दो सतगुरु – एक सत्य: देहस्वरूप से परे
राधास्वामी सत्संग ब्यास के संत-सतगुरु बाबा गुरिंदर सिंह जी ने सितंबर 2024 में, हुज़ूर जसदीप सिंह जी को आर. एस. एस. बी. की सभी सोसाइटियों के नए संरक्षक और संत-सतगुरु के रूप में अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। सतगुरु ने उत्तराधिकारी चुनकर देहधारी रूहानी मार्गदर्शक की परंपरा को जारी रखा है जो कि संतमत की विचारधारा का आधार है।
ज़्यादातर शिष्य यह बात अच्छी तरह से समझते हैं कि नए संत-सतगुरु की नियुक्ति ख़ुशी मनाने का मौक़ा क्यों है। फिर भी, कई लोग पूछते हैं कि बाबा जी कहाँ हैं और सत्संग या सवाल-जवाब के सत्रों में उनकी मौजूदगी की उम्मीद रखते हैं। ये सवाल सिर्फ़ डेरा में ही नहीं, बल्कि बहुत-से अन्य सत्संग केंद्रों में भी किए जाते हैं। हालाँकि, अपने सतगुरु की कमी महसूस करना पूरी तरह स्वाभाविक है लेकिन सत्संग में हर बार उनके देहस्वरूप की मौजूदगी की उम्मीद रखने के अलावा हम किन तरीक़ों से अपना प्रेम और भक्ति-भाव ज़ाहिर कर सकते हैं, प्रस्तुत लेख इसी बारे में है।
हमारी समझ, विश्वास और करनी के बीच का फ़र्क़
रूहानी मार्गदर्शक का होना सभी आध्यात्मिक परंपराओं में अहम माना गया है। जिसने भी कभी किसी मैसिव ओपन ऑनलाइन कोर्स (MOOC) से सीखने की कोशिश की है, वह जानता है कि अपने दम पर कुछ नया सीखना कितना मुश्किल होता है। रूहानियत में भी बस ऐसा ही है; हमें एक देहधारी सतगुरु की ज़रूरत होती है जो इनसान की दयनीय दशा के बारे में समझा सके और सबसे महत्त्वपूर्ण, आत्मा को ‘शब्द’ से जोड़ने की युक्ति सिखा सके। भले ही देहधारी सतगुरु का होना बेहद ज़रूरी है, फिर भी सभी संत-महात्मा हमें बार-बार याद दिलाते हैं कि हमें उनके देहस्वरूप से अधिक लगाव नहीं रखना चाहिए क्योंकि सच्चा गुरु तो ‘शब्द’ है और शब्द से जुड़कर ही आत्मा सच्चा शिष्य बनती है।
हममें से बहुत-से लोग यह समझते हैं कि उन्हें पता है कि ‘शब्द’ ही सच्चा गुरु है लेकिन हमारा व्यवहार अकसर कुछ और ही ज़ाहिर करता है। यदि हम सच में इस बात को समझते तो हम ख़ुद से यह सवाल ज़रूर पूछते कि एक सतगुरु के मौजूद होते हुए भी हमें दूसरे सतगुरु की कमी क्यों महसूस होती है? हमारा दिल और हमारी आत्मा शायद जिस बात को ज़ाहिर करते हैं उसे हमारा मन अभी पूरी तरह से स्वीकार नहीं कर पाया है: चूँकि ‘शब्द’ ही सच्चा गुरु है इसलिए किसी एक शब्द-स्वरूपी सतगुरु के साथ होना, किसी दूसरे शब्द-स्वरूपी सतगुरु की मौजूदगी में होने जैसा ही है। इस नज़रिए से देखें तो इस सवाल का उतना महत्त्व नहीं रह जाता कि कौन हमारे बीच मौजूद नहीं है। इसके बजाय, हमें तो इस बात के लिए आभारी होना चाहिए कि हम इस धरती पर मौजूद अरबों इनसानों में से उन चंद ख़ुशक़िस्मत लोगों में से हैं जिन्हें पूर्ण सतगुरु की संगति में बैठने का अवसर मिला है।
हममें से कुछ लोग सतगुरु को बहुत ऊँचे मुक़ाम पर रखते हैं और यह मानते हैं कि चूँकि उनका असल स्वरूप ‘शब्द’ ही है इसलिए वह सब में समाए हुए हैं। मत को भरम भुलै संसार की लेखिका एक तरीक़ा बताती हैं जिससे हम जान सकते हैं कि हमारा विश्वास पक्का और दृढ़ नहीं है:
हमारे विश्वास की सबसे अहम और एकमात्र कसौटी यह है कि क्या हम उनके हुक्म के मुताबिक़ भजन-सिमरन करते हैं? जिन्हें हम सतगुरु मानते हैं, अगर हम उनके दिए इस एक और सिर्फ़ एक हुक्म का पालन नहीं करते तो हम अपने विश्वास के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। हम केवल दिखावा कर रहे हैं कि हमें विश्वास है वरना सतगुरु के हुक्म का पालन न करने की गुस्ताख़ी कौन करेगा?
ये शब्द पढ़ने में शायद अच्छे न लगें लेकिन अगर हम अपने अंदर झाँककर देखेंगे तो पाएँगे कि हममें से ज़्यादातर लोग ऐसा ही करते हैं। लेखिका हमारी आलोचना नहीं कर रही बल्कि हमें आईना दिखा रही हैं। हममें से बहुत-से लोग सतगुरु के हुक्म को न मानने के बारे में सोच भी नहीं सकते लेकिन हमारा रोज़मर्रा का भजन-सिमरन कुछ और ही कहानी बयाँ करता है।
रोज़ाना भजन-सिमरन न करने के अलावा (बावजूद इसके कि सतगुरु चाहते हैं कि हम इसे करें) एक और बात हमारी कथनी और करनी के बीच के फ़र्क़ को साफ़ ज़ाहिर करती है। अगर सतगुरु ‘शब्द’ का रूप हैं तो तर्क की दृष्टि से वह जो भी कहते या करते हैं, हमें उसे मानना चाहिए। इस संदर्भ में, बाबा जी की अनुपस्थिति को लेकर हुज़ूर जी से किए गए सवाल पर उनके द्वारा दिया गया जवाब हमें दिखाता है कि कथनी और करनी में फ़र्क़ का न होना कैसा होता है। जब उनसे पूछा गया कि बाबा जी सत्संग में क्यों नहीं आए या वह कब आएँगे तब हुज़ूर जी का यह कहना कि मैं अपने सतगुरु से इस तरह का सवाल पूछने की हिम्मत नहीं कर सकता। उनका यह जवाब उनकी विनम्रता और बाबा जी के लिए उनके गहरे प्रेम को तो दर्शाता ही है, साथ ही हुज़ूर जी का जवाब हमें यह सिखाता है कि हमें ऐसे सवाल करना छोड़ देना चाहिए।
प्रेम की सर्वोत्तम करनी
अपने सतगुरु, जिन्होंने हमें नामदान बख़्शा है, के साथ ख़ास लगाव का होना क़ुदरती है और हम चाहते हैं कि उनकी ख़ुशी हासिल कर सकें। पैंतीस वर्षों से, बाबा जी हमें याद दिला रहे हैं कि सच्चा प्यार कथनी से नहीं बल्कि करनी से ज़ाहिर करना है। इसलिए अपने सतगुरु के प्रति प्यार को प्रकट करने का सबसे अच्छा तरीक़ा यह है कि हम ईमानदारी से अपना भजन-सिमरन करें।
असल में, यदि हम नियमित रूप से अभ्यास करते हैं तो हो सकता है कि भजन-सिमरन करना जितना मुश्किल लग रहा हो, उतना ही हमारा प्रेम गहरा होता जा रहा हो। ऐसा क्यों? क्योंकि रूहानियत की प्रेरणा से भजन-सिमरन करना आसान हो जाता है। जब इसे करना मुश्किल लगे, जब इसे करने का मन न करे, जब प्रेम की भावना ही महसूस न हो और ख़ालीपन का एहसास हो तब भी भजन-सिमरन करना ही सच्ची भक्ति है। चाहे मन भजन-सिमरन को छोड़ने या टालने के लिए कहता है, तब प्यार ही हमें बैठने, फिर से शुरू करने और इसे दृढ़ता से करते रहने की प्रेरणा देता है। हुज़ूर महाराज सावन सिंह जी ने सन् 1965 में छपे स्पिरिचुअल लिंक के लेख में दरियाई लाल कपूर जी को समझाते हुए फ़रमाया:
असल बड़ाई उस इनसान की है जो भजन-सिमरन के मुश्किल और नीरस लगने के बावजूद इसे करता है। एक घंटा किया गया ऐसा भजन-सिमरन कुल-मालिक की नज़रों में कहीं ज़्यादा अहमियत रखता है बजाय दस घंटे किए भजन-सिमरन के (जिसमें से रस आता है)। यही सतगुरु की असल सेवा है।
भले ही हम इस भ्रम में रहें कि सतगुरु सिर्फ़ ‘अच्छे’ भजन-सिमरन को ही अहमियत देते हैं लेकिन हमें इस बात से तसल्ली मिल सकती है जो वह हमें लगातार याद दिलाते हैं कि असल में हमारी कोशिश मायने रखती है, न कि अच्छी तरह से किया गया भजन-सिमरन। यदि हमारा शरीर स्थिर नहीं रहता या इसमें दर्द होता है और फिर भी हम इसे जारी रखते हैं, तो यह कोशिश करना है। यदि हमारा मन भटकता है और फिर भी हम इसे सिमरन में लगाते हैं, यह भी कोशिश करना है। यहाँ तक कि यदि हम अभ्यास के दौरान सो जाते हैं और उठकर फिर से भजन-सिमरन शुरू कर देते हैं तो यह भी कोशिश करना ही है। असल में, जब दरियाई लाल कपूर जी ने भजन-सिमरन के दौरान मन को एकाग्र करने में असफल रहने पर अपनी निराशा और दु:ख प्रकट किया तो महाराज सावन सिंह जी ने उन्हें यक़ीन दिलाया कि जिन्हें हम संघर्ष या कमियाँ समझते हैं, कुल-मालिक के लिए वह प्रेम से की गई करनी है। इस घटना का ज़िक्र करते हुए अपने लेख में दरियाई लाल कपूर जी ने बताया कि महाराज सावन सिंह जी ने उनसे रूमी की मसनवी की यह पंक्ति पढ़ने के लिए कहा था:
कुल-मालिक को हमारी असफलताएँ और नाक़ाम कोशिशें पसंद हैं। उसके लिए हमारी सफलता के बजाय सच्चे दिल से की गई नाक़ाम कोशिशें मायने रखती हैं। व्यर्थ लगने वाला प्रयास, सोए रहने से तो बेहतर है।
महाराज सावन सिंह जी ने इस बात को समझाने के लिए उस माँ का उदाहरण दिया जो अपने बच्चे को सीढ़ियाँ चढ़ना सीखते देख रही है। बच्चा दोनों हाथों से सीढ़ी की रेलिंग पकड़ता है, अपनी छोटी-सी टाँग ऊपर उठाता है और लड़खड़ाता है। बेशक़ अपनी इस कोशिश में बच्चा फिसलेगा ही, और हो सकता है कि वह निराश होकर बैठ जाए जबकि माता-पिता के लिए बच्चे द्वारा की गई कोशिश असफलता नहीं बल्कि ख़ुशी का मौक़ा है। माता-पिता इस बात को लेकर उतावले नहीं होते कि बच्चा झट से सारी सीढ़ियाँ चढ़ जाए बल्कि वे उसके हर लड़खड़ाते क़दम को बड़े प्यार और दुलार से देखते हैं। जब बच्चा दौड़कर सीढ़ियाँ चढ़ना सीख जाता है तब माता-पिता भी इस बारे में बेफ़िक्र हो जाते हैं। इसी तरह, ऊपर दिए गए उद्धरणों द्वारा हमें समझ आती है कि जब तक हम तीसरे तिल तक नहीं पहुँच जाते, हमारा भजन-सिमरन भी उस बच्चे की कोशिशों जैसा ही है; जो शब्द-सतगुरु के लिए बहुत अहम है, हमारी अपूर्ण कोशिशों के बावजूद नहीं बल्कि इन्हीं की वजह से। मन के न मानने पर भी भजन-सिमरन के लिए बैठना, मन के भटकने के बाद इसे फिर से सिमरन में लगाना और कोशिश करते रहना – शब्द-सतगुरु के लिए ये हमारी कमियाँ नहीं हैं बल्कि ये तो प्रेम से की गई कोशिशें हैं जो उन्हें अच्छी लगती हैं।
फिर भी, किसी बात को समझ लेना और उसे करनी में ले आना दो अलग बातें हैं। भले ही हम यह मानते हों कि हमारी कोशिशों को प्रेम की करनी ही माना जाता है, फिर भी हममें से कई लोग कहीं न कहीं यह उम्मीद लगा लेते हैं कि ‘अच्छे’ भजन-सिमरन के फलस्वरूप हमें अंदर दर्शन हो जाएँगे, हमारे गुण प्रत्यक्ष दिखाई देंगे, हमारी कमियाँ दूर हो जाएँगी और हम जीवन की समस्याओं की वजह से विचलित नहीं होंगे। जब हम अपने अभ्यास को इन कसौटियों पर आँकते हैं तब हमें एहसास होता है कि अपनी कोशिशों से अब तक हम यह सब हासिल नहीं कर पाएँ हैं। हालाँकि, गूढ़ सीख यह है कि हमारे भजन-सिमरन का मक़सद ये सब नहीं है और न ही ये सब इस बात का प्रमाण है कि हमारा भजन-सिमरन कारगर है।
भजन-सिमरन सबसे उत्तम सेवा है जो हम कर सकते हैं। सेवा का बुनियादी अर्थ देना है, लेना नहीं। सतगुरु को सबसे ज़्यादा ख़ुशी किसी ख़ास आंतरिक अनुभव से नहीं बल्कि हमारे नज़रिये में आए बदलाव से मिलती है। भजन-सिमरन को एक सौदा समझकर, इस उम्मीद से करने के बजाय कि हमें अंतर में सतगुरु के दर्शन होंगे, शब्द सुनाई देगा या प्रकाश दिखाई देगा, इसे भेंट समझकर समर्पण की भावना से करना चाहिए। भजन-सिमरन में हम सतगुरु को अपना समय, ध्यान, लगन और सर्वस्व (दिल, मन और आत्मा) समर्पित कर देते हैं। जब हम इस भाव से सब कुछ समर्पित कर देते हैं तब हमारी मुश्किलें भी प्रेम का इज़हार बन जाती हैं।
कृतज्ञता और मालिक की रज़ा में रहना
हमारे सतगुरु इस बात पर ज़ोर देते हैं कि कृतज्ञता (शुक्राना करना) ही रूहानियत की नींव है। अगर भजन-सिमरन मालिक के प्रति हमारे प्रेम को व्यक्त करने का ज़रिया है तो उनकी रज़ा में रहकर आभार व्यक्त करना भी उसी प्रेम का दूसरा रूप है। व्यावहारिक रूप से इसका मतलब यह है कि हम उनके हर फ़ैसले को स्वीकार करें, भले ही वह फ़ैसले हमारी मर्ज़ी के मुताबिक़ न हों। अगर सतगुरु सत्संग में आते हैं तो हमें उनके शुक्रगुज़ार होना चाहिए; अगर वे नहीं आते तो हमें इसे भी उनकी मौज समझना चाहिए।
जब सतगुरु (बाबा जी) सत्संग में नहीं आते, तो मन में निराशा होना क़ुदरती है। फिर भी, जब हमें सवाल पूछने का मौक़ा मिले, तो हमें थोड़ा रुककर यह सोचना चाहिए कि इस अवसर का सबसे बेहतर इस्तेमाल कैसे किया जाए। बाबा जी के बारे में पूछने की वजह समझ आती है लेकिन क्योंकि वह अपनी मर्ज़ी के मालिक हैं इसलिए ऐसे सवालों से कुछ बदलने वाला नहीं है। इसके बजाय, हमें ऐसे सवाल पूछने चाहिएँ जिनसे रूहानी तौर पर हमारा भला हो सके और जिनसे संगत भी लाभ उठा सके।
सतगुरु की रज़ा में रहने का एक और तरीक़ा यह है कि हम हुज़ूर जी को बाबा जी के उत्तराधिकारी के रूप में स्वीकार करें। भजन-सिमरन करने के साथ-साथ, सबसे सार्थक सेवा यही होगी कि हम निराश होकर हुज़ूर जी से बाबा जी की ग़ैर-मौजूदगी के बारे में सवाल न पूछें। ऐसे सवाल, चाहे वे सच्चे दिल से ही क्यों न पूछे गए हों, हमारा ध्यान हुज़ूर जी की मौजूदगी और उनके द्वारा दी जा रही रूहानियत की शिक्षा से भटका देते हैं। इसलिए, हमारा असल समर्पण हमारे सवालों में नहीं बल्कि हमारी ख़ामोशी और हमारे भजन-सिमरन में है। यह हमें खोई हुई भेड़ों की कहानी की याद दिलाता है।
कल्पना करें कि एक नया चरवाहा भेड़ों के झुंड की देखभाल की ज़िम्मेदारी लेता है। अगर पुरानी भेड़ें पुराने चरागाह में जाएँ और ठीक मार्ग पर चलें तो वे नए चरवाहे का काम आसान और सुखद बना देती हैं। लेकिन, अगर वही पुरानी भेड़ें पुराने चरवाहे की तलाश में पहाड़ियों पर भटकने लगें, तो नए चरवाहे की ज़िम्मेदारी दोहरी हो जाती है – उसे नए मेमनों को भी सँभालना पड़ता है और साथ ही खोई हुई पुरानी भेड़ों को ढूँढ़ने के लिए पहाड़ियों पर भी इधर-उधर दौड़ना पड़ता है।
विरह की तड़प से लाभ उठाना
रूहानियत मूल रूप से प्रेम और भक्ति का मार्ग है। युगों-युगों से इस मार्ग पर चलते हुए शिष्यों ने सतगुरु से जुदाई की गहरी पीड़ा को महसूस किया है। जैसा कि तुलसी साहिब पुस्तक के लेखक समझाते हैं कि यह पीड़ा कुल-मालिक द्वारा बख़्शी गई दात है:
जिस प्रकार प्रेम परमात्मा की दात है उसी प्रकार विरह भी उसी की दी हुई नेमत है। दरअसल विरह में ही प्रेम परिपक्व होता है। यह विरह की तड़प संसार की इच्छाओं को भस्म कर देती है। विरह में प्रेमी का रोम-रोम प्रियतम को याद करता है। विरह वह सीढ़ी है जो प्रेमी को प्रियतम के चरणों तक पहुँचा देती है।
इस तरह की सूझबूझ बहुत अहम है। हमें इस बात को लेकर सजग रहना होगा कि हम विरह की पीड़ा को सिर्फ़ जज़्बाती तौर पर ही महसूस न करते रहें बल्कि इसे आंतरिक बदलाव का ज़रिया बनाएँ। इसे ख़ुद पर हावी न होने देकर, क्यों न हम इसे अपनी रूहानी बेहतरी के लिए इस्तेमाल करें? उदाहरण के लिए, सत्संग में बाबा जी के मौजूद न होने पर अगर हमें उनकी कमी बहुत ज़्यादा महसूस हो रही हो तो यह एहसास करनी के लिए पुकार है। क्या हम अपने इन जज़्बातों को करनी में बदलने यानी शाम के समय थोड़ा ज़्यादा भजन-सिमरन करने के लिए तैयार हैं? उस समय के अलावा जो हम सुबह पहले ही भजन-सिमरन में लगा चुके हैं?
मन में यह शंका पैदा होने से पहले कि क्या हम ऐसा कर पाएँगे, हमें थोड़ा रुककर यह विचार करना चाहिए कि हम असल में कौन हैं? हमारा असल वजूद आत्मा है जो शब्द का ही रूप है और शब्द सर्वशक्तिमान है। इसके बाद हमें ख़ुद से यह सवाल पूछना चाहिए कि हमें क्या लगता है कि असल में कौन किसकी कमी महसूस कर रहा है? यह सोचना कि हमारा वजूद, हमारी ख़ुद की बनाई पहचान, सतगुरु के देहस्वरूप के लिए तड़प रही है, यह केवल मन का एक भ्रम है। जिस जुदाई को हम महसूस करते हैं, वह असल में हमारी आत्मा की ‘शब्द’ यानी दिव्य धुन से मिलाप की तड़प है जोकि सतगुरु के रूप में साकार है।
दुनिया-भर के सत्संग केंद्रों में निष्काम सेवा का जो अद्भुत नज़ारा देखने को मिलता है, वह शब्द के कार्यशील होने का प्रमाण है। अगर हमारा प्यार सिर्फ़ शारीरिक या जज़्बाती होता तो इस तरह के निष्काम भाव को बनाए रखना लगभग नामुमकिन होता। हम अकसर कहते हैं, “सतगुरु ही सब कुछ कर रहे हैं।” लेकिन सतगुरु कौन हैं? सतगुरु शब्द हैं। और सेवा कौन कर रहा है? यह वही शब्द है जो हर सेवादार के ज़रिए सेवा कर रहा है।
चाहे हमने सबके साथ मिलकर सेवा में हिस्सा न भी लिया हो, फिर भी हमने यह देखा या अनुभव किया होगा कि सतगुरु के बाहरी दर्शनों के लिए हम किस हद तक चले जाते हैं। अपनी उम्र या बीमारी की परवाह किए बिना, अपने आराम और भूख-प्यास तक को भूलकर हम सुबह जल्दी उठकर सत्संग में सबसे आगे बैठने की कोशिश में रहते हैं और फिर घंटों तक सब्र के साथ इंतज़ार करते हैं, सिर्फ़ सतगुरु के देहस्वरूप की एक झलक पाने के लिए। प्यार की ख़ातिर हम इस असुविधा को भी ख़ुशी-ख़ुशी सह लेते हैं।
अगर हम सतगुरु के देहस्वरूप की झलक पाने के लिए ऐसा पक्का इरादा रख सकते हैं तो फिर ऐसी कोई वजह नहीं कि हम उसी दृढ़ संकल्प के साथ भजन-सिमरन न कर पाएँ। हो सकता है कि हम अपने अंदर जो दर्शन करना चाहते हैं वह हमें तुरंत प्राप्त न हों मगर पूरी ईमानदारी से किए गए अभ्यास से हम अपने आप सतगुरु के नज़दीक हो जाते हैं। हमारा भजन-सिमरन भले ही उतना अच्छा न हो पाए जितना हम करना चाहते हैं तब भी सिर्फ़ यह सोचकर कि हमने अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश की है, हमें सुकून और ख़ुशी महसूस होती है और इस तरह से अपने आप को समर्पित कर देने से आत्मा और परमात्मा के बीच की दूरी ख़ुद-ब-ख़ुद मिटने लगती है।
जो तड़प हम महसूस करते हैं, वह रूहानी मार्ग में कोई रुकावट नहीं है बल्कि एक न्योता है। हमारी जुदाई की हर टीस दरअसल भीतर आने के लिए शब्द-सतगुरु का बुलावा है जहाँ हम सच्चे सुकून का अनुभव कर सकें। हमें अनमोल तोहफ़े दिए गए हैं – देहधारी सतगुरु, कारगर युक्ति और अब शायद विरह की दात ताकि हम भजन-सिमरन की अहमियत को समझकर इसे शिद्दत से करने लग जाएँ। पूछने लायक़ सवाल यह नहीं है, “वह कहाँ हैं?” बल्कि सवाल यह है, “क्या मैं नियमित रूप से भजन-सिमरन कर रहा हूँ?” अगर हम हर सुबह शांत मन से भजन-सिमरन करते वक़्त इस बात का जवाब ईमानदारी से दे सकें तो हम पाएँगे कि उनके और हमारे बीच की दूरी हमारी सोच से कहीं कम है और उस ख़ामोशी से परे जो प्यार हमारा इंतज़ार कर रहा है, वह हमारी उम्मीद से कहीं बढ़कर है।