अपने सच्चे स्वरूप की तलाश
वर्ष 1990 में, जब नासा का अंतरिक्ष यान वॉयेजर I अंतरिक्ष में जा रहा था तब उसने अपना कैमरा पृथ्वी की ओर घुमाया और लगभग छह अरब किलोमीटर दूर से पृथ्वी की तस्वीर ली। इस तस्वीर में पृथ्वी विशाल अंतरिक्ष के गहन अंधकार में एक छोटे-से नीले बिंदु के रूप में दिखाई दी। अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने इस तस्वीर को ‘पेल ब्लू डॉट’ का नाम दिया।
अगर हमारी पृथ्वी इस पूरे ब्रह्मांड की तुलना में इतनी छोटी है तो उस छोटे-से ‘पेल ब्लू डॉट’ पर रहनेवाला हम में से हर एक व्यक्ति इस ब्रह्मांड की अवर्णनीय विशालता की तुलना में एक सुई की नोक से भी छोटा है। हालाँकि हम सब यह जानते हैं फिर भी हम अपने आप को कुछ ज़्यादा ही अहम समझते हैं।
हमें ऐसा क्यों लगता है? संत-महात्मा समझाते हैं कि यह हमारी झूठी ‘हौमैं’ या अहंकार है। वे यह भी कहते हैं कि यही हौमैं परमात्मा रूपी रचयिता के पास वापस पहुँचने में सबसे बड़ी रुकावट है। हुज़ूर महाराज चरन सिंह जी ने इसके बारे में इस तरह समझाया था:
परमात्मा और हमारे बीच हौमैं की रुकावट है। यही असली और बड़ी रुकावट है। जब तक हौमैं की रुकावट को दूर नहीं करते, परमात्मा से मिलाप का सवाल ही पैदा नहीं होता।
संत संवाद, भाग 1
आत्मा कभी उस रचयिता का हिस्सा हुआ करती थी जो परम आनंद का स्रोत है। लेकिन मन का साथ लेने के कारण यह इस रचना में फँस गई। बहुत-सी योनियों में जन्म लेने के बाद मन ने हौमैं की वजह से अपनी एक अलग हस्ती क़ायम कर ली है। जिससे यह आत्मा पर हावी हो गया और इस वजह से यह भ्रम पैदा हो गया कि आत्मा की हस्ती परमात्मा से अलग है।
अगर हम इस क़ैद से मुक्त होना चाहते हैं तो यह समझना बहुत ज़रूरी है कि हम मन द्वारा बनाई गई अपनी उस छवि से बिल्कुल अलग हैं। सतगुरु का इस संसार में आने का मक़सद हमारी आत्मा को जगाना और हमें इस बात का एहसास दिलाना है कि हमारा असल स्वरूप आत्मा है। उसका निवास इस शरीर के अंदर है और साथ ही वे हमें एक ऐसी व्यावहारिक युक्ति सिखाने के लिए आते हैं जिससे हम पहचान सकें कि हम असल में कौन हैं।
लेकिन हम अपनी आत्मा के बारे में जानते ही क्या हैं? कभी-कभी हमें थोड़ा-बहुत एहसास होता है कि हमारा असल वजूद यह स्थूल शरीर नहीं है। हमारा असल वजूद इससे अलग है – वह है अमर-अविनाशी आत्मा। कभी-कभी हमें यह एहसास भी होता है कि सतगुरु हमारे जैसे इनसान नहीं हैं जैसे कि वह हमें दिखाई देते हैं बल्कि उनका असल स्वरूप उससे कहीं अधिक श्रेष्ठ है। हुज़ूर महाराज चरन सिंह जी पुस्तक डाई टू लिव में फ़रमाते हैं:
यह शरीर तुम्हारा असल वजूद नहीं है। सतगुरु का असल स्वरूप भी शरीर नहीं है। तुम्हारा असल वजूद आत्मा है और सतगुरु का असल स्वरूप शब्द है, वर्ड है।…लेकिन अंत में वह नूरी स्वरूप शब्द ही बन जाता है और आप रंग-रूप और आकार रहित निर्मल आत्मा बन जाते हैं। और तब आत्मा शब्द में लीन हो जाती है।
सच तो यह है कि हम अब भी हौमैं के अधीन होकर कर्म कर रहे हैं। हमें इस बात का ज़रा भी अंदाज़ा नहीं है कि हम आत्मा हैं जो सतगुरु के शब्द स्वरूप में समाकर उनमें अभेद हो सकती है। अपनी हौमैं और उस से पैदा हुए विकारों के कारण हमें इस बात का एहसास नहीं होता। महाराज जगत सिंह जी ने हौमैं को “अत्यंत निकृष्ट प्रकार का स्वार्थ” कहा है जिसकी वजह से हम सोचते हैं कि हम कभी ग़लती नहीं कर सकते।
सतगुरु हमें समझाते हैं कि हौमैं को ख़त्म करने का एक ही तरीक़ा है – भजन-सिमरन। नामदान के समय किए गए वायदे के मुताबिक़, हम हर सुबह अभ्यास में बैठकर अपने चंचल मन को स्थिर करने और अपने ध्यान को तीसरे तिल पर टिकाने का प्रयास करते हैं। हो सकता है कि हम कई वर्षों से इस कोशिश में लगे हों और हमें कोई रूहानी तरक़्क़ी होती दिखाई न दे। लेकिन निष्फल प्रतीत होनेवाला भजन-सिमरन असल में कभी व्यर्थ नहीं जाता। सतगुरु चाहते हैं कि हम कोशिश करें – उन्हें हमारा हुक्म में रहना पसंद है और वह हमें संघर्ष करते रहने के लिए प्रेरित करते हैं।
शायद यह उनकी दया-मेहर ही है कि अंतत: भजन-सिमरन करना ही हुक्म मानने और मार्ग पर दृढ़ रहने की कसौटी है। ज़रा सोचें कि अगर हर सुबह हमें यह पता चल जाए कि हम कितनी रूहानी तरक़्क़ी कर चुके हैं तो हमारी हौमैं कितनी बढ़ जाएगी। यह बहुत ही ख़तरनाक होगा – यह सचमुच हमारी हौमैं को बढ़ा देगा। अगर हम वाक़ई अपने असल घर वापस लौटना चाहते हैं तो हौमैं को नाश करना ही उचित है।
यह सच है कि हम अपनी कोशिशों द्वारा इस हौमैं से छुटकारा नहीं पा सकते। यह सिर्फ़ भजन-सिमरन द्वारा ही मुमकिन है और ख़ासकर शायद उस भजन-सिमरन से जिसे हम ‘निष्फल’ समझते हैं। इनसान होने के नाते हमारा दायरा बहुत सीमित है। महाराज जी ने फ़रमाया है कि सब कुछ परमात्मा की दया-मेहर से ही होता है।
सतगुरु ही हमें निज-घर ले जा सकते हैं – हम तो सिर्फ़ उनके हाथों में कठपुतली हैं। अगर हम इस बात को समझ जाएँ और स्वीकार कर लें तो हम निश्चिंत और आज़ाद महसूस कर सकते हैं। तब न तो निराशा की कोई वजह होगी और न ही पश्चाताप की क्योंकि हमें इस बात का एहसास होने लगेगा कि सब कुछ उन्हीं का है और वही हमारा मार्गदर्शन कर रहे हैं। जब हम यह स्वीकार कर लेते हैं तब हम ख़ुद को दोषी ठहराना, अपने आप को कोसना और दूसरों से उम्मीदें रखना छोड़ देते हैं।
महाराज जी हमें समझाते हैं कि गुरुमुख और मनमुख में सिर्फ़ इतना ही फ़र्क़ है, गुरुमुख को परमात्मा की पहचान हो चुकी है, वह जानता है कि वह एक कठपुतली है, उसके हाथ में कुछ भी नहीं है। मनमुख सोचता है कि सब कुछ वह ख़ुद कर रहा है।
एक समय था जब हम रचयिता का हिस्सा थे, उसके प्रकाश, प्रेम और पूर्णता का ही रूप थे। हौमैं की इन परतों के कारण इनसान ने क्या कुछ खो दिया है इस बात पर प्रकाश डालते हुए महाराज सावन सिंह जी फ़रमाते हैं:
इनसान की हालत भी बहुत हद तक एक ढकी हुई लालटेन के समान है। उसके अन्दर परमात्मा का नूर है, पवित्र जीवन, ज्ञान और आनन्द है, लेकिन मन और माया के पर्दों ने इसके प्रकाश को मन्द कर दिया है और इनसान अन्धकार में भटकता फिर रहा है। उसका असली रूप विकृत हो गया है और उसने तर्क, बुद्धि और अन्त:प्रेरणा की शक्ल ले ली है। हम परम आनन्द को खोकर उसकी जगह क्षणिक दु:ख-सुख का अनुभव कर रहे हैं।
परमार्थी पत्र, भाग 2
हौमैं की जिन परतों की वजह से हम इस रचना में क़ैद हैं उन्हें हटाने की कोशिश ही इस जीवन का असल मक़सद है। अब हमारा लक्ष्य यह होना चाहिए कि हम उन सीमित दायरों से बाहर निकल आएँ, जिनकी वजह से हम कई जन्मों से इस संसार में क़ैद हैं ताकि हम अपने असीम, अनंत-अपार स्वरूप की पहचान कर पाएँ। यह सर्वोच्च क़िस्म की रूहानी जागृति है जिसका होना इस बात का संकेत है कि हमने लड़ाई जीत ली है। हम पर नामदान की बख़्शिश इसीलिए की गई है ताकि हम अपने असली रूहानी स्वरूप को पहचान सकें।
हमें समझाया जाता है कि अपने असल स्वरूप की पहचान के बाद परमात्मा की पहचान अगला क़दम है। यह युगों-युगों से जारी लंबे सफ़र के ख़त्म होने का संकेत है ताकि हमारी आत्मा वापस अपने असल स्रोत में समा सके क्योंकि उसकी हौमैं का नाश हो चुका है।
लेकिन हौमैं आसानी से पीछा नहीं छोड़ती और इसे ख़त्म करना आसान नहीं है। अगर यह सिर्फ़ हम पर निर्भर होता तो हम कभी भी हौमैं को ख़त्म नहीं कर पाते। धीरे-धीरे, अनुभव प्राप्त होने पर हमें इस बात का एहसास होने लग जाता है और फिर हम ख़ुद को सतगुरु के सुपुर्द कर देते हैं। हम उनकी रज़ा में रहने लग जाते हैं और फिर हमें किसी चीज़ की चाह नहीं रहती। महाराज जी के वचन हैं:
हौमैं को मिटाना ही सतगुरु को आत्म-समर्पण करना है। जब तक हौमैं है तब तक हम समर्पण नहीं करते। हम मन के अधीन होते हैं, लेकिन जब हम हौमैं को ख़त्म कर लेते हैं तब हम समर्पण करते हैं। फिर सतगुरु ही सब कुछ होते हैं।
संत संवाद, भाग 3
सिर्फ़ प्यार में ही हमारे अंदर किसी दूसरे के आगे झुकने और उसकी सेवा करने की चाहत पैदा होती है। जैसा कि महाराज जी समझाते हैं, सतगुरु के प्रेम द्वारा हमारे अंदर से हर तरह की हौमैं ख़त्म हो जाती है। फिर हम ख़ुद-ब-ख़ुद हुक्म में रहने लगते हैं और समर्पण कर देते हैं।
संतमत की अनेक पहेलियों और क़रामातों में से एक सतगुरु के प्रति प्रेम है। महाराज जी समझाया करते थे कि यह असीम प्रेम परमात्मा की दात है जिसे लफ़्ज़ों में बयान नहीं किया जा सकता और यह सतगुरु की दया-मेहर से प्राप्त होता है। आप फ़रमाते थे कि भजन-सिमरन द्वारा ही यह प्रेम पैदा होता है और गहरा होता है जो हमें अपने वश में कर लेता है और हम सतगुरु की तरफ़ खिंचे चले जाते हैं।
अब तक, आत्मा की वापस परमपिता के पास लौटने की तड़प मन, माया और अपने अलग वजूद के भ्रम के कारण दबी हुई थी। लेकिन अब यह तड़प तीव्र होने लगती है। हमारी आत्मा उस आनंद और ख़ुशी को, जिसे यह कभी अनुभव करती थी, फिर से पाने के लिए तड़प उठती है। महाराज जी के इन वचनों द्वारा हमें प्रेरणा मिलती है:
परमात्मा में समाने के परम आनंद को शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। उस अवस्था में अपनी हस्ती, अलग चेतना या और किसी बात का ध्यान नहीं रहता। उस अवस्था में सिर्फ़ प्यार ही प्यार, आनंद ही आनंद होता है, क्योंकि परमात्मा में समाकर हम परमात्मा ही बन जाते हैं और तब केवल वही होता है, वही सब कुछ है।
संत संवाद, भाग 1
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परमात्मा हमेशा रहने वाला है, ज्ञान और आनन्द है – वह शक्ति, ज्ञान और प्रेम का भण्डार है। इसी भण्डार या सार-तत्त्व की एक चिनगारी हमारी आत्मा है, जो मन और माया के पर्दों में लिपटकर इनसान या जीवात्मा का रूप धारण किये हुए है। अगर हमारे ऊपर से मन और माया के पर्दे उतर जायें तो आत्मा निर्मल हो जायेगी और परमात्मा को पहचानने के क़ाबिल हो जाएगी।
परमार्थी पत्र, भाग 2