आइंस्टीन और स्वतंत्र इच्छा - राधास्वामी सत्संग ब्यास सत्संग और निबंध डाउन्लोड | प्रिंट

आइंस्टीन और स्वतंत्र इच्छा

क्या यह दुनिया पूरी तरह से परमात्मा के हुक्म के मुताबिक़ चलती है जैसा कि संत-महात्मा ज़ोर देकर समझाते हैं? अगर ऐसा है तो क्या इसका मतलब यह नहीं हुआ कि हमारी कोई स्वतंत्र इच्छा नहीं है? अगर सब कुछ पहले से ही तय है तो फिर हमें सक्रिय होने या कुछ भी करने की क्या ज़रूरत है? रोज़मर्रा के फ़ैसले लेते समय ऐसे सवाल अकसर उलझन पैदा कर सकते हैं। इस संदर्भ में स्वतंत्र इच्छा और परमात्मा के हुक्म के बारे में अल्बर्ट आइंस्टीन के नज़रिये को समझना मददगार हो सकता है क्योंकि हैरानी की बात यह है कि उनका नज़रिया संत-महात्माओं के उपदेश से मिलता-जुलता है। असल में आइंस्टीन स्वतंत्र इच्छा में विश्वास नहीं रखते थे। उनका कहना था:

मैं स्वतंत्र इच्छा में विश्वास नहीं करता। मुझे शोपेनहावर के ये शब्द जीवन-भर हर हालात में याद रहे हैं: ‘मनुष्य वह कर सकता है जो वह करना चाहता है लेकिन उसने क्या चाहना है यह मनुष्य के बस में नहीं है’ – और ये शब्द मुझे दूसरों के व्यवहार को स्वीकार करने में मदद करते हैं, चाहे उनका व्यवहार मुझे कितनी ही तक़लीफ़ क्यों न दे रहा हो।1

जैसा कि आइंस्टीन शोपेनहावर का हवाला देते हुए समझाते हैं, स्वतंत्र इच्छा की धारणा सिर्फ़ एक भ्रम है – यह हमारी गलतफ़हमी है कि हम जो चाहें, सोचने के लिए आज़ाद हैं। असल में, पहले से ही हमारे मन की एक सोच बन चुकी है और हम उसी सोच के मुताबिक़ कार्य करते हैं और इसीलिए ‘क्या चाहना है यह हमारे बस में नहीं है।’ आइंस्टीन को पूरा यक़ीन था कि हम सब परमात्मा की मर्ज़ी या यूँ कह लें कि उसकी “धुन” पर नाच रहे हैं:

सब कुछ पहले से तय है, आदि भी और अंत भी, ऐसी ताक़तों द्वारा जिन पर हमारा कोई वश नहीं। यह किसी कीड़े-मकोड़े के लिए भी उतना ही तय है जितना कि किसी सितारे के लिए। मनुष्य, वनस्पति या ब्रह्मांड की धूल – हम सब एक रहस्यमय धुन पर नाच रहे हैं जिसे दूर कहीं कोई अदृश्य बाँसुरी बजानेवाला बजा रहा है।2

इस यक़ीन के बावजूद भी आइंस्टीन ने बहुत-से मौक़ों पर अपनी स्वतंत्र इच्छा का इस्तेमाल किया। उदाहरण के तौर पर, जब नाज़ी सत्ता में आ रहे थे तब उनका अपनी जर्मन नागरिकता को छोड़ने का फ़ैसला करना; या जब मुसोलिनी ‘ब्लैकशर्ट्स’ ने सत्ता हथिया ली तब इटली में भौतिक वैज्ञानिकों के एक सम्मेलन का बहिष्कार करना ये दोनों उनके सक्रिय फ़ैसले थे। उन्हें “अदृश्य बाँसुरी बजानेवाले” में दृढ़ विश्वास और अपनी मर्ज़ी से लिए गए इन फ़ैसलों के बीच कोई विरोधाभास नज़र नहीं आया। उनकी विचारधारा के इस तार्किक विरोधाभास को लेखक और नोबेल पुरस्कार विजेता इसाक बशेविस सिंगर ने बड़े रोचक अंदाज़ में पेश किया है:

हमें मान लेना चाहिए कि स्वतंत्र इच्छा होती है। हमारे पास और कोई चारा नहीं है।3

दूसरे शब्दों में, परमात्मा के हुक्म में इनसानों के लिए यह आदेश भी शामिल है कि जिसे हम स्वतंत्र इच्छा मानते हैं हमें उसका प्रयोग भी करना चाहिए। जैसा कि संत-महात्माओं ने समझाया है कि इस अवस्था में (यानी कि जब हम रूहानी तौर पर परिपक्व नहीं हैं) हम उसके रहस्यपूर्ण हुक्म से बेख़बर हैं। रूहानी तौर पर परिपक्व होने और उसके हुक्म को स्वीकार करने के लिए, हमें इसी सोच के साथ कर्म करने चाहिए जैसे कि हमारे पास स्वतंत्र इच्छा है – लेकिन साथ में हमें इस बात को भी सुनिश्चित करना चाहिए कि हमारे फ़ैसले हमेशा हमारे ज़मीर और विवेक के अनुसार हों। जब हम इस नज़रिए के साथ जीवन में आगे बढ़ते हैं – यानी कि सही फ़ैसला लेकर उसी के मुताबिक़ कार्य करना, अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश करना और फिर नतीजे को ख़ुशी-ख़ुशी स्वीकार करना – तो धीरे-धीरे हमारी ‘आत्मा’ या ‘चेतना’ (यानी कि हमारा निर्मल चेतन स्वरूप) जागृत हो जाती है जिसमें हमारे मन की पुरानी सोच को बदलने की शक्ति है। जब हम अपने मन की पुरानी सोच को बदल लेते हैं, सिर्फ़ तभी यह अपने आप को किसी सर्वोच्च शक्ति – जिसे हम परमात्मा, चेतना या आत्मा कह सकते हैं – के सुपुर्द कर सकता है और तभी असल मायने में हमें स्वतंत्र इच्छा प्राप्त होती है जो उस परमात्मा की रज़ा का ही रूप होती है।

गुरु नानक देव जी भी यही फ़रमाते हैं, परमात्मा के हुक्म का असली मतलब ‘सरबत दा भला’ (सभी जीवों का कल्याण) है, यानी कि पूरी सृष्टि का भला, न कि सिर्फ़ कुछेक का। रचना को बनाया ही इस तरह से गया है कि जो पूरी रचना की भलाई के लिए कार्य करते हैं असल में उन्हीं के पास स्वतंत्र इच्छा होती है। जब तक हम उस स्तर पर नहीं पहुँचते, तब तक हम इतने स्वार्थी होते हैं (हमारा दायरा इतना सीमित होता है) कि हम स्वतंत्र इच्छा का सही इस्तेमाल नहीं कर पाते। रूहानी तौर पर परिपक्व होने से पहले, हमें सत्य का पूरा ज्ञान नहीं होता और इसलिए हमारे मन में तरह-तरह के सवाल पैदा होते हैं कि परमात्मा इस रचना को कैसे चला रहा है। लेकिन जैसे-जैसे हमारी आत्मा जागृत होती है, हमारा दायरा खुलने लगता है और हम ज़्यादा से ज़्यादा जीवों की भलाई चाहने लगते हैं और फिर हम ऐसे कर्म करने लग जाते हैं जो ‘सरबत दा भला’ के आदर्श के अधिक अनुरूप होते हैं। इसलिए आइंस्टीन जैसे महान वैज्ञानिक यह सुझाव देते हैं कि हमें अपनी स्वतंत्र इच्छा का प्रयोग केवल कुछ लोगों के लिए नहीं बल्कि सब के कल्याण के लिए करना चाहिए। इस विषय पर उनके कथनों का सारांश इस प्रकार है:

मनुष्यों को लड़ना चाहिए, लेकिन उन्हें सार्थक उद्देश्यों के लिए लड़ना चाहिए, न कि भौगोलिक सीमाओं, जाति-नस्ल के भेदभाव और देश-भक्ति की आड़ में छिपे निजी लालच के लिए। उनके पास आत्मा के अस्त्र-शस्त्र होने चाहिए, न कि गोले-बारूद और टैंक।…
मेरे कुछ भी करने से ब्रह्मांड की संरचना को बदला नहीं जा सकता। लेकिन शायद, अपनी आवाज़ उठाकर, मैं सबसे बड़े उद्देश्य – मनुष्यों के बीच सद्भावना और इस धरती पर शांति – में मदद कर सकता हूँ।4

“आत्मा के अस्त्र-शस्त्र” का मतलब है आत्मा की शक्ति, जोकि शरीर/मन की शक्ति से अलग है। शरीर/मन के स्तर पर हम द्वैत में फँसे रहते हैं लेकिन आत्मा के स्तर पर हम पूरी रचना के साथ एकसुर हो जाते हैं। आइंस्टीन ने बहुत ख़ूबसूरत ढंग से इनसान की परिभाषा दी है कि जीवन का उद्देश्य अपने आपको एक अंश के रूप में देखने के बजाय पूर्ण रूप में देखना है।

इनसान उस ‘पूर्ण’ का एक हिस्सा है जिसे हम ‘ब्रह्मांड’ कहते हैं – एक ऐसा हिस्सा जो समय और स्थान के दायरे में है। वह अपने आपको, अपने विचारों और भावनाओं को बाक़ी सबसे अलग समझता है – यह एक प्रकार से उसका दृष्टि-भ्रम (आँखों का धोखा) है। यह भ्रम हमारे लिए एक जेल की तरह है जो हमें अपनी इच्छाओं और अपने सबसे क़रीबी लोगों के प्यार तक सीमित रखता है। यह हमारा फ़र्ज़ है कि हमारा नज़रिया सभी जीवों और सारी क़ुदरत के लिए करुणा से भरा हो ताकि हम ख़ुद को इस जेल से मुक्त कर सकें। कोई भी इस लक्ष्य को पूरी तरह से हासिल नहीं कर पाता, फिर भी इसके लिए कोशिश करना एक तरह की मुक्ति है और हमारी आस्था की बुनियाद है।5

यह परिभाषा इनसान को उसी तरह से प्रस्तुत करती है जिस तरह संत-महात्मा करते हैं – इनसान असल में रूहानी जीव है जो मानवीय अनुभव से गुज़र रहा है। आइंस्टीन विज्ञान के ज़रिए सत्य की खोज करते हुए इस नतीजे पर पहुँचे। इस तरह उन्हें इस बात का यक़ीन हो गया “कि ब्रह्मांड के नियमों में एक दिव्य चेतना दिखाई देती है – जो मनुष्य की चेतना से बहुत श्रेष्ठ है और जिसके सामने हमें अपनी सीमित शक्ति के साथ अपने तुच्छ होने का एहसास होना चाहिए।”6 ऐसी विनम्रता से उन्हें “एक विशेष प्रकार की धार्मिक भावना का एहसास हुआ जो असल में किसी सीधे-सादे इनसान की धार्मिक मान्यताओं से काफ़ी अलग है।”7 इसी आधार पर वह बुद्धि की सीमाओं को पहचान पाए:

इनसान की बुद्धि, चाहे कितनी ही कुशाग्र क्यों न हो, ब्रह्मांड को पूर्ण रूप से नहीं समझ सकती। इस वक़्त हमारी अवस्था उस छोटे बच्चे जैसी है जो एक बहुत बड़ी लाइब्रेरी में दाख़िल होता है जिसकी दीवारें ज़मीन से छत तक बहुत-सी अलग-अलग भाषाओं की किताबों से भरी हुई हैं। बच्चा यह तो जानता है कि उन किताबों को किसी न किसी ने ज़रूर लिखा होगा पर उसे यह नहीं पता कि इन्हें किसने या कैसे लिखा है। वे किताबें जिन भाषाओं में लिखी गई हैं, बच्चे को उन भाषाओं का ज्ञान नहीं है। बच्चा देखता है कि उन किताबों को एक निश्चित क्रम में रखा गया है, एक ऐसे रहस्यमय क्रम में, जिसे वह पूरी तरह से समझ नहीं पाता, उसे बस थोड़ा-सा अंदाज़ा होता है। मुझे लगता है कि सबसे कुशाग्र बुद्धिवाले और सबसे सभ्य मनुष्य का भी परमात्मा को लेकर यही नज़रिया है।8

इस प्रकार आइंस्टीन भी, संत-महात्माओं की तरह, बुद्धि और आत्मा (या चेतना) के बीच स्पष्ट अंतर कर पाए और उन्हें इस बात का एहसास हुआ कि आत्मा बुद्धि से कहीं श्रेष्ठ है। उन्हें इस बात की भी समझ आ गई कि सच्ची स्वतंत्र इच्छा सिर्फ़ दिव्य चेतना के स्तर पर संभव है, न कि बुद्धि के दायरे में। इससे वह रूहानियत और विज्ञान के बीच गहरे संबंध को पहचान पाए:

सबसे सुंदर और गहरा अनुभव रूहानियत का एहसास है। यही सच्चे विज्ञान की बुनियाद है।9

आइंस्टीन की विज्ञान की खोज और रूहानियत के प्रति उनके झुकाव में गहरा संबंध था। यह संबंध इस मान्यता की उपज था कि तीन आयामों वाली (three dimensional) स्थान (दिक्) और रैखिक समय (काल) की यह दुनिया, सिर्फ़ हमारा “दृष्टि भ्रम” है। उन्होंने महसूस किया कि इस भ्रम को दूर करने का उत्तम तरीक़ा “रूहानियत का एहसास” है। स्वतंत्र इच्छा के बारे में उनके विचारों का आधार उनकी गहरी अंतर्दृष्टि थी।


  1. Einstein 1879-1979: Exhibition. Yehuda Elkana and Adi Ophir, eds. New York: Jewish National and University Library, 1979, p. 48. Recording in Einstein’s own voice can be heard and exact wordings viewed on http://www.einstein-website.de/z_biography/credo.html
  2. Einstein: The Life and Times, Ronald W. Clark. New York: World Publishing Co., 1971, p. 422
  3. “Isaac Bashevis Singer’s Promised City,” City Journal, Summer 1997, https://en.wikiquote.org/wiki/Isaac_Bashevis_Singer
  4. https://www.goodreads.com/quotes/10619827 (Taken from the documentary “Weapons of the Spirit,” this quote may not be an exact rendering of what Einstein said, but nevertheless conveys his views fairly accurately.)
  5. “The Einstein Papers. A Man of Many Parts,” The New York Times, March 29, 1972
  6. Albert Einstein, The Human Side. Princeton: Princeton University Press, 2013, p. 33
  7. Ibid.
  8. Glimpses of the Great, George Sylvester Viereck. New York: The Macauley Co., 1930, pp. 372-73, https://www.asl-associates.com/einsteinquotes.htm
  9. Various sources