प्रेम और भक्ति
सभी पूर्ण संतों ने यह उपदेश दिया है कि परमात्मा प्रेम-रूप है। प्रेम उसके अस्तित्व का आधार है और प्रेम ही उसके साथ मिलाप का सच्चा साधन है। प्रेम कहीं बाहर से नहीं मिलता। परमात्मा का अंश होने के कारण आत्मा के अंदर स्वाभाविक रूप से परमात्मा का प्रेम समाया हुआ है। वर्तमान अवस्था में यह प्रेम संसार के मोह, इंद्रियों के भोगों, विषय-विकारों के आकर्षण और कर्म-संस्कारों के मोटे परदों के नीचे दबा हुआ है। संतों की संगति, परमात्मा की भक्ति या नाम के अभ्यास का वास्तविक उद्देश्य अपने भीतर परमात्मा के प्रेम को जाग्रत करना है। जैसे ही जीवात्मा को संतों की संगति द्वारा परमात्मा के साथ अपने सच्चे संबंध का एहसास होता है और इस बात का ज्ञान हो जाता है कि उसका निज-घर परमात्मा का परमधाम है और उसका असल स्वरूप मन-इन्द्रियाँ नहीं, बल्कि विशुद्ध आत्मा है; इसके अंदर परमात्मा का प्रेम अंकुरित हो जाता है।
जैसे-जैसे यह प्रेम फलीभूत होता है, वैसे-वैसे प्रेमी समर्पण की उस अवस्था में पहुँच जाता है जहाँ वह अपने प्रियतम के लिए हर क़ुर्बानी देने को तैयार हो जाता है। तुलसी साहिब ने प्रेम के इसी भाव को स्पष्ट करते हुए कहा है:
आसिक इसक इसक आसिक से, करना मौत निसानी॥
मुरदा है करि खाक मिली अब, जब पट अमर लिखानी॥
तुलसी साहिब जब यह कहते हैं कि सच्चा आशिक़ ख़ुद को इश्क़ में क़ुर्बान कर देता है तब आपका भाव ख़ुदी या हौमैं के नाश से है। आप आशिक़ की इस अवस्था को बयान करते हुए कहते हैं: सच्चे आशिक़ को इस संसार की ओर से ‘मुरदा’ होना पड़ता है। इसका भाव यह है कि वह शरीर के नौ द्वारों को ख़ाली करके अपनी सुरत को ऊँचे आंतरिक जगत में ले जाता है। इसी अवस्था को संत-महात्माओं ने ‘जीते-जी मरना’ कहा है।
प्रेम ही प्रियतम के प्रति श्रद्धा और विश्वास उत्पन्न करता है। प्रेमी भक्त कभी यह हिसाब नहीं रखता कि उसे उसकी भक्ति का क्या फल मिलेगा। जिस प्रेम में हिसाब रखा जाता है, वह प्रेम नहीं व्यापार है। प्रेमी केवल देना जानता है। वह प्रियतम से केवल प्रियतम को ही माँगता है। हिरदे नामक अपने शिष्य को प्रेमी भक्त का यही लक्षण बताते हुए तुलसी साहिब कहते हैं:
जब हिरदे यह भक्त कहावे। दास भाव स्वामी को चावे॥
तुलसी साहिब ने प्रेम से संबंधित अपनी संपूर्ण विचारधारा का विवरण इस प्रकार दिया है। आप समझाते हैं कि परमात्मा से मिलाप का साधन उसका प्रेम है। प्रेम की कशिश ही आत्मा को निज-धाम तक का लंबा सफ़र तय करने की शक्ति प्रदान करती है। परमात्मा स्वयं आत्मा के अंदर यह प्रेम पैदा करता है। फिर आत्मा पुकार उठती है, “मैं पिया की बलिहार प्यार मोहि से कियौ।” – निज-धाम पहुँचकर आत्मा को इस बात की सूझ हो जाती है कि वह स्वयं परमात्मा से प्रेम नहीं कर सकती थी। उस दयालु प्रियतम ने स्वयं उसके अंदर अपना प्रेम पैदा किया है और उसकी दया-मेहर से ही वह प्रेम और परम आनंद के धाम तक पहुँच सकी है।…
भक्ति
जिससे प्रेम हो, उसे प्रसन्न करना ही भक्ति है। प्रियतम को याद करना, बार-बार उसका ध्यान आना, उसकी महिमा करना, उसके आगे विनती करना, उसकी सेवा करना और उसकी आज्ञा का पालन करना ये सभी भक्ति के अंग हैं। भक्ति-भाव प्रेम से ही उत्पन्न होता है। जब प्रियतम के लिए प्रेम गहरा हो जाता है तो यह उससे मिलाप का साधन बन जाता है।…
भक्ति के बिना जीव का इस भवसागर से उद्धार नहीं हो सकता और न ही उसका आवागमन के चक्कर और मृत्यु के दु:खों से छुटकारा हो सकता है। इसीलिए संतों ने प्रेम और भक्ति पर बल दिया है। संतों की सेवा और उनकी आज्ञा का पालन करने से जीव के अहं भाव का नाश होने पर भक्ति-भाव बढ़ता है। इसीलिए तुलसी साहिब ने भक्ति को तलवार की धार पर चलना कहा है क्योंकि इसका अर्थ है अहं-भाव का नाश है जोकि बहुत मुश्किल है।
भक्ति पदारथ सार, यह नर जग जाने नहीं॥
जग के बिषम बिकार, सो सब समझे साँच करि॥
तुलसी साहिब कहते हैं कि भक्ति के मार्ग में सबसे बड़ी रुकावट हमारी यह ग़लत धारणा है कि इन्द्रियों के भोग और विषय-विकार सच्चे सुख का साधन हैं, हमें यह एहसास ही नहीं होता कि ये अस्थायी और छलावा-मात्र हैं; हम इनसे कभी भी शाश्वत सुख प्राप्त नहीं कर सकते। इसी तरह पूजा-भक्ति के बहिर्मुखी साधन जैसे कि रीति-रिवाज, पुण्य-दान, धर्म-ग्रंथों का अध्ययन, तीर्थ-यात्राएँ, जप-तप आदि हमारे ध्यान को परमात्मा की तरफ़ ले जा सकते हैं पर परमात्मा की पहचान नहीं करवा सकते। परमपिता परमात्मा की पहचान श्रद्धा और प्रेम से की गई अंतर्मुख भक्ति द्वारा ही हो सकती है जिसके फलस्वरूप आत्मा अंदर जाकर ‘शब्द’ में समाकर उसी का रूप बन जाती है।
तुलसी साहिब – सेंट ऑफ़ हाथरस से उद्धरित