क्या आप प्याले से नाम रूपी दिव्य अमृत पी रहे हैं?
जब आप इस लेख का शीर्षक देखेंगे, आप शायद ख़ुद से पूछें कि दिव्य अमृत का आपसे क्या लेना-देना है। यह वाक्य शायद आपको प्राचीन यूनानी कहानियों की याद दिलाए जिसमें अमृत एक जादुई पेय था जिसे पीकर इनसान अमर हो जाता था। पर क्या दिव्य अमृत सिर्फ़ एक काल्पनिक विचार है या इन कहानियों के लेखक किसी गहरे रूहानी सत्य की ओर इशारा कर रहे थे? अगर यह सच है, तो यह क्या है? जब कोई इसका अनुभव करता है तब क्या होता है? सबसे अहम बात, क्या यह आपके भीतर पहले से ही मौजूद है?
संत-महात्मा समझाते हैं कि दिव्य अमृत कोई ऐसा पेय नहीं है जिसे आप किसी गिलास में उड़ेल सकते हैं बल्कि यह परमात्मा की रचनात्मक शक्ति है जिसके कई नाम हैं जैसे शब्द, नाम या लॉगॉस। यह ऐसी दिव्य शक्ति है जिसने सब कुछ रचा है और जो सारी सृष्टि का आधार है। जब कोई भजन-सिमरन के ज़रिए इससे जुड़ता है तो इसका अनुभव इतना गहन होता है कि प्राचीन लेखक इसकी तुलना अमृत से करते हैं। मगर यह विचार किसी कल्पना या रूपक से कहीं बढ़कर है। संत-महात्मा समझाते हैं कि जब आत्मा ‘शब्द’ से जुड़ती है तब शब्द अहं का नाश करके, आत्मा को दिव्य प्रेम से सराबोर कर देता है और इसे जन्म-मरण के चक्कर से हमेशा के लिए मुक्त कर देता है और यह अमर हो जाती है। तीसरी पातशाही गुरु अमरदास जी की बानी है:
अंम्रित साचा नाम है कहणा कछू न जाइ॥
पीवत हू परवाण भइआ पूरै सबद समाइ॥
आदि ग्रन्थ
अगर ‘शब्द’ दिव्य अमृत है तो प्याला क्या है? संत-महात्मा समझाते हैं कि यह हृदय रूपी कोठरी है। सिर्फ़ मनुष्य-जामे में ही हमारी आत्मा उस अमृत की खोज कर सकती है और अंतर्मुख होकर अपने रूहानी स्रोत तक का सफ़र तय कर सकती है। इस प्याले में से अमृत पीने के लिए हमें मनुष्य-जामे की अहमियत को समझकर उस रूहानी मक़सद को पूरा करना है जिसके लिए यह मिला है। वह मक़सद है: प्याले को साफ़ करना ताकि इसे भरा जा सके।
यह समझने के लिए कि यह पात्र यानी मनुष्य-जामा इतना दुर्लभ और अनमोल क्यों है, हमें सिर्फ़ अपने आस-पास देखने की ज़रूरत है। इस दुनिया में अलग-अलग तरह के कितने ही जीव हैं जब तक कोई किसी ख़ास मक़सद से गहराई में जाकर अध्ययन नहीं करता तब तक उसका इस ओर कभी ध्यान ही नहीं जाता। संत-महात्मा समझाते हैं कि धरती पर चौरासी लाख योनियाँ हैं। चूँकि यह संख्या अलग-अलग जीवों और पेड़-पौधों के बजाय श्रेणियों की ओर इशारा करती हैं, कुल जीवित प्राणियों की संख्या गिनती से भी परे है। यहाँ तक कि प्रजातियों की गिनती कर पाना भी बहुत मुश्किल है क्योंकि एक ही प्रजाति के अंतर्गत कई उपप्रजातियाँ शामिल हैं। उदाहरण के लिए, चींटियों का संबंध ‘फ़ोरमिसिडाए’ नामक कुल से है, सिर्फ़ इस कुल में ही चींटियों की हज़ारों प्रजातियाँ शामिल हैं।
संत-महात्मा समझाते हैं कि परमात्मा की रचनात्मक शक्ति ‘शब्द’ हरेक चीज़ में मौजूद है, सृष्टि का एक भी कण इससे ख़ाली नहीं है। इसका भाव है कि सूक्ष्म से सूक्ष्म जीव से लेकर सबसे विशाल प्राणी तक हरेक जीव के अंदर आत्मा है। हालाँकि, इन अनगिनत प्रकार के जीवों में से केवल मनुष्य-जामे में ही आत्मा जागृत होकर शब्द से जुड़कर मृत्यु और पुनर्जन्म के चक्कर से मुक्त हो सकती है। इसलिए, मनुष्य-जन्म दुर्लभ ही नहीं बल्कि रूहानी दृष्टि से अनमोल है। संत-महात्मा समझाते हैं कि आत्मा को मनुष्य के रूप में जन्म लेने से पहले चौरासी लाख योनियों में से गुज़रना पड़ता है। इस दृष्टिकोण से देखने पर पता चलता है कि मनुष्य-जीवन सिर्फ़ एक जैविक घटना ही नहीं है बल्कि एक अहम रूहानी पड़ाव है जिसके महत्त्व को लफ़्ज़ों में बयान नहीं किया जा सकता। महाराज सावन सिंह जी परमार्थी पत्र, भाग 2 में फ़रमाते हैं:
इनसान और उससे नीचे की योनियों में यही फ़र्क़ है कि इनसान का जामा परमात्मा के दर्शन करने और इसी ज़िंदगी में ऊँचे से ऊँचे रूहानी दर्जे को प्राप्त करने के लिए दिया जाता है। इसका हरएक पल करोड़ों रुपयों के बराबर है।
संत-महात्मा समझाते हैं कि मनुष्य-जन्म तब वरदान बनता है जब हम इसका इस्तेमाल परमात्मा से मिलाप करने के लिए करते हैं क्योंकि सिर्फ़ तभी हम नाम के दिव्य अमृत को पी सकते हैं। हालाँकि, हम बहिर्मुखी होकर दुनिया की ऐशो-इशरत में सारा समय व्यर्थ गँवा देते हैं। जब हमारा ध्यान पूरी तरह से अंदर एकाग्र हो जाता है तब हमारा प्याला भरता है अन्यथा हम इसकी मिठास से वंचित ही रहते हैं।
पाँचवीं पातशाही गुरु अर्जन देव जी की बानी से हमें प्रेरणा मिलती है:
अंम्रित नाम निधान है मिल पीवहो भाई॥
जिस सिमरत सुख पाईऐ सभ तिखा बुझाई॥
आदि ग्रन्थ
गुरु अर्जन देव जी समझाते हैं कि वह अमृत जिसे हम खोज रहे हैं, वह कहीं दूर नहीं है या हमारी पहुँच से बाहर नहीं है। यह तो पहले से ही हमारे अंदर है पर इसका अनुभव करने के लिए, हमें नामदान के समय बताए हुए चारों उसूलों का पालन ज़िंदगी-भर करना पड़ेगा। पहला, हमें शुद्ध शाकाहारी भोजन जिसमें दूध और दूध से बने पदार्थ भी शामिल हैं, अपनाना है। हमें माँस, मछली, अण्डों इत्यादि से परहेज़ करना है। दूसरा, हमें शराब या अन्य मादक पदार्थों का सेवन नहीं करना है क्योंकि रूहानी तरक़्क़ी के लिए मन का निश्चल और निर्मल होना ज़रूरी है। तीसरा, हमें नैतिक जीवन जीना है। हमें ईमानदार और दयालु बनना है। इन उसूलों का पालन करने से हम अपने विचारों एवं कर्मों को नियंत्रण में रख सकते हैं और ये तीनों चौथे उसूल भाव भजन-सिमरन की नींव बनते हैं। देहधारी सतगुरु के मार्गदर्शन में नियमित रूप से किया गया भजन-सिमरन मन को निर्मल करता है। इन सभी सिद्धांतों का जीवन-भर पालन करने से हम सहज ही उस नाम रूपी अमृत के प्रति जागरूक हो जाएँगे जो पहले से ही हम सबके भीतर मौजूद है।
चाहे हमें मार्ग के बारे में समझा दिया गया है फिर भी संत-महात्मा चेतावनी देते हैं कि मार्ग के बारे में जान लेना ही मार्ग पर चलना नहीं है। संत भीखा जी हमें गहराई से विचार करने के लिए कहते हैं कि हमारा क्या दाँव पर लगा है:
अनहद नाद गगन घहरानो, आबुस समय जनावत।
हेइ होउ आजु कालि दिन बीतत, भ्रम बसि चेत न आवत॥
भीखा साहब की बानी
क्या दिव्य अमृत केवल काल्पनिक विचार है? संत-महात्मा समझाते हैं कि यह सत्य है। यह शब्द है, परमात्मा की रचनात्मक शक्ति है जो सबके भीतर बहती है। हम इसे पहचानने में चूक जाते हैं क्योंकि हम दुनिया के भ्रम में फँसे रहते हैं इसलिए हमारी अंतर्दृष्टि स्पष्ट नहीं होती। हम नामदान के समय देहधारी सतगुरु द्वारा बख़्शे गए भजन-सिमरन द्वारा ही इस तक पहुँच सकते हैं। संत दादू दयाल जी हमें याद दिलाते हैं:
जिन बिष खाया ते मुए, अमर अमी सौं होइ।
दादू दयाल की बानी
यह प्याला रूहानी हृदय रूपी कोठरी है जो तीसरे तिल में स्थित है। अमृत पहले से ही हमारे भीतर मौजूद है और सतगुरु ने इसे प्राप्त करने की युक्ति बता दी है। अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम इसका अभ्यास करके, सतगुरु के बताए हुए उसूलों पर चलकर अपने हृदय को निर्मल करें। ताकि उनकी दया-मेहर से, आख़िरकार हमारा प्याला भी उस नाम रूपी दिव्य अमृत से भर जाए और हमारी प्यास हमेशा-हमेशा के लिए बुझ जाए।