हमारे भीतर के साँप - राधास्वामी सत्संग ब्यास सत्संग और निबंध डाउन्लोड | प्रिंट

हमारे भीतर के साँप

बेक़सूर लोगों को इतने भारी दु:ख क्यों सहने पड़ते हैं? हाल ही में, किसी ने सतगुरु से अपने एक रिश्तेदार के बारे में पूछा जिन्होंने सत्तर वर्षों तक बहुत अच्छा नैतिक जीवन बिताया था। वह रोज़ नियम से भजन-सिमरन भी किया करते थे। फिर भी उन्हें कई तरह की गंभीर शारीरिक और मानसिक समस्याओं का सामना करना पड़ा जिससे उनके परिवार के लोगों को परमात्मा के प्रेम-रूप और दयालु होने पर संदेह होने लगा था। सतगुरु ने उत्तर देते हुए समझाया कि हम तस्वीर का सिर्फ़ एक हिस्सा देख पाते हैं, पूरी तस्वीर नहीं। हाँ, उन सत्तर वर्षों में उन्होंने वाक़ई बहुत अच्छा जीवन जिया होगा – लेकिन पिछले जन्मों में उनके द्वारा किए हुए कर्मों का क्या? हम उन कर्मों को नहीं देख सकते क्योंकि हमें किसी भी जीव के जन्म-जन्मांतर से इकट्ठे किए हुए कर्म और उनका परिणाम दिखाई नहीं देता। इसके लिए हमें अपने ‘अंदर’ जाना होगा, जहाँ कर्मों का पूरा हिसाब सामने आ जाता है। जब तक हम सिर्फ़ बुद्धि के स्तर पर ऐसे सवालों के जवाब ढूँढ़ने की कोशिश करेंगे, तब तक हम इन्हें कभी भी समझ नहीं पाएँगे।

फिर भी, संत-महात्मा हमें संकेतों के ज़रिए इन सवालों के जवाब देते हैं। मिसाल के तौर पर जलाल अल-दीन रूमी द्वारा लिखी एक सुंदर कहानी इस प्रकार है: एक मुसाफ़िर रेगिस्तान में सफ़र कर रहा था। दोपहर का भरपेट भोजन करने के बाद उसे नींद सताने लगी, इसलिए उसने एक विशाल पेड़ के नीचे झपकी लेने का फ़ैसला किया। जब वह चैन की नींद सो रहा था तभी उसकी टाँग पर एक ज़ोरदार प्रहार हुआ जिससे अचानक उसकी नींद खुल गई। वह दर्द से कराहता हुआ उठा और उसने देखा कि एक घुड़सवार ने उस पर डंडे से प्रहार किया था। “अरे, तुमने ऐसा क्यों किया?” मुसाफ़िर ने घुड़सवार से सवाल किया। घुड़सवार ने जवाब में एक बार फिर से डंडे से प्रहार किया। मुसाफ़िर को पूरा यक़ीन था कि उसने इस घुड़सवार को पहले कभी नहीं देखा और न ही उसका इससे कभी कोई वास्ता रहा था। बिना किसी गलती के इस तरह बार-बार पीटे जाने पर उसे बहुत गुस्सा आया। उसने घुड़सवार को गालियाँ देना शुरू कर दिया, उसकी हर गाली पर घुड़सवार ने उस पर और भी ज़ोरदार प्रहार किया।

यह सोचकर कि शायद घुड़सवार उसे पेड़ की ठंडी छाँव से उठाना चाहता है, मुसाफ़िर रेगिस्तान की धूप में चला गया। लेकिन, वह तब और भी चिढ़ गया, जब घुड़सवार भी उसके पीछे-पीछे वहाँ पहुँच गया और उस पर डंडे बरसाता रहा। “सुनो, तुम मुझे इस तरह क्यों मार रहे हो?” मुसाफ़िर ने पूछा लेकिन जवाब में घुड़सवार ने उसे एक और डंडा मारा। अब उस मुसाफ़िर की समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था, उसने वहाँ से भागने का फ़ैसला किया। मगर घुड़सवार ने तब भी उसका पीछा नहीं छोड़ा और वह उसे डंडे मारता ही रहा। मुसाफ़िर अपनी पूरी ताक़त लगाकर और तेज़ी से भागने लगा, घुड़सवार ने फिर भी उसका पीछा करना न छोड़ा। आख़िरकार, मुसाफ़िर की साँसें फूल गईं और उसकी हिम्मत जवाब दे गई। वह अधमरा होकर ज़मीन पर गिर पड़ा और पेड़ के नीचे लेटने से पहले उसने जो स्वादिष्ट भोजन खाया था, वह सब उल्टी आने से बाहर निकल गया। जैसे ही उसने उल्टी की, उसने देखा कि उल्टी के साथ एक छोटा लेकिन बेहद जहरीला साँप उसके अंदर से बाहर निकला था। ज़ाहिर है कि साँप उसके पेट में तब घुसा होगा, जब वह मुँह खोलकर गहरी नींद में खर्राटे ले रहा था।

यह देखकर उसे एहसास हुआ कि घुड़सवार उस पर अत्याचार नहीं कर रहा था बल्कि उसका भला कर रहा था। वह घुड़सवार के पैरों पर गिर पड़ा और बोला, “आपने मुझ पर इतना बड़ा उपकार किया है कि उसके लिए मैं आपका जितना भी शुक्रिया अदा करूँ, कम है। लेकिन जब मैं आपसे बार-बार पूछ रहा था तब आपने मुझे मारने की वजह क्यों नहीं बताई? अगर आपने मुझे बस इतना बता दिया होता तो भागने के बजाय मैं ख़ुशी-ख़ुशी आपका सहयोग करता और शायद वह साँप और जल्दी बाहर निकल आता।”

घुड़सवार ने जवाब दिया, “जब तुम पेड़ के नीचे थे, अगर मैं तब तुम्हें यह बता देता कि एक बेहद जहरीला साँप तुम्हारे शरीर में घुस गया है तो तुम डर के मारे वहीं मर जाते। तुम्हें ज़्यादा नुकसान न पहुँचाकर इस साँप को बाहर निकालने का मेरे पास बस यही एकमात्र रास्ता था।”

​हममें से हरेक इंसान के अंदर एक जहरीला साँप मौजूद है, एक नहीं बल्कि अनेक। हर तरह की नकारात्मक प्रवृत्तियाँ हमारे भीतर की अच्छाई को धीरे-धीरे ख़त्म करती रहती है जिससे हम सार्थक और संपूर्ण जीवन जीने से वंचित रह जाते हैं। मौलाना रूम की यह कहानी जिस साँप की तरफ़ संकेत कर रही है, वह है हमारे अंदर का अहंकार। यह अंहकार उन सभी विकारों की जड़ है जो परमात्मा से हमारा मिलाप नहीं होने देते और पूर्णता की प्राप्ति में रुकावट हैं। ये सभी विकार एक पौधे की टहनियों की तरह हैं जिसकी जड़ अहंकार है। अगर अहंकार यानी ‘मैं-मेरी’ का भाव ख़त्म हो जाए तो बाक़ी सभी विकार (जैसे काम, क्रोध, लोभ और घमंड) अपने आप समाप्त हो जाते हैं।

रूमी की कहानी का वह घुड़सवार कर्म और फल के सिद्धांत का प्रतीक है जो सृष्टि का संचालन करता है। जब तक हम विकारों के वश में होकर द्वैत में फँसे हैं तब तक कर्म और फल का यह सिद्धांत हमें अपने डंडे से पीटता ही रहेगा। अगर हमें इस बात का एहसास हो जाए कि किस प्रकार ये विकार हमारी आत्मा को नुकसान पहुँचा कर रहे हैं तो हमें यक़ीन नहीं होगा। अगर हम अपने वजूद की गहराई में छिपी स्वार्थ की घिनौनी प्रवृत्तियों को देख ले तो हम ख़ुद का सामना नहीं कर पाएँगे। हमें दुनिया में जो भी अन्याय या दु:ख दिखाई देता है, वह सच की पूरी तस्वीर का एक छोटा-सा भाग है। अपराध और अन्याय के शिकार लोग हमें बेक़सूर लग सकते हैं क्योंकि उन्होंने अपने इस छोटे-से जीवन-काल में ऐसा कुछ भी नहीं किया होता जिससे उनकी आत्मा मलिन हो। हमारी सत्तर-अस्सी साल की यह ज़िंदगी इस पूर्ण ब्रह्मांड के अस्तित्व में आने से लेकर अब तक के लंबे अरसे की तुलना में एक पलक झपकने के बराबर है। कुछ ऋषि-मुनियों के अनुसार, आंतरिक जगत (जिसे ‘ब्रह्म लोक’ कहते हैं) का एक दिन इनसान के समय के हिसाब से 4.32 अरब साल के बराबर होता है।

जब परमात्मा हमारी ओर देखता है तब वह हमारे पूर्व जन्मों के सभी कर्मों को देखता है, न कि हमारी तरह सिर्फ़ इसी जन्म को। वह उन्हीं लोगों को चुनता है जो अपने भीतर के जहरीले साँप को बाहर निकालने के लिए तैयार होते हैं और वह उन्हें जीवन में बार-बार दु:ख और तकलीफ़ देकर कर्मों का भुगतान करवाता है। असल में, परमात्मा कर्म और फल के इस सिद्धांत के ज़रिए उन जीवों को निर्मल कर रहा होता है। यह सिद्धांत और कुछ नहीं बल्कि परमात्मा के प्रेम का ही एक रूप है। चूँकि हम प्रेम और कर्म के इन नियमों की कार्यशीलता को समझ नहीं पाते, इसलिए हमें पीड़ितों पर दया आती है और ज़ुल्म करने वालों पर गुस्सा। हमारा ऐसा महसूस करना क़ुदरती है क्योंकि हमारे अंदर कर्म के इस पूरे चक्र को एक साथ देख पाने का सामर्थ्य नहीं है।

अपने सीमित सामर्थ्य के कारण, हम ज़्यादा से ज़्यादा बस यही कर सकते हैं कि हम पीड़ितों की मदद धैर्य और निष्काम-भाव से करें। इससे भी ज़्यादा अहम बात है कि हम ख़ुद को यह याद दिलाते रहें कि यदि पूर्णता के नज़रिए से देखें तो इस रचना में होनेवाले हर घटनाक्रम का मूल उद्देश्य एक ही है – इस सृष्टि को ‘मैं-मेरी’ की सीमित भावना से न देखना यानी अहंकार को दूर करना (जो सभी साँपों की जननी है)।

इस नज़रिए से देखें तो जब हम सजग नहीं रहते तब ये साँप चुपके से हमारे भीतर प्रवेश कर जाते हैं, वैसे ही जैसे रूमी ने घुड़सवार और साँप की कहानी में बताया है। कोई भी किए हुए कर्मों से बच नहीं सकता। हमारा हर एक कर्म हमारे अंतर की गहराइयों में अपना प्रभाव छोड़ जाता है और उसका परिणाम तय होता है जो उस घुड़सवार के डंडों के प्रहार की तरह किसी न किसी रूप में सामने ज़रूर आता है। ये प्रहार भले ही हमें कड़ी परीक्षा की तरह लगें मगर जब हम दुनियावी नज़रिए के बजाय रूहानी नज़रिए से देखते हैं तब हमें समझ आता है कि ये हमारे भले के लिए ज़रूरी हैं। ये कर्मों के सिद्धांत की अटलता को दर्शाते हैं जो इस संसार की हर एक घटना का कारण है जिसे हम अपनी सीमित बुद्धि से पूरी तरह नहीं समझ पाते। यह दुनिया हमारे लिए एक कक्षा की तरह है जिसमें हमें जन्म-जन्मांतर से अपने अंदर घुसे इन साँपों को बाहर निकालने के बारे में सिखाया जाता है (जो कि कई बार हमें कठिन सबक़ की तरह लगता है।) इस तरह हम अपनी सीमित बुद्धि से ऊपर उठ जाते हैं और निर्मल होकर उस पूर्ण परमात्मा में समाने के क़ाबिल बन जाते हैं।