ज़िंदगी को सरल रखना
सदियों से ज्ञान और स्थूल जगत के विभिन्न पहलुओं को समझने की कोशिश में लगे खोजियों ने हमें बहुत-से ऐसे नए आविष्कारों से हैरान किया है जिनके मुमकिन होने की हमने कभी कल्पना भी नहीं की थी। फिर भी वे ख़ुद इस बात को स्वीकार करते हैं कि अभी बहुत कुछ सीखना बाक़ी है। यह एक कभी न ख़त्म होनेवाला प्रयास है।
और अधिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए हमारी तरफ़ से की जानेवाली निरंतर खोज और इसके फलस्वरूप हुए कई नए आविष्कार इस तथ्य पर प्रकाश डालते हैं कि हमारी समझ और बुद्धि हमेशा सीमित रहेगी। इस बारे में इस तरह से सोचिए: आज हमारे पास जो ज्ञान है वह बीत चुके कल में हमारे पास नहीं था और आनेवाले कल में हमारे पास जो ज्ञान होगा वह आज हमारे पास नहीं है। चाहे हमारे ज्ञान का दायरा कितना भी विस्तृत क्यों न हो जाए फिर भी हमारा ज्ञान सीमित है।
उदाहरण के लिए, हमारे लिए यह समझ पाना नामुमकिन है कि समय का कोई अस्तित्व नहीं है या इस ब्रह्मांड का कोई अंत नहीं है। ऐसी धारणाएँ हमारी सीमित बुद्धि और समझ को दर्शाती हैं।
जब रूहानियत की बात आती है तब हमें लग सकता है कि हमारे पास उतने ज़्यादा जवाब नहीं हैं जितने ज़्यादा सवाल हैं। लेकिन जब संत-महात्मा हमें उलझन में देखते हैं तब वे सही दिशा दिखाकर, उस सही राह पर चलने के लिए हमारा मार्गदर्शन करते हैं। वे सब सरल रखने के लिए कहते हैं। वे समझाते हैं: “सिर्फ़ एक अच्छे इनसान बनो।” इससे सरल और क्या हो सकता है?
हर व्यक्ति सही और गलत के बीच का अंतर जानता है। सही काम करने और एक अच्छा इनसान बनने का अर्थ है अपने चार रूहानी वायदों को बिना किसी समझौते के पूरा करना। इसका अर्थ है इन महत्त्वपूर्ण नियमों का पालन करना:
- शाकाहारी भोजन जिसमें दूध और दूध से बने पदार्थ शामिल हैं
- शराब, लत लगाने वाले मादक पदार्थों और तंबाकू का सेवन न करना
- निर्मल नैतिक जीवन जीना
- हर रोज़ ढाई घंटे भजन-सिमरन करना।
यदि हम इन नियमों के मुताबिक़ जीवन जीते हैं तो जीवन सरल और निर्लेप होकर जीना आसान हो जाता है। सॉन्ग ऑफ़ सॉन्गस कविता में कवि महसूस करता है: “तुम स्वयं शांत हो कर, चुपचाप बैठकर निरंतर अशांत दुनिया को देख रहे हो।” इसका अर्थ उस मधुमक्खी की तरह बनना है जो मर्तबान के किनारे पर बैठकर, उसमें गिरे और फँसे बिना शहद की मिठास का आनंद लेती है। जब हम इस रचना के बंधनों से मुक्त हो जाते हैं तब हम जीवन के इस नाटक से बेलाग हो कर अपनी भूमिका प्रेम और निष्ठा के साथ निभा सकते हैं।
जब हम सतगुरु द्वारा दी गई नसीहत को याद रखते हैं तब ज्ञान के होने या न होने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। जब तक हम इस रचना में हैं तब तक रोटी, कपड़ा और मक़ान हमारी बुनियादी ज़रूरतें हैं। इन्हें पूरा करने और अपनी पारिवारिक ज़िम्मेदारियों को अच्छी तरह से निभाने के लिए हमें काम-काज करना चाहिए, लेकिन इस काम-काज को वक़्त देते हुए हमें किसी भी क़ीमत पर अपनी रूहानी ज़िम्मेदारियों को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए।
हमारा जन्म हमारे कर्मों द्वारा नियत समय और स्थान पर हुआ है और हम उसे बदल नहीं सकते। चाहे हम गरीब हों या अमीर, बीमार हों या स्वस्थ – हमारे हालात जो भी हों – हमें फिर भी सतगुरु के कहे अनुसार अच्छे इनसान बनने की कोशिश करनी चाहिए। हम अपनी ज़िम्मेदारियों को निभाते हुए साथ ही साथ संतमत के उपदेश पर पूरा ध्यान दे सकते हैं। इससे हमें यक़ीनन सुख और संतोष प्राप्त होगा।
भविष्य के बारे में चिंता करने की भी कोई ज़रूरत नहीं है क्योंकि सतगुरु ने हमारे कर्मों के लेखे-जोखे की ज़िम्मेदारी ले ली है। महाराज सावन सिंह जी पुस्तक परमार्थी पत्र, भाग 2 में फ़रमाते हैं:
आपकी चिन्ता और परेशानी गुरु की चिन्ता और परेशानी है। इन सब चिन्ताओं को गुरु के हवाले कर दीजिए और बेफ़िक्र होकर गुरु के लिए प्रेम बढ़ाइए, जो आपका फ़र्ज़ है।
सतगुरु ने हमें पूरा यक़ीन दिलाया है कि वे कभी भी हमारा साथ नहीं छोड़ेंगे। आइए उनकी इस बात पर भरोसा करते हुए अपना जीवन सरल बनाएँ यानी कि अपने दुनियावी और रूहानी कर्तव्यों का पालन करते हुए एक अच्छे इनसान बनें।