रूहानी मुक्ति – एक लंबा खेल
शब्द-मार्गी संत-सतगुरुओं का मक़सद हमें रूहानी अनुभव करवाना नहीं है बल्कि वे चाहते हैं कि हम रूहानी जीवन जिएँ: रूहानी तौर पर हमारी तरक़्क़ी हो और हम अपनी इच्छाओं, मोह-माया और कर्मों के जाल से ऊपर उठें ताकि हम जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो सकें जिसमें हमारी आत्माएँ अनगिनत जन्मों से फँसी हुई हैं।
वे आरज़ी आत्म-ज्ञान पर नहीं बल्कि जन्म-मरण के चक्र से सदा के लिए मुक्त हो जाने पर ज़ोर देते हैं। संत-सतगुरु हमें समझाते हैं कि यह मार्ग सिर्फ़ आवाज़ और प्रकाश के बारे में नहीं है बल्कि यह एक लंबा खेल है। लंबा तो यह होगा ही क्योंकि हम अपने कर्मों की वजह से ही अनंत काल से इस रचना में बार-बार जन्म लेते आ रहे हैं। हमारे कर्म हमें वापस इस रचना में खींच लाते हैं जिनका नतीजा हमें जन्म-दर-जन्म भुगतना पड़ता है।
असल रूहानी तरक़्क़ी तब होती है जब हमारा मन स्थिर हो जाता है, जब हमारे जीवन में बदलाव आता है। उदाहरण के लिए, अगर हम पहले से अधिक शांत, सहनशील और दयालु बनते जा रहे हैं तो यह इस बात का संकेत है कि सतगुरु ऐसा बनने में हमारी मदद कर रहे हैं। संत-महात्मा समझाते हैं कि प्रकाश, धुन, रूहानी नज़ारे – ये सब आत्मा को आकर्षित कर सकते हैं लेकिन मन इनसे मोहित होने की वजह से इन्हें छोड़ने के लिए तैयार नहीं होता और वहीं रुक जाता है। जैसा कि हमें समझाया जाता है कि आत्मा का असल मक़सद इन अनुभवों से ऊपर उठकर परमात्मा के प्रेम में समाना है।
यह कैसे होता है? महाराज चरन सिंह जी संत संवाद, भाग 2 में फ़रमाते हैं:
भजन-सिमरन से हमारा नज़रिया हर एक के लिए बदल जाता है और हम अपने अंतर में उस आनंद और ख़ुशी का अनुभव करते हैं।…भजन-सिमरन हमें अंतर में उस शांति, आनंद और संतोष को पाने में ज़रूर मदद करता है। हम इतनी आसानी से किसी भी बात से परेशान नहीं होते। हम ज़िंदगी में बेफ़िक्र हो जाते हैं और जो भी होता है, उसे परमात्मा की मौज समझकर स्वीकार करते हैं।1
महाराज जी फ़रमाते हैं कि संत-महात्माओं का इस दुनिया में आने का मक़सद “ज़िंदगी के प्रति हमारे नज़रिए और सोच को बदलना है। उनका असली मक़सद हमें इस रचना के मोह से निकालना और उस रचयिता से जोड़ना है।…संत-महात्मा हमें गहरी नींद से जगा देते हैं।…वे हमें उपदेश देने के लिए, ज़िंदगी के प्रति हमारा नज़रिया और सोच बदलने के लिए आते हैं।”2
अंत में, उन्होंने हमें यही समझाया: “सतगुरु का सरोकार सिर्फ़ इस बात से है कि आत्मा को रूहानी तौर पर उन्नत कैसे करना है। वह आत्मा को रूहानी तौर पर उन्नत होने की ताक़त बख़्शते हैं ताकि यह परमात्मा के स्तर तक ऊपर उठ जाए और मन के पंजे से आज़ाद होकर जन्म-मरण के चक्र से छूट जाए।”3
हम धीरे-धीरे बदलाव की प्रक्रिया से गुज़र रहे हैं; हम कर्म-फल के इस स्थूल जगत से निर्मल प्रेम और स्थायी शांति के आंतरिक जगत की ओर बढ़ते जा रहे हैं। इस बदलाव के दौरान जब हमारे अंदर धीरे-धीरे शब्द के लिए प्रेम जागृत हो रहा होता है तब जीवन के प्रति हमारा नज़रिया कैसा होना चाहिए इस बारे में बाबा जी हमें एक बेहतरीन सुझाव देते हैं। आप फ़रमाते हैं कि परमात्मा ने हमें यहाँ सीखने के लिए भेजा है। इस मार्ग पर सीखना ही हमारी रूहानी उन्नति की शुरुआत है।
जिस तरह कुछ भी सीखने के लिए नम्रता और समर्पण की भावना का होना आवश्यक है उसी तरह इस मार्ग पर चलने के लिए भी यह गुण ज़रूरी हैं। शुरू में, जब हम नामदान के लिए अर्ज़ करते हैं तब हम इस बात को स्वीकार कर रहे होते हैं कि हम इस मार्ग से अनजान हैं और रूहानियत के बारे में सीखना चाहते हैं। हम यह मानते हैं कि जिस मार्ग पर हम चलना चाहते हैं उसके लिए हमें किसी ऐसे मार्गदर्शक की ज़रूरत है जो ख़ुद उस मार्ग पर चल चुका है।
हमारा मिलाप जब सतगुरु से हो जाता है तब हम इस मार्ग पर चलने के लिए वचनबद्ध हो जाते हैं और अपनी आत्मा को शब्द में लीन कर देना हमारे जीवन का मक़सद बन जाता है। तब हम रूहानी तौर पर नन्हे शिशु की तरह होते हैं; हमें ज़रा-सा भी अंदाज़ा नहीं होता कि यह काम हमारे सामर्थ्य से बाहर है। लेकिन जल्दी ही हमें अपनी अज्ञानता का एहसास होने लगता है। यक़ीनन यह भी सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा है। जब हमें एहसास होता है कि हम कितना कम जानते हैं और हमारी कोशिशें कभी पर्याप्त नहीं हो सकतीं तब हमारे अंदर विनम्रता आती है।
शायद यह सतगुरु की योजना का हिस्सा हो क्योंकि हमारी रूहानी मुक्ति बहुत लंबा खेल है। महाराज सावन सिंह जी गुरुमत सिद्धांत, भाग 2 में फ़रमाते हैं:
मालिक और उसी के रूप गुरु के दर पर पहुँचो तो केवल उसी के दर के भिखारी होकर पहुँचो। उसको छोड़ और कोई हस्ती ऐसी नहीं जिसके सामने सिर झुकाया जाए। मन-माया के भँवर-जाल में फँसे हुए जीव की प्रार्थना सुननेवाला कोई है तो केवल वही है। केवल वही लोभ और मोह से घायल हृदयों पर मरहम लगा सकता है। टूट चुकी उम्मीदों को केवल वही पूरा कर सकता है। ये सब गुण उस मालिक और उसी के रूप गुरु के अन्दर हैं। वह घायल हृदयों का इलाज अपनी आन्तरिक चेतना की धारा द्वारा करता है।4
बड़े महाराज जी आगे फ़रमाते हैं: “इसलिए शिष्य को गुरु के सामने, चाहे वह पास या दूर कहीं भी हो, सब चतुराइयाँ छोड़कर, तन और मन को अर्पण करके, अपने अन्तर की व्यथा खोलकर रखनी चाहिए।”5
अपने तन-मन को सतगुरु के आगे अर्पण करने का सीधा-सा मतलब उनकी हिदायतों का पालन करना है: हर रोज़ भजन-बंदगी करना; शाकाहारी भोजन करना जिसमें दूध से बनी चीज़ें भी शामिल हैं; मादक पदार्थों, शराब और तंबाकू आदि से दूर रहना; और नैतिक जीवन जीना। यह सब हमें इसलिए नहीं करना है कि हमें शब्द की मधुर आवाज़ को सुनना है या सतगुरु के नूरी स्वरूप के दर्शन करने हैं। इस बात को समझना ज़रूरी है कि इस मार्ग का मक़सद सिर्फ़ रूहानी अनुभव प्राप्त करना नहीं है बल्कि रूहानी जीवन जीना है। फ्रांसीसी दार्शनिक पियरे तेलहार्ड डी शार्दिन के शब्दों में: “हम मनुष्य नहीं हैं जिन्हें रूहानी अनुभव प्राप्त हो रहा है बल्कि हम रूहानी जीव हैं जो मानवीय अनुभव में से गुज़र रहे हैं।”
इस मार्ग पर चलने से पहले सबसे महत्त्वपूर्ण बात अपनी अज्ञानता का एहसास होना है। सर्वोच्च प्रेम की वह शक्ति – शब्द – हमें एक रहस्य की ओर आकर्षित कर रही है। हम अपनी सीमित सोच के दायरे से आगे नहीं देख पाते। जब तक हम कुछ भी – रत्ती-भर भी – नहीं जानते तब तक हमें उस पर भरोसा रखने के लिए कहा जाता है जिसने हमें अपनी पनाह में लिया है। हुज़ूर जी इस भरोसे को अंधेरे में किसी दूसरे का हाथ पकड़कर चलने की कला कहते हैं। यह तो समर्पण की शुरुआत है। एक बच्ची जो यह जानती है कि उसकी माँ बाहर बैठी है, अँधेरे कमरे में अकेली बैठी हुई भी नहीं डरती। इसी तरह, हमें समझाया जाता है कि आत्मा अपने अंदर सतगुरु की मौजूदगी का अनुभव कर सकती है और इसी भरोसे के साथ वह अपने आप को पूरी तरह सतगुरु के सुपुर्द करने लगती है।
बाबा जैमल सिंह जी ने अपने शिष्य महाराज सावन सिंह जी को एक पत्र में लिखा था: “कोई फ़िक्र न करना, सतगुरु शब्द-स्वरूप में हर वक़्त अंग-संग हैं।…वह हर पल हमें अंदर बुला रहे हैं, हमारी सँभाल कर रहे हैं और हम पर दया-मेहर कर रहे हैं।”6
विश्वास वह मचान है जो हमें तब तक सहारा देता है जब तक हमें इस मार्ग के सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव नहीं हो जाता। जैसे एक बच्चा बिलकुल बेफिक्र रहता है क्योंकि वह जानता है कि उसके माता-पिता उसकी सभी ज़रूरतें पूरी कर देंगे। यदि हम अपनी धन-संपदा और बल-बुद्धि के भरोसे रहना छोड़ दें तो हमें बेहद शक्ति, कृतज्ञता और भरोसे का एहसास होगा। कितना ही अच्छा हो यदि हम अपनी ख़ुदी को छोड़ दें, शर्मिंदगी और अपराध-बोध को त्याग दें, असुरक्षा की भावना और डर को निकाल दें और ख़ुद को परमात्मा और सतगुरु के सुपुर्द कर दें बिलकुल उस बच्चे की तरह जो पूरी तरह से अपनी माँ पर निर्भर है।
जैसा कि महाराज जी संतमत दर्शन में फ़रमाते हैं: “सिमरन और भजन से जब हम उस ऊँची हस्ती में विश्वास करने लगते हैं तब हमारा बोझ बँट जाता है और हम हल्का महसूस करने लगते हैं।”7
भरोसा आसानी से डोल जाता है। यह बेहद निजी होता है। अपनी धन-दौलत और बल-बुद्धि के मान को छोड़कर ख़ुद को किसी के हवाले कर देना आसान नहीं होता, फिर सतगुरु के सामने तो यह और भी बड़ी बात है। इसमें पूरा जीवन लग सकता है। हमारी बस यही ज़िम्मेदारी है कि हम अपना भजन-सिमरन करें और एक अच्छे इनसान बनें। इस तरह हम सतगुरु पर भरोसा करने लगते हैं और फिर हमें ख़ुद अनुभव होता है कि वह हमारे लिए क्या कर रहे हैं। आख़िर में, हमारा यही भरोसा प्रेम में बदल जाता है।
जब हमें पता होता है कि हम अकेले नहीं हैं तब हम बहुत कुछ हासिल कर सकते हैं। हम जितना अधिक सतगुरु को अपना सहारा बनाते हैं उतना ही हल्का महसूस करने लगते हैं। हम जितना अधिक भरोसा उन पर करते हैं उतने ही मज़बूत बनते जाते हैं। फिर हम हर तरह के हालात को उनकी मौज समझकर स्वीकार करते हैं और वह कर सकते हैं जिसे करना हमारी ज़िम्मेदारी है: हमारा भजन और सिमरन। यही हमारी रूहानी मुक्ति के लंबे खेल का सार है।
- Spiritual Perspectives, Vol. II, Question 343.
- Ibid., Vol. III, Question 536.
- Ibid., Vol. I, Question 537.
- Philosophy of the Masters, Vol. III, p. 75.
- Ibid.
- Spiritual Letters, p. 50.
- Light on Sant Mat, p. 21