प्रेम का साकार रूप
जब हम रूहानी मार्ग पर चलना शुरू करते हैं तब हमें एहसास होता है कि इस मनुष्य-जन्म का मक़सद परमात्मा के साथ रिश्ता क़ायम करना है। आख़िरकार, इस रिश्ते का उद्देश्य अपनी आत्मा को परमात्मा में अभेद कर देना है। जब हम किसी रूहानी मार्ग को चुन लेते हैं फिर उस मार्ग पर चलना हमारी ज़िम्मेदारी बन जाता है। हम बहुत ज़्यादा ख़ुशक़िस्मत हैं कि संतमत में हमारा मिलाप ऐसे देहधारी सतगुरु से हुआ है जो धर्म-ग्रंथों और संत-महात्माओं के उपदेश के सही मायनों को समझने और सबसे महत्त्वपूर्ण, इन शिक्षाओं को अमल में लाने में हमारा मार्गदर्शन करते हैं।
इस मार्ग पर चलने से पहले अपनी बुद्धि की तसल्ली करना सबसे ज़रूरी होता है ताकि हमारे अंदर इतना यक़ीन और भरोसा पैदा हो जाए जिससे हम उस मार्ग पर दृढ़ता से चल पाएँ और अपने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए पर्याप्त तरक़्क़ी कर सकें। अब महत्त्वपूर्ण सवाल ये हैं कि क्या हम बुद्धि की तसल्ली करने के बाद आगे बढ़कर उस उपदेश पर अमल करते हैं और क्या हम उस उपदेश को करनी में लाकर जीवन बिताते हैं ताकि हम वह रूहानी तरक़्क़ी कर सकें जो हम करना चाहते हैं?
दूसरी तरफ़, क्या हम हमेशा अपने मन के ग़ुलाम होने के कारण दिमाग़ में आनेवाले बेशुमार सवालों के जवाब ढूँढ़कर बुद्धि की तसल्ली करने में ही लगे रहते हैं? अगर थोड़ा-सा सोच-विचार करें तो इसमें कोई संदेह नहीं कि हर सवाल का जवाब ढूँढ़ लेने पर सिर्फ़ और अधिक सवाल ही पैदा होते हैं। अगर थोड़ा और गहराई से सोचें तो साफ़ ज़ाहिर होता है कि जब तक हम उन जवाबों पर अमल नहीं करते तब तक कभी ख़त्म न होनेवाले हमारे सवाल-जवाब व्यर्थ हैं।
अल्फ्रेड टेनीसन की कविता ‘द चार्ज ऑफ़ द लाइट ब्रिगेड’ के प्रसिद्ध उद्धरण में इस विचार को बड़ी ख़ूबसूरती से पेश किया गया है:
उनका काम ‘कारण’ पूछना नहीं,
उनका काम तो सिर्फ़ करना और मरना है।
अगर सैनिक कमांडर के फ़ैसलों पर सवाल उठाने लग जाएँ तो किसी भी सेना का युद्ध जीत पाना मुमकिन नहीं। इसी तरह, बेशुमार सवालों में उलझकर रूहानियत का जिज्ञासु अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच सकता। अगर हम रूहानी तरक़्क़ी करना चाहते हैं तो हमारे पास सिर्फ़ एक ही ज़रिया है – हमें किंतु-परंतु छोड़कर सिर्फ़ अमल करना है! हमें अपने सतगुरु के उपदेश का पालन करने की हर मुमकिन कोशिश करनी चाहिए और परिणाम अपने रूहानी कमांडर – अपने सतगुरु पर छोड़ देना चाहिए।
बुद्धि को बीच में लाने से मानसिक तर्क-वितर्क के जाल में आसानी से फँस जाना स्वाभाविक-सी बात है। रूहानी विषयों पर वाद-विवाद और चर्चा करना बुद्धि के ज़रिए उन विषयों को समझने की कोशिश करना है जो असल में इनसान की समझ से परे हैं। इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि अहंकार के कारण हर इनसान यही सोचता है कि उसे दूसरों से ज़्यादा पता है। मन के अधीन होने के कारण हम निरंतर विश्लेषण करके, दलीलें देकर और तर्क-वितर्क द्वारा हर चीज़ को समझने की कोशिश करते हैं परन्तु किसी भी अर्थपूर्ण नतीजे पर नहीं पहुँचते।
यहाँ तक कि नामदान मिल जाने के दशकों बाद भी, हम मन के कहने पर इस व्यर्थ की कोशिश में लगे रहते हैं। यह मन की चालाकी है जो हमें सतगुरु के उपदेश पर अमल करने और उसके अनुसार जीवन नहीं जीने देता। ख़ुशक़िस्मती से इस समस्या का एक अचूक उपाय है और वह उपाय है मन को अपने वश में करना। लेकिन हम अपने इस कपटी मन को कैसे क़ाबू करें? हुज़ूर महाराज चरन सिंह जी संत संवाद, भाग 1 में समझाते हैं:
मन इंद्रियों का ग़ुलाम है और आत्मा मन की ग़ुलाम हो गयी है, क्योंकि आत्मा भी मन के साथ ही इंद्रियों की ओर खिंची जा रही है। अब हमें इस सिलसिले को पलटना है। जब तक मन का झुकाव इंद्रियों की ओर रहेगा, यह उनकी तरफ़ ही जायेगा, लेकिन अगर यह उनकी तरफ़ जाने से इनकार कर दे तो यह उनका साथ छोड़ देगा। जब मन इंद्रियों का साथ छोड़ देता है, तब यह हमारा दोस्त बन जाता है।
इसके लिए इस सारे सिलसिले को पलटना पड़ेगा, हमें मन को इंद्रियों के चंगुल से और आत्मा को मन के चंगुल से छुड़वाना पड़ेगा। भले ही यह सुनने में आसान लगता हो लेकिन इसके लिए जीवन-भर भजन-सिमरन करना पड़ता है। भजन-सिमरन की इस प्रक्रिया में अपने ख़याल को शरीर और संसार दोनों में से निकालकर तीसरे तिल पर एकाग्र करना पड़ता है।
इस महत्त्वपूर्ण कार्य में सफल होने पर मन को ऐसा आंतरिक आनंद प्राप्त होता है जिसकी तुलना में ऐंद्रिय भोगों द्वारा मिलने वाले सब दुनियावी रस फीके लगने लगते हैं। फिर मन दुनियावी सुखों की ओर आकर्षित नहीं होता और यही रूहानी तरक़्क़ी का राज़ है।
इस शरीर के दस द्वार हैं। इनमें से नौ द्वारों के ज़रिए हमारा ख़याल बाहर की ओर फैलता है जबकि केवल एक द्वार – दसवाँ दरवाज़ा – हमारे ध्यान को अंदर, ऊपर की ओर ले जाता है। इन नौ द्वारों – जिनमें दो आँखें, दो कान, दो नासिकाएँ, मुँह और नीचे के दो ऐंद्रिय सुराख़ शामिल हैं – को बंद करने से ही रूहानी तरक़्क़ी मुमकिन है।
हम सब का निजी अनुभव है कि इन्हीं नौ द्वारों के ज़रिए न सिर्फ़ हमारा संबंध इस स्थूल जगत से जुड़ता है बल्कि असल में इन्हीं द्वारों के ज़रिए हमारा ख़याल इस दुनिया और इसके क्षणभंगुर भोगों में फैलता है। हुज़ूर महाराज जी अपनी पुस्तक संत संवाद, भाग 2 में इस बात की पुष्टि करते हैं:
हमारी आँखों के केंद्र पर, मन और आत्मा की गाँठ बँधी हुई है। हमारा ख़याल यहाँ से यानी तीसरे तिल से उतरकर, शरीर के नौ द्वारों से बाहर निकलकर सारी दुनिया में फैला हुआ है।
यह हमारी ज़िम्मेदारी है कि धीरे-धीरे हम इन नौ द्वारों को बंद करके अपने ख़याल को दसवें दरवाज़े की ओर मोड़ें जो अंदर की ओर खुलता है। चूँकि हमारा मानना है कि इसी दरवाज़े पर – जिसे तीसरा तिल भी कहा जाता है – मुक्ति हमारा इंतज़ार कर रही है इसलिए यह बहुत ज़रूरी है कि हम इन नौ द्वारों को बंद करने की अपनी ज़िम्मेदारी निभाएँ ताकि हमारा ध्यान अपने आप दसवें दरवाज़े की ओर ऊपर जा सके। इसका मतलब है कि हमें अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश करनी चाहिए कि हम समझदारी से उन चीज़ों का चुनाव करें जिनका संबंध हमारे मन और इंद्रियाँ से है क्योंकि इसका सीधा असर दसवें द्वार तक पहुँचने की हमारी क्षमता पर पड़ता है।
हमें विवेक की अद्भुत दात दी गई है। इसकी मदद से यह हमें तय करना है कि हम क्या देखें, सुनें, सूँघें, चखें और खाएँ। हमें किन चीज़ों के संपर्क में आना है, इस बारे में सही फ़ैसला करने पर हमें महसूस होता है कि जब हम भजन-सिमरन करते हैं तब ख़याल को एकाग्र करना ज़्यादा आसान हो जाता है क्योंकि ऐसा करने से पूरा दिन हमारा ख़याल उतना नहीं फैलता जितना यह आमतौर पर फैलता है। साथ ही, भजन-सिमरन के ज़रिए ख़याल को तीसरे तिल पर इकट्ठा करने से हम धीरे-धीरे अपने ख़याल को नौ द्वारों से हटाकर अंदर की ओर मोड़ने लगते हैं।
शब्द चाहे कितने भी तर्कपूर्ण, आकर्षक या प्रेरणादायक क्यों न हों, उनका कोई मूल्य नहीं होता जब तक कि उनमें दिए गए संदेश को अमल में नहीं लाया जाता। अंत में, सिर्फ़ हमारे कर्म ही मायने रखते हैं। इस समय हमारा यह मानना कि नौ द्वारों को बंद करने से हम दसवें द्वार तक पहुँच जाएँगे, महज़ एक धारणा है। मगर अपने असल रूहानी अभ्यास को करने से हम उस शाश्वत मुक्ति की ओर आगे बढ़ेंगे जिसकी हमें खोज है।
इसी तरह, जब हम अपने सतगुरु के प्रति अपने प्रेम का इज़हार करते हैं तब हमें बड़ी विनम्रता से याद दिलाया जाता है कि हमें इस प्रेम को अपनी करनी द्वारा प्रकट करना है। हमारे कर्म हमेशा हमारे द्वारा किए गए दावों, हमारे इरादों और इच्छाओं के अनुरूप होने चाहिएँ क्योंकि अपनी करनी द्वारा ही हम मंज़िल तक पहुँच पाएँगे।
हम अपने प्यार को अपनी करनी द्वारा कैसे ज़ाहिर करें? इस संदर्भ में ब्यास के संत-सतगुरुओं से बेहतर मिसाल और क्या हो सकती है? वे परमात्मा की रज़ा में रहते हुए अच्छे या बुरे दोनों हालात को उसकी दात समझकर समान रूप से स्वीकार करते हुए मानवता की अथक सेवा करते हैं। मन की हर इच्छा और आकांक्षा को न मानकर, शरीर के नौ दरवाज़ों को बंद करके मन को वश में करके उन्होंने स्वयं आदर्श शिष्य की मिसाल पेश की है। अगर हम अपनी आत्मा को परमात्मा में अभेद करने का अपना रूहानी लक्ष्य पूरा करना चाहते हैं तो हमें संत-सतगुरुओं के उदाहरण से प्रेरणा लेकर उनके जैसा बनने की कोशिश करनी चाहिए।
जिज्ञासु होने के नाते हम अकसर रूहानी तरक़्क़ी करने की इच्छा ज़ाहिर करते हैं पर क्या हमारी करनी इस इच्छा को दर्शाती है? अगर हम सचमुच रूहानी तरक़्क़ी करना चाहते हैं, तो आइए, अपने प्यार और तड़प को केवल शब्दों द्वारा नहीं बल्कि अपनी करनी में ज़ाहिर करें। इसमें अपने सतगुरु के उपदेश के अनुसार जीवन जीना भी शामिल है जोकि प्रेम का साकार रूप हैं।