अमूल्य उपहार
मौजूदा सतगुरु के शिष्य होने के नाते हमें उनसे अमूल्य उपहार मिला है जो उनकी दया-मेहर से भरपूर है। जब हम इस उपहार को खोलते हैं तब इसमें से हमें बिल्डिंग ब्लॉक्स (Building Blocks) मिलते हैं जिन्हें अगर उचित क्रम से एक-दूसरे के ऊपर रखा जाए तो एक ऐसा ढाँचा बन जाता है जो हमारी सुरत को तीसरे तिल और उससे भी परे ले जा सकता है।
पहला ब्लॉक बहुत बड़ा और मज़बूत आधार है, जिस पर ‘मनुष्य-जन्म’ लिखा है। अगर यह ब्लॉक न हो तो बाक़ी ब्लॉकों को जोड़ा ही नहीं जा सकता। दूसरा ब्लॉक ‘देहधारी सतगुरु से मिलाप’ है, उसके बाद तीसरा ब्लॉक आता है जिस पर ‘नामदान’ लिखा है। इन तीन महत्त्वपूर्ण ब्लॉकों के बाद कुछ थोड़े छोटे लेकिन बेहद अहम ब्लॉक आते हैं। चौथा ब्लॉक ‘भजन-सिमरन’ है, इसके बाद शाकाहार, शराब, मादक पदार्थ और तंबाकू आदि से दूर रहना और ‘नैतिक जीवन जीना’ आदि ब्लॉक आते हैं।
आख़िरी दो ब्लॉक पूरे ढाँचे को एक साथ बाँध देते हैं, इन्हें ‘गुरु भक्ति’ कहा जाता है यानी कि गुरु के प्रति श्रद्धा-भक्ति और आख़िरकार ‘नाम भक्ति’ अर्थात् शब्द को सुनना। इस अभ्यास के ज़रिए हम शब्द रूपी जीवन धारा से जुड़ जाते हैं और हमारे अंदर परमात्मा के लिए प्रेम पैदा होने लगता है। जब ये आख़िरी ब्लॉक अपनी-अपनी जगह मज़बूत हो जाते हैं तब बाक़ी के सारे ढाँचे को एक मक़सद और मायना मिल जाता है।
यह अत्यंत दुर्लभ और अमूल्य उपहार परमात्मा की देन है जो उसी के प्रेम और अपार दया-मेहर से मिलता है। इसके लिए हमें तहे दिल से उसके शुक्रगुज़ार होना चाहिए।
ऐसा लगता है कि आजकल मनुष्य-जन्म रूपी इस उपहार की उतनी क़द्र नहीं की जाती। यह कितने दु:ख और अफ़सोस की बात है। संत-महात्मा अकसर मनुष्य को सृष्टि का सिरताज कहते हैं फिर भी लाखों लोग अत्यंत गरीबी, दु:ख और पीड़ा में अपना जीवन गुज़ार रहे हैं जिससे इसे दिया गया इतना ऊँचा दर्जा सही नहीं लगता। फिर भी हमें बताया जाता है कि देवी-देवता, जो दिव्य लोकों में रहते हैं, वे भी मनुष्य-जन्म पाने के अद्भुत अवसर और सौभाग्य के लिए तरसते हैं।
तो आख़िर मनुष्य-जन्म में ऐसा क्या है जो इसे इतना ख़ास बनाता है? वह ख़ास बात यह है कि सिर्फ़ मनुष्य के जामे में ही हमारा मिलाप किसी पूर्ण सतगुरु से हो सकता है और हमें उनसे नामदान की बख़्शिश प्राप्त हो सकती है। इस उपहार के मिलने पर हमारी तरफ़ से की गई कोशिश इस बात की गारंटी है कि हमारी आत्मा जो कि बहुत लंबे समय से जन्म-मरण और पुनर्जन्म के चक्र में फँसी हुई है आख़िरकार इस चक्र से मुक्ति पा लेती है। केवल पूर्ण सतगुरु, जो स्वयं परमात्मा की पहचान कर चुके हैं, ही हमें यह उपहार दे सकते हैं और यह दात केवल मनुष्य को ही दी जा सकती है। महाराज चरन सिंह जी अपनी पुस्तक जीवत मरिए भवजल तरिए में फ़रमाते हैं:
हमारा सच्चा गुरु है वर्ड, लॉगॉस, नाम, शब्द, चेतन धुन या जो भी नाम कोई उसे देना चाहे। सतगुरु उस शब्द का, उस शक्ति का देहधारी स्वरूप है।
पूर्ण सतगुरु इस संसार में परमात्मा के दूत या प्रतिनिधि बनकर आते हैं। वह परमात्मा के प्रेम की साकार मूरत होते हैं और उन्हें हमारी आत्माओं को शब्द से जोड़कर हमें हमारे सच्चे घर वापस ले जाकर परमात्मा में अभेद करने की शक्ति प्राप्त होती है। यह संबंध नामदान के समय से ही जुड़ जाता है।
जब हमें नामदान रूपी उपहार प्राप्त होता है तो सतगुरु हमें यक़ीन दिलाते हैं कि हमारी इस सृष्टि में आवागमन की अंतहीन यात्रा समाप्त हो जाएगी और हम निज-घर वापस जाने के क़ाबिल बन जाएँगे। फिर हमें कभी भी इस रचना में वापस नहीं आना पड़ेगा क्योंकि असल में परमात्मा भी यही चाहता है कि हम वापस उसके पास लौट जाएँ। जब हमें नामदान की बख़्शिश हो जाती है फिर कुछ भी हमें घर वापस जाने से नहीं रोक सकता।
पहले तीन बिल्डिंग ब्लॉकों – मनुष्य-जन्म, सतगुरु और नामदान का मिलना – में से कुछ भी हमें हमारी अपनी कोशिशों से प्राप्त नहीं होता। ये परमात्मा की तरफ़ से मिले उपहार हैं। लेकिन अगले ब्लॉकों के लिए हमें अपनी तरफ़ से कोशिश, एकाग्रता, करनी और लगन की ज़रूरत है।
नामदान के समय जब हम चार प्रण लेकर उन्हें निभाने का वायदा करते हैं तब हम जीवन-भर निरंतर यत्न करते हुए ख़ुशी-ख़ुशी अपने सतगुरु के हुक्म का पालन करने के लिए वचनबद्ध हो जाते हैं। सबसे अहम कार्य जिसकी उम्मीद सतगुरु हमसे रखते हैं, वह है हमारा रोज़ाना का भजन-सिमरन। नामदान के समय हमें भजन-सिमरन करने की युक्ति समझाई जाती है और इसे जीवन-भर रोज़ाना बिना नाग़ा करते रहना हमारा फ़र्ज़ भी है और सौभाग्य भी।
नामदान सिर्फ़ एक रूहानी उपहार ही नहीं है बल्कि हमारे लिए एक अत्यंत शक्तिशाली साधन भी है। सतगुरु हमें पाँच शब्दों या नामों का भेद देते हैं जिन्हें दोहराने को सिमरन करना कहा जाता है। हमें बताया जाता है कि अभ्यास के पहले दो घंटे इन शब्दों को दोहराना है। इन शब्दों में इतनी ताक़त होती है कि पहले जिस मन को स्थिर करना नामुमकिन लगता था, सिमरन द्वारा उसके स्थिर होने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। इससे हम अपने ख़याल को तीसरे तिल पर एकाग्र करने के लायक़ बन जाते हैं जो कि दोनों आँखों के बीच, थोड़ा ऊपर स्थित रूहानी केंद्र है।
सिमरन सतगुरु द्वारा बख़्शा गया वह साधन है जिससे हम अपने ख़याल को दुनिया में से निकालकर तीसरे तिल की ओर ले जाते हैं। अगर हम सिमरन नहीं करते हैं तो हम अपने ख़याल को अंदर एकाग्र नहीं कर पाएँगे और अपने वास्तविक अंदरूनी रूहानी सफ़र का पहला छोटा-सा क़दम भी नहीं उठा पाएँगे। जितना ज़्यादा सिमरन हम करते हैं यह उतना ही शक्तिशाली होता जाता है।
भजन-सिमरन का अभ्यास हमारी तरफ़ से दिया जानेवाला अहम योगदान है – हमारी तरफ़ से की गई यह कोशिश सतगुरु द्वारा हमें इस दुनिया से बाहर निकालने और वापस घर ले जाने में सहायक होती है। सख़्ती से शाकाहार का पालन करना, शराब, मादक पदार्थों और तंबाकू से बने उत्पादों से परहेज़ करना तथा अच्छे इनसान बनने का प्रयास करना हमारी तरफ़ से दिए जानेवाले अन्य योगदान हैं। ऐसा करने से हम कर्मों का कम से कम बोझ इकट्ठा करते हैं।
परमात्मा निर्मलता, प्रेम, करुणा और दया का परम स्रोत है। यदि हम नकारात्मकता, क्रूरता, क्रोध, घृणा, द्वेष और असंतोष से भरे हुए हैं तो हम उसके दरबार में पहुँचने की आशा कैसे कर सकते हैं? यदि हमारे अंदर परमात्मा से मिलाप की चाह है तो हमें मन, वचन और कर्म से निर्मल होने की कोशिश करनी पड़ेगी।
मन और मन की नकारात्मक प्रवृत्तियों के खिलाफ़ इस लड़ाई में हम निहत्थे नहीं हैं। हमारे पास सिमरन की शक्ति है। इस बात को याद रखते हुए हमें सिमरन करते रहना है।
अंतिम दो ब्लॉक – भक्ति अर्थात् गुरु भक्ति और फिर सबसे महत्त्वपूर्ण, नाम भक्ति – हमारे रूहानी ढाँचे को मज़बूत करते हैं, जिससे हमारी सुरत तीसरे तिल और उससे भी ऊपर उड़ान भरने के लायक़ बन जाती है। स्वामी जी महाराज पुस्तक सारबचन संग्रह में फ़रमाते हैं:
गुरुमुखता बिन सुरत न चढ़ती। फूटे गगन न पावे नाम॥
गुरुमुखता है मूल सबन की। और साधन सब शाखा जान॥
जो लोग पुनर्जन्म और आत्मा के अनगिनत योनियों में जन्म लेने के सिद्धांत में विश्वास रखते हैं, उनके लिए जन्म-मरण और पुनर्जन्म के इस अंतहीन चक्र से हमेशा के लिए मुक्ति पाने का विचार सचमुच बहुत ही रोमांचक है। यक़ीनन कोई भी इस चक्र में ही फँसे रहना पसंद नहीं करेगा। हम अपने घर वापस जाना चाहते हैं; हमारी आत्माएँ अपने परमपिता से मिलने के लिए तड़प रही हैं ताकि दु:खों से भरे इस संसार से हमेशा के लिए छुटकारा पाकर परमात्मा के शाश्वत प्रेम में सदा के लिए समा सकें।
सिर्फ़ अपनी कोशिशों के दम पर इस कार्य को पूरा कर पाना नामुमकिन लग सकता है और ऐसा सच में है भी लेकिन हम अकेले नहीं हैं। हमारे पास एक ऐसा साधन है जिससे आत्मा अपने रुख़ को दुनिया की ओर से मोड़कर निज-घर वापसी का सफ़र तय कर सकती है।
भक्ति सतगुरु और शिष्य के बीच एक अद्भुत रिश्ता क़ायम करती है। यह हृदय और मन की एक अवस्था है। यह हमारे अंदर प्रेम और विरह पैदा करती है और विश्वास, हुक्म मानने, अनुशासन, धैर्य, समर्पण और कृतज्ञता को बढ़ाती है। भक्ति हमें अपने सतगुरु की हिदायतों का पालन करने और इस मार्ग पर चलने के लिए हमें समय और ध्यान देने के लिए प्रेरित करती है।
सिमरन ऐसी बहुमूल्य दात है जिसका लाभ हम सिर्फ़ भजन-सिमरन के वक़्त ही नहीं बल्कि पूरा दिन उठा सकते हैं। जितने ज़्यादा प्रेम और कृतज्ञता भरे दिल से हम सिमरन करते हैं, यह हमारे लिए उतना ही उपयोगी सिद्ध होता है। सिमरन के इस उपहार के लिए ही नहीं बल्कि भजन-सिमरन के पूरे अभ्यास के लिए हमें बहुत ज़्यादा आभारी होना चाहिए। भजन-सिमरन करने से प्रेम और श्रद्धा बढ़ती है। अगर हम हर बार भजन-सिमरन पर बैठते समय सतगुरु द्वारा दिए गए इस मौक़े के लिए आभार प्रकट करें तो हम पूरा दिन प्रेम और कृतज्ञता से भरे रहते हैं।
हम जानते हैं कि हमें इस दुनिया से मुक्त करवाकर निज-घर पहुँचाने के लिए जितने अधिक यत्न की ज़रूरत है, हमारी कोशिशें उसकी तुलना में रत्ती-भर भी नहीं। असल में होना तो सब कुछ सतगुरु की दया-मेहर से ही है लेकिन हम अपनी तरफ़ से कृतज्ञता, प्रेम और विश्वास अर्पित कर सकते हैं, इस बात को जानते हुए कि उन्होंने हमारी आत्मा को निज-घर ले जाने की ज़िम्मेदारी ली है और एक न एक दिन वह हमें वहाँ ज़रूर ले जाएँगे।
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जिन पर वह परमात्मा अपनी दया-मेहर करना चाहता है, उनको मनुष्य-जन्म की दात मिलती है। इन भाग्यशाली जीवों में से वह चुने हुए जीवों का ध्यान अपनी ओर खींचता है। ये ही वे आत्माएँ हैं जिन्हें वह कुलमालिक अपनी असीम कृपा द्वारा माया के भ्रमजाल से छुड़ाना चाहता है।
जीवत मरिए भवजल तरिए