जीवन के प्रवाह के साथ चलना
अलग-अलग परंपराओं में हुए संत-महात्मा हमेशा से रूहानी सच्चाइयों को समझाने के लिए प्रकृति से उदाहरण देते आए हैं। उनमें से सबसे ज़्यादा लिया जानेवाला रूपक ‘पानी’ है। उदाहरण के लिए, ‘जीवन देनेवाले जल’ का वर्णन हज़ारों वर्ष पुराने धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। यह परमात्मा की सृजनात्मक शक्ति यानी ‘शब्द’ (वर्ड) का प्रतीक है जिसका ज़िक्र मध्य पूर्व से लेकर दक्षिण एशिया तक की अनेक रूहानी परंपराओं में आता है। प्रतीक के रूप में पानी हमें रूहानियत के कई अन्य पहलुओं के बारे में भी समझाता है। इस लेख में हम पढ़ेंगे कि पानी हमें मन, परमात्मा की दया-मेहर को ग्रहण करने की क्षमता और जीवन के प्रवाह के साथ सहज भाव से बहने के बारे में क्या सिखाता है।
पानी शक्तिशाली भी है और सुंदर भी। यह हमें जीवन देता है और हमारे आसपास की दुनिया को आकार। पानी अपने स्वच्छ और शुद्ध रूप में साफ़ और चमकता दिखाई देता है। उदाहरण के लिए, पहाड़ों से बहने वाला पानी इतना पारदर्शी होता है कि नदी के तल में पड़े हर पत्थर और कंकड़ को आसानी से देखा जा सकता है। लेकिन जब तूफ़ान आते हैं और तेज़ हवाओं के कारण नदी का तल गँदला हो जाता है, इसमें मिट्टी और गंदगी मिल जाती है तो जो प्रकाश पहले नदी की गहराई तक पहुँचता था वह अब नीचे तक नहीं पहुँच पाता। मगर यदि पानी को कुछ समय के लिए शांत और स्थिर होने दें तो मिट्टी और गंदगी धीरे-धीरे नीचे बैठ जाती है और पानी फिर से साफ़ और निर्मल हो जाता है।
हमारा मन भी बिलकुल पानी की तरह है। जब हम अपनी इच्छाओं, चिंताओं या क्रोध में उलझ जाते हैं तब हमारा मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है और हमें ऐसा लगने लगता है कि हम पर अब परमात्मा की दया-मेहर नहीं रही। ऐसा नहीं है कि परमात्मा की दया-मेहर नहीं हो रही होती बल्कि हमारा मन ही इतना अशांत होता है कि वह हमें महसूस नहीं होती। पहाड़ों से निकलने वाला झरना हमें सिखाता है कि मिट्टी को पानी में से निकालने के लिए ज़्यादा कोशिश करने की ज़रूरत नहीं होती; जब पानी स्थिर हो जाता है तब मिट्टी अपने-आप नीचे बैठ जाती है। ठीक इसी तरह, हमें अपने विचारों से उलझने या उन्हें ज़बरदस्ती रोकने की ज़रूरत नहीं है। जब हम अपनी चिंताओं को छोड़ देते हैं और शांत होकर बैठ जाते हैं तब क़ुदरती तौर पर स्पष्टता आ जाती है। और जब हमारा मन स्थिर हो जाता है तब उस परमात्मा का नूर स्पष्ट दिखाई देने लगता है।
इनसान के अंदर परमात्मा से मिलाप की क़ुदरती इच्छा है। कभी-कभी हम इस ओर ध्यान नहीं देते या इसे दबा देते हैं लेकिन यह फिर से उभर आती है। मिसाल के तौर पर जब हम किसी नवजात शिशु को अपनी गोद में लेते हैं तब हमारे अंदर कोई चीज़ परमात्मा के साथ उस असल नज़दीकी को महसूस करती है और उसके लिए तड़प उठती है।
जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ती है, हमारा मन दुनिया के कोलाहल में इतना खो जाता है कि आत्मा की अपने असल से मिलाप की क़ुदरती पुकार हमें सुनाई ही नहीं देती। आज इंटरनेट और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के कारण हर दिशा से पल-भर में जानकारी हमारे पास पहुँच जाती है। यदि हम सावधान न रहें तो लगातार मिलने वाली यह जानकारी हमारा ज्ञान बढ़ाने के बजाय हमारे मन में उथल-पुथल पैदा कर सकती है। इतना ही नहीं, ये तकनीकें धीरे-धीरे हमें हर समय कुछ नया देखने और जानने की आदत डाल देती हैं। हमारा ध्यान बार-बार एक स्क्रीन से दूसरी स्क्रीन की ओर आकर्षित होता है। इस तरह हम धीरे-धीरे अपने भीतर की स्वाभाविक शांति से दूर होते जाते हैं।
फिर भी, किसी भी समय में हुए हर इनसान के लिए जीवन के प्रवाह के विपरीत चलने के बजाय इस प्रवाह के साथ चलने में ही समझदारी है। नर्सरी में बच्चों को सिखाई जानेवाली कविता भी यही संदेश देती है:
धीरे-धीरे अपनी नाव चलाओ, सहजता से धारा के साथ बहते जाओ।
हँसते-हँसते, मुस्कुराते-मुस्कुराते, ज़िंदगी सिर्फ़ एक स्वप्न है।
यह कविता हमें प्रेरणा देती है कि जीवन के उतार-चढ़ाव के विपरीत खड़े होने के बजाय हमें उन्हें शांत भाव से स्वीकार करना चाहिए और सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। लेकिन हम फिर से जीवन को शांतमय और सहज ढंग से कैसे जिएँ? मन को निर्मल और स्थिर कैसे करें? अलग-अलग परंपराओं में हुए संत-महात्मा समझाते हैं कि किसी पूर्ण जीवित सतगुरु द्वारा समझाई गई भजन-सिमरन की युक्ति इसका अचूक उपाय है। भजन-सिमरन द्वारा अपने ध्यान को तीसरे तिल पर केंद्रित करने से मन निश्चिंत, निर्मल और पहले से अधिक एकाग्र होने लगता है। धीरे-धीरे हमें अपने अंदर परमात्मा की मौजूदगी का एहसास होने लगता है। यही ‘सुरत-शब्द योग’ का मार्ग है। महाराज चरन सिंह जी संतमत प्रकाश में लिखते हैं: “मन को निर्मल करने का सबसे अच्छा तरीक़ा है प्रेम और भक्ति के साथ पाँच नाम के सिमरन द्वारा शरीर के नौ द्वारों को ख़ाली करना।”
इन मायनों में, भजन-सिमरन पवित्र जल जैसा है। जैसे जल हर वस्तु को स्वच्छ और तरोताज़ा कर देता है वैसे ही भजन-सिमरन द्वारा मन निर्मल हो जाता है और इसकी मौलिक पवित्रता लौट आती है। ऐसा होने पर, हमें अपने जीवन में रूहानी शांति और अपने अंदर परमात्मा की मौजूदगी और दया-मेहर का अनुभव होने लगता है। अंग्रेज़ी भाषा में एक कहावत है: “शांत जल गहरा होता है।”
जल हमें समर्पण करने और परमात्मा की रज़ा में रहने का अहम सबक़ सिखाता है। जल का क़ुदरती गुण है कि इसे जिस भी पात्र में डाला जाता है यह उसी का आकार ले लेता है और कभी अपने अलग आकार को क़ायम रखने लिए हठ नहीं करता। जब कोई जलधारा अपने मार्ग में किसी बड़ी चट्टान से टकराती है तो वह उससे संघर्ष नहीं करती और न ही रुकती है; बस अपना रास्ता बदलकर आगे बढ़ जाती है। क्या हम भी जीवन की कठिनाइयों का सामना ऐसी समझदारी के साथ नहीं कर सकते? जिस प्रकार हर जलधारा का अंतिम लक्ष्य समुद्र में समाना होता है उसी प्रकार हमारी आत्माएँ भी अपने असल घर की ओर खिंची चली जाती हैं – परमात्मा के उस दिव्य रूहानी स्पंदन ‘शब्द’ की ओर।
महाराज चरन सिंह जी संत संवाद, भाग 3 में फ़रमाते हैं: “अगर लहरों के विपरीत तैरने लगेंगे तो डूब जाएँगे। अगर आप धारा के साथ-साथ तैरेंगे तो आसानी से किनारे तक पहुँच जाएँगे।” हमारा समय और ऊर्जा सीमित है, इसलिए हमें जीवन के असल उद्देश्य की ओर ध्यान देने की प्रेरणा दी जाती है – अपनी आत्मा की पहचान करके परमात्मा की पहचान करना। भजन-सिमरन इस उद्देश्य को पूरा करने में हमारी सहायता करता है। यह मन को निर्मल करता है, हृदय को निश्चल बनाता है और जीवन की धारा के विरुद्ध चलने के बजाय हमें उसी की दिशा में बहना सिखाता है। इस प्रकार बच्चों की इस कविता का एक नया अर्थ हमारे सामने आता है। यह हमें याद दिलाती है कि जीवन की नाव को सहजता से चलाएँ, प्रसन्नचित्त होकर आगे बढ़ें और इस बात को हमेशा याद रखें कि सुखों और चुनौतियों से भरा यह जीवन सिर्फ़ एक स्वप्न है। हम सच में ख़ुशक़िस्मत हैं कि ज़िंदगी के इस सफ़र में हमारे दिल में सतगुरु का प्रेम झलक रहा है और हमारे मार्ग को रोशन कर रहा है।
फिर भला हम सबसे अधिक ख़ुश क्यों न हों?
सतगुरु सँभाल कर रहे हैं
सच्ची बात तो यह है जब हम तीसरे तिल पर आते हैं, तभी हमें एहसास होने लगता है कि सतगुरु हमारी सँभाल कर रहे हैं। असल में सतगुरु जन्म से ही हमारी सँभाल करते हैं। वे लोग जो संतमार्ग पर आ गए हैं, उनकी सँभाल तो सतगुरु जन्म से ही करने लगते हैं, वे उन्हें कभी इतना नहीं भटकने देते कि उनको मार्ग पर वापस न ला सकें। आपने पतंग उड़ानेवाले को पतंग उड़ाते हुए देखा होगा। वह डोर को ढीला छोड़ता जाता है, लेकिन जब उसे लगता है कि पतंग उसके क़ाबू से बाहर जा रही है तो वह उसे वापस खींच लेता है। वह कभी पतंग से नज़र नहीं हटाता और उसे आसमान में सीधा रखते हुए उसकी डोर खींचता रहता है। जब हम अंतर में एक बार सतगुरु के दर्शन कर लेते हैं, तभी हमें यह एहसास हो पाता है कि हमारी सँभाल हो रही है। तब हमें यक़ीन हो जाता है कि हमारी सहायता हो रही है, हमारी सँभाल हो रही है। उससे पहले हमें इस बात का एहसास नहीं होता।
हुज़ूर महाराज चरन सिंह जी, संत संवाद, भाग 3