और कुछ भी मायने नहीं रखता
हम सब इनसानों की कमज़ोरी है कि हम जीवन के नाटक और मुसीबतों में इतने उलझ जाते हैं कि हम सबसे अहम चीज़ को नज़रअंदाज़ कर देते हैं। रूहानियत के खोजी होने के नाते, हमारी असल प्राथमिकता क्या है? हुज़ूर महाराज चरन सिंह जी पुस्तक संत संवाद, भाग 2 में फ़रमाते हैं:
हम परमात्मा को हमेशा वही वक़्त देने की कोशिश करते हैं जब हमारे पास कोई दूसरा काम नहीं होता। जब हम समाज द्वारा, अपने बच्चों द्वारा, अपने दोस्तों द्वारा ठुकरा दिये जाते हैं, तब हम अपना वक़्त परमात्मा की भक्ति में लगाना चाहते हैं, जबकि हमें अपने जीवन का सबसे अच्छा वक़्त परमात्मा को देना चाहिये।…मनुष्य-जन्म का असली मक़सद परमात्मा के पास वापस जाना है, इसलिये हमें इस मक़सद को हमेशा याद रखना चाहिये। इस मक़सद को पहल देनी चाहिये, बाक़ी सब काम अपने आप होते रहेंगे।
हम अपनी पूरी ज़िंदगी रूहानियत के लिए सही समय के इंतज़ार में बिता देते हैं। शायद हमें यह लगता है कि जीवन में कभी न कभी ऐसे उचित हालात होंगे जब हम अपने रूहानी मक़सद को पूरा कर पाएँगे। ऐसी सोच के कारण हम इसे टालते ही रहते हैं।
हम अकसर कम महत्त्वपूर्ण चीज़ों को निपटाने में ज़रूरत से ज़्यादा समय बिता देते हैं – जैसे कि हमारे कर्तव्य और ज़िम्मेदारियाँ, जिन्हें वक़्त देना ज़रूरी होता है, यहाँ तक कि हम भजन-सिमरन को प्राथमिकताओं की सूची में सबसे आख़िरी स्थान पर रखते हैं। हम सोचते हैं कि जब हम बाक़ी सब कुछ निपटा लेंगे तब भजन-सिमरन का आनंद लेंगे, लेकिन हमारा पूरा समय कर्तव्यों, ज़िम्मेदारियों और सांसारिक सुखों को भोगने में व्यतीत हो जाता है और दिन ख़त्म होने पर हमें यह एहसास होता है कि हमें भजन-बंदगी के लिए तो समय ही नहीं मिला। जबकि असल में भजन-बंदगी के अलावा और कुछ भी मायने नहीं रखता।
सभी संत-सतगुरुओं ने सत्संगी के जीवन में भजन-सिमरन की अहमियत पर बहुत अधिक ज़ोर दिया है। यह हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता होना चाहिए। बाक़ी सब कुछ इसके बाद आता है। कम अहमियत रखने वाली चीज़ों के बजाय ज़्यादा महत्त्वपूर्ण चीज़ों को पहल देनी चाहिए। इसीलिए हर बार जब हम भजन-सिमरन के लिए बैठते हैं तब हमें इस बात का एहसास होना चाहिए कि उस समय हम वह ज़रूरी काम कर रहे होते हैं जिसके लिए हमें यह इनसानी जामा मिला है। भजन-सिमरन किए बिना हम जन्म-मरण के चक्र में ही फँसे रहेंगे। एक बार जब मौजूदा सतगुरु हम पर नामदान की बख़्शिश कर देते हैं फिर भजन-बंदगी से ज़्यादा अहम कुछ भी नहीं होता।
हम सब जानते हैं कि नियमित रूप से भजन-सिमरन करते रहना आसान नहीं होता। भजन-सिमरन में ऐसे दौर भी आते हैं जब यह बिलकुल नीरस लगता है और इसे करने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। सालों-साल हम इस मार्ग पर आहिस्ता-आहिस्ता चलते जाते हैं और हमें कोई रूहानी तरक़्क़ी दिखाई नहीं देती। कभी-कभी तो हम यह सब कुछ छोड़ने के लिए तैयार हो जाते हैं। फिर भी, रोज़मर्रा का हमारा यह प्रयास व्यर्थ नहीं जाता क्योंकि इसके एवज़ में सतगुरु लगातार हम पर दया-मेहर बरसाते रहते हैं।
संघर्ष और नीरसता के इस दौर में से गुज़रते हुए हमें निराश नहीं होना चाहिए। रूहानी ख़ुशी का महसूस होना ज़रूरी नहीं कि रूहानी तरक़्क़ी का ही संकेत हो। हो सकता है कि जब हमारा मन बेचैन हो और हम फिर भी भजन-सिमरन करते रहें तब हम ज़्यादा तरक़्क़ी कर रहे हों। बेहतर यही है कि हम सतगुरु पर और ख़ुद पर पूरा यक़ीन रखें कि हमें सफलता ज़रूर मिलेगी। अगर हम इसे करने के योग्य नहीं होते तो सतगुरु ने हमें नामदान की बख़्शिश ही नहीं करनी थी।
किसी भी हालात में, हमें यह नहीं पता चलता कि हम कितनी तरक़्क़ी कर रहे हैं। महाराज सावन सिंह जी परमार्थी पत्र, भाग 2 में अपने एक शिष्य को समझाते हैं:
हर सच्चे अभ्यासी की आत्मा अन्दर तरक़्क़ी कर रही होती है, भले ही उसे इस बात का पता न चले। हाँ, सत्संगी की आत्मा ब्रह्माण्ड में जा सकती है भले ही सत्संगी इसके बारे में सजग न हो।
सतगुरु समझाते हैं कि हमारा नज़रिया आशावादी होना चाहिए। हमारे नज़रिए का हमारे रूहानी जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है? कई साल भजन-सिमरन करने पर भी थोड़ी-बहुत रूहानी तरक़्क़ी होने पर शायद हम यह मानने लग जाएँ कि इसमें सफल होना इतना आसान नहीं है। इसीलिए यह समझना ज़रूरी है कि भजन-सिमरन के प्रति हमारा नज़रिया ही यह तय करता है कि हम कितनी रूहानी तरक़्क़ी करेंगे। जब हम भजन-सिमरन में बैठते हैं तब हम मालिक की रज़ा में रहना, दुनियावी चीज़ों को जाने देना और निर्लेप होना सीख रहे होते हैं। यह उस परम शक्ति के हुक्म में रहना है, जिसे हम ‘मैं’ से कहीं अधिक महान मान चुके हैं।
भजन-सिमरन अंतर में बदलाव लाता है। भजन-बंदगी करते समय ख़याल को भजन-सिमरन में रखना सबसे अहम है। फिर चाहे कुछ भी हो जाए, हम अपना संतुलन नहीं खोते हैं और हम पर उन तूफ़ानों का कोई असर नहीं होता जिनका सामना हमें इस जीवन में करना पड़ता है। लेकिन हमें कभी भी कोशिश करना नहीं छोड़ना चाहिए क्योंकि धीरे-धीरे होनेवाला यह आंतरिक बदलाव ही पूरे बाहरी कायाकल्प का आधार है।
अगर हमें नामदान की बख़्शिश हो चुकी है और हमने भजन-सिमरन नहीं किया या हमने इसे करना शुरू तो किया था लेकिन इसे करना बंद कर दिया है तो हमें सकारात्मक सोच और व्यावहारिक नज़रिए के साथ फिर से भजन-सिमरन करने के लिए दृढ़ संकल्प लेना होगा। अहम यह है कि हम जितना वक़्त दे सकते हैं, कम से कम उतना वक़्त देकर शुरुआत तो करें। फिर धीरे-धीरे और दृढ़ता से हम उस समय को बढ़ा सकते हैं बजाय इसके कि हम एक या दो दिन पूरे ढाई घंटे भजन-सिमरन को दें और फिर इसे कम करते हुए दस मिनट पर आ जाएँ या फिर बिलकुल ही भजन-सिमरन न करें। यह तरीक़ा ठीक नहीं है। सही तरीक़ा यह है कि इसे सहज भाव से नियमपूर्वक करते रहें, थोड़ा-थोड़ा समय बढ़ाते जाएँ।
कुछ दिन ऐसे भी हो सकते हैं जब हम नियमपूर्वक भजन-सिमरन को वक़्त नहीं दे पाते क्योंकि हमारा शरीर साथ नहीं देता। ऐसे दिनों में हमें कम से कम थोड़ी देर के लिए बैठने की कोशिश ज़रूर करनी चाहिए। हमें किसी भी दिन भजन-सिमरन में नाग़ा नहीं डालना चाहिए। अगले दिन हमें फिर से पहले की तरह भजन-सिमरन करना चाहिए। वर्ना हो सकता है कि हमारे कई दिन, हफ़्ते, महीने या यहाँ तक कि कई साल बिना भजन-सिमरन किए बीत जाएँ। इसीलिए आदत डालना बहुत ज़रूरी है।
हो सकता है कि भजन-सिमरन के दौरान हम अपने ख़याल को अच्छी तरह से एकाग्र न कर पाएँ और मन लगातार भटकता रहे लेकिन महत्त्वपूर्ण यह है कि हमने भजन-सिमरन को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाना है। हम जितना ज़्यादा भजन-सिमरन करते हैं यह उतना ही बेहतर होता जाता है। महाराज जी हमें अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश करने की प्रेरणा देते हैं चाहे हम ख़याल को पूरी तरह से एकाग्र न भी कर पाएँ। अगर एकाग्रता न भी हासिल हो पाए और हमारा मन भटकता रहे तो भी हमें निराश नहीं होना चाहिए।
इस समय हम चेतना के जिस स्तर पर हैं, हमारा यह स्वीकार करना कि सब कुछ हमारे सतगुरु के हाथ में है, महज़ एक ख़याल है। जब हमारे अंदर सतगुरु का नूरी स्वरूप प्रकट हो जाता है तब हमें इस बात का पक्का यक़ीन हो जाता है कि सब कुछ उनके हाथ में है। तब हमें इस बात की समझ आती है कि ज़िंदगी हमारे बारे में नहीं है। परमात्मा ही हमारे ज़रिए सब कुछ अनुभव कर रहा है। परमात्मा हमारे अवगुणों को नहीं बल्कि हमारे रूहानी सामर्थ्य को देखता है। वह सिर्फ़ यही चाहता है कि हम अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान लें।
हमारा अहंकार उन बहुत-सी बाधाओं में से एक है जो हमें सच्चे प्रेम और परमात्मा के साथ एकता का अनुभव नहीं होने देता। जब हम अपने आप को परमात्मा से अलग समझते हैं तब द्वैत पैदा होता है। जहाँ द्वैत है, वहाँ अंहकार है और अहंकार का कारण यह अज्ञानता है कि हम जानते ही नहीं कि हम असल में कौन हैं। हम अपने असल वजूद को भूल चुके हैं। हमारा अहंकार वह मुखौटा है जिसने हमारे असल स्वरूप को छुपा दिया है। जब तक हम अहंकार के इस मुखौटे को उतार नहीं लेते, हम अपने सच्चे स्वरूप को पहचानने के क़ाबिल नहीं बन पाते।
परम चेतना के महासागर में समा जाने पर हम अपनी पहचान नहीं खो देते बल्कि हम अपने असल स्वरूप को पहचान लेते हैं कि हम निर्मल चेतना, पूर्ण आनंद और असीम प्रेम का रूप हैं। हमारी हस्ती है ही क्या, जिसे खो देने से हम इतना डरते हैं? इस अंधकारमय दुनिया में, अपने असल वजूद से जुदा होकर संतुष्ट रहने में क्या समझदारी है जबकि हम अमर-अविनाशी बन सकते हैं?
अपने बारे में सोचने के बजाय सिमरन करने से और भजन-सिमरन के समय अपने अहं को सतगुरु के आगे समर्पित कर देने से एक न एक दिन द्वैत की दीवार ख़ुद-ब-ख़ुद ढह जाती है। भ्रम का पर्दा हट जाता है और हमें अनुभव हो जाता है कि हम असल में कौन हैं। जब हम अपने प्रियतम को लगातार याद करते हैं तब हमारे अंदर उसके लिए लगाव और प्रेम पैदा होने लगता है और हमारे अहं या आपाभाव का नाश हो जाता है। तब हमें समझ आती है कि सब कुछ वही कर रहा है।
अपनी अलग हस्ती को मिटा देना ही प्रेम का बुनियादी उसूल है। प्रियतम की इच्छा ही प्रेमी की इच्छा बन जाती है। प्रेमी का पूरा वजूद प्रियतम में समा जाता है। जब हमारा अपना ही कोई वजूद बाक़ी नहीं रहा तब इच्छाएँ कहाँ से बाक़ी रह जाएँगी?
परमात्मा तक पहुँचने के लिए हमें सिर्फ़ तीसरे तिल तक पहुँचने की कोशिश करनी चाहिए। उसके बाद जैसा कि हमें बताया गया है, बाक़ी सब कुछ परमात्मा स्वयं करता है। वह हमारे अंदर इतनी विरह और जुदाई की तड़प पैदा कर देता है और हम पर ऐसी दया-मेहर बरसाता है कि आत्मा के पास परमात्मा की ओर खिंचे चले जाने के अलावा कोई चारा नहीं रहता। भजन-सिमरन के महत्त्व यानी कि अपनी अलग पहचान खोकर परमात्मा का रूप बन जाने की प्रक्रिया के बारे में, आओ हुज़ूर महाराज जी के इन शब्दों को याद करें:
संतमत के अनुसार अपने जीवन को ढालें और भजन-सुमिरन करते रहें। बस, इसी की ज़रूरत है। भजन-सुमिरन से ही प्रेम उत्पन्न होगा, इसी से नम्रता और समर्पण की भावना पैदा होगी। सब कुछ भजन-सुमिरन से ही होगा।
जीवत मरिए भवजल तरिए