हवा से भी तेज़ क्या है?
भारत का प्रसिद्ध प्राचीन महाकाव्य ‘महाभारत’ पाँच पांडव भाइयों की कहानी है जो अपना राज्य हार जाते हैं। वे अपनी पत्नी द्रौपदी के साथ तेरह वर्ष का वनवास भोगते हैं। इस वनवास के दौरान एक घटना का वर्णन आता है: युधिष्ठिर जो पाँच पांडवों में से सबसे बड़े थे, एक झील के पास पहुँचते हैं और जैसे ही वह पानी पीने लगते हैं, उन्हें एक यक्ष की रोबदार आवाज़ सुनाई देती है जो झील का स्वामी होने का दावा करता है। यक्ष युधिष्ठिर से कहता है, “तुम तब तक इस झील से पानी नहीं पी सकते जब तक तुम मेरे सवालों का जवाब नहीं दे देते।” फिर यक्ष के सवालों का सिलसिला शुरू हो जाता है और युधिष्ठिर उनके सवालों के उत्तर तुरंत देते जाते हैं।
यक्ष की पहेलियाँ युधिष्ठिर के ज्ञान की परीक्षा नहीं हैं बल्कि आत्म-ज्ञान की कसौटी हैं। वे यह जाँचती हैं कि क्या युधिष्ठिर सच्चे धर्म और ब्रह्मांडीय व्यवस्था के नियमों को समझते हैं और सबसे अहम बात यह है कि क्या वह अपने जीवन में उन नियमों का पालन करते हैं? युधिष्ठिर तुरंत उत्तर देते हैं इसलिए नहीं कि उन्हें रटे-रटाए तथ्य याद हैं बल्कि इसलिए कि उन्हें पहले से ही सत्य का ज्ञान था। जिज्ञासु होने के नाते हम इन पुराने सवालों से क्या सीख सकते हैं?
यक्ष द्वारा पूछे गए कई सवालों में से एक सवाल यह भी था कि “हवा से भी तेज़ क्या है?” युधिष्ठिर ने जवाब दिया, “मन।” यह जवाब हमें तुरंत समझ में आ जाता है क्योंकि हम मन की आदत से वाक़िफ़ हैं। किसी काम को एकाग्र होकर करते हुए मन को किसी पुराने अपमान, भविष्य की किसी चिंता, किसी गहरी दबी इच्छा या रातों की नींद उड़ा देनेवाले डर का ख़याल आ सकता है। जब सब कुछ सही चल रहा होता है और कोई चिंता भी नहीं सता रही होती तब भी मन की कभी ख़त्म न होनेवाली बकबक की वजह से हम अपने अंदर शांति महसूस नहीं कर पाते। यह परख करता है, तुलना करता है, वही पुरानी बातें दोहराता है, योजनाएँ बनाता है और तर्क-विर्तक भी करता है। सृष्टि के आरम्भ से ही हमने मन को बाहर भटकने की आदत डाल दी है। फलस्वरूप, अपने फैले हुए ध्यान को अंदर की ओर मोड़ना अजीब और अस्वाभाविक लगता है।
यह मन जो हर समय बाहर की तरफ़ भागता रहता है, यही मन हमेशा और अधिक पाने की लालसा भी करता है। शायद इसीलिए यक्ष ने सवाल-जवाब के दौरान युधिष्ठिर से एक और सवाल पूछा, “वह क्या है जो सुख के मार्ग में बाधा है?” युधिष्ठिर का जवाब था – “लालच।” इसी सवाल को अगर हम दूसरे ढंग से पूछें जैसे कि “सच्चा सुख क्या है?” तो शायद हमारा जवाब होगा, “संतोष।” लेकिन शायद यहीं पर हममें से बहुत-से लोग चूक जाते हैं। हम सुख को इस बात से नहीं जोड़ते कि हमारे पास क्या है बल्कि उन चीज़ों से जोड़ लेते हैं जो हमारे पास नहीं हैं। जब हमारी कोई इच्छा पूरी हो जाती है तब हम बहुत ख़ुशी महसूस करते हैं लेकिन वह ख़ुशी या संतोष ज़्यादा देर तक क़ायम नहीं रहता। फिर मन में कुछ और हासिल करने की चाहत पैदा हो जाती है: हमें लगता है कि यदि हम थोड़ा और, कुछ और, बस यह बदलाव ले आए तो हम संतुष्ट हो जाएँगे। जब हम तुलना करने लग जाते हैं तो जो कभी पर्याप्त लगता था, वह कम लगने लगता है और मन में असंतोष की भावना पैदा होने लगती है।
अगर संतोष में ही सुख है तो यह इतना दुर्लभ क्यों है? क्योंकि चंचलता मन का स्वभाव है। यह किसी भी कष्ट और अधूरी इच्छा को तो आसानी से नहीं भुला पाता लेकिन जो असल में मायने रखता है, उसे आसानी से भुला देता है। यही कारण है कि यक्ष का आख़िरी सवाल मन में गूँजता रहता है: “दुनिया में सबसे बड़ा अजूबा क्या है?” युधिष्ठिर जवाब देते हैं कि हम हर रोज़ लोगों को मरते देखते हैं, फिर भी हमें लगता है कि मौत शायद दूसरों के लिए है, हमारे लिए नहीं है। इस सवाल का मतलब हमें उदास करना नहीं बल्कि इसका उद्देश्य हमें सचेत करना है कि हम नश्वर हैं। जब हम भूल जाते हैं कि हम नश्वर हैं तब जीवन छोटी-छोटी उपलब्धियों और कभी न ख़त्म होनेवाली चाहतों को पूरा करने की दौड़ बन जाता है। जब हम मृत्यु को याद रखते हैं तब प्राथमिकताएँ ख़ुद-ब-ख़ुद बदल जाती हैं।
हालाँकि हमारा चंचल मन और इसकी वजह से हमें जो सहना पड़ता है, वह बिना वजह नहीं है बल्कि उसका आधार कर्म-सिद्धांत का गूढ़ नियम है। संत-महात्मा समझाते हैं कि कर्मों का क़ानून दुनिया को संचालित करता है। जिस मंशा से हम कोई काम करते हैं, वह हमारे मन पर एक छाप छोड़ जाता है। शरीर मर जाता है पर कर्मों का लेखा-जोखा ख़त्म नहीं होता। जब आत्मा शरीर से निकलती है तो इस पर पिछले कर्मों और अधूरी इच्छाओं का बोझ होता है जिनकी वजह से इसे फिर से नए शरीर में जन्म लेना पड़ता है। यहाँ तक कि पुण्य भी हमें कर्मों के बंधन से मुक्त नहीं कर सकते; पुण्य भी उतने ही बंधनकारी होते हैं जितने कि पाप। हमारी समस्या यह है कि हम किए हुए कर्मों के नतीजे से बच नहीं सकते। चाहते तो हम यह हैं कि हमें मनमर्ज़ी से कर्म करने की आज़ादी मिल जाए लेकिन असल में हमें कर्मों के बंधन से मुक्ति चाहिए।
यही कारण है कि संत-महात्मा हमें बार-बार याद दिलाते रहते हैं कि मनुष्य-जीवन दुर्लभ है। हमें किसी भी योनि में जन्म मिल सकता था लेकिन फिर भी मालिक की अपार दया से हमें यह मनुष्य-शरीर मिला है। साथ ही हमें स्वयं की पहचान और सजग रहकर अपने ध्यान को अंदर की ओर मोड़ने का सामर्थ्य भी बख़्शा गया है। स्वास्थ्य, परिवार और काम-काज ज़रूरी हैं पर ये जीवन के असल मक़सद नहीं हैं। हमारा असल मक़सद वापस अपने मूल में समा जाना है।
जब हम आत्म-निरीक्षण करते हैं तो मन को यह एहसास होता है कि अपनी चंचलता और कभी न ख़त्म होनेवाली तृष्णाओं की वजह से यह कर्मों के जाल में बहुत बुरी तरह से फँस गया है जबकि यह दुर्लभ मनुष्य-जन्म कर्मों के इस जाल से मुक्त होने का अनमोल मौक़ा है। मन बदलाव का संकल्प तो ले लेता है लेकिन यह सिर्फ़ अपनी इच्छा-शक्ति द्वारा ऐसा नहीं कर सकता। मन जिसका स्वभाव ही चंचलता है वह सिर्फ़ ख़ुद से वायदा करके सदा के लिए स्थिर कैसे हो सकता है? यही कारण है कि संत-महात्माओं ने हमेशा इस बात पर बल दिया है कि इसके लिए एक मार्गदर्शक का होना ज़रूरी है। जिस तरह किसी भी मुश्किल काम में महारत हासिल करने के लिए उस्ताद का होना ज़रूरी है, उसी तरह चंचल मन को सिर्फ़ किताबें पढ़कर, दृढ़ संकल्प द्वारा या दूसरों के अनुभवों के आधार पर नहीं जीता जा सकता। इसके लिए देहधारी सतगुरु की ज़रूरत होती है जो आत्मा को मन की सूक्ष्म चालों से सुरक्षित बाहर निकालने के लिए हमारा मार्गदर्शन कर सकें। मन बहुत चालाक है, यह रूहानियत का ढोंग कर सकता है, कल्पना को ही अनुभव समझ सकता है और थोड़ा-सा ज्ञान प्राप्त करके अहंकार से भर सकता है। देहधारी सतगुरु ही हमें इस तरह के धोखों से बचाकर असल सच्चाई से जोड़े रखते हैं।
देहधारी सतगुरु कोई जादूगर नहीं हैं जिन्हें दुनियावी इच्छाएँ पूरी करने के लिए भेजा गया है। उनका मक़सद इससे कहीं बड़ा और महत्त्वपूर्ण है – एक ऐसी व्यावहारिक युक्ति समझाना जिससे आत्मा, आंतरिक दिव्य ध्वनि ‘शब्द’ से फिर से जुड़कर धीरे-धीरे मन के चंगुल से बाहर निकल सके। यह युक्ति हमें नामदान के समय समझाई जाती है। इसे सीखने के बाद हमारा सिर्फ़ एक ही लक्ष्य होना चाहिए – अपने फैले हुए ख़याल को इकट्ठा करके उसे अंदर की ओर मोड़ना। इसके लिए हमें पाँच नाम का सिमरन करना है। मन को पहले से ही इच्छाओं, चिंताओं और तर्क-वितर्क करते रहने की आदत पड़ी हुई है। हमें बख़्शा गया सिमरन मन की इस आदत के ख़िलाफ़ नहीं बल्कि इसके अनुरूप काम करता है। यह मन को दुनियावी सिमरन करने से रोकने के बजाय सतगुरु की शक्ति से भरपूर पाँच नाम के सिमरन में लगा देता है।
शुरू-शुरू में, बाहर भटकते मन को रोककर एक बार सिमरन करना भी नामुमकिन लगता है। फिर भी, उसे बार-बार वापस लाना अपने आप में साधना है। जब मन, भले कुछ देर के लिए ही सही, एकाग्र होने लगता है तब हम भजन-सिमरन के दूसरे भाग की ओर मुड़ते हैं यानी उस ‘शब्द-धुन’ को सुनने की कोशिश करते हैं जो कि पहले से ही हमारे अंदर गूँज रही है। ‘शब्द-धुन’ कोई ऐसी धुन नहीं है जिसे हम बना या रच सकते हैं। यह केवल तब सुनाई देती है जब मन स्थिर होता है और हमें यह स्थिरता सिमरन द्वारा ही प्राप्त होती है। जब आत्मा ‘शब्द-धुन’ से जुड़ जाती है तो ‘शब्द-धुन’ आत्मा की मलिनताओं को साफ़ करके इसके कर्मों के भण्डार को जलाकर राख कर देती है।
संत-महात्माओं का संदेश स्पष्ट है: समय सीमित है, मन चंचल है और यह अवसर दुर्लभ है। हमें सच्चे दिल और पूरे धैर्य के साथ सतगुरु के उपदेश पर अमल करते हुए उस ‘शब्द-धुन’ को सुनने का अभ्यास करते रहना है जिससे उन्होंने हमें जोड़ा है। मन चाहे हवा से भी तेज़ दौड़े लेकिन शब्द उससे कहीं अधिक शक्तिशाली है और सतगुरु का दया-मेहर भरा हाथ सदा शिष्य के सिर पर होता है जो उसे सही मार्ग दिखाता है।