उपेक्षित आत्मा
“द मिस्टिक फ़िलॉसफ़ी ऑफ़ संत मत” में से लिया गया निम्नलिखित दृष्टांत इस पुस्तक में दर्ज कहानी का संक्षिप्त रूप है जिसमें लेखक दो भाइयों के बारे में बताता है: बड़ा भाई, एक अमीर और बहुत प्रतिष्ठित व्यापारी है जो एक बहु-मंज़िला हवेली में रहता है जबकि छोटा भाई दयनीय, निर्बल, दुबला-पतला इनसान है जिसकी बड़ी-बड़ी आँखें डर, दर्द और दु:ख से भरी रहती हैं। वह हमेशा दर्द भरा एक गीत गुनगुनाता रहता है।
कई साल पहले, अपने प्रतिष्ठित दोस्तों के सामने अपने छोटे भाई की वजह से शर्मिंदा होकर अमीर व्यापारी ने अपने नौकरों को बुलाकर अपने छोटे भाई को हवेली से निकालने का आदेश दे दिया था। लेकिन नौकरों ने ऐसा न करके उसे हवेली में ही छुपा दिया।
आख़िरकार, छोटे भाई द्वारा गाए जानेवाले दिल को छू लेने वाले गीत ने बड़े भाई की जिज्ञासा को जगा दिया। जाँच करने पर उसे पता चलता है कि दिल को छू लेने वाले इस गीत को कोई और नहीं बल्कि उसका छोटा भाई ही गा रहा है जिसे परछत्ती पर एक क़ैदी की तरह रखा गया था।
अपने भाई के साथ किए गए बर्ताव का एहसास होने पर वह दुखी होकर हवेली छोड़कर चला जाता है। बेचैन होने के कारण वह रोते हुए पास ही के जंगल में रुक जाता है तभी वहाँ से गुज़रने वाला एक भिक्षुक उससे उसकी परेशानी की वजह पूछता है। वह उसे सारा किस्सा सुनाता है जिसे सुनकर वह उसे नसीहत देता है कि वह अपने भाई को हर रोज़ मिले और धीरे-धीरे प्रेम से उसे अपना दोस्त बना ले। फिर वह उसे अपने फटे-पुराने कपड़े पहनने को देता है ताकि जब वह अपने ग़रीब भाई से मिले तो उसकी धन-दौलत की वजह से उसके अंदर हीन भावना न आए।
इस तरह दोनों भाई फिर से मिल जाते हैं और हवेली को छोड़कर ‘सचखंड’ नामक सुंदर देश के लिए निकल जाते हैं।
यह कहानी हमारे मन और आत्मा के संबंध का प्रतीकात्मक चित्रण है। अमीर और प्रतिष्ठित व्यापारी भाई मन का प्रतीक है जबकि छोटा भाई आत्मा का। आत्मा शरीर रूपी हवेली में कारावास का दु:ख भोगती है जहाँ ताक़तवर मन जो ख़ुद इंद्रियों और उनकी अधूरी इच्छाओं के अधीन है आत्मा को बंदी बनाकर रखता है। यह कहानी दर्शाती है कि मन ने किस प्रकार आत्मा को अपने क़ाबू में किया हुआ है।
मन और आत्मा का यह संबंध इस रचना के हर जीव का अभिन्न हिस्सा है। दोनों एक ही शरीर में रहते हुए एक ही घर में रहनेवाले दो भाइयों की तरह हैं। दोनों को एक-दूसरे की मौजूदगी का अहसास है लेकिन दोनों का रुझान अलग-अलग दिशाओं में है – एक का बाहर की तरफ़, दूसरे का अंदर की ओर।
यह दो भेड़ियों की कहानी जैसा है – एक को तो हम ख़ूब पोषित करते हैं जबकि दूसरे की ओर ज़्यादा ध्यान नहीं देते। अफ़सोस कि हम मन का पोषण करते हैं, आत्मा का नहीं। हमारे रिश्ते-नाते, दुनियावी इच्छाएँ और रंग-तमाशे हमारे ध्यान को संसार की तरफ़ खींचते हैं क्योंकि हम इनमें से सुख पाना चाहते हैं। इस तरह हम अपनी आत्मा की पुकार को अनसुना कर देते हैं।
सभी धर्म और परमार्थी मान्यताएँ अमर-अविनाशी आत्मा को ही हर जीवित प्राणी का आधार मानती हैं। यह एक जीवनदायिनी शक्ति है जो निराकार है। आत्मा के बिना शरीर बिना सॉफ़्टवेयर का कंप्यूटर या बिना बिजली का बल्ब है। आत्मा के शरीर में प्रवेश करने पर शरीर जीवंत होता है; आत्मा ही शरीर में प्राणों का संचार करती है।
हालाँकि आत्मा परमात्मा का अंश है लेकिन हम अकसर इसे अनदेखा कर देते हैं – हम इसकी ओर ध्यान ही नहीं देते। फिर भी यह परमात्मा का अंश है इसकी वजह से ही हर जीवित प्राणी का अस्तित्व और महत्त्व है। जैसा कि स्कॉटिश लेखक जॉर्ज मैकडॉनल्ड ने कहा: “तुम्हारे पास आत्मा नहीं है, तुम आत्मा ही हो – तुम्हारे पास शरीर है।”
आत्मा परमात्मा का ही रूप है। इस कारण इसमें परमात्मा जैसे सभी गुण मौजूद हैं: यह परमात्मा की तरह अमर है और बिना किसी शर्त के प्यार करती है। यह हमारा वह अंदरूनी हिस्सा है जिसे हमारी सूक्ष्म रूहानी ताक़तों का बोध है। आत्मा अमर-अविनाशी है – सिर्फ़ हमारा शरीर ही मृत्यु का अनुभव करता है।
लेकिन परमात्मा ने हमारे साथ लुका-छिपी का अद्भुत खेल खेला है। उसने आत्मा को इस सारी रचना में भिन्न-भिन्न आवरणों के नीचे छुपा दिया है।
जिन्हें वह परमात्मा अपने में अभेद करना चाहता है वह उनके अंदर अपने मिलाप की तड़प और खोज की इच्छा पैदा कर देता है जिसमें हमारी आत्मा की पहचान भी शामिल है। लेकिन यह कार्य इतना आसान नहीं है। यह उतना ही कठिन है जैसे किसी बहुत बड़े जिगसा पज़ल (jigsaw puzzle) के टुकड़ों को जोड़कर छिपी हुई तस्वीर को सामने लाने का प्रयास करना।
आत्मा की पहेली को सुलझाना इसलिए मुश्किल है क्योंकि अभी तक हम अपनी आत्मा से नहीं जुड़ पाए। क्यों? पहली वजह यह कि आत्मा इतनी सूक्ष्म और गुप्त रूप से छिपी हुई है कि हमें उसके होने का बोध नहीं है। दूसरी वजह यह कि हम दुनिया के शोरगुल में इतना खो गए हैं और हमारा दृष्टिकोण इतना सीमित है कि हम आत्मा के रूहानी स्वरूप को जान ही नहीं पाते। फलस्वरूप आत्मा को पहचानने का काम पज़ल के टुकड़ों को जोड़ने की तरह असंभव-सा लगता है।
दो भाइयों की कहानी में हमारी आत्मा को दयनीय और बेबस दिखाया गया है। लेकिन असल में, यह कोई निष्क्रिय हस्ती नहीं है जिसका निवास हमारे शरीर की परछत्ती – माथे में है। यह एक सकारात्मक और उद्देश्यपूर्ण शक्ति है जो हमारी हस्ती का आधार है। यह निर्मल चेतना है, परमात्मा रूपी सागर की एक बूँद है। यह वह शक्ति है जिसकी ओर ध्यान देने की ज़रूरत है और अपने ख़याल को अंदर अपनी आत्मा और सतगुरु के नूरी स्वरूप की ओर मोड़ने की ज़रूरत है।
जब दुनिया ही हमारे ख़यालों में रहती है और हम रोज़ का अपना सिमरन-भजन नहीं करते हैं तब हम अपनी आत्मा को नज़रअंदाज़ कर रहे होते हैं। जब हमारा ध्यान दुनिया की ओर होता है और हम दुनियावी शक़्लों-पदार्थों में पूरी तरह से खो जाते हैं तब हम दुनियादार बन जाते हैं। जब हमारा ध्यान आत्मा की ओर मुड़ता है तब हमारी वृत्ति परमार्थी हो जाती है।
सिमरन वह महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है जिससे हम दुनियावी सिमरन को परमात्मा के सिमरन में बदल सकते हैं और यह हमारे मन पर एक गहरी छाप छोड़ देता है। वह छाप दुनियावी हो या परमार्थी, यह चुनाव हमें करना है। लेकिन असल में हम अपने मन पर लगातार किस छाप को गहरा कर रहे हैं? हम किस भेड़िये का पोषण कर रहे हैं – मन का या आत्मा का? दुनियावी विचारों और सिमरन के बीच चुनाव करना मुश्किल नहीं है फिर भी यह एक ऐसा चुनाव है जिसे हम नियमित रूप से नहीं करते।
यह सब इस बात की ओर इशारा करता है कि हमारा सिमरन सतगुरु की शक्ति से भरपूर असाधारण रूहानी वरदान है। असल में परमात्मा के नाम को इसलिए दोहराना है ताकि परमात्मा के साथ हमारा रिश्ता गहरा हो सके। इससे हम आत्मा के प्रति सचेत होने लगते हैं और सतगुरु की दया-मेहर को ग्रहण करने लायक़ बन जाते हैं। यह परमात्मा के लुका-छिपी के खेल को समझने का ज़रिया है।
हम इस रूहानी मार्ग को इसलिए अपनाते हैं ताकि हम परमात्मा की पहचान कर पाएँ, लेकिन सबसे पहले हमें अपनी आत्मा के रहस्य को समझना पड़ेगा। इसलिए हमारा लक्ष्य यह होना चाहिए कि हम इस मनुष्य शरीर को ज़रिया बनाकर अपनी आत्मा को शरीर की परछत्ती से मुक्त करवा लें। इसके लिए हमें अपने मन के साथ एक अलग तरह का रिश्ता बनाना होगा।
मन के अधीन होने के कारण हमारा ध्यान लगातार स्थूल पदार्थों, ख़ासकर पाँच इंद्रियों और हौमैं में ही फँसा रहता है जिस वजह से हम अपने भीतर के दिव्य जगत का अनुभव नहीं कर पाते। रूहानी तरक़्क़ी करने के लिए यह ज़रूरी है कि हम अपने मन के बजाए आत्मा के प्रति वफ़ादार हों।
कहानी में भिक्षुक ज्ञानी महात्मा का प्रतीक है। उसका फटे-पुराने कपड़े पहनने से भाव विनम्रता को धारण करना है – जिसे समझ पाना अहंकारी मन के लिए मुश्किल है। वह महात्मा इस बात को जानते थे कि जब तक व्यापारी अपने अभिमान और अहंकार को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हो जाता तब तक दोनों का मिलाप नहीं हो सकता। भाव यह है कि जब तक हम अपनी हौमैं और हौमैंपूर्ण व्यवहार का त्याग नहीं करते हम अपनी आत्मा के परछत्ती भाव तीसरे तिल में पहुँचने की उम्मीद नहीं कर सकते।
हमारी भजन-बंदगी हमारी रोज़ की हाज़िरी है जिससे धीरे-धीरे परमात्मा के लिए हमारा प्यार बढ़ता है और एक दिन यह प्यार शरीर रूपी घर से हमारी सुरत को समेटकर उस परछत्ती पर पहुँचा देगा – जहाँ आत्मा का दिव्य साम्राज्य है। जब ऐसा होगा तब हमें फिर से अपनी आत्मा की पहचान हो जाएगी और उसकी जन्म-जन्म की उदासी ख़त्म हो जाएगी।
हमारे सबसे चुनौतीपूर्ण कार्यों में से एक है ग़फ़लत को चिंतन में बदलना यानी कि बिस्तर से उठकर भजन-सिमरन करना। हर सुबह हमारी तरफ़ से उठाए गए ये कुछ क़दम हमारी रूहानी उन्नति के लिए बहुत अहम हैं। इस ज़िम्मेदारी को नियमित रूप से निभाए बिना हम रूहानी तरक़्क़ी की आशा कैसे रख सकते हैं?
सिर्फ़ भजन-सिमरन से ही मन और आत्मा के बीच तालमेल बिठाया जा सकता है। हमारे रूहानी विकास के लिए ज़रूरी यह है कि हम हर उस चीज़ को छोड़ दें जो हमारी आत्मा के प्रकाश को धुंधला कर रही है ताकि इसे मन व शरीर के बंधन से मुक्त कर सकें।
हमारा मक़सद इस पहेली को सुलझाना है यानी कि अपनी आत्मा को मुक्त करवाकर वापस अपने घर सचखंड जाना है। नामदान के लिए अर्ज़ करने से लेकर नामदान मिल जाने तक हमने अपनी चाहत को ज़ाहिर किया है और अब हमें इसे अंजाम तक पहुँचाना है।
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बाबा जी महाराज ने हुज़ूर महाराज जी को यही लिखा था। जैसे ही एक सत्संगी को नामदान प्राप्त हो जाता है, आप यह मान सकते हैं कि वह सचखण्ड पहुँच गया, यानी वह देर-सवेर सचखण्ड ज़रूर पहुँचेगा।…एक बात तो पक्की है कि एक दिन बीज अवश्य अंकुरित होगा, आत्मा अपनी मंज़िल तक ज़रूर पहुँचेगी। लेकिन आपको एक लंबा रास्ता तय करना है।
संत संवाद, भाग 2