अदृश्य इनसान
एच. जी. वेल्स द्वारा लिखा गया उपन्यास ‘द इनविज़िबल मैन’ एक ऐसे वैज्ञानिक की काल्पनिक कहानी है जिसने दुनिया की नज़रों से ओझल हो जाने का तरीक़ा तो खोज निकाला था लेकिन बदक़िस्मती से उसे यह नहीं पता था कि अदृश्य कर देनेवाली उस दवा के असर को कैसे पलटना है। इसलिए वह अपने अदृश्य शरीर को लंबे कोट से ढकने लग गया; धूप का चश्मा लगाने लग गया ताकि उसकी आँखों के होने का आभास हो और अपने सिर को आकार देने के लिए टोपी पहनने लग गया। वह अपने चेहरे को कपड़े से लपेट कर रखता था। कईं सालों तक, वह इसी वेश-भूषा में दुनिया में घूमता रहा सिर्फ़ इस सच को छुपाने के लिए कि अगर उसने ये सब उतार दिया तो वह दूसरों के लिए अदृश्य हो जाएगा। जब उसकी मृत्यु हुई तब वह दिखाई देने लग गया।
काफ़ी हद तक हम भी उस अदृश्य आदमी की तरह हैं क्योंकि हम भी अपने जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा दुनिया को ‘अपनी हस्ती’ दिखाने में ही बिता देते हैं। हम अकसर अपनी ज़िंदगी दूसरों को ख़ुश करने, अपने माता-पिता, दोस्तों, बॉस की उम्मीदों को पूरा करने और आमतौर पर दुनिया द्वारा बनाए गए नियमों के मुताबिक़ जीने में ही बिता देते हैं जिस वजह से हमारा ध्यान इस बाहरी दुनिया में ही फँसा रहता है। जिस कसौटी पर हम अपनी और दूसरों की परख करते हैं उसी की वजह से हमारा ध्यान बाहर रहता है। हम ख़ुद को क़ाबिल तभी समझते हैं जब लोग हमें अहमियत देते हैं और हम संसार में कोई उपलब्धि हासिल कर लेते हैं। हम अकसर उस अदृश्य आदमी की तरह दुनिया की नज़रों से ओझल रहते हैं लेकिन इससे भी ज़्यादा अफ़सोस इस बात का है कि हम अपने असल स्वरूप की पहचान किए बिना ही जीवन गुज़ार देते हैं। जब हम अदृश्य होकर जीवन बिताते हैं तो इसका मतलब यह नहीं है कि दुनिया हमें देख पाने में असमर्थ है बल्कि असल अंधापन तो यह है कि हम ख़ुद अपने असल स्वरूप को नहीं देख पा रहे। चाहे हम यह सोचते हैं कि हम जानते हैं कि हम कौन हैं लेकिन फिर भी हमारा असल आंतरिक स्वरूप हमारे द्वारा निभाई जानेवाली भूमिकाओं, आदतों, दुनियावी प्रलोभनों और कर्मों की परतों के नीचे दबा रहता है। मनोवैज्ञानिक कार्ल जंग का यह कथन ख़ुद को न देख पाने की हमारी असमर्थता को संक्षेप में बयान करता है, “आप स्पष्ट रूप से तभी देख पाओगे जब आप अपने दिल के भीतर झाँक सकोगे। जो सिर्फ़ बाहर देखता है, वह सपना देखता है; जो भीतर देखता है, वह जाग जाता है।” कार्ल जंग ने इस विचार को बहुत ख़ूबसूरती से पेश किया है कि सच्ची आत्म-जागरूकता और सूझ दूसरों से मान्यता पाने या बाहरी चीज़ों के ज्ञान से नहीं आती, बल्कि आत्म-निरीक्षण करने से आती है। जन्म-जन्मांतर से, हमने अपने ऊपर अज्ञानता और मलिनता की ऐसी परतें जमा कर ली हैं कि हमें यह भी याद नहीं रहा कि हम कौन हैं, हम कहाँ से आए हैं या यहाँ क्यों आए हैं? हमने अपने चारों ओर एक ऐसी मज़बूत दीवार बना ली है जिसे भेद पाना लगभग नामुमकिन है।
यह सब कैसे हुआ?
बाबा जैमल सिंह जी ने स्पिरिचुअल लैटर्स में इसे बहुत ही ख़ूबसूरती से बयान किया है:
जिस दिन यह जीवात्मा यानी सुरत सचखंड से, शब्द-धुन से अलग हुई है, उसी दिन से इसका सतपुरुष और शब्द-धुन से संबंध टूट गया है। शब्द-धुन इसकी हर वक़्त सँभाल करती है, पर सुरत यह नहीं जानती, क्योंकि मन, माया और माया के सामान और इंद्रियाँ जो धोखेबाज़ हैं, इनके साथ इसकी बहुत-बहुत गाढ़ी मुहब्बत और प्रीत हो गई है।1
जैसा कि आपने फ़रमाया: दुनिया से तंग आने पर भी, मन के उचाट होने पर भी, अकेलेपन और जुदाई का एहसास होने पर भी माया और इंद्रियों के जाल में फँसकर हम दुनिया में इस तरह विचरण कर रहे हैं मानो हम यहीं के ही हों।
महाराज चरन सिंह जी स्पिरिचुअल पर्सपेक्टिव्स में फ़रमाते हैं:
जब तक आप आत्मा को अपने मूल स्रोत की ओर नहीं जाने देते, आप अपने अकेलेपन से छुटकारा नहीं पा सकते। चाहे सारी दुनिया आपके हुक्म के मुताबिक़ चले, लेकिन फिर भी आप इस अकेलेपन से छुटकारा नहीं पा सकते।…कुछ भी आपका अपना नहीं है।…क्योंकि आत्मा के अंदर अपने स्रोत में समाने के लिए हमेशा तड़प बनी रहती है। इस अकेलेपन के एहसास से हम तब तक छुटकारा नहीं पा सकते, जब तक हमारी आत्मा वापस अपने स्रोत में समा नहीं जाती।…अगर यह अकेलापन न हो, आत्मा की अपने मूल स्रोत की तरफ़ कशिश न हो, तो कभी कोई परमात्मा की तलाश नहीं करेगा।2
परमात्मा की दया-मेहर से जब हमें इस बात का एहसास हो जाता है कि कोई भी दुनियावी चीज़ हमारे दिल के ख़ालीपन को नहीं भर सकती तब हमारी आत्मा को बोध होने लगता है कि वह कभी उस परमात्मा में अभेद थी। हो सकता है कि हमारे पास दुनिया की हर चीज़ हो लेकिन फिर भी इस ख़ालीपन का एहसास नहीं जाता। महाराज चरन सिंह जी समझाते हैं: “इस (अकेलेपन के) एहसास से हम तब तक छुटकारा नहीं पा सकते जब तक हमारी आत्मा वापस अपने स्रोत में समा नहीं जाती। यही विधि का विधान है।”3
जब हमें यह समझ आने लगती है कि यह मायामय दुनिया हमारी असलियत नहीं है तब हमारे अंदर ये सवाल उठने लगते हैं कि हम कौन हैं? और हम यहाँ किस लिए आए हैं? इन सवालों का सरल-सा जवाब है:
हमारा इस संसार में आने का एक ही उद्देश्य है – अपने घर लौटकर फिर से शब्द में समा जाना। महाराज जी फ़रमाते हैं कि अपने घर लौट जाना ही “मनुष्य का एकमात्र कर्तव्य है क्योंकि केवल मनुष्य के जामे में ही हम उस मार्ग पर चलकर अपनी मंज़िल तक पहुँच सकते हैं, अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं।” सिवाए इसके कोई भी मक़सद नहीं है। दुनिया के जिस कोलाहल – बाहरी सफ़र – को हमने इतनी गंभीरता से लिया हुआ है वह सिर्फ़ हमारे पूरे सफ़र का एक पड़ाव है और जल्द ही यह सफ़र ख़त्म हो जाएगा। यह सब कैसे होता है, आंतरिक बदलाव की पूरी प्रक्रिया की तरह यह भी एक रहस्य ही है।
प्राचीन यूनानी दार्शनिक प्लॉटिनस समझाते हैं कि किस तरह एक इनसान अपनी सीमित पहचान को असीमित पहचान में और कर्म व समय से बँधी चेतना को अनंत चेतना में बदल सकता है:
जीवात्मा कभी भी अपने असल स्वरूप से अलग नहीं होती क्योंकि वह स्वरूप दिव्य चिंतन में मौजूद रहता है। यह सच्चा स्वरूप – जो परमात्मा में विद्यमान है – हमारे अंदर ही है। कुछ विशेष अनुभवों के दौरान जब हमारी चेतना का स्तर ऊँचा हो जाता है तब हमें उस सच्चे स्वरूप की पहचान होती है। तब हम अपने अमर-अविनाशी स्वरूप की अकथनीय सुंदरता को देखकर आश्चर्यचकित रह जाते हैं… ख़ुशक़िस्मती से प्राप्त ऐसे अनुभव द्वारा हमें एहसास होता है कि हम अपने वास्तविक स्वरूप से न तो कभी अलग थे और न ही कभी हो सकते हैं। हम सदा से परमात्मा में समाए हुए हैं।4
हमें इस बात का एहसास कैसे होता है? जब धर्मों की खोज करने, धर्म-ग्रंथों को पढ़ने, समाज-सेवा इत्यादि के बाद परमात्मा की दया-मेहर से हमें नामदान की बख़्शिश हो जाती है तब हम नई दिशा में क़दम बढ़ाते हैं। यह मार्ग बौद्धिक रूप से यह समझने में हमारी मदद करता है कि हमारे रूहानी जीवन के लिए क्या अहम है और क्या नहीं क्योंकि इनसान के लिए हर चीज़ को सही नज़रिए से देखना इतना आसान या स्वाभाविक नहीं होता। इसका मतलब यह है कि हमें अपने अहं को एक तरफ़ रखना पड़ता है। अंतर्मुख होना अब हमारा स्वभाव नहीं रहा। महाराज चरन सिंह जी फ़रमाते हैं, “अभी हम परमात्मा की भक्ति भी मन की मर्ज़ी के मुताबिक़ करते हैं। लेकिन जब हमें अपने असल स्वरूप की पहचान हो जाती है तब हम सच्ची अंतर्मुख भक्ति में लग जाते हैं, हमारे अंदर परमात्मा के लिए सच्चा प्रेम और सच्चा भरोसा पैदा हो जाता है। यही सच्चा प्रेम और भरोसा हमें वापस परमात्मा के पास पहुँचा सकता है।”5 मगर हमें किसी भी तरह अपने रुख़ को मोड़ना होगा।
नामदान मिल जाना घर वापसी के सफ़र का अंत नहीं बल्कि शुरुआत है। इस सफ़र में सतगुरु और भजन-सिमरन ही हमारे सबसे अहम और सच्चे साथी हैं जिनके ज़रिए हमें इस बात का एहसास होता है कि जिस सच की हमें तलाश थी वह हमारे अंदर ही मौजूद था। इस सफ़र की शुरुआत से पहले हम उस अदृश्य इनसान की तरह, अपने वास्तविक स्वरूप से अनजान रोज़मर्रा की ज़िंदगी की उलझनों में खोए हुए थे और ‘दिखाई देने’ के लिए एक के बाद एक सांसारिक मोह-माया की परतें चढ़ाते जा रहे थे। अंतर की आवाज़ पुस्तक में लिखा है, “जिसे हम अलग व्यक्तित्व या अस्तित्व कहते हैं, वह सिर्फ़ एक भ्रम है। यह भ्रम हमारी आत्मा के उस नश्वर शरीर में क़ैद हो जाने से उत्पन्न हुआ है जिसके पैरों में अहं भाव की बेड़ियाँ पड़ी हुई हैं। अपने झूठे अस्तित्व से चिपके रहने के कारण असल में हमने ख़ुद को अपने असली अस्तित्व और सर्वव्यापक शक्ति से दूर किया हुआ है।”6
जैसा कि बाबा जैमल सिंह जी ने फ़रमाया, “जिस दिन यह जीवात्मा यानी सुरत सचखंड से, शब्द-धुन से अलग हुई है, उसी दिन से इसका सतपुरुष और शब्द-धुन से संबंध टूट गया है।” और कई तरह से उस जुदाई का एहसास आज भी हमारे अंदर बना हुआ है। अपने मूल से अलग होकर हम भटक रहे हैं। संसार के आवरणों ने हमारी अंतरात्मा की रोशनी को धुंधला कर दिया है। लेकिन अब सतगुरु भजन-सिमरन की दात देकर उस पुरानी दूरी को मिटाने और हमारे अंदर फिर से वह भरोसा जगाने के लिए हमारा मार्गदर्शन कर रहे हैं। भजन-सिमरन वह अभ्यास है जो हमें अपने मूल से जुड़ने, मन को स्थिर करने और धीरे-धीरे हमारी आत्मा और परमात्मा के रिश्ते को फिर से जोड़ने में मदद करता है। नियमित अभ्यास से मायारूपी भ्रम और हमारी झूठी हस्ती समाप्त होने लगती है और आत्मा को निज-घर याद आने लगता है। ऐसा नहीं है कि इस रास्ते में चुनौतियाँ नहीं हैं – ऐसे पल भी आते हैं जब संदेह होता है, हम ख़ुद को खोया हुआ पाते हैं और यहाँ तक कि जो भीतर मौजूद है उससे भी डर लगता है। लेकिन जैसे-जैसे हम दृढ़तापूवर्क अभ्यास करते हैं, हम रूहानी तौर पर अधिक जाग्रत होते जाते हैं। हमें यह एहसास होने लगता है कि हमारा इस रास्ते पर चलना ही परमात्मा की ओर लौटना है, जुदाई को मिटाना है और उस भरोसे को फिर से पाना है जो कभी खो गया था। यह मार्ग कुछ नया बनने, कोई नई पहचान बनाने या नया रुतबा हासिल करने के बारे में नहीं है और न ही हमें साधु-संन्यासियों जैसी वेशभूषा पहनने या किसी नए साहसिक कार्य को करने के लिए अपना शहर या घर-बार छोड़ने की ज़रूरत है। इस मार्ग का मक़सद उस सत्य को प्रकट करना है जो हमेशा से हमारे भीतर ही है।
जिस रहस्यमय सफ़र पर हम निकले हैं उसका सत्य तभी ज़ाहिर होता है, जब हम भजन-सिमरन करते हैं। फिर हम इस दुनिया में रहते ज़रूर हैं लेकिन इस दुनिया के बनकर नहीं रहते। अब हम सांसारिक आवरणों को छोड़कर अपने असल रूहानी स्वरूप की पहचान के सफ़र पर निकल पड़े हैं और इस सफ़र को पूरा करने के लिए हमें पूरी तरह से सशक्त कर दिया गया है। हम उस रहस्यमय मार्ग पर चल रहे हैं जो हमारी कल्पना या उम्मीद से परे है; इसका संबंध न अतीत से है, न भविष्य से; यह वर्तमान में, इस पल में जीने का सफ़र है, जिसमें हम अपनी झूठी हस्ती को छोड़कर अपनी असल हस्ती को पहचानने की ओर सहजता से बढ़ रहे हैं।
संतमत के साधक होने के नाते यह हमारी ख़ुशक़िस्मती है कि हमें मौजूदा सतगुरु की दया-मेहर से सीधा और सरल मार्ग मिला है जिसमें वह हर क़दम पर हमारे अंग-संग हैं।
चाहे हम अपने लक्ष्य पर पहुँचने का कितनी भी बार हिसाब-किताब क्यों न लगा लें, हमारी मंज़िल तो फिर भी निज-घर ही है जो पहले से ही हमारे अंदर है। “जब हमें अपने असल स्वरूप की पहचान हो जाती है तब हम सच्ची अंतर्मुख भक्ति में लग जाते हैं, हमारे अंदर परमात्मा के लिए सच्चा प्रेम और सच्चा भरोसा पैदा हो जाता है।”
यही अपने सतगुरु के साथ किए हुए वायदे को पूरा करना है। बाबा जैमल सिंह जी फ़रमाते हैं— “शब्द-धुन आपको पुकारती है कि अपने घर सचखंड आओ।”7
- Spiritual Letters, #78.
- Spiritual Perspectives, p.347.
- Spiritual Perspectives, p. 349.
- Hadot, Plotinus, or The Simplicity of Vision, p. 27.
- Maharaj Charan Singh, Spiritual Perspectives, Vol. I, p. 212.
- Inner Voice, p. 34.
- Spiritual Letters, #78.