सतगुरु की मौजूदगी
हुज़ूर महाराज चरन सिंह जी हमें यह अमूल्य सुझाव देते हैं कि हम अपने दिन सतगुरु की हुज़ूरी में कैसे बिता सकते हैं। आप पुस्तक संत संवाद, भाग 3 में फ़रमाते हैं:
सतगुरु को अपने दिल में बसाए रखने के लिये और स्वयं को सतगुरु की हुज़ूरी में समझकर हम इस दुनिया में जो कुछ भी करते हैं, वह भजन-सिमरन है, भजन-सिमरन का ही हिस्सा है। आप चाहे रूहानी अभ्यास में बैठे हों या चुपचाप ही बैठे हों, सतगुरु के लिये प्रेम और श्रद्धा से सराबोर हों, शब्द-धुन को सुन रहे हों या प्रकाश को देख रहे हों, आप चाहे कुछ भी कर रहे हों, दुनियावी काम ही सही, अगर आपके सतगुरु की याद आपके मन में है, वह आपके दिल में हैं, अगर आप अपने सब काम सतगुरु के उपदेश और हुक्म के मुताबिक़ करते हैं, तो आप सतगुरु के साथ ही हैं।
महाराज जी समझाते हैं कि हम ज़िंदगी में जो कुछ भी करते हैं वह भी भजन-सिमरन बन सकता है, बशर्ते कि उस समय सतगुरु हमारे दिल में हों क्योंकि जब हम उन्हें याद करते हैं तो हम उनकी हुज़ूरी में होते हैं। हमें बताया जाता है कि नामदान के समय सतगुरु अपने नूरी स्वरूप में हमारे अंदर विराजमान हो जाते हैं, जिसका अर्थ है कि वे सदा हमारे अंग-संग रहते हैं। लेकिन हमें यह एहसास हमेशा नहीं रहता कि वह हमारे साथ हैं क्योंकि हम ख़ुद उनके साथ नहीं रहते।
रोज़ाना भजन-सिमरन में बैठते समय हम सजग होकर प्रयास करते हैं कि हम सतगुरु की हुज़ूरी में रहें। लेकिन भजन-सिमरन कर लेने के बाद जब हम अपने रोज़मर्रा के कामों में जुट जाते हैं तब अकसर हम अगले दिन भजन-सिमरन में बैठने तक उन्हें भूल जाते हैं।
सतगुरु से मिलाप का एक फ़ायदा यह है कि हम उनके साथ एक ख़ास रिश्ता क़ायम कर सकते हैं ताकि वह हमारे सच्चे साथी और वफ़ादार दोस्त बन जाएँ। इस बात का एहसास होने से कि सतगुरु सदा हमारे अंग-संग हैं, हमारा मन सजग रहता है फलस्वरूप हम हर चुनाव और कर्म अधिक सावधान होकर करते हैं। धीरे-धीरे हमारे अंदर बदलाव आने लगता है; हम ज़्यादा शांत और अधिक जागरूक हो जाते हैं।
भजन-सिमरन में हम अपने मन को स्थिर करने और सतगुरु की मौजूदगी के प्रति सचेत होने की कोशिश करते हैं। यह हमारे मन के लिए बहुत बड़ी चुनौती है। यह सारा दिन इधर-उधर हर दिशा में भागता रहता है और कुछ मिनटों के लिए भी टिकता नहीं है, ढाई घंटे स्थिर होकर बैठना तो बहुत दूर की बात है।
हमें रोज़ाना भजन-सिमरन के वायदे को पूरा करने की हर मुमकिन कोशिश करनी चाहिए, लेकिन यदि हम पूरा समय नहीं बैठ पाते तो हमें याद रखना चाहिए कि अगला दिन दोबारा कोशिश करने का नया अवसर है। हार मानने का सवाल ही नहीं उठता; हमें नए उत्साह के साथ अपनी कोशिशें जारी रखनी चाहिएँ।
अहम बात तो यह है कि हम अपने रोज़मर्रा के भजन-सिमरन को सतगुरु की ख़ुशी प्राप्त करने का ज़रिया मानें और उनसे मिली अनेक दातों के लिए आभार जताने और शुक्रगुज़ार होने के लिए भी भजन-सिमरन करें। यदि हम संतमत के अनुसार जीवन जीते हैं तो जैसा कि महाराज जी ने ऊपर फ़रमाया, सतगुरु को अपने दिल में बसाए रखने के लिये हम ज़िंदगी में जो कुछ भी करते हैं, वह भजन-सिमरन ही बन जाता है। दूसरे लफ़्ज़ों में, फिर हम सिर्फ़ ढाई घण्टे भजन-सिमरन न करके पूरा दिन भजन-सिमरन कर रहे होते हैं।
चाहे हम चल रहे हों, आलू छील रहे हों, रोटियाँ बेल रहे हों या बर्तन धो रहे हों, जब हम अपने सतगुरु को याद करते हैं तो हर काम भजन-सिमरन बन जाता है। इस तरह हमारी ज़िंदगी में बदलाव आने लगता है और यह परमात्मा के प्रति समर्पण बन जाती है – हमारा जीवन भक्ति का गीत बन जाता है। तब सतगुरु हमारे द्वारा की गई हर चीज़ को प्रेम की भेंट समझकर स्वीकार कर लेते हैं। पूरा दिन मन में उनकी मौजूदगी के एहसास को बनाए रखना ज़िंदगी जीने का बहुत ख़ूबसूरत तरीक़ा है।
अगर हम हर समय सचेत रूप से सतगुरु की मौजूदगी में रहने का अभ्यास करना चाहते हैं तो हमें ऐसे तरीक़े खोजने पड़ेंगे जिनसे हमारे विचार और कर्म इस मक़सद को पूरा करने में सहायक हों। इसके लिए हमारे पास तीन शक्तिशाली साधन हैं – सिमरन, सत्संग और सेवा।
सिमरन करना इन तीनों में से सबसे आसान है। जब हम अपने रोज़मर्रा के अन्य कामों को करते हुए पाँच नाम का सिमरन करते हैं तब हमारे मन का रुख़ सतगुरु की ओर हो रहा होता है। फिर हर रोज़ ढाई घंटे के लिए भजन-सिमरन में बैठना नीरस न होकर आनंदायक बन जाता है। जहाँ तक संभव हो हमें मन को सिमरन में व्यस्त रखना चाहिए, इस तरह हम इसे व्यर्थ की बातें सोचने से रोक सकते हैं क्योंकि एक पुरानी कहावत है – ‘ख़ाली मन शैतान का घर होता है।’
अगर हम अपने दिन की शुरुआत भजन-सिमरन से करें और सोने से पहले भजन-सिमरन या रूहानी साहित्य को पढ़ें तो हम अपने लक्ष्य के और नज़दीक पहुँच रहे होते हैं। सिमरन करने या सतगुरु को याद करने के अन्य मौक़े और कुछ सरल-सी आदतें हैं जिन्हें हम अपना सकते हैं जैसे कि खाना खाते वक़्त, टहलते हुए, सीढ़ियाँ चढ़ते या व्यायाम करते हुए उन्हें याद करना। असल में, बहुत-से हालात हमें सतगुरु की ओर रुख़ करने का मौक़ा देते हैं।
सत्संग सुनने से अतिरिक्त लाभ मिलता है क्योंकि यह हमें उन वायदों की याद दिलाता है जो हमने अपने सतगुरु से किए हैं। इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि सतगुरु देहस्वरूप में सत्संग में मौजूद हैं या नहीं। जब हम उनके नाम पर इकट्ठा होते हैं तब वह शब्द-स्वरूप में वहीं मौजूद होते हैं और हम प्रेम तथा श्रद्धा का अनुभव करते हैं। इस प्रकार हमें मार्ग पर आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा मिलती है।
सेवा भी सतगुरु को हाज़िर-नाज़िर महसूस करने का उत्तम साधन है। सेवा का अर्थ बहुत व्यापक है। हर वह काम जो हम निष्काम होकर करते हैं, सेवा ही है। जब हम मन लगाकर सेवा कर रहे होते हैं तब हमारा ख़याल ख़ुद-ब-ख़ुद सतगुरु की ओर चला जाता है। जब हमें इस बात का एहसास हो जाता है कि हम उनकी हुज़ूरी में हैं फिर हम सिर्फ़ वही करते हैं जो सही है। हुज़ूर बड़े महाराज जी पुस्तक गुरुमत सिद्धान्त, भाग 2 में फ़रमाते हैं:
गुरु की सेवा सबसे उत्तम और पवित्र है, क्योंकि गुरु सब बन्धनों से रहित है, वह मालिक के प्रेम का सागर है। उसकी सेवा द्वारा हम भी बन्धनों से छूट जाते हैं और हमारे अन्तर में मालिक का प्रेम जाग्रत होता है।
जैसा कि हम देख सकते हैं कि हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में सतगुरु को याद करने के अनेक मौक़े हैं। जब भी मौक़ा मिले उन्हें याद करने में ही हमारा भला है। सबसे महत्त्वपूर्ण यह है कि इसका संबंध हमारी मृत्यु के साथ है जब हम इस संसार से कूच करते हैं। भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण अपने शिष्य अर्जुन से कहते हैं:
अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्।
य: प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशय:॥
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावित:॥
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिमर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥अर्थात् जो पुरुष अंतकाल में मुझको ही स्मरण करता हुआ शरीर को त्यागकर जाता है, वह मेरे स्वरूप को ही प्राप्त करता है; इसमें संशय नहीं है।
हे अर्जुन! जो कोई अंतकाल में जिस-जिस भी भाव को स्मरण करता हुआ शरीर का त्याग करता है, उस-उसको ही वह प्राप्त करता है।
क्योंकि उस समय उसका भाव निरंतर उसी विचार में बह रहा था। इसलिए हर समय मेरा ही स्मरण करो और युद्ध करो। मुझमें अर्पित मन-बुद्धि से तुम निस्संदेह मुझे ही प्राप्त हो जाओगे।
हर समय सतगुरु की याद बनाए रखने से दुनिया और इसके बंधनों से बेलाग होने में मदद मिलती है। जब हम सतगुरु को पहल देते हैं तब दुनियावी रिश्तों-नातों की अहमियत कम होने लगती है। जीवनसाथी, माता-पिता, बाल-बच्चे, दोस्त-मित्र और पालतू जानवरों के मोह के बँधन ढीले होने लगते हैं जिससे मृत्यु के बाद हम फिर से पुनर्जन्म के चक्र में नहीं आते हैं। हुज़ूर बड़े महाराज जी प्रभात का प्रकाश पुस्तक में फ़रमाते हैं:
मन जैसी संगति में रहता है, उस पर वैसा ही प्रभाव पड़ता है। दुनियादारों की संगति से मनुष्य की सांसारिक वृत्तियाँ प्रबल हो जाती हैं। आध्यात्मिक महापुरुषों की संगति मनुष्य में अध्यात्म का रुझान पैदा करती है।
इसलिए हमें ध्यान रखना चाहिए कि हम दिन-भर क्या सोचते हैं। जब हमारे विचार हमें संसार की ओर ले जाएँ तब यह हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम इनके भ्रम-जाल में न फँसें और अपने विचारों को सतगुरु की ओर मोड़ दें। जैसा कि महाराज जी ने समझाया है:
अगर आपके सतगुरु की याद आपके मन में है, वह आपके दिल में हैं, अगर आप अपने सब काम सतगुरु के उपदेश और हुक्म के मुताबिक़ करते हैं, तो आप सतगुरु के साथ ही हैं।
संत संवाद, भाग 3
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अगर आप उस स्वरूप का ध्यान करने में क़ामयाब नहीं होतीं, तब यह सोचें कि आप सतगुरु की मौजूदगी में बैठकर सिमरन कर रही हैं। आपको यह महसूस होना चाहिये कि आप उनकी हाज़िरी में बैठकर सिमरन कर रही हैं। इससे आपके ख़्याल को वहाँ लाने और वहाँ एकाग्र करने में मदद मिलेगी।
संत संवाद, भाग 2