फसल तैयार है
1960 और 70 के दशक में आध्यात्मिकता पर दो पुस्तकें: परमहंस योगानंद जी की ‘ऑटोबायोग्राफ़ी ऑफ़ ए योगी’ और बेर्ड स्पॉल्डिंग की ‘लाइफ़ एंड टीचिंग ऑफ़ द मास्टर्स ऑफ़ द फार ईस्ट’ बहुत लोकप्रिय थीं। हमने कभी सोचा भी नहीं था कि भारत से कोई संत-सतगुरु पश्चिमी देशों में आएँगे। हुज़ूर महाराज चरन सिंह जी के हमारे देश में आने पर हमारी रूहानियत की प्यास तो शांत हुई ही पर जब हम उनसे निजी तौर पर मिले तो हमारे भीतर की तड़प और भी गहरी हो गई। कहते हैं कि सतगुरु की एक मेहर-भरी दृष्टि आत्मा को चिताने के लिए काफ़ी होती है। हम बहुत ज़्यादा ख़ुशक़िस्मत रहे कि सतगुरु की वह मेहर-भरी दृष्टि हम पर पड़ी। यह मुलाक़ात हमारे जीवन का सबसे ख़ास मौक़ा थी – एक ऐसा अहम रूहानी मोड़, जिसकी वजह से हममें से कई लोग रूहानी मार्ग पर चल पड़े। समय बीतने के साथ, नाम-दान की इस अनमोल दात की क़द्र और भी बढ़ती गई। यह कितना बड़ा सौभाग्य है कि हमें सतगुरु के रूप में जीवन-भर साथ निभाने वाला ऐसा मित्र मिला जो शब्द-स्वरूप में सदा हमारे अंग-संग है।
हुज़ूर महाराज जी लाइट ऑन सेंट जॉन में लिखते हैं:
संत-महात्मा संसार में किसी ख़ास मक़सद से आते हैं। जो काम उन्हें परमात्मा द्वारा सौंपा जाता है, उसे वह परमपिता द्वारा निर्धारित समय और स्थान पर ही करते हैं।…संत संसार में चमत्कार करने के लिए नहीं आते। उनके जीवनकाल में चमत्कार तो होते हैं लेकिन संसार में आने का उनका उद्देश्य चमत्कार करना नहीं होता। असली चमत्कार जो संत कर सकते हैं, वह है हमें नाम-दान देकर हमारी आत्मा को शब्द के साथ जोड़कर हमें नया जन्म – एक रूहानी जन्म देना।
(नौवाँ संस्करण, 2019, पृ. 35)
नाम-दान प्राप्त करने के बाद जैसे-जैसे हम इस मार्ग पर आगे बढ़ते हैं, हमारी रूहानी तरक़्क़ी शुरू हो जाती है। हमारा बहुत-सा समय दुनियावी ज़िम्मेदारियों को निभाने में बीत जाता है मगर हमें पहल अपनी रूहानी ज़िम्मेदारी को देनी चाहिए। हमें इसे अपने जीवन, अपनी सोच और अपने हर कर्म का आधार बना लेना चाहिए। इस सब के लिए धैर्य और दृढ़ता की ज़रूरत होती है और धीरे-धीरे हमें एहसास होने लगता है कि हमारी इस लगन और समर्पण का फल अमूल्य होता है। भजन-सिमरन को अपनी रहनी का हिस्सा बनाने से हमारे अंदर ऐसा बदलाव आने लगता है कि हमें ज़िंदगी का असल मक़सद स्पष्ट रूप से समझ आ जाता है।
धीरे-धीरे हमारे ध्यान का रुख़ बाहर से अंदर की तरफ़ होने लगता है। जो ध्यान पहले बाहर की ओर फैला रहता था, उसे अंतर्मुख करने के लिए मन को अनुशासित करना पड़ता है। इस बदलाव को लाने के लिए समय और लगातार अभ्यास की ज़रूरत होती है। शुरू-शुरू में हम सतगुरु के हुक्म का पालन या कर्तव्य समझकर भजन-सिमरन करते हैं लेकिन धीरे-धीरे हमें अपने अंदर ज़्यादा कशिश महसूस होने लगती है। सिमरन करते हुए ध्यान को एकाग्र करना आसान हो जाता है। धीरे-धीरे एक अंदरूनी ताक़त हमें अपनी ओर खींचने लगती है और हमें अपने अंदर शब्द-गुरु की मौजूदगी का एहसास होने लगता है। इससे हमें अद्भुत ख़ुशी और आनंद का अनुभव होता है।
लेकिन प्रेम और भक्ति का यह मार्ग आसान नहीं है। इसके लिए क़ुर्बानी देनी पड़ती है। हुज़ूर महाराज जी लाइट ऑन सेंट मैथ्यू में समझाते हैं:
स्वाभाविक है कि जब हज़रत ईसा उपदेश देते थे, तब लोग उनके उपदेश से बहुत प्रभावित होते थे और उनका हृदय परमपिता के प्रति प्रेम और भक्ति से भर जाता था। किसी ने उनसे कहा: ‘आप जहाँ भी जाएँगे, मैं आपके पीछे-पीछे चलूँगा।’ इसका अर्थ है: ‘आप मुझे जो भी आदेश देंगे, मैं हमेशा उसका पालन करूँगा।’ इसलिए उसे सावधान करते हुए हज़रत ईसा कहते हैं: “लोमड़ियों के बिल हैं और आकाश के पक्षियों के घोंसले हैं परंतु मनुष्य के पुत्र को सिर रखने तक की जगह नहीं है।” (8:20)
आप कहते हैं मैं जानता हूँ कि तुम पूरी निष्ठा से मेरा अनुसरण करने के लिये उतावले हो लेकिन एक बात याद रखो कि कुल-मालिक से प्रेम करना कोई आसान काम नहीं है। यह मत सोचो कि यह फूलों की सेज है। मैं जहाँ जा रहा हूँ, वहाँ मेरे पीछे आना बहुत कठिन है।...कुल-मालिक से प्रेम करनेवालों को तब तक चैन नहीं मिलता जब तक वे अपनी मंज़िल तक नहीं पहुँच जाते। वे अपने आप को इस दुनिया का हिस्सा नहीं समझते और जब तक उनका परमपिता से मिलाप नहीं होता तब तक वे विरह की पीड़ा में ही तड़पते रहते हैं।
(छठा संस्करण, 2003, पृ. 94-95)
इस मार्ग पर चलना कोशिश करने, गिरने और फिर से उठने की एक निरंतर प्रक्रिया है। कभी-कभी यह नामुमकिन लगने लगता है जैसे कि मुश्किल हालात के ख़िलाफ़ थका देने वाली व्यर्थ कोशिश। फिर भी हमें निराश नहीं होना चाहिए। सतगुरु हर पड़ाव पर हमारी मदद करते हैं और हमें सहारा देते हैं। कर्मों की ज़ोरदार आँधी हमें मार्ग से भटका सकती है पर इसके बावजूद हम तरक़्क़ी कर रहे होते हैं। आख़िरकार निराशा के बादल छट जाते हैं और सतगुरु का प्रेम हमारे इरादों को फिर से बुलंद कर देता है। सतगुरु अंदर से हमारा मार्गदर्शन कर रहे होते हैं और हमें अपनी तरफ़ खींच रहे होते हैं, वह हमें निज-घर वापस ले जाने के लिए हमसे भी कहीं ज़्यादा तत्पर हैं।
हमारे मन को सच्चा सुकून तभी मिल सकता है जब हम अंदर की ओर रुख़ करके वहाँ अपना ठिकाना बना लेते हैं। हमारा तीसरा तिल ही वह आंतरिक स्थान है जहाँ बैठकर हम हर रोज़ भजन-सिमरन कर सकते हैं। अंदर की तरफ़ मुड़ना यानी मन को स्थिर करना, विचारों के बहाव को रोकना, एकाग्र होना और परम शांति का अनुभव करना ही हमारी सबसे अहम सेवा है। विद द थ्री मास्टर्स, वॉल्यूम 3 में दर्ज आदि ग्रंथ में से लिया गया एक उद्धरण इसी बात पर बल देता है:
घरि रहु रे मन मुगध इआने। राम जपहु अंतरगति धिआने।
(पाँचवाँ संस्करण, 2018, पृ. 121)
‘घरि रहु रे’ से भाव अपने ख़याल को समेटकर तीसरे तिल पर एकाग्र करना है जिससे हम “अपने अंतर में शांत” रह सकते हैं जैसा कि हुज़ूर महाराज जी लाइट ऑन सेंट मैथ्यू में फ़रमाते हैं। सिर्फ़ भजन-सिमरन के ज़रिए ही हम कुछ हद तक आंतरिक शांति प्राप्त कर सकते हैं। निरंतर अभ्यास से ही हमें सिमरन की शक्ति और इसकी अहमियत का एहसास होता है। यह एक ऐसा रूहानी अभ्यास है जिसे हम हर हाल में कर सकते हैं। जितना ज़्यादा हम इसे करते हैं, उतना ही ज़्यादा हमें एहसास होता है कि पाँच नाम के सिमरन में कितनी शक्ति है। यह हमें सही मार्ग पर बनाए रखता है और शब्द-गुरु के साथ हमारे संबंध को और ज़्यादा गहरा करता है। प्रेम के इस खेल में कोई हिसाब-किताब नहीं होता। हम या तो सचेत होकर इन पाँच नामों का जाप करते हैं या फिर यह सहज रूप से अपने आप ही चलने लगता है।
भजन-सिमरन से प्रेम हो जाने से बड़ा कोई वरदान नहीं है। हुज़ूर महाराज जी डाई टू लिव में फ़रमाते हैं:
जब हमें किसी से प्रेम हो जाता है तो हम हमेशा उसके साथ रहना चाहते हैं। इसी प्रकार जब हमें भजन-सिमरन से प्यार हो जाता है और अंदर शांति तथा आनंद का अनुभव होने लगता है तब जो भी थोड़ा-बहुत समय हमें मिलता है, हम उसे भजन-सिमरन में बिताना चाहते हैं क्योंकि हम उस शांति और आनंद के वातावरण में ज़्यादा से ज़्यादा समय के लिए रहना चाहते हैं। तब भजन का समय अपने आप बढ़ने लगता है। इसके लिए कोशिश नहीं करनी पड़ती।
(सातवाँ संस्करण, 1999, पृ. 262)
अपने भजन-सिमरन में हम उस स्थिरता, उस शांति को ढूँढ़ते हैं जहाँ हमें परमात्मा की मौजूदगी का एहसास हो। सिमरन हमारे ध्यान को एकाग्र करने में मदद करता है और हमें भजन (शब्द-धुन को सुनने) के लिए तैयार करता है। सिमरन और भजन साथ-साथ चलते हैं। ये हमारे आत्मा रूपी पात्र को साफ़ करते हैं और फिर उसे भर देते हैं – यह एक ऐसी रूहानी प्रक्रिया है जिसमें हम अपने विचारों और दुनियावी शक़्लों व पदार्थों से ऊपर उठने लगते हैं। सिमरन, भजन की तैयारी है जो हमें परमात्मा की दहलीज़ तक ले जाता है लेकिन उस दहलीज़ को पार करना हमारे वश में नहीं है; यह सब परमात्मा के हाथ में है। हम स्थिर बैठकर बिना कोई उम्मीद किए सिर्फ़ इंतज़ार कर सकते हैं। प्रेरणा तो हमें मिलती रहती है – कभी अभ्यास से, कभी सत्संग से या कभी अचानक किसी अनजाने पल में। सतगुरु हमेशा हमारे मार्गदर्शन और सँभाल के लिए मौजूद होते हैं।
कृष्णमूर्ति जी अपनी डायरी द ब्यूटी ऑफ़ लाइफ़ में शांति के पवित्र अनुभव का वर्णन बहुत ही सुंदर तरीक़े से करते हैं:
जब वह बात करते हुए सही शब्द की तलाश में थे तब सूरज डूब रहा था और हमारे बीच एक गहरा मौन छा गया। उन्होंने बोलना बंद कर दिया। थोड़ी देर बाद, जब सितारे धरती के बहुत क़रीब लग रहे थे, उन्होंने कहा, “यह वही मौन है जिसे मैं हर जगह खोज रहा था – किताबों में, शिक्षकों के बीच और ख़ुद के भीतर। मुझे बहुत-सी चीज़ें मिलीं लेकिन मैं इसे नहीं खोज पाया। यह बिना खोजे, बिना बुलाए आ गया...यहाँ बैठे हुए, मैं इस पवित्र मौन के बारे में सजग हूँ। इसके ज़रिए मैं सितारों, उन पेड़ों और नदी को देख रहा हूँ। हालाँकि मैं यह सब देख और महसूस कर रहा हूँ फिर भी मैं वास्तव में वहाँ नहीं हूँ। जैसा कि आपने उस दिन कहा था, ‘दृष्टा (देखने वाला) ही दृश्य है।’ अब मुझे समझ आया कि इसका क्या मतलब है। जिस परम आनंद को मैं खोज रहा था, वह खोजने से नहीं मिलता।”
संतमत की रहनी को अपनाकर जब हम रूहानियत के उसूलों पर चलते हैं तो हमें शब्द की करतारी शक्ति का एहसास होने लगता है। यह शक्ति अचानक, बिना बुलाए, सहज ही ज़ाहिर हो जाती है। रूहानियत तो हमेशा से हमारे अंदर मौजूद होती है क्योंकि हमारे भीतर हो रहा बदलाव इसी का एक हिस्सा है। हमें सिर्फ़ इसके साथ एकसुर होने की कोशिश करनी है जो केवल भजन-सिमरन के ज़रिए ही संभव है।
दुनिया-भर में बने सत्संग-घर इन कोशिशों में हमारी मदद करते हैं। ये न सिर्फ़ हमें सेवा के अवसर प्रदान करते हैं बल्कि यहाँ सत्संग भी होते हैं। सतगुरु देह-स्वरूप में चाहे इन सत्संग-घरों में मौजूद हों या न हों, यहाँ का माहौल हमारे अंदर रूहानी मार्ग पर चलने और भजन-सिमरन करने की गहरी तड़प पैदा करता है। सेवा, सत्संग और संतमत की पुस्तकें हमारी रूहानी तरक़्क़ी के लिए बहुत आवश्यक हैं क्योंकि ये संतमत को समझने में हमारी मदद करती हैं जिससे धीरे-धीरे हमारे अंदर प्रेम बढ़ने लगता है।
आख़िरकार भजन-सिमरन ही वह ज़रिया है जिससे हम अपने सतगुरु के प्रति आभार व्यक्त कर सकते हैं क्योंकि उन्होंने हमें इतना दिया है जितने के हम लायक़ भी नहीं थे। जीवन के तमाम उतार-चढ़ाव में भी हमें अपने रूहानी मक़सद को हमेशा सबसे ऊपर रखना चाहिए। इसे अपनी प्राथमिकता बनाने के लिए अपनी ओर से पूरी कोशिश करनी चाहिए और बाक़ी सब कुछ उन्हीं पर छोड़ देना चाहिए। सतगुरु ने हमारे लिए कौन-सी रूहानी दौलत रखी है? महाराज जगत सिंह जी विद द थ्री मास्टर्स (वॉल्यूम 3) में फ़रमाते हैं:
किसी की भी मेहनत व्यर्थ नहीं जाती। अंत समय जब जीव के प्रारब्ध कर्म ख़त्म हो जाते हैं तब सतगुरु उसकी कमाई उसे दे देते हैं और उसका पर्दा खुल जाता है। इसलिए हर एक को, चाहे उसका पर्दा खुले या न खुले, भजन-सिमरन में मेहनत करते रहना चाहिए।
(पाँचवाँ संस्करण, 2018, पृ. 121)
कितना आशावादी दृष्टिकोण है! हम स्वर्ग में अपना ख़ज़ाना जमा कर रहे हैं, जैसा कि सेंट जॉन के वचनों में कहा गया है: “मेरे पिता के घर में रहने के लिए बहुत-से स्थान हैं।” (14:2) हम निज-घर लौट रहे हैं और हमारे सतगुरु हमारे लिए जगह तैयार कर रहे हैं। हुज़ूर महाराज जी लाइट ऑन सेंट जॉन में फ़रमाते हैं:
हर शिष्य सीधे परमपिता के पास नहीं पहुँच जाता। वह किस मंज़िल तक पहुँचता है, यह उसकी अपनी रूहानी उन्नति पर निर्भर करता है। वह पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी या पाँचवीं मंज़िल तक भी जा सकता है। इसलिए हर किसी की अपनी एक जगह है जिसे उसके गुरु ने उसके लिए तैयार किया है और वहाँ से रूहानी उन्नति करते-करते, वह तब तक आगे बढ़ता रहता है जब तक परमपिता में समा नहीं जाता।
हमें इस जीवन में रूहानी मार्ग पर चलने का एक सुनहरा मौक़ा मिला है। चाहे हमें छोटी उम्र में नाम-दान मिला हो या बड़ी उम्र में, अपना रूहानी मक़सद पूरा करने के लिए हमारे पास समय कम ही है इसलिए सचेत और सावधान रहना बेहद ज़रूरी है। हमें अपने ध्यान को तीसरे तिल पर एकाग्र करने की आदत डालनी होगी ताकि वहाँ पर ठहराव और सुकून मिल सके जिससे हम अपने आप अंदर खिंचे चले जाएँ। जीवन के इस खेल में उलझने के बजाय केवल एक दर्शक बने रहने का यही एकमात्र तरीक़ा है।
सेंट जॉन के दो वचनों पर प्रकाश डालते हुए हुज़ूर महाराज जी फ़रमाते हैं:
अपने समय का सही उपयोग करो और अपनी सुरत को समेटकर तीसरे तिल पर ले आओ। तुम्हारे लिए फ़सल तैयार है; वहाँ परमपिता तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है।…
जो कोई भी कड़ी मेहनत करता है, उसे उचित इनाम मिलता है।... जो संतों की शिक्षा का पालन करता है और सच्चे दिल से रूहानी अभ्यास करता है, उसे निश्चित रूप से इस रूहानी अभ्यास के लिए इनाम के रूप में ‘मज़दूरी’ मिलेगी। और वह क्या है ? “अमर जीवन का फल” – वह फल जो उसे अमर जीवन देगा।
(गॉस्पल ऑफ़ सेंट जॉन, पृ. 66-68)
हम खेत में काम करने वाले वे मज़दूर हैं जो फ़सल इकट्ठी करने में लगे हुए हैं। हम पर पहले से ही सतगुरु की अपार दया-मेहर है – इसे बार-बार माँगने की ज़रूरत नहीं है। हमारे दिलों में परमात्मा से मिलने और निज-घर लौटने की ऐसी गहरी तड़प पैदा हो चुकी है कि अब सतगुरु के बताए रास्ते पर चलने के अलावा हमारे पास कोई और विकल्प नहीं है। अपने अंदर उनकी मौजूदगी का एहसास हो जाने से बड़ी कोई ख़ुशी नहीं है, जहाँ वह हमारा इंतज़ार कर रहे हैं ताकि हम उनसे मिलाप कर सकें। हम कितने भाग्यशाली हैं! हम उस परमपिता परमात्मा की संतान हैं जिन्हें नूर के पुंज पूर्ण संत-सतगुरुओं ने अपनाकर, अपनी शरण में ले लिया है।