अश्वत्थ वृक्ष
भारतीय ग्रंथों में वट के एक वृक्ष का ज़िक्र आता है जिसे “अश्वत्थ” कहा जाता है। माना जाता है कि इसकी उत्पत्ति भारतीय उपमहाद्वीप में हुई थी। हालाँकि, इस वृक्ष को केवल इसके फल की वजह से पौराणिक महत्त्व हासिल नहीं हुआ है। यह वृक्ष अपने आप में कई संस्कृतियों, ख़ासकर हिंदू और बौद्ध धर्म के लिए बहुत अधिक रूहानी महत्त्व रखता है। सिद्ध पुरुष, शामन (shamans), फ़ारसी संत यहाँ तक कि प्राचीन केल्टिक संस्कृति और वाइकिंग्स भी इस वृक्ष के बारे में जानते थे। शाश्वत जीवन के प्रतीक के रूप में, यह पवित्र वट का वृक्ष ब्रह्मांड का प्रतीक है और इसका संबंध मन्नतों, रूहानी साधनाओं और प्राकृतिक सुंदरता से है। इस वृक्ष की इतनी मान्यता क्यों है? शायद इसलिए कि हर संस्कृति इसके अद्भुत रूप को देखकर इतनी प्रभावित हुई कि इसके बारे में कई काल्पनिक कहानियाँ प्रचलित हो गईं। “अश्वत्थ” का अस्तित्व अद्भुत और अनोखा है जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता: यह उल्टी दिशा में बढ़ता है, इसकी जड़ें ऊपर होती हैं और शाखाएँ नीचे की ओर।
इससे हमें क्या सीख मिलती है? अजीब-से दिखनेवाले इस वृक्ष ने अपने छिपे हुए गहरे अर्थ और पौराणिक कहानियों के ज़रिए परमार्थ में इतना महत्त्वपूर्ण स्थान कैसे बना लिया? इस वृक्ष के पीछे क्या परमार्थी रहस्य है? क्या यह वृक्ष हमारे सांसारिक और परमार्थी जीवन का प्रतीक हो सकता है?
प्राचीन भारतीय ग्रंथ, वेदों के कठ उपनिषद् में एक कहानी दर्ज है जिसमें एक विशाल ब्रह्मांडीय वृक्ष के बारे में बताया गया है जिसे पूरी रचना की उत्पत्ति का स्रोत माना गया है। कहानी में बताया गया है कि एक अमर वृक्ष है जिसे अश्वत्थ कहा जाता है। इसकी जड़ें ऊपर की ओर होती हैं और शाखाएँ नीचे की ओर। इसकी प्रकाशमय जड़ ब्रह्म है जोकि परम सत्य है। जो कुछ अस्तित्व में है, वह इसी जड़ में निहित है। इसके परे कुछ भी नहीं है। बड़ के फल देने के बजाय यह वृक्ष अलौकिक अमृत – नक्षत्र – तारे आदि धारण करता है। अश्वत्थ का वर्णन उल्टे वृक्ष के रूप में किया गया है जिससे कि इसकी जड़ें अलौकिक आकाश तक पहुँच जाती हैं और इसका तना व शाखाएँ इस ब्रह्मांड में फैलकर जीवन का आधार बनती हैं। उपनिषदों में बताया गया है कि इसकी जड़ों को अमरलोक – “जहाँ मृत्यु नहीं होती” – में सींचा जाता है जिसे अमर जीवन का दिव्य मण्डल भी कहा जा सकता है। कहानी में बताया गया है कि जड़ें तो हमेशा से मौजूद रही हैं परंतु इसकी शाखाएँ रचना के चक्रों में से गुज़रती रहती हैं – जिसे पूर्व में ‘तीन गुणों के चक्र’ के नाम से जाना जाता है। इस वृक्ष का शीर्ष भाग लगातार बदलता रहता है जबकि जड़ें अमर होती हैं, ये कभी नहीं बदलतीं। इस पर ऐसे पत्ते आते हैं, जो एक ही तने से उगते हैं; जिन पर फूल और फल खिलते हैं, बढ़ते हैं और मुरझाकर फिर से अपने स्रोत में समा जाते हैं, बिलकुल वृक्ष से गिरे हुए सेब की तरह जो ज़मीन पर गिरता है, जड़ पकड़ता है और मिट्टी में समाकर फिर से मिट्टी बन जाता है। वेदों में इसका वर्णन इसी तरह किया गया है।
हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म में इस वृक्ष को बोधिवृक्ष, अश्वत्थ या पीपल का पेड़ भी कहा जाता है। यह वही पवित्र वट का वृक्ष है जिसके नीचे बैठकर महात्मा बुद्ध ने साधना की थी और उन्हें ब्रह्मज्ञान प्राप्त हुआ था। इस वृक्ष की ख़ासियत यह है कि जैसे-जैसे यह वृक्ष बढ़ता है, इसकी आस-पास की शाखाओं से ऐसी जड़ें निकलती हैं जो ज़मीन के ऊपर हवा में लटकती हैं और जब ये जड़ें धरती तक पहुँचती हैं तब वे फिर से जड़ पकड़ लेती हैं और एक नया वृक्ष बना लेती हैं। फलस्वरूप, धीरे-धीरे यह वृक्ष कई सौ वर्ग मीटर के क्षेत्र तक फैल जाता है और अश्वत्थ वृक्षों का पूरा जंगल बन जाता है। फिर यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि मूल वृक्ष कौन-सा था। इस जंगल का हर वृक्ष उस मूल वृक्ष का ही हिस्सा होता है इसलिए भले ही ऐसा लगे कि ये कई वृक्ष हैं लेकिन असल में यह एक ही वृक्ष होता है।
यह रहस्यमय कहानी किस ओर संकेत करती है?
कवि कहता है, वह परमात्मा अपने ही अनंत प्रेम के बाग़ में उग रहे ‘जीवन के वृक्ष’ की जड़ है और इसकी अनेक शाखाएँ, टहनियाँ और पत्ते उस परमात्मा की ही रचना हैं।1
बहुत-सी संस्कृतियों और धर्मों में यह वृक्ष रूहानी उन्नति का प्रतीक है।
यह जड़ और तने द्वारा मिलने वाली स्थिरता को दर्शाता है और साथ ही शाखाओं से मिलनेवाले लचीलेपन का भी प्रतीक है जो बिना टूटे हवा के झोंके के साथ झूमती हैं। स्थिरता और लचीलापन ऐसे गुण हैं जो इस दुनिया में जीवन जीने के लिए ज़रूरी हैं।
बाइबल में हम “भले और बुरे के ज्ञान के वृक्ष” के बारे में पढ़ते हैं। यहूदी तौरात विद्वान फ्रेडरिक वेनरेब बताते हैं, “जैसे ही मनुष्य ‘ज्ञान के वृक्ष’ का फल खाता है, ‘जीवन के वृक्ष’ का मार्ग बंद हो जाता है।”
जब इंसान दृश्यमान जगत की तरफ़ आकर्षित होने लगता है और अदृश्य दिव्य लोक को भूल जाता है तब इसका “जीवन के वृक्ष” से, रूहानी मण्डलों से और नाम यानी शब्द-धुन से नाता टूट जाता है। बाइबल में इसी “भूल जाने” या संपर्क टूटने को “मनुष्य का पतन” कहा गया है।
संत-महात्मा जिस रहस्यमय वृक्ष की बात करते हैं, उसका “फल” हमें कहाँ से मिलता है?
आदि ग्रंथ की बानी है: “सभ किछु घर महि बाहरि नाही॥ बाहरि टोलै सो भरमि भुलाही॥” (पृ. 102), “हरि मंदरु एहु सरीरु है गिआनि रतनि परगटु होइ॥” (पृ. 1346) भजन-सिमरन में ध्यान के पूर्ण रूप से एकाग्र होने पर हम इस वृक्ष पर चढ़ सकते हैं। यह अश्वत्थ वृक्ष हमारे शरीर के भीतर ही है।
जैसा कि वेदों में कहा गया है: यह वृक्ष हमारे भीतर छिपा है और इसका तना इंसान की रीढ़ की हड्डी का प्रतीक है। “मूलाधार चक्र” जो रीढ़ की हड्डी के सबसे निचले हिस्से में स्थित है, रीढ़ की हड्डी की बुनियाद होता है मगर अश्वत्थ वृक्ष की तरह इसकी असली जड़ भी इंसान के शरीर के ऊपरी हिस्से ‘शीर्ष चक्र’ (सहस्रार चक्र) में होती है। यहीं पर ब्रह्मांड और सूक्ष्म ऊर्जा से जुड़ा जा सकता है। भगवद्गीता के अनुसार, ‘शीर्ष चक्र’ में शिव और शक्ति का दिव्य विवाह यानी कि आत्मा का परमात्मा से मिलाप होता है जोकि समाधि की अवस्था और ब्रह्मज्ञान की ओर ले जाता है। दिव्य चेतना का निवास इसी केंद्र में है। यह तब जागृत होती है जब हम सांसारिक प्राप्तियों के पीछे भागना छोड़ देते हैं और अपने ध्यान को अंदर की ओर मोड़ते हैं। फिर ‘कुंडलिनी’ यानी चेतना-शक्ति, रीढ़ की हड्डी के सभी सूक्ष्म चक्रों में से गुज़रते हुए ऊपर चोटी की ओर बढ़ने लगती है। ‘जीवन के वृक्ष’ से जुड़ी भारतीय पौराणिक कथाओं के अनुसार, वृक्ष की चोटी के पास एक चील मौजूद होती है, सर्प (कुंडलिनी) जिस तक पहुँचने की कोशिश कर रहा है। यह चील ‘तीसरे तिल’ का प्रतीक है – वह केंद्र जहाँ से चेतना ऊपर जाती है। यह ‘तिल’ भौंहों के बीच, थोड़ा पीछे की ओर होता है और इसे ‘तीसरी आँख’ भी कहते हैं। जब सर्प चील को पार करके वृक्ष की मूल जड़ तक पहुँच जाता है तब उसका ब्रह्मज्ञान को प्राप्त करके परमात्मा की पहचान द्वारा उस प्रेम के सागर में लीन होना निश्चित है।
आदि ग्रंथ की बानी है: “नउ दर ठाके धावतु रहाए॥ दसवै निज घरि वासा पाए॥ ओथै अनहद सबद वजहि दिनु राती गुरमती सबदु सुणावणिआ॥” (आदि ग्रंथ, पृ. 124)
सतगुरु के मार्गदर्शन द्वारा हमें दिव्य धुन सुनाई देने लगती है। नौ द्वारों को बंद करके, दसवें द्वार में पहुँचकर हमें मुक्ति प्राप्त हो जाती है। वहाँ शब्द की अनहद ध्वनि गूँजती सुनाई देती है।
जब पूर्ण सतगुरु की दया-मेहर से कोई व्यक्ति उस कशिश-भरी धुन से जुड़ जाता है तब उसकी आँखें खुल जाती हैं और उसे सब कुछ स्पष्ट नज़र आने लगता है। अंतर में प्रकाश हो जाता है और अज्ञानता का अंधकार दूर हो जाता है। प्रकाश की खोज में गुरु नानक देव जी की बानी का हवाला दिया गया है:
अंतरि जोति निरंतरि बाणी साचे साहिब सिउ लिव लाई।2
ऐसे व्यक्ति का मन फिर से ब्रह्म में विलीन हो जाता है और उसकी आत्मा दिव्य ज्योति में लीन हो जाती है। शब्द के अभ्यास द्वारा मन और आत्मा की गाँठ खुल जाती है। फलस्वरूप, मन अपने निज-घर (त्रिकुटी) पहुँच जाता है और उसके पंजे से आज़ाद हुई आत्मा वापस अपने घर लौट जाती है। मन की रुकावट के दूर हो जाने पर आत्मा उसी तरह परमात्मा की ओर खिंची चली जाती है और उसमें समा जाती है जिस तरह एक सुई चुंबक की तरफ़ खिंची चली जाती है जब उस पर किसी तरह का भार नहीं होता। साँप चील को पीछे छोड़ देता है और आत्मा मुक्त हो जाती है। भगवद्गीता में कहा गया है, “जो सदा अपने मन को वश में रखता है, उसका रूहानी प्रयास उसे आंतरिक शांति की ओर ले जाता है, वह परम आनंद प्राप्त कर लेता है और फिर से पूर्ण परमात्मा में समा जाता है।”
हममें से ज़्यादातर लोगों को तीसरे तिल पर पहुँचने के लिए चंचल मन के विरुद्ध निरंतर संघर्ष करना पड़ता है। इस मुक़ाम तक पहुँचने के लिए हमें कड़ी मेहनत करनी पड़ती है। यह हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम दृढ़ता, सहनशक्ति और धैर्य को बढ़ाएँ ताकि हम सतगुरु के उपदेश पर नियमित रूप से अमल कर सकें। भजन, सिमरन, सत्संग सुनना, सेवा करना और पुस्तकों को पढ़ना – ये सब नामदान के समय किए गए वायदों जैसे कि मांस, मछली, अंडे और उनसे बने सभी पदार्थों से परहेज़ करना, मादक पदार्थों से दूर रहना, नैतिक जीवन जीना और रोज़ाना ढाई घंटे भजन-सिमरन करना आदि को निभाने में बहुत मददगार साबित होते हैं।
सभी रूहानी साधनाओं का सिर्फ़ एक ही मक़सद है – परमात्मा के लिए प्रेम जागृत करना। ये साधनाएँ अपने मक़सद को तभी पूरा कर पाती हैं जब इनके द्वारा प्रेम जाग्रत हो जाता है और फलस्वरूप शिष्य अपने आपे तथा हर तरह से सांसारिक मोह से ऊपर उठ जाता है। बाबा जी ने इस बारे में संक्षेप में समझाते हुए फ़रमाया:
सिमरन का अभ्यास प्रेम और इस दृढ़ विश्वास के साथ करना चाहिए कि यह जीवन में सबसे महत्त्वपूर्ण है। जब हम पूर्ण एकाग्रता और पूरी लगन के साथ सिमरन करते हैं तब हमें सफलता ज़रूर मिलती है।
हुज़ूर महाराज चरन सिंह जी से एक बार किसी ने पूछा: “मैं भजन-सिमरन के लिए श्रद्धा-भाव और प्रेम कैसे पैदा कर सकता हूँ?”
महाराज जी ने उत्तर दिया:
सिमरन को पूरी एकाग्रता के साथ करना चाहिए। किसी भी कारण आपका ध्यान किसी दूसरी तरफ़ नहीं भटकना चाहिए। सिमरन में ध्यान लगाएँ। हम विचारों का सिलसिला ख़त्म करने के लिए सिमरन करते हैं। जब एक भी विचार नहीं उठता, जब आप पूरी तरह से विचारहीन हो जाते हो तब आप प्रकाश और शब्द-धुन की ओर खिंचे चले जाओगे। जब सिमरन पक जाता है तब प्रेम भी पूर्ण हो जाता है।
भागवत पुराण के एक पाठ में यह वर्णन है कि अपनी मृत्यु के समय श्री कृष्ण ने अपनी चेतना को अपने आंतरिक स्वरूप पर केंद्रित करके अश्वत्थ वृक्ष का ध्यान किया। कहा जाता है कि बोधिवृक्ष के नीचे बैठे हुए सिद्धार्थ को ब्रह्मज्ञान प्राप्त हुआ और वह महात्मा बुद्ध बन गए। वे अपने मन के प्रलोभनों का शिकार नहीं हुए, उन्होंने अपनी सभी इच्छाओं पर विजय प्राप्त कर ली।
क्या इन कहानियों के छिपे हुए गहरे अर्थ को समझने का कोई तरीक़ा है?
आदि ग्रंथ की बानी है:
आदि सचु जुगादि सचु॥ है भी सचु नानक होसी भी सचु॥ (जपुजी साहिब, पृ. 1)
इस वृक्ष की तुलना सतगुरु के देहस्वरूप से की जा सकती है। जब हम अपने भीतर जाते हैं तब हमें “शाश्वत जीवन के वृक्ष”, सतगुरु के सच्चे स्वरूप के दर्शन होते हैं।
हालाँकि ब्रह्मांड में हर चीज़ एक-दूसरी से अलग नज़र आती है लेकिन जैसे बहुत-से पत्ते अश्वत्थ वृक्ष के एक ही तने से निकलते हैं, वैसे ही इस ब्रह्मांड में सब कुछ आपस में जुड़ा हुआ है और एक ही अमर-अविनाशी स्रोत से उत्पन्न होता है। हम सब का परिवार एक ही है क्योंकि हम सब का परमपिता एक है। ‘योग विद्या’ के संस्थापक सुकदेव ब्रेट्ज़ समझाते हैं कि हर पत्ते को एक ही वृक्ष से, एक ही जड़ से पोषण मिलता है। हमारी जड़ें उस परमात्मा में हैं। आख़िरकार हम सब एक ही परमात्मा का अंश हैं। इसलिए इस अश्वत्थ वृक्ष को रचना के प्रतीक, आपसी जुड़ाव के प्रतीक के रूप में देखना चाहिए।
हम सब का परिवार एक ही है क्योंकि हम सब एक ही परमपिता की संतान हैं।
सिर्फ़ पूर्ण सतगुरु की सहायता से ही हम उस परमपिता परमात्मा को पहचान सकते हैं जिसने सब कुछ रचा है। सिर्फ़ पूर्ण सतगुरु की मदद द्वारा ही हम अश्वत्थ वृक्ष की असल जड़ों तक पहुँच सकते हैं और केवल उसकी दया-मेहर से ही हठी मन निर्मल होता है और फिर हम “वर्जित फलों” का सेवन नहीं करते हैं।
हमारा जीवन इस विशाल संसार रूपी वृक्ष के एक फल के समान है। अगर कोई इस वृक्ष की जड़ को जान लेता है और सर्वशक्तिमान परमात्मा पर भरोसा रखता है तो उसका हर प्रकार का भय दूर हो जाता है, उसके अंदर सच्चा प्रेम जागृत हो जाता हो और इस प्रेम के दिव्य प्रकाश द्वारा वह सर्वव्यापक परमात्मा में समाने के क़ाबिल बन जाता है।
जैसे पत्ते मुरझा जाते हैं और फल पेड़ से टूटकर गिर जाते हैं वैसे ही हमें यह जीवन सीमित समय के लिए मिला है। जिस तरह पेड़ से नीचे गिर चुके पके हुए फल को लाख कोशिशों के बावजूद भी वापस शाखाओं से नहीं जोड़ा जा सकता उसी तरह अगर हम अपना जीवन सांसारिक शक्लों-पदार्थों के मोह में ही बिता देते हैं तो यह ज़िंदगी भी व्यर्थ चली जाती है। फिर इस दुर्लभ मनुष्य-शरीर को पाने के लिए हमें दोबारा जन्म-मरण के चक्र से गुज़रना पड़ता है तभी हम मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं। यही कारण है कि संत-महात्मा हमें नसीहत देते हैं कि हमारा ध्यान सदा अपने लक्ष्य पर होना चाहिए और हमें परमात्मा द्वारा दिए गए मनुष्य-जीवन के इस सुनहरी मौक़े के असल उद्देश्य को कभी भी नहीं भूलना चाहिए।
कबीर साहिब आदि ग्रंथ (पृ. 1366) में फ़रमाते हैं: “कबीर मानस जनमु दुलंभु है होइ न बारै बार। जिउ बन फल पाके भुइ गिरहि बहुरि न लगहि डार।” हमें मनुष्य-जन्म का यह अनमोल तोहफ़ा परमात्मा की भक्ति करने के लिए मिला है। नामदान तो बस शुरुआत है।
सिर्फ़ नामदान ले लेना चार जन्मों में परमात्मा की प्राप्ति और रूहानी मुक्ति की गारंटी नहीं है। हमें तन-मन से भजन-सिमरन में जुट जाना चाहिए। अगर सिर्फ़ नामदान लेना ही मुक्ति की गारंटी होता तो सतगुरु हमें भजन-सिमरन करने के लिए बार-बार क्यों चेताते?3
और अब आखिरी सवाल: जब संसार रूपी वृक्ष का अस्तित्व नहीं रहता, तब क्या होता है?
जब इस संसार में से शब्द-धुन को वापस खींच लिया जाता है तब इस धरती पर जीवन का अंत हो जाता है, ठीक वैसे ही जैसे एक निश्चित समय के बाद वृक्ष का अस्तित्व नहीं रहता। लेकिन वह परम सत्ता सदा क़ायम रहती है, जैसा कि पुस्तक वन बीइंग वन के उद्धरण में स्पष्ट रूप से कहा गया है:
कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कैसा भी हो और किसी भी देश का हो, सब एक ही नूर से उपजे हैं और उस परमात्मा का अंश हैं। कोई भी अलग नहीं है। सच तो यह है कि सभी जीवों में उस परमपिता परमात्मा के साथ अपनी आंतरिक एकता का अनुभव करने का सामर्थ्य है।4
जिस तरह अश्वत्थ वृक्ष अपने प्रतिरूपों के साथ जुड़ा रहता है, उसी तरह परमात्मा की संतान होने के नाते अगर हम एक-दूसरे के साथ सद्भावना और शांति से जीएँ तो जीवन बहुत आसान हो जाएगा, यह भजन-सिमरन द्वारा परमात्मा की पहचान करके ही संभव है। जैसे अश्वत्थ वृक्ष हमेशा अपनी जड़ से जुड़ा रहता है वैसे ही हम भी अपने सतगुरु से रिश्ता जोड़कर परमात्मा में अभेद हो सकते हैं और फिर परमात्मा (जोकि हमारा मूल है) की तरह हम भी जन्म और मृत्यु के बंधनों से हमेशा के लिए मुक्त हो जाते हैं।
- One Being One, p. 27.
- Quest for Light, p. xxii.
- Concepts and Illusions, p. 38.
- One Being One, p. 10.