रूहानी शक्ति हमारी ओर क़दम बढ़ा रही है - राधास्वामी सत्संग ब्यास सत्संग और निबंध डाउन्लोड | प्रिंट

रूहानी शक्ति हमारी ओर क़दम बढ़ा रही है

प्रेरणा ... एक अंदरूनी जज़्बा जो मन और आत्मा को रूहानी शक्ति की ओर ले जाता है; मन और आत्मा अंतर में परमात्मा की तरफ़ खिंचे चले जाते हैं; ... साथ ही, किसी इनसान के शब्दों से या किसी किताब को पढ़ने से आत्मिक बल और हौसला मिलता है।1

एक बार जब हमारे अंदर परमात्मा के लिए तड़प पैदा हो जाती है तब हमारा जीवन और हमारा पूरा वजूद निरंतर गहरे बदलाव और कायापलट की प्रक्रिया से गुज़रने लगता है। संघर्ष कर रही आत्मा के लिए दिव्य सत्ता के कई पहलू हो सकते हैं। पूर्ण सतगुरु से नामदान प्राप्त कर चुके जीवों के लिए शुरुआत में यह सतगुरु का देहस्वरूप होता है जो रूहानी मार्गदर्शक और शिक्षक के रूप में हमें अपने ही भीतर रचयिता की खोज करने की प्रेरणा देता रहता है। हमें प्रेरित करने के लिए वही हमारे आदर्श होते हैं। उनका उपदेश हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन जाता है जो हमारा मार्गदर्शन करता है, हमें प्रेरणा देता है और सही मार्ग पर चलते रहने में हमारी सहायता करता है। सतगुरु का उपदेश, चाहे पुस्तकों के रूप में हो या सत्संग के रूप में, हमारे जीवन को इस प्रकार ढालने लगता है कि धीरे-धीरे रूहानियत हमारे जीवन की सबसे अहम प्राथमिकता बन जाती है।

सतगुरु अकसर माहौल बनाने की अहमियत पर बल देते हैं। सत्संग सुनने से – चाहे सतगुरु वहाँ देहस्वरूप में हों या न हों (वे हमेशा वहाँ मौजूद होते हैं), कोई न कोई सेवा करने से और इस सबसे बढ़कर रूहानी अभ्यास में लगने से उस माहौल को बनाने में मदद मिलती है। ये सभी कार्य हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में भजन-सिमरन का माहौल बनाने में भी मदद करते हैं जिससे दिन-भर सतगुरु के अंग-संग होने का एहसास बढ़ने लगता है।

हमारी आत्मा में परमात्मा की रूहानी मौजूदगी से जो दया-मेहर मिलती है, हमें – जहाँ तक हो सके – उस एहसास के प्रति हमेशा सचेत रहना चाहिए।
वाल्टर हिल्टन, लैडर ऑफ़ परफेक्शन2

अपने अंदर सत्य के प्रति जागरूक हो जाना, उस हक़ीक़त के प्रति सचेत हो जाना, जीवन रूपी उपहार के अमूल्य होने का एहसास हो जाना – ये सब रोज़मर्रा के भजन-सिमरन के फलस्वरूप होने वाले कई अनुभवों में से कुछ एक हैं। सतगुरु की दया-मेहर सूक्ष्म रूप से हमेशा बनी रहती है और यह अपने साथ रूहानी आनंद लेकर आती है जिससे शब्द-गुरु और परमात्मा के लिए हमारी तड़प और ज़्यादा बढ़ जाती है। हमारे मन की तरंगें जो पहले हमें निरंतर बाहर की ओर खींचा करती थीं, उनका रुख़ अंदर की ओर हो जाता है। सतगुरु के सूक्ष्म स्वरूप में हमारे अंग-संग होने का एहसास धीरे-धीरे बढ़ने लगता है। हम बेलाग होकर जीवन जीने लगते हैं और दुनिया के खेल को दर्शक की तरह देखने लग जाते हैं और इसके अधिकतर आकर्षण और प्रलोभन समय के साथ फीके पड़ जाते हैं। हमारे नज़रिए में आश्चर्यजनक बदलाव आने लगता है और अंदर की ओर कशिश धीरे-धीरे बढ़ने लगती है। यह हौमैं और मन की समझ से परे की प्रक्रिया है, शब्द-गुरु ही ये सब कर रहे होते हैं। संत-महात्माओं का उपदेश है कि एक बार जब सतगुरु किसी आत्मा पर नामदान की बख़्शिश कर देते हैं तब वह ख़ुद मल्लाह बनकर उसे नाम रूपी जहाज़ में बिठाकर संसार रूपी भवसागर से पार ले जाते हैं। हमारी ज़िंदगी की बागडोर पूरी तरह से उनके हाथ में होती है और जीवन में लड़खड़ाते हुए, गिरते और उठते हुए हम पूर्ण रूप से उन्हीं का ओट-आसरा लेते हैं। और वे कितने पक्के और सच्चे साथी व दोस्त साबित होते हैं!

सूरज की किरणें एक साथ रोशनी और गर्माहट देती हैं। प्रेरणा भी दया-मेहर की एक किरण है जो हमारे अंदर प्रकाश और उत्साह लाती है: यह प्रकाश हमें दिखाता है कि हमारे लिए क्या अच्छा है; उत्साह उसे पाने की शक्ति देता है। संसार की हर सजीव वस्तु सर्दी की ठंड से सुन्न पड़ जाती है; लेकिन बसंत की गर्माहट के लौटने पर वह फिर से जी उठती है – जानवरों की चाल और ज़्यादा तेज़ हो जाती है, पक्षी उत्साह से चहचहाते हुए ऊँची उड़ान भरने लगते हैं, पौधे भी कलियों और फूलों से लहलहा उठते हैं। प्रेरणा के बिना आत्मा का जीवन भी बेजान, शक्तिहीन और व्यर्थ है। लेकिन जब परमात्मा की प्रेरणा की किरणें हम पर पड़ती हैं तब हमें प्रकाश और जीवन का एहसास होने लगता है – हम जागरूक हो जाते हैं, हमारी इच्छाशक्ति इतनी दृढ़ हो जाती है कि हम मुक्ति प्राप्त करने के लिए जी-जान से जुट जाते हैं।
फ्रांसिस डी सेल्स, लव ऑफ़ गॉड3

सत्संग में “परमात्मा की प्रेरणा की किरणें हम पर पड़ती हैं।” सत्संग हमारे भजन-सिमरन का पूरक है। यह वह जगह है जहाँ न केवल संत-महात्माओं का उपदेश दिया जाता है बल्कि यहाँ हमें सतगुरु की मौजूदगी का एहसास भी होता है। जब हम दिल की गहराई से समझते हैं, जब हमारी प्रेम को जज़्ब कर लेने की क्षमता बढ़ती है, जब हमारे अंदर गहरी तड़प पैदा होती है तब हम सत्संग में मिली प्रेरणा से रूहानी तरक़्क़ी करने लगते हैं। अपने अंदर विरह की तड़प को बनाए रखने के लिए हमें सत्संग के इस ईंधन की ज़रूरत है। यह हमारे अंदर रूहानियत की उस भूख को पैदा करता है जिसके लिए हमारी आत्मा तरसती है। सत्संग में सतगुरु का अपनी संगत के लिए प्रेम झलकता है। सतगुरु की संगत का हिस्सा होना कितना बड़ा वरदान है! सत्संग से हम अपने साथ रूहानियत का ख़ज़ाना लेकर आते हैं जिसका एहसास हमें भजन-सिमरन के ज़रिए अपने अंदर करना है। नियमित रूप से सत्संग सुनने में हमारा अपना ही हित है। हुज़ूर महाराज जी के वचन हैं:

नामदान प्राप्त करनेवाले हर जीव के अंतर में नाम का बीज बोया जाता है, एक न एक दिन वह ज़रूर फलीभूत होगा। हमें यह हिदायत दी जाती है कि नाम या शब्द की इस फ़सल की सुरक्षा करनी है, इस क़ीमती ख़ज़ाने को सँभाल कर रखना है। जिस फ़सल के गिर्द बाड़ नहीं होती, उगती तो वह भी है पर वह ख़तरे से घिरी रहती है और आसानी से बर्बाद हो सकती है। इसलिए जो अनमोल फ़सल हम भजन-सिमरन से पैदा करते हैं, हमें उसके चारों तरफ़ सत्संग, संत-सतगुरुओं और उनके भक्तों की संगति की बाड़ लगानी है।4

कोई रूहानी शक्ति हमें सत्संग की ओर खींचती है। असल में वह रूहानी शक्ति ही हमारी ओर क़दम बढ़ा रही है। सत्संग में हमारे अंदर फिर से नया उत्साह और दृढ़ लगन पैदा होती है जो हमेशा ताज़गी और स्फूर्ति देती है। सतगुरु की रूह हमारी रूह से स्पर्श कर रही है।

सत्संग में संत-सतगुरु रूहानी किरणों द्वारा जीव को नया जीवन प्रदान करते हैं जिसके फलस्वरूप जीव पतँगे की तरह उस प्रकाश के स्रोत पर क़ुर्बान होकर उसमें समा जाते हैं। फिर उनकी अपनी कोई हस्ती नहीं रहती, वे गुरु का ही रूप हो जाते हैं और पूर्ण रूप से उनमें समा जाते हैं।5

पूर्ण सतगुरु से नामदान की प्राप्ति से बड़ा कोई सौभाग्य नहीं है और इसके लिए हम उनके जितने भी शुक्रगुज़ार हों, कम है। सतगुरु के उपदेश पर अमल करके ही हम अपना आभार प्रकट कर सकते हैं। जैसा कि बाबा जी अकसर फ़रमाते हैं – हमें करके दिखाना है। हमें और दया-मेहर की ज़रूरत नहीं है, यह तो पहले से ही भरपूर है। नामदान के समय हमें पाँच नाम का सिमरन दिया गया था और अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम इसकी अहमियत को समझें और इसकी क़द्र करें। इन नामों का सिमरन करना परमात्मा के दरवाज़े पर दस्तक देने जैसा है। ये नाम हमें अंदर शब्द से जोड़ देते हैं और हमें अपने अंदर दिव्य धुन सुनाई देने लग जाती है। जब हम सिमरन की सीढ़ियाँ चढ़ने लगते हैं तो एक अलौकिक आनंद महसूस होने लगता है। जैसा कि बड़े महाराज जी फ़रमाते हैं, “निरंतर सिमरन ही वह सीढ़ी है जिसके ज़रिए कुल-मालिक के महल तक पहुँचा जा सकता है।”6

हम सब का परमात्मा और अपने सतगुरु के साथ एक अनोखा रिश्ता है। हमारे जन्म के समय से – और क्या पता इस जन्म से पहले कितने जन्मों से – सतगुरु हमारी सँभाल कर रहे हैं। हमारा वर्तमान जन्म सबसे अमूल्य जन्म है। हम अपने निज-घर वापस जा रहे हैं। रूहानी शक्ति हमारी ओर क़दम बढ़ा रही है। हम प्रेम के पंखों के सहारे तेज़ी से उसकी ओर बढ़ रहे हैं। सिमरन के रूप में सतगुरु की शक्ति हमेशा हमारे साथ है जो हमारी रक्षा और मार्गदर्शन कर रही है।

सिमरन जितने प्रेम और भरोसे के साथ किया जाये, इसका फल उतना ही अधिक होता है। प्रेम और भरोसे से मालिक के नाम का सिमरन करो। इसकी बड़ी महिमा है। भरोसे के साथ सिमरन करने से आत्मा ख़ुशी से झूम उठती है जिसके फलस्वरूप जीव को शरीर और संसार की सुध-बुध नहीं रहती और उसे मालिक की मौजूदगी का एहसास हो जाता है। परमात्मा के नाम में अपार शक्ति और आनंद है। परमात्मा के नाम का सिमरन करनेवाला अपने अंदर आनंद, शान्ति और आत्मिक शक्ति का अनुभव करता है और वह निहाल हो जाता है।7

  1. A Treasury of Mystic Terms, Volume 12, p. 5
  2. A Treasury of Mystic Terms, Volume 12, p.5.
  3. A Treasury of Mystic Terms, Volume 12, p. 7.
  4. Die to Live, p. 54.
  5. Philosophy of the Masters, Series 1, p. 121.
  6. Philosophy of the Masters, Series I, p. 64.
  7. Philosophy of the Masters, Series 1, pp. 60-61.