प्रसाद का तोहफ़ा
एक अंश
प्रसाद असल में उसके लिये होता है जिसे दिया जाता है। इससे हमें सतगुरु की, उनके उपदेश की याद आनी चाहिये। इससे प्रेम और भक्ति पैदा होनी चाहिये। यह शिष्य और सतगुरु के बीच की एक कड़ी है। जब हम प्रसाद खाते हैं तो हमेशा सतगुरु को, उनके उपदेश को याद करते हैं। इस नज़रिये से यह बहुत फ़ायदेमंद है। लेकिन अगर आप इसे केवल एक रस्म की तरह लेते हैं कि शायद इसे खाने से आप पर दवा जैसा असर हो जायेगा या कोई रूहानी प्रभाव होगा, तो आप अपने आप को धोखा दे रहे हैं। यह तो इस बात पर निर्भर करता है कि आप प्रसाद को किस नज़रिये से लेते हैं। बात तो आपके नज़रिये की है।
हम अकसर अपने यार-दोस्तों से तोहफ़े लेते और देते हैं। तोहफ़े की क़ीमत पैसों से नहीं आँकी जा सकती। तोहफ़े की क़ीमत आप उस प्यार से आँकते हैं जिसके कारण आपको तोहफ़ा दिया गया है, क्योंकि तोहफ़ा आपको देनेवाले की, उसके गुणों की, उसकी दोस्ती की, उसके प्यार की और आपके प्रति उसकी सद्भावना की याद दिलाता है। इसलिये अहमियत तो आपके प्रति उसके प्यार की, उसके सद्गुणों की, आपके लिये उसकी सद्भावना की है, तोहफ़े की नहीं।…
इसी तरह जब हम प्रसाद को परमपिता परमात्मा की, सतगुरु की बख़्शिश के रूप में लेते हैं, तो इससे मन में सतगुरु की, उनके उपदेश की याद आनी चाहिये, परमात्मा के लिये भक्ति-भाव और प्यार पैदा होना चाहिये और संतमत के उसूलों पर चलने की ताक़त मिलनी चाहिये, अपने जीवन को उन उसूलों के मुताबिक़ ढालने तथा भजन-सिमरन करने की शक्ति मिलनी चाहिये। तभी प्रसाद का फ़ायदा होता है।
अगर आप प्रसाद को केवल मिश्री या मिठाई समझकर खायें तो यह बस मिठाई ही है। इसलिये प्रसाद को विश्वास के साथ खाना चाहिये और इसी विश्वास से आपको संतमत के उसूलों के मुताबिक़ ज़िंदगी बिताने की ताक़त मिलती है। अगर आप प्रसाद अपने रिश्तेदारों को देंगे तो उनके लिये इसकी कोई अहमियत नहीं होगी, क्योंकि उनके अंदर वह विश्वास नहीं होगा। इसलिये उनके लिये यह केवल मिठाई ही होगी। असल में प्रसाद सिर्फ़ उसके लिये ही होता है जिसे दिया जाता है; यह दूसरों में बाँटने के लिये नहीं दिया जाता। यह तो एक निजी दौलत है जिसकी निजी दौलत की तरह ही क़द्र करनी चाहिये।…
असल में प्रसाद उसी के लिये होता है जिसे दिया जाता है। यह उस व्यक्ति पर निर्भर करता है कि वह इसका इस्तेमाल कैसे करना चाहता है। आम तौर पर यह आपको उसकी याद दिलाता है जिसने यह दिया है। यह तो लेनेवाले और देनेवाले के बीच की बात है। इसकी अहमियत उनके रिश्ते में होती है, प्रसाद हमें उस रिश्ते की याद दिलाता है। आप अपने प्रियतम को एक फूल देते हैं। उस फूल में ऐसा क्या ख़ास है जो गुलाब के बग़ीचे के दूसरे फूलों में नहीं है? सारा बग़ीचा फूलों से भरा हुआ है, लेकिन वह फूल आपके लिये क़ीमती क्यों हो जाता है? क्योंकि वह देनेवाले और जिसे दिया गया है उनके बीच की बात है। वह रिश्ता ख़ूबसूरत है। असली अहमियत उस रिश्ते की है, न कि फूलों की। फूल तो आपको किसी भी बग़ीचे से मिल सकते हैं।