हे परमात्मा! मैं तेरा शुक्रगुज़ार हूँ
हम जीवन जीने के इस सहज, प्रेममय और उद्देश्यपूर्ण मार्ग के लिए बहुत शुक्रगुज़ार हैं जिसमें हमारा ध्यान धीरे-धीरे इस दुनिया से हटकर परमात्मा की ओर हो जाता है, हम जागरूक होने लगते हैं और धीरे-धीरे यह जागरूकता बढ़ती जाती है। हम इस जीवन के लिए बहुत आभारी हैं जिसके मिलने पर हमें इस बात का बोध होता है कि हम असल में हैं कौन – एक दिव्य बूँद जो परमात्मा का ही रूप है।
सतगुरु समझाते हैं कि जब हमारा ध्यान तीसरे तिल पर एकाग्र हो जाता है और शरीर व मन पूरी तरह से स्थिर और निर्मल हो जाते हैं तभी हमें अपने भीतर परमात्मा का अनुभव और अपने असल स्वरूप की पहचान होती है। मगर हमारे लिए ध्यान को अंदर एकाग्र करके मन और शरीर को स्थिर करने की कोशिश करना सबसे मुश्किल काम साबित होता है। हमारा ध्यान दुनियावी शक्लों-पदार्थों में इतना तल्लीन है और मन पर इतने अधिक प्रभाव पड़े हुए हैं कि अपनी इच्छाओं पर क़ाबू पाना बड़ा मुश्किल हो जाता है। लेकिन हमारा जन्म इसी मक़सद को पूरा करने के लिए हुआ है।
यही कारण है कि संत-महात्मा हमारे बीच आकर हमें भक्ति का एक ऐसा तरीक़ा समझाते हैं जिसे अपनाने से हमारा ध्यान अंदर की ओर मुड़ जाता है और हमारा शरीर व मन स्थिर और निर्मल हो जाता है। उनके प्यार-भरे मार्गदर्शन और दया-मेहर से हम परमात्मा की पहचान कर सकते हैं। लोटस सूत्र में दिया गया एक दृष्टांत उनके इस दुनिया में आने के मक़सद की व्याख्या करता है:
इस कहानी में महात्मा बुद्ध समझाते हैं कि वह अपने आनंदमय धाम को छोड़कर मनुष्य-शरीर धारण करके इस दुनिया में अपने उस पुत्र की खोज में आए हैं जो अपने पिता और अपने दिव्य स्रोत को भूलकर इस दुनिया में खो गया है। वह इस दुनिया में भटक रहा है, मामूली नौकर की तरह काम कर रहा है और उसकी हालत बड़ी दयनीय है। महात्मा बुद्ध, जिन्हें इस कहानी में एक बहुत अमीर व्यक्ति के रूप में दिखाया गया है, एक साधारण मज़दूर के वेश में अपने पुत्र से मिलने आते हैं और धीरे-धीरे उसका भरोसा जीतकर उसके दिल में अपनी जगह बना लेते हैं।
समय के साथ, उनकी संगति से उसमें भी सभी सद्गुण पैदा होने लगते हैं और अंत में वह उसे अपने भव्य महल में आने के लिए प्रेरित करते हैं। वहाँ पहुँचकर वह आश्चर्यचकित रह जाता है जब उसे पता चलता है कि उसका मज़दूर मित्र कोई और नहीं बल्कि इस महल का मालिक है जो ख़ज़ानों से भरपूर है। उसे यह देखकर और भी हैरानी होती है कि उसका स्वागत उस अमीर व्यक्ति के पुत्र की तरह होता है और वह उस सारे ख़ज़ाने का वारिस है।1
संत-महात्मा हमारे बीच रहकर हमारी तरह अपनी ज़िंदगी गुज़ारते हैं ताकि हम उनसे जुड़ सकें, उन पर भरोसा कर पाएँ और उनके साथ एक प्यार भरा रिश्ता क़ायम कर सकें फलस्वरूप हम उनके उपदेश को समझने के लायक़ बन जाते हैं। ओड्स ऑफ़ सोलोमन में ईसाई धर्म से संबंधित गीत में भी यही संदेश दिया गया है:
मेरी ख़ुशी परमात्मा है, और मैं उसी की तरफ़ बढ़ रहा हूँ:
मेरा यह मार्ग बहुत ख़ूबसूरत है।
क्योंकि परमात्मा तक पहुँचने के लिए मेरे साथ एक मददगार है।
उसने ख़ुद मुझ पर अपना भेद ज़ाहिर किया,
बिना किसी शिकायत के, पूरी दरियादिली से:
क्योंकि अपनी दयालुता में,
उसने अपनी शाही शान को एक तरफ़ रख दिया।
वह मेरी तरह ही बन गया,
ताकि मैं उसे अपना सकूँ।
दिखने में, वह मुझे मेरे जैसा ही लगा,
ताकि मैं उसका रूप बन सकूँ।
और जब मैंने उसकी ओर देखा तो मैं काँपा नहीं,
क्योंकि उसके दिल में मेरे लिए करुणा थी।
वह मुझ जैसा ही बन गया,
ताकि मैं उसे जान सकूँ;
और उसने मेरे जैसा मनुष्य-शरीर धारण कर लिया
ताकि मैं उसके क़रीब आ सकूँ।...
वह, जिसने मुझे बनाया जब मेरा कोई अस्तित्व ही नहीं था,
जानता था कि अस्तित्व में आ जाने पर मैं क्या कर सकता हूँ।
इसलिए अपनी अपार दया-मेहर से
उस (मेरे मददगार) ने मुझ पर दया की,
और मुझे इजाज़त दी कि मैं उससे कुछ माँग सकूँ,
और उसकी (यहाँ आने की) क़ुर्बानी से लाभ उठा सकूँ।2
तिब्बती बौद्ध गुरु पत्रुल रिनपोचे इस बात की पुष्टि करते हुए कहते हैं: “आध्यात्मिक गुरु...सभी बुद्धों के करुणा से भरपूर ज्ञान का साकार रूप होता है जो सिर्फ़ जीवों की मदद करने के लिए आम इनसान के रूप में प्रकट होता है।” वह सतगुरु द्वारा की जानेवाली सहायता का वर्णन करते हुए आगे कहते हैं:
एक मल्लाह की तरह, वह सफलतापूर्वक हमें आत्मज्ञान और मोक्ष के मार्ग पर ले जाता है। अमृत की वर्षा द्वारा वह बुरे कर्मों और बुरी प्रवृत्तियों की अग्नि को शांत कर देता है। सूरज और चाँद की तरह, वह ‘धर्म’ (सत्य) का प्रकाश फैलाता है और अज्ञानता के गहन अंधकार को दूर करता है। धरती की तरह, वह हर तरह की कृतघ्नता और निराशा को धैर्यपूर्वक सहन करता है और वह उदार विचारों व विशाल हृदय वाला होता है। वह कल्पवृक्ष की तरह इस जीवन में हर प्रकार की सहायता और परलोक में हर सुख का स्रोत होता है।3
इससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि सतगुरु दिव्य शक्ति – ‘शब्द’ का ही रूप होते हैं। लेकिन वर्तमान अवस्था में हमारी चेतना इतनी सीमित है कि हम शब्द, परमात्मा से बेख़बर हैं। इसीलिए सतगुरु हमारे बीच देहस्वरूप में आते हैं: हमें समझाने के लिए, हमारा मार्गदर्शन करने के लिए और हमें शब्द और परमात्मा के प्रेम और भक्ति से सराबोर करने के लिए।
देहस्वरूप सतगुरु से प्रेम करने का मक़सद हमारे अंदर ‘शब्द’ के लिये प्यार और भक्ति पैदा करना है। यह उस लक्ष्य को प्राप्त करने का साधन है। हम हमेशा उसी से प्यार कर सकते हैं जो हमारे जैसा हो, हम उससे कभी प्यार नहीं कर सकते जो हमारे जैसा नहीं है।...जब तक हम इस शरीर के दायरे में हैं तब तक हम सतगुरु के देहस्वरूप से ही प्यार करते हैं; जब हम अपने आत्मिक स्वरूप को पहचान लेते हैं तब हम ‘शब्द’ से प्यार करने लगते हैं क्योंकि वही हमारा असल है।...इस तरह देहस्वरूप का यह प्यार ख़ुद-ब-ख़ुद रूहानी प्रेम और भक्ति में बदल जाता है।4
संत-सतगुरु इस संसार में हमारी मदद के लिए आते हैं ताकि हम परमात्मा को पहचान सकें और फिर उनके जैसे बन सकें – पूरी तरह से सचेत और परमात्मा में अभेद। वह हमारा मार्गदर्शन करके हमें ऐसा जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं जो परमात्मा को समर्पित हो। एक महात्मा ने इसे बहुत ख़ूबसूरती से बयान किया है जिसका हवाला पुस्तक ‘द क्लाउड ऑफ़ अननोइंग’ में दिया गया है: “मैं तुम्हारे और परमात्मा के बीच गहरे प्रेम का रूहानी बंधन बाँधने में तुम्हारी मदद करना चाहता हूँ ताकि तुम उसकी रज़ा में रहते हुए उसमें समाकर उसी का रूप बन जाओ।”5
संत-सतगुरु हमें बार-बार समझाते हैं; निस्स्वार्थ प्रेम के कारण वह हमें भजन-सिमरन करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं और संतमत के उसूलों के अनुसार जीवन व्यतीत करने की प्रेरणा देते हैं। हर बार जब हम मार्ग से भटक जाते हैं, वह बड़े प्यार से हमारा मार्गदर्शन करते हैं। वह ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि वह जानते हैं कि हम कौन हैं और हमारे जन्म से पहले ही उन्हें पता होता है कि हम आगे क्या करेंगे और क्यों करेंगे। उन्हें हम पर भरोसा होता है कि हम परमात्मा की पहचान कर सकते हैं। और वह हमें इस बात का एहसास करवाते हैं कि दिव्य प्रेम के इस मार्ग पर वह हमेशा हमारे अंग-संग हैं।
साथ ही, वह हमें हमारी ज़िम्मेदारी के बारे में बार-बार याद दिलाते रहते हैं कि अगर हम जीवन के सार-तत्व की खोज और परमात्मा की पहचान करना चाहते हैं तो हमें इसके लिए ज़रूरी क़दम उठाने पड़ेंगे।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि सतगुरु हम पर दया-मेहर करते हैं, हमारा उचित मार्गदर्शन करते हैं और हमें इस लायक़ बनाते हैं कि हम अपने अंतर में उस दिव्य प्रकाश का अनुभव कर सकें। लेकिन यह हम पर निर्भर करता है कि हम उनके द्वारा दिए गए उपदेश के मुताबिक़ अपने जीवन को ढालकर हर रोज़ भजन-सिमरन करते हुए उनकी दया-मेहर को पाने के लायक़ बने, उस दया-मेहर को अपने अंदर हज़म करके उसकी क़द्र करें। रोज़ाना भजन-सिमरन का अभ्यास किए बिना, सतगुरु के असल स्वरूप – शब्द – पर ध्यान एकाग्र किए बिना हमारे लिए परमात्मा की मौजूदगी को अनुभव कर पाना मुमकिन नहीं। जैसा कि पुस्तक ‘द क्लाउड ऑफ़ अननोइंग’ में कहा गया है: “तुम अच्छी तरह जानते हो कि परमात्मा ही शब्द है और जो कोई उससे मिलाप करना चाहता है उसे शारीरिक स्तर से ऊपर उठकर, शब्द की सच्चाई और गहराई तक पहुँचना होगा।”6
हुज़ूर महाराज जी आगे समझाते हैं:
शब्द या नाम और परमपिता परमात्मा में कोई फ़र्क़ नहीं। शब्द, रचनात्मक शक्ति और परमेश्वर एक ही हैं।...अगर हम अंदर शब्द से जुड़ जाते हैं तो हम परमात्मा से जुड़ जाते हैं।...शब्द की भक्ति ही परमात्मा की भक्ति है।7
भजन-सिमरन द्वारा अपने ध्यान को अंदर की ओर मोड़कर तीसरे तिल पर एकाग्र करने से हम शब्द-रूपी सत्य तक पहुँच सकते हैं जहाँ उसकी मधुर दिव्य ध्वनि गूँजती है और उसका दिव्य प्रकाश जगमगाता है।
जैसा कि पुस्तक फिलोकालिया में कहा गया है:
परमात्मा से जुड़ने और उस दिव्य सत्ता में समाने के लिए सच्चे दिल से की गई प्रार्थना से उत्तम कोई तरीक़ा नहीं है – जब तुम्हारा ध्यान पूरी तरह से परमात्मा में लीन हो जाता है तब तुम्हारी रूह आँसुओं से निर्मल होती है, पश्चाताप से कोमल बनती है और परमात्मा की ज्योति से जगमगा उठती है।8
भजन-सिमरन के ज़रिए निर्मल होकर हमारा कायाकल्प हो जाता है, शब्द हमें विनम्रता और प्रकाश से भरपूर कर देता है। हमारा शरीर और मन स्थिर होने लगता है और आख़िरकार हमें यह एहसास होने लगता है कि हम परमात्मा का ही अंश है। जैसा कि फिलोकालिया में कहा गया है:
जब आत्मा हर तरह के विकारों से पूरी तरह से मुक्त होकर पूर्णता प्राप्त कर लेती है और ‘होली स्पिरिट’ से जुड़कर उसके ज़रिए परमात्मा से मिलाप कर लेती है, तब उस ला-बयान मिलाप द्वारा आत्मा स्वयं भी परमात्मा बनने के क़ाबिल बन जाती है; यह प्रकाश, आनंद, शांति, उल्लास, प्रेम, करुणा, अच्छाई और दया का ही रूप बन जाती है।9
इसीलिए सतगुरु हमें बार-बार समझाते हैं, प्रेरणा देते हैं यहाँ तक कि कई बार हमारे आगे रोज़ाना भजन-सिमरन करने के लिए अर्ज़ भी करते हैं। हमारी कोशिश चाहे कितनी ही मामूली क्यों न लगे, रोज़-रोज़ भजन-सिमरन करना हमारे मन व शरीर को निर्मल और स्थिर करने के लिए ज़रूरी है। अपने आप को हर उस चीज़ से मुक्त करके, जो हमारी चेतना को सीमित करती है, परमात्मा की रज़ा के आगे पूरी तरह से समर्पण करना ज़रूरी है। यही वह तरीक़ा है जिससे हम शब्द में समाकर संत-महात्माओं की तरह प्रकाश-रूप, शब्द-रूप और आनंद-रूप; शांति, प्रेम, विनम्रता, नेकी और दया का रूप बन सकते हैं।
हमें यह सोचकर बहुत अधिक शुक्रगुज़ार होना चाहिए कि यह सब परमात्मा की दया-मेहर ही तो है कि हमें भजन-सिमरन करके अपने रूहानी मक़सद को पूरा करने का मौक़ा मिला है। यह उसकी बख़्शिश ही तो है कि हम परमात्मा से प्रेम करना और उसकी रज़ा में रहना सीख जाते हैं; हमारी सुरत इतनी जागृत हो जाती है कि हमें अपनी वर्तमान अवस्था का एहसास होने लगता है और हम धीरे-धीरे अपने वास्तविक स्वरूप को परमात्मा की बूँद के रूप में अनुभव करने लगते हैं जो परमात्मा के साथ अभेद है।
यह एक बहुत बड़ी दात है कि हमें सतगुरु की मौजूदगी में रहने, उनके प्रेम का अनुभव करने और उनकी मदद से परमात्मा के लिए प्रेम को बढ़ाने और प्रेमपूर्वक समर्पण करने का मौक़ा मिला है।
अपना आभार जताने का एकमात्र तरीक़ा पूरी शिद्दत के साथ अपनी भजन-बंदगी करना और उसकी रज़ा में रहना है, भले ही हमें अपने प्रयास पर्याप्त न लगें या उसकी महानता के सामने बहुत तुच्छ लगें। उसकी दया-मेहर और प्रेम के कारण ही हम इतना भी कर पाए हैं।
पुस्तक एक्ट्स ऑफ़ थॉमस में एक साधक अपने सतगुरु और परमात्मा का आभार प्रकट करते हुए कहता है:
हे परमात्मा, मैं तेरा शुक्रगुज़ार हूँ।...
जिसने मुझे अपना दीदार बख़्शा,
और मेरे सामने मेरे असल स्वरूप को ज़ाहिर किया।
तुमने अपने आप को इतना दीन बना लिया,
कि मुझ जैसे तुच्छ के लिए तुम मेरे स्तर पर आ गए,
ताकि मुझे अपनी शाही शान के लायक़ बना सको,
और अपने में ही अभेद कर सको।
जिसने मुझसे अपना असल (आंतरिक) स्वरूप न छुपाया...
बल्कि मुझे ख़ुद की खोज करने
और यह जानने का मार्ग दिखाया
कि मैं कौन था,
और अब किस अवस्था में हूँ,
ताकि मैं फिर वही बन सकूँ, जो मैं था।
जिसे मैं जानता नहीं था, उसने मुझे खोज निकाला,
जिससे मैं बेख़बर था,
उसने मुझे अपने पास बुलाया।
जिसे मैंने अब पहचान लिया है,
और अब मैं उससे बेख़बर नहीं रह सकता,
जिसका प्रेम मेरे अंदर दहक रहा है,
और उसके बारे में बयान करने के लिए मेरे पास उचित शब्द नहीं है।
मगर मैं जो कह पाया हूँ, वह कम और अपर्याप्त है,
और मैं उससे वह कह पाने के योग्य भी नहीं जो कुछ मैं जानता ही नहीं,
क्योंकि उसके प्रेम के कारण ही मैं इतना भी कह पाया हूँ।10
- The Lotus Sutra, as quoted in Buddhism: Path to Nirvana, p. 175.
- As quoted in The Odes of Solomon, pp. 30, 32.
- As quoted in Buddhism: Path to Nirvana, p. 170.
- Maharaj Charan Singh, Spiritual Perspectives, Vol. III, p. 41.
- The Cloud of Unknowing, as quoted in A Treasury of Mystic Terms, Vol. II, p. 238
- Ibid.
- Maharaj Charan Singh, Light on Saint John, 9th ed., p. 64.
- Philokalia, as quoted in A Treasury of Mystic Terms, Vol. II, p. 239.
- Ibid., p. 240.
- Acts of Thomas, as quoted in The Gospel of Jesus, p. 537.