भली बुरी यह मानुष देह
नहीं बुरा संसार में कुछ भी मानुष देह सा,
नहीं सुंदर त्रिलोकी में कुछ भी इस नर देह सा।
बुरा सोचकर देह छोड़ जो देगा, मोक्ष फिर पा न सकेगा।
सुंदर मान कर जो भोग करेगा, नरक तुझे भोगना पड़ेगा।
त्याग-भोग को छोड़कर, खोजो बीच की डगर।
आत्म साधना में लीन जो होगा, वह हित अपना ही करेगा।
देह से जितना भोग करेगा, उतना ही बंधन में पड़ेगा।
विषय-विकारों में फँसा रहेगा, तो हावी यह हो जाएगा।
देह टिकी हो एक आसन में, या फिर लगी हो काम-काज में,
मन निश्चल है जिसका, वही है निर्मल, वही है योगी।
एकनाथ: स्वर अनेक, गीत एक