सीमाओं से आगे
7 सितंबर, 1838 की सुबह उत्तरी इंग्लैंड के समुद्री तट की बर्फ़ीली और भयंकर तूफ़ानी लहरों में एक बहुत ही साहसिक बचाव अभियान हुआ। ग्रेस डार्लिंग नाम की एक नवयुवती ने संकट में फँसे हुए नाविकों की सहायता की और उन्हें सुरक्षित किनारे पर पहुँचाया। उसने अपने लाइटहाउस में अपने कमरे की खिड़की से एक जहाज़ के चालक दल और वहाँ मौजूद एक यात्री को ख़तरे में देखा। उसने अपने पिता से आग्रह किया कि उन्हें जहाज़ में फँसे हुए लोगों को बचाने की कोशिश करनी चाहिए। सुबह होते ही वे तूफ़ान का सामना कर सकने वाली अपनी एकमात्र साधारण नाव में बचाव कार्य के लिए निकल पड़े। उन दोनों ने मिलकर नौ लोगों की जान बचाई और इस साहसिक कार्य के बाद ग्रेस राष्ट्र की नायिका बन गई। उसकी बहादुरी की चर्चा आज भी बच्चों की कहानियों की किताबों में की जाती है। ऊँची लहरों, चिंतित चेहरों और इस साहसी लड़की की तस्वीरें आप ऑनलाइन देख सकते हैं।
कई बार ऐतिहासिक और प्रसिद्ध कार्यों के कारण दूसरे नेक कार्यों की तरफ़ लोगों का ध्यान नहीं जाता। फिर भी हम ग्रेस डार्लिंग जैसे इनसानों द्वारा किए गए कार्यों की प्रशंसा इसलिए करते हैं क्योंकि वे हमारे अमूल्य सिद्धांतों को अपनी करनी से साकार करते हैं। ग्रेस ने वही किया जो हम सब करना चाहते हैं लेकिन असल ज़िंदगी में जिसे करना हमें बहुत मुश्किल लगता है। ख़ुद से पहले दूसरों के बारे में सोचकर, वह सीमाओं से बहुत आगे निकल गई।
किन सीमाओं से आगे? अपने कर्तव्य की सीमाओं से आगे और उस ज़माने के सामान्य नियमों से आगे क्योंकि उस दौर में बीस-इक्कीस साल की लड़की से बस यही उम्मीद की जाती थी कि वह एक आज्ञाकारी बेटी बने और नियमित रूप से चर्च जाए। किसी ने भी उससे यह उम्मीद नहीं की थी कि वह किसी की जान बचाने के लिए इतनी बहादुरी दिखाए। फिर भी वह मदद करने के लिए आगे आई। लड़की होने के बावजूद उसने नाव का चप्पू चलाया जिससे वह और उसके पिता लोगों की जान बचाने में सफल हो सके। भयभीत कर देने वाली उन ऊँची लहरों के बीच इस कार्य को करने के लिए शारीरिक बल और साहस दोनों की ज़रूरत थी। इस तरह के क़दम उठाने के लिए दुनिया की सोच की परवाह न करते हुए इंसान की अपनी सोच सही और स्वतंत्र होनी चाहिए। सही सोच का मतलब है: ज़िम्मेदारी की भावना, दूसरों के प्रति सहानुभूति और बुनियादी नैतिक मूल्यों का होना। ऐसी सोच बातों से नहीं बल्कि कुछ कर दिखाने से ज़ाहिर होती है। इसी सोच की वजह से ग्रेस डार्लिंग ने हिम्मत दिखाई व बिना किसी झिझक के समुद्री तूफ़ान में फँसे लोगों की हालत देखते ही मदद के लिए आगे बढ़ी। उसने अपने कर्तव्य से कहीं आगे बढ़कर, अपने जीवन को जोखिम में डालकर उन सभी लोगों की मदद की जो तूफ़ानी लहरों में फँसे थे। उसने यह कार्य प्यार और ज़िम्मेदारी की भावना से प्रेरित होकर किया। उसके इस साहस और वीरता के लिए उसे आज भी याद किया जाता है।
हममें से बहुत कम लोग होंगे जिन्हें ग्रेस डार्लिंग की तरह किसी संकट का सामना करना पड़ा हो। हालाँकि रोज़मर्रा की ज़िंदगी की अपनी चुनौतियाँ हैं और उनसे निपटते समय हमें अकसर ऐसा लगता है कि ‘सीमा से बढ़कर काम करना’ ही असल में आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता है। आइए रोज़मर्रा की कुछ ऐसी ही स्थितियों पर नज़र डालते हैं।
जहाँ तक हमारी मान्यताओं का सवाल है, जब हम संतमत के रास्ते पर चलना शुरू करते हैं तब हमारे लिए इस पर क़ायम रहना हमेशा आसान नहीं होता। हममें से कुछ लोगों का जन्म सत्संगी परिवारों में होता है, जहाँ परिवार के सभी सदस्य शाकाहारी होते हैं; माता-पिता सत्संग में जाते हैं, भजन-सिमरन करते हैं और बच्चों को नामदान लेने के लिए प्रेरित करते हैं। लेकिन अगर हमारे हालात इससे अलग हों, फिर? जिनके साथ हम रहते हैं, अगर वे शाकाहारी न हों, वे किसी अन्य रूहानी मार्ग पर चलते हों या किसी पर भी नहीं, फिर? अगर ऐसा है, तो हमारी क्या प्रतिक्रिया होगी? ऐसे में हमें 19वीं सदी की उस साहसी लड़की से प्रेरणा लेनी चाहिए जिसने न सिर्फ़ डूबते हुए जहाज़ के चालक दल को बचाया बल्कि दूसरों की सोच की परवाह न करते हुए अपने आत्म-विश्वास और साहस को बटोरकर ‘सीमा से आगे बढ़कर काम किया।’ हमें बनाया ही इस तरह गया है कि हम स्वाभाविक तौर पर जानते हैं कि मुश्किलों से कैसे निपटना है और विपरीत हालात को भी अपने अनुकूल कैसे बनाना है।
उदाहरण के लिए, ज़रा सोचिए, जब आपने ख़ुद से वायदा किया हो कि आप जल्दी से काम निपटाकर दो घंटे भजन-सिमरन करेंगे, लेकिन आपका जीवनसाथी चाहता है कि आप शाम का समय परिवार के साथ बिताएँ। या फिर, जब आपने हाल ही में शाकाहारी भोजन अपनाया हो, लेकिन आपकी माँ को लगता है कि आप को उनके द्वारा बनाया खाना पसंद नहीं है और वह उदास हो जाती है। दूसरों से अलग रास्ता चुनकर आप पहले ही ‘सीमा से आगे’ क़दम बढ़ा चुके हैं। अब आपको दूसरों के अधिकारों को समझते हुए और उनकी पसंद का सम्मान करते हुए एक क़दम आगे बढ़कर अपने लक्ष्य के प्रति भी ईमानदार रहना है। इसके लिए आपको बहुत समझदारी और धैर्य से काम लेना होगा। हो सकता है कि आपको अपनी एक ऐसी ख़ूबी का पता चले जिसके बारे में आप अब तक अनजान थे – बिना किसी का दिल दुखाए अपनी बात रखना – जैसे जब आप अपनी माँ को बताते हैं कि आपको उनके हाथ का बना खाना कितना पसंद है और आप उनके हाथ का बना पालक-पनीर खाना चाहते हैं। और हाँ, आपका जीवनसाथी भी यह सोचकर ख़ुश हो जाएगा कि भले ही आप आज की शाम अपने लिए समय निकाल रहे हैं लेकिन आपने कल परिवार के साथ बाहर जाने की योजना बनाई है।
इन सब उतार-चढ़ाव के बीच हमारे साथ एक अदृश्य पर सच्चा दोस्त मौजूद रहता है। वह हैं हमारे पूर्ण सतगुरु जिन्होंने हमें नामदान के लिए चुना और जो हमारे रूहानी सफ़र के अंतिम पड़ाव तक हमारे अंग-संग रहेंगे। अपने शब्द-स्वरूप में वह हमेशा हमारे अंग-संग होते हैं और हमें रोज़मर्रा के जीवन में हर पल इस बात को याद रखना चाहिए। देहस्वरूप में सतगुरु सवाल-जवाब के ज़रिए हमें अपनी परेशानियों और कठिनाइयों को बताने का मौक़ा देते हैं। वह हमें हमेशा यही नसीहत देते हैं कि हमें प्रतिकूल परिस्थितियों में तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय उनसे ऊपर उठना चाहिए। प्रतिक्रिया देने से हमारा मन विचलित और अशांत हो जाता है और ऐसी स्थिति मानो किसी तूफ़ानी समुद्र में फँस जाने जैसी है। इससे पैदा होने वाली नकारात्मकता हमें आपसी मनमुटाव और तनाव के कड़वे अनुभव में ही उलझाए रखती है। हालाँकि, अगर हम प्रतिक्रिया न दें, तो हम मज़बूत चप्पुओं वाली एक छोटी-सी नाव की तरह आगे बढ़ सकते हैं और ‘सीमाओं से आगे जा सकते हैं।’
जब आपसी मतभेद इतने गहरे हो जाएँ कि समझौते या बदलाव की गुंजाइश ही न हो तब ऐसे हालात को परमात्मा की रज़ा मानकर ही ‘सीमा से आगे’ बढ़ा जा सकता है। अपनी उम्मीदों और चाहतों को छोड़कर, यह एहसास होने से कि जो कुछ हो रहा है, वह हमारे कर्मों की वजह से ही हो रहा है, हम स्थिति को स्वीकार कर लेते हैं, चाहे वह अच्छी हो, बुरी हो या बहुत ख़राब हो। इस तरह हम अपनी निजी राय या विचारों से ऊपर उठ जाते हैं और हमारी मानसिक स्थिति बदल जाती है यानी हम मालिक के हुक्म में आ जाते हैं।
ईमानदारी से सोचें, तो क्या हम ज़िंदगी-भर यही करने की कोशिश नहीं करते? और क्या हमारे भीतर वह शक्ति नहीं है जो हमें ऊपर की ओर खींचती है। महाराज चरन सिंह जी संत संवाद, भाग 1 में फ़रमाते हैं:
मन जितना ज़्यादा निर्मल होता जाता है, उतना ज़्यादा शब्द या नाम से जुड़ता जाता है। यह जितना ज़्यादा निर्मल हो जाता है, इसमें उतनी ज़्यादा शक्ति और दृढ़ता आ जाती है। जितना ज़्यादा यह शब्द से दूर रहता है, उतना ज़्यादा यह इंद्रियों के अधीन होता है, उतनी इसकी इच्छाशक्ति कमज़ोर हो जाती है। मैं अकसर अर्ज़ करता हूँ कि हमारे मन और आत्मा की बैठक शरीर में आँखों के पीछे तीसरे तिल में है। मन का रुख़ जितना नीचे की तरफ़ होता जाता है, हमारी इच्छाशक्ति उतनी ही निर्बल होती है। जितना मन का रुख़ ऊपर की तरफ़ होता है, हमारी इच्छाशक्ति उतनी बलवान् हो जाती है। असल में दृढ़ता या इच्छाशक्ति हमें शब्द से ही प्राप्त होती है।
अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश करने और मालिक की रज़ा में रहने से हम अंदर ‘शब्द’ रूपी शक्ति के क़रीब होते जाते हैं जो हमें अद्भुत तरीक़े से ऊपर की ओर खींचती है। बाबा जी अकसर ताश के पत्तों का उदाहरण देकर समझाते हैं कि समझदारी से लिए गए फ़ैसले जीवन में कितना अहम या बड़ा बदलाव ला सकते हैं। ताश की बाज़ी में हमें अच्छे पत्ते भी मिल सकते हैं और बुरे भी। यह तो क़िस्मत का खेल है जिस पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं। पर हमारे पास चाहे जैसे भी पत्ते आए हों, फ़र्क़ तो इस बात से पड़ता है कि हम उन पत्तों के साथ कैसी बाज़ी खेलते हैं।
संतमत बहुत सीधा और सरल मार्ग है, इसमें सतगुरु की हिदायत के अनुसार नियमपूर्वक भजन-सिमरन करना और दिन-भर परमात्मा को याद करना शामिल है। साथ ही इसमें शुद्ध शाकाहारी भोजन करना जिसमें दूध और दूध से बने पदार्थ भी शामिल हैं, शराब और मादक पदार्थों से दूर रहना और नैतिक जीवन जीना शामिल है। हालाँकि हममें से बहुत से लोग यह भली-भाँति महसूस करते हैं कि इसे कहना जितना आसान है, निभाना उतना ही कठिन है। हम अपने ही कर्मों की तूफ़ानी लहरों में घिरे और फँसे हुए हैं बिलकुल वैसे ही जैसे उत्तरी सागर की तूफ़ानी लहरों में ग्रेस डार्लिंग फँसी थी। हमें अपने प्यारे सतगुरु के साथ मिलाप के लक्ष्य को सामने रखकर और संतमत के उसूलों का पालन करते हुए आगे बढ़ना है। अपना रूहानी सफ़र जारी रखते हुए ही हम इस विकराल भवसागर को पार कर सकते हैं।
रूहानी नज़रिए से देखें तो सही मार्गदर्शन के नियम वे चार सिद्धांत हैं, जिनका मक़सद इनसानी कमज़ोरियों पर क़ाबू पाने में मदद करना है ताकि हम अपनी मंज़िल पर पहुँच सकें। इसके अलावा, हम सामाजिक प्राणी हैं और किसी न किसी काम में व्यस्त ही रहना चाहते हैं, इसलिए सतगुरु हमें अपने ख़ाली समय को सेवा में लगाने के लिए प्रेरित करते हैं। वह समय अब बीत चुका है जब सतगुरु के सेवकों की गिनती इतनी कम होती थी कि उन्हें सतगुरु की निजी सेवा का मौक़ा मिल जाता था। मगर अब हम सत्संग-केंद्रों या संगत के लिए किए गए किसी भी कार्य को सतगुरु की सेवा करने जितना ही अहम समझ सकते हैं। जब सेवा ईमानदारी और प्यार के साथ व उस कार्य के लिए नियुक्त किए सेवादार की हिदायतों के अनुसार की जाती है तब सतगुरु हमारे अंग-संग होते हैं। ऐसा करके हम सतगुरु के साथ अपना रिश्ता और मज़बूत कर रहे होते हैं जो हमें क़ुदरती तौर पर भजन-सिमरन की ओर खींचता है ताकि हम उनकी मौजूदगी को महसूस कर सकें।
इंसान पर आस-पास के माहौल का असर बहुत जल्दी पड़ता है जिसकी वजह से कभी-कभी वह अपने नेक इरादों को भूल जाता है। इसीलिए सतगुरु हमें नियमित रूप से सत्संग में जाने की नसीहत देते हैं, जहाँ हमारा ध्यान संत-महात्माओं के उपदेश की तरफ़ जाता है और हम समान सोच रखने वाले सत्संगियों के संपर्क में आते हैं। सतगुरु इस बात पर भी ज़ोर देते हैं कि हम अच्छे इंसान बनें तथा हमारी करनी में दया और करुणा का भाव झलके। ज़िंदगी की चुनौतियों का सामना करते हुए आगे बढ़ने के ये तरीक़े हमारे ध्यान को सतगुरु पर केंद्रित करने और साथ ही अधिक एकाग्रता से ढाई घंटे भजन-सिमरन करने में हमारी मदद करते हैं। सेवा और सत्संग से लगातार जुड़े रहने पर जो आत्म-अनुशासन हममें दिखाई देता है, वह एक स्पष्ट संदेश और जवाब है – “तुम यह कर सकते हो” और “हाँ, मैं कर सकता हूँ।”
इस संसार के पथरीले किनारे से दूर हमारी यह छोटी-सी नाव – जिसमें हमारा भरोसा, हमारी कोशिश, हमारा अभ्यास और इन सब से बढ़कर हमारे सतगुरु की दया-मेहर शामिल है – लहरों का सामना करते हुए सही दिशा में निरंतर आगे बढ़ती रहेगी जब तक कि हम हर मुश्किल को पार करके उस किनारे पर नहीं पहुँच जाते जहाँ हम पूरी तरह से सुरक्षित हैं।