भीतर के प्रकाश को चमकने दो - राधास्वामी सत्संग ब्यास सत्संग और निबंध डाउन्लोड | प्रिंट

भीतर के प्रकाश को चमकने दो

खुरचते रहो, छीलते रहो, काटते रहो,
  उस दीवार को जो रोके हुए है राह तेरी।...
एक पल चैन लिए बिना, आख़िरी साँस तक जुटे रहो।
फ़िज़ूल-सा लगनेवाला प्रयास, सोए रहने से तो बेहतर है,
  क्योंकि परमात्मा को हमारी कोशिश,
  हमारी तड़प और संघर्ष प्यारा है।1

यहाँ रूमी एक गूढ़ सत्य पर प्रकाश डाल रहे हैं कि हमारा मन अहंकार, सांसारिक मोह, इच्छाओं और कर्मों की एक बहुत ही मज़बूत पत्थर की दीवार की तरह है। यह आत्मा के वापस परमात्मा के पास लौटने के मार्ग में बाधा है। मन और अहंकार की इस दीवार को तोड़ने के लिए हमें एक शक्तिशाली रूहानी साधन चाहिए जो सिर्फ़ पूर्ण सतगुरु ही दे सकते हैं – वह है ‘नाम’ की दात। यह साधन ब्रह्मांड की वह रचनात्मक शक्ति है जो पूरी सृष्टि का संचालन करती है। जब हम इस युक्ति द्वारा रोज़ाना पूरी कोशिश और लगन के साथ भजन-सिमरन करते हैं तो हम तीसरे तिल पर पहुँच जाते हैं और उस दीवार को गिराकर रूहानी आनंद, सच्चे प्रेम और शब्द के प्रकाश – अपने सतगुरु के नूरी स्वरूप के दर्शन करते हैं। तब हमें यह एहसास होता है कि हमारी देह ही वह मंदिर है जहाँ परमात्मा, शब्द और हमारी आत्मा तीनों एक साथ मौजूद हैं।

महाराज सावन सिंह जी भी यही फ़रमाते हैं:

शब्द-धुन उस रूहानी समुद्र की लहर है, यह आत्मा उसी समुद्र की एक बूँद है। समुद्र, लहर और बूँद इन सभी का स्वरूप एक समान है। ये तीनों एक ही हैं। अगर आत्मा शब्द-धुन को पकड़ कर उसके पीछे-पीछे जाती है तो यह अपनी मंज़िले-मक़सूद – रूहानी समुद्र में पहुँच सकती है और उस समुद्र में समाकर समुद्र बन सकती है।2

नामदान के समय, सतगुरु अपने नूरी-स्वरूप में हमारे तीसरे तिल पर विराजमान हो जाते हैं और वह हमारी सोच, कथनी और करनी से पूरी तरह वाक़िफ़ होते हैं। वह चाहते हैं कि हम भजन-सिमरन करके तीसरे तिल पर पहुँचकर उनके साथ मिलाप कर लें ताकि हम रूहानी तौर पर जाग्रत होकर उनके साथ रूहानी रिश्ता क़ायम कर सकें। वह जानते हैं कि इस सब के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है और साथ ही वह हमारी निराशा को भी समझते हैं, लेकिन वह यह भी जानते हैं कि हम अपनी रूहानी सफलता के बहुत क़रीब हैं। हम किसी भी पल सफलता प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए वह इस बात पर ज़ोर देते हैं कि हमें हार नहीं माननी चाहिए, भजन-सिमरन करते रहना चाहिए क्योंकि शब्द हमारे अंदर मौजूद है और हम अपनी मंज़िल के क़रीब हैं। महाराज जगत सिंह जी हमें प्रेरणा देते हुए फ़रमाते हैं:

परमात्मा की अपार दया-मेहर से हमें मनुष्य-जन्म मिला है और केवल इसी शरीर में परमात्मा की प्राप्ति हो सकती है। परमेश्वर की दया-मेहर से हमें सतगुरु भी मिल गए हैं और उन्होंने हमें नाम का भेद भी दे दिया है तथा यह दात बख़्शकर वह सदा के लिए हर शिष्य के तीसरे तिल में विराजमान भी हो गए हैं। अब हमारा कर्तव्य है कि हम सतगुरु के उपदेश के अनुसार चलें, सतगुरु से प्रेम बढ़ाएँ और इस तरह स्थायी आनंद प्राप्त कर लें। शब्द से जुड़ने और परमात्मा से मिलाप में ही सच्चा सुख व आनंद है: “सबद सुरत सुख ऊपजै प्रभ रातउ सुख सार॥”3

नीचे दी गई कहानी हमारे भीतर के प्रकाश को प्रकट करने के बारे में है:

एक पिता अपनी सात साल की बेटी को, जो संगीत सीख रही थी, एक मशहूर ओपेरा गायक के चैरिटी कॉन्सर्ट में लेकर गया। कॉन्सर्ट हॉल में, उसने अगली पंक्ति में अपने कुछ दोस्तों को बैठे हुए देखा और वह उनसे मिलने के लिए चला गया। इसी बीच, उसकी बेटी अपनी सीट छोड़कर मंच के पीछे चली गई, इस उत्सुकता में कि मंच के पीछे क्या हो रहा है? जैसे ही हॉल की रोशनी मद्धिम हुई, पिता अपनी सीट पर वापस आया और उसने देखा कि उसकी बेटी अपनी सीट पर नहीं है।

ठीक उसी समय पर्दा ऊपर उठा, मंच रोशनी से जगमगा उठा। पिता अपनी बेटी को माइक्रोफोन के सामने खड़ा देखकर दंग रह गया। उसने बाइबल से प्रेरित “मेरी यह छोटी-सी रोशनी, मैं इसे सदा चमकने दूँगी…” गीत गाना शुरू किया।

उसी पल, मशहूर ओपेरा गायक अपनी शानदार पोशाक पहने मंच पर आए। उन्होंने बच्ची के कान में फुसफुसाकर कहा, “रुकना मत, गाती रहो।” हाथ में हाथ डालकर, उन दोनों ने वह सुंदर गीत गाया जिसकी शुरुआत इन पंक्तियों से होती है, “मेरी यह छोटी-सी रोशनी, मैं इसे सदा चमकने दूँगी…।” जब गीत समाप्त हुआ तब उन्होंने एक-दूसरे की ओर देखा, वे मुस्कुराए और फिर उन्होंने दर्शकों के सामने सिर झुकाया। दर्शकों ने पाँच मिनट तक खड़े होकर उनके लिए तालियाँ बजाईं। जो बात लोगों के दिलों को सबसे ज़्यादा छू गई, वह यह थी कि एक तरफ़ वह छोटी-सी मासूम बच्ची ख़ुशी से गा रही थी और दूसरी तरफ़ गायकी में निपुण मशहूर ओपेरा गायक अपनी दमदार आवाज़ से बच्ची की मासूम आवाज़ को दबाने के बजाय उस बच्ची की आवाज़ में अपने सुर को इस तरह मिला रहे थे मानो दोनों संगीत के प्यार में एक हो गए हों। यह पल सच में जादुई था।

इसी प्रकार, हमारी आत्मा भी हर रोज़ भजन-सिमरन के अभ्यास द्वारा परमात्मा की महिमा गाती है। शब्द-गुरु दया-मेहर करके हमें अपने नूरी स्वरूप में तीसरे तिल पर दर्शन देते हैं और हम उनके साथ रूहानी मार्ग पर आगे बढ़ते हैं। फिर हमारी आत्मा शब्द-गुरु के साथ मिलकर प्रेम और विरह से शब्द को सुनती हुई ख़ुशी-ख़ुशी वापस अपने घर सचखंड पहुँच जाती है।

हमारी आत्मा क्या है? इसका रहस्य इसके नाम में ही छिपा है – S-O-U-L – साउंड ऑफ़ यूनिवर्सल लव यानी सर्वव्यापक प्रेम की ध्वनि। हमारी आत्मा जोकि सर्वव्यापक प्रेम की ध्वनि है परमात्मा रूपी दिव्य सागर की ही बूँद है और ‘नाम’ की अपार रूहानी दौलत – शब्द-धुन – हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, हमारी विरासत है। सतगुरु हमारी इस रूहानी संपदा को हमारी अमानत के रूप में सँभाल कर रखते हैं। लेकिन अब यह हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम संतमत को अपनाकर तन और मन को निर्मल करें ताकि हम इस रूहानी दौलत को प्राप्त करने के लायक़ बन सकें।

सतगुरु की दया-मेहर और अपनी कोशिश से संतमत के अनुसार अपने जीवन को ढालकर हम अपने मन और शरीर को निर्मल करने की नींव रखते हैं। इस जीवन ढंग में चार वायदे शामिल हैं जो हम नामदान के समय करते हैं:

  1. शाकाहारी भोजन को अपनाना जिसमें दूध और दूध से बने पदार्थ भी शामिल हैं। भोजन हमारे जीवन का आधार है लेकिन हम क्या खाएँ, हमें यह फ़ैसला सचेत होकर, दया-भाव से और ज़िम्मेदारी के साथ करना है। हमारा शरीर परमात्मा का जीता-जागता मंदिर है इसलिए हमें अपने शरीर को मरे हुए जानवरों की क़ब्र नहीं बनाना है। इसमें हमारी आत्मा की ही भलाई है क्योंकि शाकाहारी रहकर हम अपने ही कर्मों के बोझ को हल्का रखते हैं।
  2. शराब, मादक पदार्थों और तंबाकू आदि उत्पादों से परहेज़ रखना क्योंकि इन पदार्थों की लत हमारे मन, शरीर और आत्मा को नुकसान पहुँचाती है।
  3. एक अच्छा इंसान बनना। अपने पति या पत्नी के अलावा किसी से भी अनुचित संबंध न रखना। अगर हमारी सोच, कथनी और करनी हमेशा आशावादी है तो समझ लेना चाहिए कि हम अच्छे इंसान बन रहे हैं।
  4. हर रोज़ ढाई घंटे भजन-सिमरन करना।

नामदान के समय सतगुरु द्वारा समझाई गई युक्ति के मुताबिक़ भजन-सिमरन करके अपने सतगुरु के हुक्म का पालन करना ही सतगुरु की सबसे ऊँची सेवा है और यही उनकी ख़ुशी हासिल करने का ज़रिया है। रूमी फ़रमाते हैं:

कुछ रोज़ मशक़्क़त कर, फिर उम्र-भर का सुख मिल जाएगा तुझे।
जब सलामत है सर तेरा, फिर माथे पर पट्टी क्यों बाँधता है तू?
पहले अपनी पूरी जान लगा दे, फिर ख़ुद को उसकी रज़ा पर छोड़ दे।
रख मुकम्मल यक़ीन उस पर और उसके करम पर,
ग़फ़लत में रहना तो है सो जाने जैसा, लुटेरों के बीच।
ग़फ़लत की नींद में है जो परिंदा, उसका हश्र तो यक़ीनन मौत है।
हार मान लेना तो मौत की नींद है। अपने सफ़र में तू यूँ न सो।
कदम बढ़ाता चल ऐ मुसाफ़िर, जब तक यार का दर न आ जाए।4

सोशल मीडिया की सोच “मेरी तरफ़ देखो” वाली है। यह हमारा ध्यान अपनी ओर खींचना चाहता है। आज के कंटेंट क्रिएटर्स हमें मानसिक ‘जंक फूड’ परोस रहे हैं। जिस तरह ‘फास्ट फूड’ हमारी सेहत पर बहुत बुरा असर डालता है, उसी तरह ये मानसिक ‘जंक फूड’ हमारी सोच पर बुरा प्रभाव डाल रहे हैं जिससे हमारी सोच दिखावटी, बनावटी और खोखली होती जा रही है। आज के समय में वीडियो, पॉडकास्ट, सोशल मीडिया पोस्ट हमारे दिमाग़ पर इतना गहरा असर डाल रहे हैं कि ये सब आवाज़ें बनकर हमारे दिमाग़ में गूँजते रहते हैं जिन्हें शांत करना मुश्किल हो जाता है। इसी बीच आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस चुपचाप हमारे सोचने के तरीक़े को ही बदल रही है जिसका असर हमारे फ़ैसलों और हमारी करनी पर पड़ रहा है।

हालाँकि, अगर हम पूर्ण सतगुरु की हिदायत के अनुसार हर रोज़ भजन-सिमरन करें तो हम अपने फैले हुए ख़याल को फिर से समेट सकते हैं। हम अपने मन में से नकारात्मक और फ़ालतू की बातों को बाहर निकालकर स्पष्ट सोच विकसित कर सकते हैं। जब हम ऐसा करने लगते हैं तब एक चमत्कार-सा होता है। जब मन को नाम रूपी अमृत की लज़्ज़त प्राप्त हो जाती है तब यह शांत होने लगता है। इसे भजन-सिमरन में आनंद आने लगता है। यह हमारा दोस्त और साथी बन जाता है। फिर यह ‘कुछ छूट जाने के डर’ की वजह से हमेशा ऑनलाइन रहने के बजाय ऑफ़लाइन रहकर अपने समय का आनंद लेने लग जाता है।

महाराज सावन सिंह जी फ़रमाते हैं:

आपने संदेश भेजने के लिए लिखा है। मेरा यही संदेश है कि आप अपनी शक्ति को इस हद तक विकसित कर लें कि आप अपने ख़याल को जब चाहें, बाहरी पदार्थों और स्थूल शरीर से समेटकर तीसरे तिल में एकाग्र कर लें। आप सूक्ष्म देश में प्रवेश करें, गुरु के नूरी स्वरूप का दर्शन करें, उससे अपना प्रेम बढ़ाएँ, उसे अपना साथी बना लें, शब्द-धुन को पकड़ें, मन के मंडलों को पार करें और अपने अनादि रूहानी धाम सचखण्ड में पहुँच जाएँ, जिससे आपका मन और माया के देशों में भटकना बंद हो जाए। इसे अभी जीते-जी करें। मनुष्य जीवन का यही उद्देश्य है।5

आज की तेज़ रफ़्तार से भाग रही डिजिटल दुनिया में स्मार्टफोन, स्मार्टवॉच, फेसबुक, इंस्टाग्राम, टिकटॉक आदि की वजह से मन हमारा बहुत फ़ायदा उठा रहा है क्योंकि यह हमारी कमज़ोरियों, डर, कमियों और चिंताओं के बारे में अब पहले से भी ज़्यादा जान गया है। जब हम रोज़ाना भजन-सिमरन के लिए बैठते हैं तब मन ‘सेवा से होनेवाली थकान’ महसूस करता है जिससे भजन-सिमरन करने का उत्साह, ख़ुशी, कृतज्ञता और लगन धीरे-धीरे ख़त्म होने लगती है। हमें भजन-सिमरन करने से रोकने के लिए हमारा मन नकारात्मक बातें सोचने लगता है जैसे: “मैं भजन-सिमरन नहीं कर सकता। मुझे नींद आ जाती है। यह बहुत मुश्किल है। मेरी तरक़्क़ी नहीं हो रही है। मुझे इसका कोई नतीजा नज़र नहीं आ रहा है” इत्यादि। मन तो यही चाहता है कि हम बिस्तर पर पड़े रहें, भजन-बंदगी के समय करवट बदलकर फिर से सो जाएँ और इंद्रियों के गुलाम बने रहें। जब ऐसा हो, हमें उस समय सकारात्मक ढंग से ख़ुद को समझाकर भजन-सिमरन करना चाहिए। हमें ख़ुद से यह कहना चाहिए, “भजन-सिमरन चाहे जैसा भी है, अच्छा ही है। उठो, सतगुरु हमारा इंतज़ार कर रहे हैं! अभ्यास करते रहना ही रूहानी तरक़्क़ी है। कोशिश करना मायने रखता है, इसलिए उठो! अपने प्यारे सतगुरु के प्रति अपना आभार व्यक्त करो।”

स्वामी जी महाराज एक उदाहरण द्वारा रोज़ाना रूहानी अभ्यास करने के महत्त्व के बारे में समझाते हैं:

अगर किसी इनसान को, जिसे ठीक से तैरना नहीं आता, डूबते समय तैरने के लिए कहा जाए तो वह डूबेगा ही, तैर नहीं पाएगा। जबकि अगर आप किसी ऐसे व्यक्ति को जिसने बचपन से तैरना सीखा है, नदी में धकेल दें, तो वह डूबेगा नहीं।...जीवन-भर भजन-सिमरन करने का यही मक़सद है कि मौत के समय यह हमें याद रहे। इसलिए भजन-सिमरन का अभ्यास इस तरह करना चाहिए कि चलते-फिरते और बातचीत करते हुए भी यह हमें याद रहे।6

अब एक ऐसा सवाल उठता है जिसका जवाब सिर्फ़ हम ही दे सकते हैं। अपनी मृत्यु के समय क्या हम डूबेंगे या पार उतर जाएँगे? हमें तैयार रहना चाहिए ताकि बाद में हमें तैयारी न करनी पड़े। हम ऐसा तभी कर सकते हैं जब हम हर रोज़ सिमरन और भजन-बंदगी के ज़रिए जीते-जी मरने की कला सीख लेते हैं। फिर मौत के समय हम आसानी से यह शरीर छोड़ सकते हैं।

यहाँ एक और सवाल है। क्या ख़ुशी-ख़ुशी मृत्यु का सामना करना मुमकिन है? इसका जवाब है “हाँ!” अगर हम मृत्यु के लिए पहले से ही तैयार हों तो हम ख़ुशी-ख़ुशी इसका सामना कर सकते हैं। नामदान के समय सतगुरु ने हमें वह युक्ति समझा दी है जिसकी मदद से हमें ख़ुद को हर रोज़ इसके लिए तैयार करना है ताकि जब मौत आए तब हम ख़ुशी-ख़ुशी सहज ही शरीर छोड़ सकें। फिर हम अपने शरीर के बँधनों से आज़ाद होकर, दुनिया की मोह-माया को त्यागकर अपने सतगुरु के साथ ख़ुशी-ख़ुशी निज-घर वापस जा सकते हैं।

इस सरल सत्य को याद रखें। चाहे हम भजन-सिमरन करें या न करें, मृत्यु तो तय है। भजन-सिमरन द्वारा जीते-जी मरने का अभ्यास करके अपने अंदर से हमेशा के लिए मौत का डर निकाल देने में ही हमारी भलाई है। निरंतर सिमरन ही वह कारगर अभ्यास है जिसमें हमें माहिर होना है। क्यों? क्योंकि जो कार्य हम बार-बार करते हैं वही हमारी आदत बन जाता है। जब हम लगातार सिमरन करते हैं तो यह हमारी सोच और करनी के पीछे की प्रेरक शक्ति बन जाता है जिसके प्रभाव से भजन-सिमरन तथा मृत्यु के समय हमारा मन सहज ही एकाग्र हो जाता है।

हमारा जन्म एक बहुत ऊँचे मक़सद को पूरा करने के लिए हुआ है। हमें यह नर-नारायणी देह रूहानी तरक़्क़ी करके उस रूहानी दौलत को प्राप्त करने के लिए बख़्शी गई है जिसे परमात्मा ने पहले से ही हमारे अंदर रखा है। परमात्मा को याद करने के लिए हमें किसी ख़ास समय का इंतज़ार करने की ज़रूरत नहीं है। हमें अपने हर पल, हर क्षण को निरंतर परमात्मा के नाम का सिमरन करते हुए सार्थक बनाना है क्योंकि लगातार सिमरन द्वारा हमारा मिलाप अंदर शब्द-गुरु से हो जाता है।

हमें अपने घर वापस पहुँचने में कितना वक़्त लगता है? इसे समय या दूरी द्वारा नहीं मापा जा सकता। हमारे अंदर प्यार की भावना जितनी प्रबल होती है, उतना ही हम अपनी मंज़िल के क़रीब होते जाते हैं। हमें भजन-सिमरन करते रहना है ताकि हम परमात्मा के प्यार में इस क़द्र खो जाएँ कि अपनी हस्ती ही भूल जाएँ। जब हम पूरी तरह से परमात्मा के प्रेम में लीन हो जाते हैं तब हम उसी के साथ होते हैं।

हमें यह याद रखना चाहिए कि अभी इसी पल ‘शब्द’ यानी परमात्मा का असीम प्रेम हमारे अंदर उमड़ रहा है। वह हमारे अंदर मौजूद है और उसकी आवाज़ हमें बेताबी से घर वापस बुला रही है। अब समय आ गया है कि हम अपने दिल के दरवाज़े खोल दें और परमात्मा की गोद में समा जाएँ। तो आइए, हम सब पूरे प्रेम और भरोसे से सतगुरु के साथ वापस निज-घर लौट चलें – जहाँ हमारी आत्मा जो सर्वव्यापक प्रेम का ही रूप है, सदा के लिए परमात्मा में लीन हो सके।


  1. Living Meditation, p. 48.
  2. Spiritual Gems, Letter 34.
  3. Science of the Soul (Excerpts from Discourses), 11th ed., #11.
  4. Discourses of Rumi, translated by A.J. Arberry. London: John Murray Ltd, 1961.
  5. Spiritual Gems, Letter 89.
  6. Sar Bachan Prose, 11th ed., p. 22.