भजन-सिमरन क्यों करना है?
जब संतमत के चार सिद्धांतों में से भजन-सिमरन सबसे महत्त्वपूर्ण है तब यह प्रश्न पूछना अजीब-सा लग सकता है, “भजन-सिमरन क्यों करना है?”
ध्यान-साधना कई प्रकार की है और संतमत इनसे इसलिए अलग है क्योंकि इसमें हर दुनियावी विचार को छोड़कर अपने ख़याल को पूरी तरह से सिमरन पर एकाग्र करना होता है। यही सिमरन हमें अंदर शब्द-गुरु तक ले जाता है जोकि परमपिता परमात्मा का ही साकार रूप है। इसमें अपने अहं को त्यागने के साथ-साथ दुनिया की उन सभी वस्तुओं से लगाव न रखने पर ज़ोर दिया जाता है जो इस समय हमें बहुत प्रिय हैं। फलस्वरूप, जब हमारी आत्मा परमात्मा में समा जाती है तब हमें सदा के लिए मुक्ति और परम आनंद की प्राप्ति हो जाती है और हम पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त हो जाते हैं।
इसलिए भजन-सिमरन करने की अहम वजह यह है कि आत्मा आवागमन के चक्र से मुक्त हो जाए और इस रचना से ऊपर उठकर रचयिता के साथ मिलाप कर सके। हुज़ूर महाराज चरन सिंह जी समझाते हैं कि किस तरह जीव परमात्मा में समाता है:
जब मन शब्द की सहायता से अपने स्रोत त्रिकुटी यानी दूसरे पद में वापस चला जाता है, तब आत्मा मन के पंजे से आज़ाद हो जाती है और मन आत्मा को नीचे की ओर नहीं खींच सकता। उस अवस्था में आत्मा तीनों तरह के कर्मों से ऊपर उठ जाती है। फिर यह प्रकाशमान हो जाती है और यह निर्मल तथा पूर्ण हो जाती है। ऐसा होने पर ही आत्मा वापस जाकर परमात्मा में विलीन हो सकती है।
संत संवाद, भाग 1
भजन-सिमरन करने का एक अन्य कारण उस वायदे को निभाना है जो हमने नामदान के समय अपने सतगुरु से किया था। नामदान के समय हमने हर रोज़ ढाई घंटे भजन-सिमरन करने का वायदा किया था। उसे पूरा करने के लिए हम रोज़ाना दो घंटे पाँच नाम का सिमरन और आधा घंटा शब्द-धुन को सुनने की कोशिश करते हैं। इसलिए हमें हुज़ूर महाराज जी द्वारा पुस्तक संत संवाद, भाग 2 में दी गई नसीहत को मानना चाहिए: “सबसे अहम तो यह है कि हमें भजन-सिमरन को पूरा वक़्त देना चाहिये और संतमत के उसूलों के साथ कोई समझौता नहीं करना चाहिये।”
हर साधक का भजन-सिमरन का अनुभव अलग होता है। कुछ लोगों को लगता है कि लफ़्ज़ों को सिर्फ़ मशीनी ढंग से दोहराना भजन-सिमरन है और उन्हें शब्द-धुन को सुनना व्यर्थ प्रतीत हो सकता है। नामदान ले चुके ऐसे कुछ जिज्ञासु यह शिकायत कर सकते हैं कि भजन-सिमरन करना नीरस और मुश्किल है और वे या तो भजन-सिमरन करना छोड़ देते हैं या इसे अनियमित रूप से करते हैं। दुर्भाग्यवश ऐसे जिज्ञासुओं की रूहानी तरक़्क़ी में विलंब होता है और धीरे-धीरे वे अपने वायदों से चूक सकते हैं।
दूसरी तरफ़, कुछ ख़ुशक़िस्मत शिष्य नामदान प्राप्त हो जाने के बाद जल्दी ही अपने ख़याल को एकाग्र कर लेते हैं और उन्हें शब्द-धुन स्पष्ट सुनाई देनी शुरू हो जाती है। ऐसे शिष्य प्रेम के असल मायनों को जान लेते हैं और वे अनुशासन, त्याग, समर्पण और भक्ति के महत्त्व को समझ जाते हैं। ऐसा इसलिए नहीं होता कि उन्हें सिर्फ़ इन धारणाओं की समझ आ जाती है बल्कि इसका कारण यह होता है कि वे इन्हें अनुभव करते हैं, इनका अभ्यास करते हैं और इनके अनुसार जीवन जीते हैं।
इस अनुभव द्वारा मिलनेवाले आनंद से उन्हें अधिक से अधिक भजन-सिमरन करने की प्रेरणा मिलती है, जोकि उनकी ख़ुशी का स्रोत है। ऐसे शिष्य परमात्मा की रज़ा में रहते हैं और रूहानी तौर पर तरक़्क़ी करते हैं क्योंकि उन्हें संसार और सांसारिक वस्तुओं में बहुत कम या फिर बिलकुल भी दिलचस्पी नहीं रहती। उन्हें ऐसी अनमोल दौलत प्राप्त हो जाती है जो रचना की हर वस्तु से श्रेष्ठ है। हुज़ूर महाराज जी ऐसी भाग्यशाली आत्माओं के बारे में फ़रमाते हैं:
कुछ लोगों का रूहानियत की तरफ़ झुकाव होता है और उन्हें दुनियावी बातों में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं होती; उन्हें सिर्फ़ परमात्मा के साथ लिव जोड़ने से ही ख़ुशी मिलती है।
संत संवाद, भाग 1
इसके अलावा, नामदान प्राप्त कर चुके ऐसे जिज्ञासु भी होते हैं जिन्हें बिलकुल अलग-अलग तरह के अनुभव होते हैं, उनकी तरक़्क़ी की रफ़्तार घोंघे की चाल की तरह बहुत धीमी होती है। यदि वे अपने सतगुरु से किए वायदे को पूरा करने की कोशिश करते हैं तो उनकी तरक़्क़ी जारी रहती है – चाहे उन्हें इसका बोध हो या न हो।
भजन-सिमरन करने का एक अन्य कारण सतगुरु के प्रति आभार प्रकट करना हो सकता है, जैसा कि महाराज जी कहते हैं:
भजन-सिमरन हमें उस मालिक का शुक्रिया अदा करने के लिये करना चाहिये। मालिक ने हमें मनुष्य का जामा बख़्शा है और ऐसा माहौल दिया है कि हम भजन-सिमरन कर सकें। इसलिये हमें भजन-सिमरन हमेशा आभार व्यक्त करने के लिये करना चाहिये।
संत संवाद, भाग 3
नामदान ले चुके जिन जीवों को नाम की इस अनमोल दात की क़द्र है, वे जागरूकता और असल मुक्ति की इस दात के लिए सतगुरु के प्रति आभार प्रकट करना चाहते हैं। अगर वे हर रोज़, आभार प्रकट करते हुए नियत समय पर भजन-सिमरन करते हैं तो यक़ीनन उनकी रूहानी तरक़्क़ी होगी।
रूहानी तरक़्क़ी को लेकर अकसर सवाल और संदेह किया जाता है क्योंकि हमें भजन-सिमरन में अपनी कोशिशों का नतीजा प्राप्त करने की बहुत अधिक उम्मीद होती है। हम सोचते हैं कि सिर्फ़ आंतरिक प्रकाश और आवाज़ का अनुभव करना ही रूहानी तरक़्क़ी की निशानी है। हम यह मान लेते हैं कि हमारे पास अपनी तरक़्क़ी को आँकने की सूझ है और साथ ही यह भी मान लेते हैं कि थोड़ा-सा भजन-सिमरन करने पर भी हमारी तरक़्क़ी होनी चाहिए।
अपनी रूहानी तरक़्क़ी को आँकने की वजह चाहे कुछ भी क्यों न हो, हम यह भूल जाते हैं कि अनंत जन्मों के दौरान हमने कर्म और अहंकार की बहुत बड़ी दीवार खड़ी कर ली है जिसने हमारी आत्मा के प्रकाश को ढक लिया है। इस दीवार को हटाने में समय लगता है, इसके लिए कोशिश करनी पड़ती है और ध्यान देना पड़ता है।
ख़ुशक़िस्मती से, संतमत में कोई असफलता नहीं होती। महाराज जी भी यही फ़रमाते हैं:
जैसा कि महाराज जी (महाराज सावन सिंह जी) कहा करते थे कि संतमत में नाक़ामयाबी जैसी कोई चीज़ नहीं होती, क्योंकि आप इस राह पर चलने की कोशिश कर रहे हैं।
संत संवाद, भाग 3
भजन-सिमरन करने के कई अन्य कारण हो सकते हैं लेकिन सबसे श्रेष्ठ कारण प्रेम ही है। प्रेम को परिभाषित करना शायद नामुमकिन हो पर जो प्रेम का अनुभव करते हैं, वे जानते हैं कि प्रेम क्या है। प्रेम अनेक रूपों में प्रकट हो सकता है लेकिन असल में वह सिर्फ़ हमारी करनी द्वारा ही ज़ाहिर होता है। शारीरिक स्तर पर प्रेम दया, करुणा, क्षमा, नि:स्वार्थ सेवा और देखभाल के रूप में प्रकट किया जा सकता है। रूहानी स्तर पर, सतगुरु के प्रति प्रेम को भजन-सिमरन के ज़रिए प्रकट किया जाता है।
सतगुरु के प्रति हमारे प्रेम के इज़हार का इससे बेहतर कोई ज़रिया नहीं हो सकता कि हम एकाग्रचित्त होकर, समर्पण और श्रद्धा-भाव से भजन-सिमरन में बैठें। महाराज जी फ़रमाते हैं:
नामदान के वक़्त जब सतगुरु हमें इस मार्ग पर डालते हैं, तो हमें भजन-सिमरन को वक़्त देने की हिदायत देते हैं। अगर हम सतगुरु से सचमुच प्यार करते हैं तो हम उनका हुक्म मानेंगे। अगर हम सतगुरु के उपदेश पर अमल नहीं करते, अपने जीवन को उनके उपदेश के मुताबिक़ ढालने की कोशिश नहीं करते, तो हम यह नहीं कह सकते कि हम सतगुरु से प्यार करते हैं। यह तो सतगुरु के लिये प्यार नहीं है।
संत संवाद, भाग 2
जब भजन-सिमरन को प्रेम से किया जाता है तब इसके प्रति हमारा पूरा नज़रिया बदल जाता है और ऐसा महसूस होता है कि हम सतगुरु के देहस्वरूप की मौजूदगी में बैठे हैं। सतगुरु की मौजूदगी में हम यक़ीनन शारीरिक तौर पर बैठते हैं लेकिन दोनों में समानता यह है कि इसमें भी हम अपने ध्यान को अपने प्रियतम पर केंद्रित करते हैं, उनकी मौजूदगी में हम उनके सिवाए दूसरी हर चीज़ को भूल जाते हैं – ख़ुद को भी। अगर हमें अपने सतगुरु के देहस्वरूप की मौजूदगी में बैठना इतना आसान लगता है तो क्या भजन-सिमरन में बैठते हुए भी हमें ऐसा ही नहीं लगना चाहिए क्योंकि हम मानते हैं उस समय हम शब्द-गुरु की हुज़ूरी में होते हैं?
चूँकि भजन-सिमरन के दौरान हमें अंदर कुछ भी दिखाई नहीं देता इसलिए हमें ऐसा लग सकता है कि यह सतगुरु के देहस्वरूप के दर्शन करने जितना महत्त्वपूर्ण नहीं है। लेकिन यदि हम देहस्वरूप से आगे बढ़कर नूरी स्वरूप तक पहुँच जाएँ तो हमें एहसास होगा कि सतगुरु असल में किस हस्ती के मालिक हैं और हमारे परमार्थी जीवन में उनकी भूमिका कितनी अहम है।
आख़िरकार, हमारा प्रेम और सिमरन ही मायने रखता है। भजन-सिमरन में यह मायने नहीं रखता कि हमें कुछ दिखाई देता है या नहीं। महत्त्वपूर्ण यह है कि इसके बावजूद भी हम अपना सिमरन करते हैं। उन पाँच लफ़्ज़ों को दोहराने से हमारा ख़याल तीसरे तिल पर एकाग्र हो जाता है जहाँ शब्द-गुरु मौजूद हैं। इसी एकाग्र हुए ध्यान द्वारा सतगुरु के प्रति हमारा प्रेम बढ़ता और गहरा होता है।
भजन-सिमरन ही सतगुरु के प्रति प्रेम को ज़ाहिर करने का सर्वोत्तम तरीक़ा है। हमारा अनुशासन, हुक्म का पालन और उनके प्रति समर्पण भी इसी प्रेम को दर्शाता है। यदि हम अपने सतगुरु से प्रेम करते हैं तो यह हमारे कर्मों, हमारे विचारों और उनके प्रति हमारे पूर्ण समर्पण में झलकेगा।
भजन-सिमरन क्यों करना है? सतगुरु के प्रति अपने प्रेम के कारण हम भजन-सिमरन किए बिना रह ही नहीं सकते।
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भजन-सिमरन के बिना आप अपनी इच्छाओं से नहीं लड़ सकते। भजन-सिमरन हमारे हाथ में दी गयी ऐसी तलवार है जिसके द्वारा हम उन सब सांसारिक तृष्णाओं से लड़ सकते हैं, जो हमें वापस इस रचना की ओर खींच रही हैं।
संत संवाद, भाग 2