हज़ारों मील का सफ़र
कहावत “हज़ारों मील का सफ़र पहले क़दम से शुरू होता है।” ताओ ते चिंग से उद्धरित है और इसका श्रेय चीनी संत लाओज़ी को जाता है। यदि हम इस बारे में सोचें तो हमारे द्वारा शुरू किए हर काम की शुरुआत हमारे उस पहले एक क़दम से ही हुई थी।
कुछ लोगों के लिए कोई नया काम शुरू करना आसान होता है लेकिन ज़्यादातर लोगों को दृढ़ संकल्प और मेहनत करने पर सफलता मिलती है। रूहानी मार्ग पर भी कुछ ऐसा ही होता है। तो यह रूहानी सफ़र क्या है जिसे हमने आरंभ किया है या जिसके बारे में हम सोच रहे हैं? और वे कौन-से क़दम हैं जो हम उठाते हैं? पुस्तक बी ह्यूमन –दैन डिवाइन में हम पढ़ते हैं:
प्लेटो का कथन है: एक समय था जब आत्मा के पास पंख थे और वह रूहानी लोक में बेफ़िक्र और आज़ाद उड़ती थी। दिव्य प्रेम की ऊपर उठने वाली तरंगों के ज़रिए वह सत्य का अनुभव करती थी और अपने असल पोषण – परमात्मा के नूरानी स्वरूप, परम सौंदर्य – का आनंद लेती थी।
यह हमारी आत्मा के निज-घर का कितना सुंदर वर्णन है। इस रूहानी सफ़र की तुलना किसी भी दुनियावी सफ़र से नहीं की जा सकती।
सिर्फ़ परमात्मा ही जानता है कि किस वजह से कुछ आत्माओं को उनके निज-घर से दूर इस रचना में भेज दिया गया ताकि रचना के विभिन्न मुक़ामों को बसाया जा सके। इनमें से बहुत-सी आत्माएँ अब स्थूल शरीरों में क़ैद हैं, उन्हें सब कुछ भूल चुका है और वे माया के भ्रम में खो गई हैं। वे कर्मों के क़ानून तथा पुनर्जन्म के चक्र में फँस गई हैं जहाँ हर कर्म की प्रतिक्रिया होती है और हर कर्म का हिसाब चुकता करना पड़ता है।
मृत्यु के बाद आत्मा को अगले शरीर में भेजा जाता है जहाँ वह अपने प्रारब्ध कर्मों का लेखा-जोखा पूरी तरह से चुकता कर सके। जन्म, मृत्यु और पुनर्जन्म का यह दुखदायी चक्र निरंतर चलता रहता है। फिर भी यह निराशाजनक दृश्य ही कहानी का अंत नहीं है। सदियों से ही दार्शनिकों, ब्रह्मज्ञानियों और संत-महात्माओं ने समझाया है कि आत्मा फिर से निज-घर लौट सकती है और अपने परमपिता परमात्मा से पुन: मिलाप कर सकती है।
हम इस सफ़र पर कैसे निकलें? यह बहुत दिलचस्प है कि पहला क़दम हम ख़ुद नहीं उठाते। पहला क़दम देहधारी सतगुरु से मिलाप और उनसे नामदान मिल जाना है। शायद हमें यह लगे कि सतगुरु की खोज हम करते हैं लेकिन सच तो यह है कि वह जानते हैं कि कौन-सी आत्माएँ तैयार हैं और फिर वह उन्हें अपनी ओर खींचते हैं। पूर्ण संत-महात्माओं का मक़सद यह सुनिश्चित करना होता है कि उनके शिष्यों की आत्माएँ सतगुरु की दया-मेहर और प्रेम के सहारे निज-घर की ओर उड़ान भरें।
सतगुरु को तो मंज़िल का ज्ञान पहले से ही है। हमारे सीमित नज़रिए के कारण हमें लगता है कि सफ़र अभी शुरू हुआ है।
सभी प्राचीन यूनानी दार्शनिकों पाइथागोरस, सुकरात, प्लेटो और अरस्तू का मानना था कि सच्चे गुरु के मार्गदर्शन में हमारी ‘आत्मा फिर से पंख प्राप्त कर सकती है।’ उनका मानना था कि इस सफ़र में हमारे क़दम उस दिशा में बढ़ेंगे जिस तरफ़ हमारा ध्यान होगा। हमें अपने ध्यान, इच्छाओं और प्रेम का रुख़ संसार की तरफ़ से हटाकर सतगुरु की ओर करना पड़ेगा।
सफ़र के इस पड़ाव पर हमारा ध्यान ही हमारी दिशा तय करेगा। यूनानी दार्शनिकों ने रोज़मर्रा के अभ्यास पर आधारित मार्ग को अपनाने का समर्थन किया। वे अपने शिष्यों को उच्च नैतिक आचरण अपनाने की सीख देते थे। उनके लिए चिंतन, ध्यान, मौन और मन को प्रशिक्षित करना ज़रूरी होता था।
ये नियम कुछ हद तक हमारे रूहानी सफ़र में भी लागू होते हैं, इनके अलावा इस सफ़र के तीन मुख्य नुक़्ते हैं – सतगुरु, प्रेम और हमारा ध्यान। जब तक हम अपने पहले मुख्य पड़ाव तीसरे तिल पर नहीं पहुँच जाते तब तक हमें इस बात का कोई अंदाज़ा ही नहीं होता कि हमारे सतगुरु असल में किस हस्ती के मालिक हैं। हमें इस बात का भी कोई अंदाज़ा नहीं है कि वह इस यात्रा में हमारे लिए असल में क्या कुछ कर रहे हैं। जिस चीज़ के बारे में हम जान सकते हैं – जिसके लिए हम लगातार कोशिश कर सकते हैं – वह है हमारा ध्यान।
हमें निम्नलिखित चीज़ों पर अमल करना चाहिए: हमें हर काम में सतगुरु का अनुसरण करना चाहिए, हमें अच्छे इनसान बनना चाहिए; हमें शाकाहारी भोजन अपनाना चाहिए; हमें शराब, मादक पदार्थों और तंबाकू इत्यादि उत्पादों का सेवन नहीं करना चाहिए; जहाँ तक हो सके हमें हर पल पूरी तवज्जोह के साथ अपना सिमरन करना चाहिए और हमें हर रोज़ सचेत होकर अपने रूहानी अभ्यास को भी समय देना चाहिए। पुस्तक बी ह्यूमन – दैन डिवाइन में हम पढ़ते हैं:
व्यावहारिक फ़लसफ़ा स्पष्ट सोच अपनाने, दृढ़ रहने और समझदारी से चुनाव करने के लिए मार्गदर्शन करता है – ऐसे चुनाव जो परेशानियों तथा उलझनों को और न बढ़ाएँ, बल्कि सुख और आत्मिक कल्याण की ओर ले जाएँ।
पाइथागोरस के स्वर्णिम वचन (The Golden Verses of Pythagoras) इस पुस्तक का मूल विषय हैं और ये इस बात पर ज़ोर देते हैं कि नैतिक जीवन जीने से आख़िरकार हम परम सत्ता के प्रति जागरूक हो जाते हैं। प्राचीन दार्शनिक गुरु की भूमिका यानी उपदेश देना और हर शिष्य को ज़रूरी मार्गदर्शन देना, के बारे में भी बहुत स्पष्ट थे।
हमारे संत-सतगुरुओं का भी यही मक़सद है। वे चाहते हैं कि हम इस मार्ग पर पूरी लगन से अभ्यास करें ताकि हम अपने सामर्थ्य को पहचान सकें। हमें हमेशा यह याद रखना चाहिए कि यह एक धीमी प्रक्रिया है। इसके लिए कोई शॉर्टकट नहीं है।
इस सफ़र के बारे में हमारा नज़रिया व्यावहारिक होना चाहिए। शायद जीवन के अंत तक हमें इस रणभूमि में लड़ना पड़ेगा। इसका कारण यह है कि हमारा सबसे बड़ा शत्रु – मन – इस जीवन के अंत तक हमारे साथ ही रहेगा। यह मन अपनी चतुराई, नकारात्मकता और बार-बार उकसानेवाली प्रवृत्तियों द्वारा हमें संसार के दलदल में फँसाकर रख सकता है। लेकिन सतगुरु की दया-मेहर और निरंतर प्रयास से हम इन बंधनों से मुक्त भी हो सकते हैं।
हम इस लड़ाई में सही चुनाव तभी कर पाएँगे जब हम अपने शत्रु के स्वभाव को समझ जाएँगे। लापरवाही, आलस्य और नकारात्मकता मन को ताक़त देते हैं और हमें इस संसार से ही बाँधकर रखते हैं। हमें हर रोज़ विवेक, ध्यान और सिमरन की शक्ति से लैस होकर इस युद्ध में उतरना पड़ता है। हम स्वर अनेक, गीत एक पुस्तक में पढ़ते हैं:
नाम के इस जाप में सतगुरु की शक्ति निहित है जो शिष्य के मन को एकाग्र और स्थिर करती है। जब आत्मा मन के दायरे से ऊपर उठ जाती है तो शिष्य उस अलौकिक और सच्चे धुनात्मक नाम से जुड़ जाता है। इसी नाम से जुड़ना संतों द्वारा बताई गई भक्ति का लक्ष्य है।
हमारा ध्यान ही वह ज़रिया है जिससे हम अपनी पहली मंज़िल – तीसरे तिल – पर पहुँच सकते हैं। हमारे सतगुरु द्वारा दिया गया सिमरन ईंधन का काम करता है। अगर हम सिमरन करते हैं तो हमारे अंदर सिमरन की शक्ति आ जाती है। सिमरन के पाँच नामों का भेद सतगुरु देते हैं – इनमें सतगुरु की शक्ति समाई होती है।
मन ख़ुद को विचारों के ज़रिए प्रकट करता है। कभी-कभी ये विचार अच्छे, फ़ायदेमंद और सकारात्मक होते हैं। लेकिन ज़्यादातर ये विचार नकारात्मक, भोग-विलास में लिप्त करनेवाले और हमें लक्ष्य से दूर ले जानेवाले होते हैं। सतगुरु की दया-मेहर पर तो कोई संदेह नहीं किया जा सकता मगर इस लड़ाई में हम दृढ़तापूर्वक अपना ध्यान नहीं लगाते।
तीसरे तिल तक हमारे सफ़र की रफ़्तार स्वाभाविक तौर पर धीमी होती है। जब से हम इस रचना में आए हैं तब से मन मनमानी ही करता आया है। इसे बॉस बनना पसंद है। फिर भी हमें हमेशा याद रखना चाहिए कि हमें पाँच नाम का सिमरन किसने और क्यों दिया है। इन नामों को दोहराने से मन को क़ाबू में किया जा सकता है और हम उस शब्द-धुन को सुनने के क़ाबिल बन सकते हैं जो आत्मा को निज-घर वापस ले जाएगी।
हमारे लिए यह बहुत अहम है कि हम दिन-भर जितना हो सके उतना सिमरन करें। सिमरन करने से हमारा ध्यान अपने सतगुरु की ओर जाता है और इससे प्रेम तथा भक्ति-भाव बढ़ता है। यह हमें भजन-सिमरन के लिए तैयार करता है जोकि हमारे जीवन का सबसे अहम कार्य है। धीरे-धीरे सिमरन हमारी बुरी आदतों और संस्कारों को ख़त्म कर देता है। यह अपने आप आनेवाले नकारात्मक विचारों का अंत करता है। सजगता के साथ किया गया ध्यान, हमारे ध्यान को आत्मा की ओर ले जा सकता है। यह चुनाव हमें करना है।
सिमरन का हर चक्र मन की शक्ति पर एक प्रहार है। हम नहीं जानते कि हम इस सफ़र में कहाँ तक पहुँच गए हैं और हमें यह जानने की ज़रूरत भी नहीं है। हमें केवल छोटे-छोटे क़दम बढ़ाते रहने की ज़रूरत है जब तक कि एक दिन वे प्रेम के ऐसे ज़बरदस्त प्रवाह में न बदल जाएँ जो हमें सीधा हमारे सतगुरु की गोद में ले जाए।
हज़ारों मील का सफ़र सिमरन के पहले क़दम से शुरू होता है। आइए, हम ये क़दम उठाते रहें।
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घण्टे की मधुर आवाज़ चुम्बक की तरह आत्मा को खींचती है और आत्मा का रूहानी सफ़र शुरू हो जाता है। गुरु ज़रूरी मदद और रहनुमाई करता है और धीरे-धीरे परमात्मा के पास सचखण्ड में पहुँचा देता है।
परमार्थी पत्र, भाग 2