई वश नहीं होता। बहुत-से लोगों के जीवन में काफ़ी खलबली मची रहती है और असल में ये सब उनके अपने ही कर्मों के कारण होता है। सिर्फ़ परमात्मा के साथ मिलाप से ही हमें सच्ची व स्थायी शांति और संतोष प्राप्त हो सकता है। परमात्मा से मिलाप करने के लिए हमें अपने जीवन को इस लक्ष्य की ओर मोड़ना पड़ता है। ऐसा करने के लिए, हमें अपनी जीवनशैली में कुछ बदलाव लाने पड़ते हैं, बुरी आदतों को अच्छी आदतों में बदलना पड़ता है और सबसे अहम यह कि हमें अपनी प्राथमिकताओं और कर्मों को इस लक्ष्य के मुताबिक़ तय करना पड़ता है। हम अकसर संत-महात्माओं के ये वचन सुनते हैं: हमें इस दुनिया में रहना है पर इस दुनिया का बनकर नहीं रहना।
इस नसीहत को मानना आसान नहीं है क्योंकि यह दुनिया लोगों को यहाँ फँसाए रखने में बहुत माहिर है। यह इतनी चतुर है कि हमें अकसर इस बात का एहसास तक नहीं होता कि हम इसके चंगुल में फँसे हुए हैं। असल में हमारे जीवन के कई दिन, कई वर्ष, यहाँ तक कि कई दशक सुखों में बीत जाते हैं मगर फिर भी सुख के इन पलों में, कभी-कभार हमें किसी चीज़ की कमी, शंका और ख़ालीपन महसूस होता है जिससे हमारे मन में सवाल पैदा होता है कि इस संसार में आने का और हमारे इस जीवन का क्या उद्देश्य है? अगर हमें थोड़ा-सा भी आभास हो जाए कि संसार की कोई भी चीज़ हमारी आत्मिक ज़रूरतों और इच्छाओं की पूर्ति नहीं कर सकती तब हमें और ज़्यादा गहराई से इस बारे में विचार करने की ज़रूरत है। जब तक हम जीवन के अर्थ को गहराई से समझने की चेष्टा नहीं करते तब तक हम इस दुनिया में बंजारों की तरह भटक रहे हैं, खोए हुए और अकेले। एक बार इस जिज्ञासा के जागृत होने पर जीवन के गहरे अर्थ को जानने के लिए हमारी खोज शुरू हो जाती है।
ज़रा अंदाज़ा लगाएँ कि फिर क्या होता है? हमें अपने जीवन के गहरे मायनों की इस खोज के दौरान कई बाधाओं का और बहुत बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। इनकी पहचान कैसे होती है? शायद हर वह चीज़, जिसके कारण हमारा संतुलन बिगड़ जाता है और हमारा ध्यान परमात्मा से हटकर दूसरी तरफ़ चला जाता है, हमें दुनिया की ओर खींच रही है। अकसर हम इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं कि वे कौन-सी चीज़ें हैं और किस रूप में हमारे सामने आती हैं। काम की पूर्ति के लिए क्या हमारे अंदर किसी ऐसी चीज़ की चाहत या इच्छा है जो हमें पूरी तरह से अपने क़ाबू में कर लेती है? क्रोध के वश होकर, क्या हमें आसानी से गुस्सा आ जाता है या हम छोटी-छोटी बातों से बेवजह परेशान होने लगते हैं? लोभ में आकर, क्या हम ज़रूरत से ज़्यादा पैसा कमाने, घर और गाड़ियों को ख़रीदने तथा अधिक से अधिक जायदाद इकट्ठी करने में लगे रहते हैं? मोह के कारण, क्या हमारे पास चाहतों और इच्छाओं की लंबी सूची है जिनका कोई अंत नहीं है? क्या हमारा अहंकार जो पाँचों दुश्मनों में से अंतिम और सबसे बड़ी बाधा है हमें इस तरह जकड़ लेता है कि हम शोहरत और दौलत के पीछे भागते रहते हैं?
अगर हम इन पाँच दुश्मनों को अपने पाँच दोस्तों – प्रेम, करुणा, उदारता, बैराग और विनम्रता – में बदल सकें तो ये वापस निज-घर पहुँचाने वाले मार्ग में हमारे सहायक बन जाते हैं। दुश्मनों को दोस्त बनाना आसान नहीं होता, इसमें समय लगता है। इन दुश्मनों को दोस्त बनाने के लिए हमारे पास कोई ठोस वजह होनी चाहिए। हमें अपना ध्यान दुनिया के भोगों को भोगने के बजाय एक क़ाबिल इंसान बनने पर लगाना चाहिए जो परमात्मा का भक्त बनने और अपने निज-घर लौटने का इच्छुक हो। यह एक चुनौतीपूर्ण काम है। किसी के मन में यह सवाल पैदा हो सकता है कि क्या ऐसा संभव भी है?
संत-महात्मा हमें समझाते हैं कि इन पाँचों विकारों को, इन मीठे ठगों को भजन-सिमरन के ज़रिए क़ाबू में किया जा सकता है। भजन-सिमरन से मन वश में आ जाता है और पाँचों विकार भी शांत हो जाते हैं। भजन-सिमरन की शक्ति से हमारी सुरत जागृत हो जाती है और हमारे अंदर तड़प पैदा हो जाती है। यही तड़प कायाकल्प के इस मार्ग पर आगे बढ़ने में हमारी मदद करती है। परमात्मा से मिलाप की इस आंतरिक तड़प को यह संसार कभी भी संतुष्ट नहीं कर सकता। केवल परमात्मा के साथ मिलाप ही हमें सच्चा और स्थायी आनंद दे सकता है। इस तरह हम दुनिया और इंद्रियों के भोगों की तरफ़ से मुँह मोड़कर, परमात्मा के पास निज-घर वापस जाने के लिए अपने जीवन के सबसे चुनौतीपूर्ण और सुखद नतीजा देनेवाले संघर्ष की शुरुआत करते हैं।
इस रूहानी युद्ध में बंदूक और चाकू-तलवार जैसे हथियारों की ज़रूरत नहीं पड़ती या दुश्मन से आमने-सामने की लड़ाई नहीं होती। इस युद्ध में हम एक अलग क़िस्म के दुश्मन से लड़ रहे हैं, जो इस दुनिया में हमारे साथ ही रहता है वह है हमारा मन। हमें समझाया जाता है कि हमारे पास एक उच्च मन (ब्रह्मांडी मन) है जो हमें परमात्मा के नज़दीक ले जा सकता है और एक निचला मन (पिंडी मन) है जो हमें इस दुनिया में फँसाए रखता है। तो हम निचले मन के साथ लड़ाई कैसे करें ताकि हम उच्च मन तक पहुँच सकें? हम इसकी शुरुआत अपने वक़्त के सतगुरु में विश्वास रखकर, उनके द्वारा दी गई हिदायतों का पालन करके कर सकते हैं।
सत्संगियों और जिज्ञासुओं के हृदय में सतगुरु रूहानी दीप जला देते हैं। जब वह ऐसा करते हैं तब हमें क्या करना चाहिए? हमें इस बात की ओर ध्यान देना है कि हम किस तरह का जीवन व्यतीत कर रहे हैं – क्या हमारे कर्म हमें परमात्मा की ओर ले जा रहे हैं या इस दुनिया और इच्छाओं की दलदल में धकेल रहे हैं जो हमें इस संसार से बाँधकर रखती हैं। दुनिया के इस मायाजाल से बचने के लिए हमें अपने ध्यान को अंदर की ओर मोड़ना पड़ेगा।
सतगुरु इस संसार में उन चुनी हुई आत्माओं को जीवन रूपी कहानी का दूसरा पहलू समझाने के लिए आते हैं कि परमात्मा का घर ही हमारा सच्चा घर है और हमें वापस वहीं जाना है। वे ख़ुशनसीब जीव जो देहधारी सतगुरु की शरण में आ जाते हैं उन्हें अपना कायापलट करने का अवसर मिल जाता है ताकि वे अपने कर्मों का हिसाब-किताब चुकता कर सकें और सभी दुनियावी ज़िम्मेदारियों को पूरा कर सकें। भजन-सिमरन सबसे अहम सुरक्षा कवच है जो हमें दुनिया से बचाकर रखता है ताकि हम अपने पाँच दुश्मनों को दोस्त बना सकें – काम को प्रेम में, क्रोध को करुणा में, लोभ को उदारता में, मोह को बैराग में और अहंकार को विनम्रता में बदल सकें।
सतगुरु हमेशा भजन-सिमरन के ज़रिए हमें अपने क़रीब लाते हैं। भजन-सिमरन करने से हम अधिक प्रेम करने और अधिक प्रेम पाने के लायक़ बन जाते हैं। इस मार्ग की महिमा अपरंपार है जिसमें धीरे-धीरे हमारा कायापलट होने लगता है ताकि हम परमात्मा से मिलाप के लायक़ बन सकें। यह कायापलट भजन-सिमरन के ज़रिए होता है और यह हमें परमात्मा से मिलाप के लायक़ बनाता है; जब हमारे सभी कर्मों का लेखा-जोखा ख़त्म हो जाता है तब हम इस संसार के बंधनों से मुक्त हो जाते हैं। भजन-सिमरन द्वारा धीरे-धीरे हमारे दुनियावी बंधन ढीले होने लगते हैं और परमात्मा के साथ हमारा रिश्ता मज़बूत होने लगता है। जब माया रूपी भ्रम के ये सभी पर्दे उतर जाते हैं तब हम परमात्मा के पास निज-घर वापस लौट जाते हैं।
सब कुछ परमात्मा की योजना के अनुसार होता है। परमात्मा हम सभी की सँभाल करता है इस बात से हमें बहुत सुकून और दिलासा मिलना चाहिए। लेकिन हम परमात्मा द्वारा बनाई योजना को आसानी से मानने के लिए तैयार नहीं होते। हमें मार्ग पर डटे रहने और पूरी तरह से शरण लेने की ज़रूरत है ताकि जो कुछ भी हो रहा है हम उसे स्वीकार कर पाएँ। संत-महात्मा समझाते हैं कि परमात्मा हर चीज़ की तथा सब जीवों की सँभाल करता है। कुछ भी संयोगवश नहीं होता। इसलिए हमारी सबसे पहली ज़िम्मेदारी यह है कि हम इस बात पर भरोसा कर लें और फिर इसके अनुसार जीवन जीएँ। हमें यह समझाया जाता है कि इस मार्ग पर हमें अपनी तरफ़ से कोशिश करनी चाहिए। हमें अपनी ज़िम्मेदारी निभानी है। परमात्मा की रज़ा में रहना इस कोशिश का हिस्सा है जो हमेशा आसान नहीं होता। अकसर हमें यही पता नहीं होता कि उसकी रज़ा क्या है? धीरे-धीरे हमें समझ आने लगती है कि असल में जो कुछ भी होता है उसकी रज़ा से ही होता है। मालिक के हुक्म से ही किसी का जन्म होता है या किसी की मृत्यु होती है। किसी दूसरे के पास जीवन देने या लेने की शक्ति नहीं है। यह सिर्फ़ परमात्मा के हाथ में है। इसलिए अगर इतनी बुनियादी बात इनसान के वश में नहीं है तो हम कैसे सोच सकते हैं कि कुछ भी हमारे बस में है? परमात्मा ही असल कर्त्ता है।
सतगुरु के उदाहरण से सीखकर और उनके हुक्म का पालन करके ही हम मन पर जीत हासिल कर सकते हैं और मृत्यु के दायरे से परे जा सकते हैं। हुज़ूर महाराज चरन सिंह जी पुस्तक स्पिरिचुअल पर्सपेक्टिवस (वॉल्यूम II, पृ. 340) में बड़े प्यार से समझाते हैं:
हमें अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश करनी है। फिर उस पर छोड़ देना है। हमें अपने आप को धोखा नहीं देना चाहिए – यही मुख्य बात है। हमें अपनी तरफ़ से पूरा यत्न करना है और फिर उस पर छोड़ देना है और इस बारे में ज़्यादा चिंता नहीं करनी है।
आओ हम इस चुनौती को स्वीकार करें और अपनी तरफ़ से एक क़ाबिल रूहानी योद्धा बनने की पूरी कोशिश करें। हमारा फ़र्ज़ है कि हम अपने प्रेम, भक्ति और अपनी कोशिशों को हर रोज़ भजन-सिमरन के ज़रिए ज़ाहिर करें। हमें भजन-सिमरन को लेकर सिर्फ़ योजनाएँ ही नहीं बनानी है बल्कि इसे करना भी है। हम सब इस बात को जानते हैं कि जब हम घर के स्टोर या तहख़ाने को साफ़ करते हैं तो अकसर हम यह देखकर हैरान हो जाते हैं कि हमने कितना अधिक सामान इकट्ठा किया हुआ है। यह बात तब भी सच होती है जब हम भजन-सिमरन करने की कोशिश करते हैं। जब तक हम अपने ध्यान को एकाग्र करने की कोशिश नहीं करते तब तक हमें यह एहसास ही नहीं होता कि हमने अपने अवचेतन मन में कितना कुछ इकट्ठा किया हुआ है। ध्यान को भटकानेवाली इन दुनियावी चीज़ों को भजन-सिमरन में रुकावट नहीं बनने देना चाहिए। मन के ख़िलाफ़ इस संघर्ष में की गई हर तरह की कोशिश हमें और ज़्यादा सशक्त बनाती है। संत-महात्मा समझाते हैं कि इस मार्ग में कोई असफलता नहीं है, हमें प्रयास जारी रखना है। सतगुरु हमें ध्यान को तीसरे तिल पर एकाग्र करने, सभी दुनियावी प्रलोभनों का सामना करने और निज-घर वापस पहुँचने की युक्ति सिखाने के लिए आते हैं।
हमारे अंदर रूहानी सफ़र तय करने की लगन होनी चाहिए। सिवाय इसके जो कुछ भी है वह माया है और हमारी आंतरिक तड़प को कभी तृप्त नहीं कर सकता। इस सफ़र में, सतगुरु रूहानियत के बादशाह हैं जो हमारा मार्गदर्शन करते हैं, हमारे अंग-संग होते हैं और हमारी सँभाल भी करते हैं। घर वापसी के इस सफ़र में वह हमें एक योद्धा की तरह उनके साथ आगे बढ़ने के लिए कहते हैं और उस दात को हासिल करने के लिए कहते हैं जिसकी प्राप्ति की युक्ति उन्होंने हमें सिखाई है। युद्ध तो पहले से ही जीता जा चुका है और आत्मा की मुक्ति भी यक़ीनी है। बाबा जैमल सिंह जी पुस्तक परमार्थी पत्र, भाग 1 (पृ. 66) में लिखते हैं:
सतगुरु की दी हुई दात को कोई नहीं मेट सकता। फिर आपको अब क्या संशय है जी? उसी दिन सचखंड पहुँच गए हो, उसी जगह जाओगे।
आओ एक क़ाबिल रूहानी योद्धा बनें और अपने मक़सद को पूरा करने की कोशिश करें। हर शिष्य का एक न एक दिन सचखंड पहुँचना तय है।