कुम्हार और मिट्टी
रूहानी मार्ग का मक़सद हमारे भीतर बदलाव लाना है। जो इनसान देहधारी सतगुरु से नामदान लेता है, वह धीरे-धीरे जीवन में पूर्णता की अवस्था तक पहुँच सकता है। भीतर आने वाले इस बदलाव को अलग-अलग नज़रिए से समझा जा सकता है लेकिन इस लेख का केंद्रीय विषय परमात्मा की रज़ा है। सिक्ख धर्म में परमात्मा की रज़ा को ‘हुक्म’ कहा जाता है जबकि दूसरी परंपराओं में इसे अलग-अलग लफ़्ज़ों से पुकारा जाता है। लफ़्ज़ चाहे कोई भी हो, बात एक ही है – यह सृष्टि परमात्मा की रज़ा के अनुसार चलती है। हमारे रूहानी सफ़र में इस रज़ा को पहचानना, इसे स्वीकार करना और अंत में पूरी तरह इसके आगे समर्पण करना शामिल है।
‘हुक्म’ क्या है?
जपुजी साहिब में ‘हुक्म’ के कई अर्थ और पहलू बताए गए हैं। जपुजी साहिब की पहली पउड़ी में गुरु नानक देव जी ‘हुकमि रजाइ’ द्वारा इस पहलू पर प्रकाश डालते हैं कि परमात्मा कोई अचेत शक्ति नहीं है बल्कि यह एक परम चेतन स्व:इच्छा वाली शक्ति है। जब हम बिजली जैसी अचेत शक्ति के साथ परमात्मा की रज़ा की तुलना करते हैं तो इसकी अहमियत स्पष्ट हो जाती है। इसे इस तरह समझा जा सकता है: बिजली बहुत शक्तिशाली होती है लेकिन उसमें चेतना नहीं होती। वह यह तय नहीं कर सकती कि किस दिशा में या क्यों बहना है। इसके विपरीत परमात्मा सर्वज्ञाता है और अपनी मौज का मालिक है। वह अपनी मर्ज़ी के अनुसार निर्णय लेता है और अपने ज्ञान द्वारा उन्हें पूरा करता है। जैसा कि मध्यकाल में हुए संत नामदेव ने कहा है, “सभो हुकमु हुकमु है आपे॥” दूसरे शब्दों में, हर मनुष्य, हर प्राणी, यहाँ तक कि एक पत्ता भी उसके ‘हुक्म’ के बिना नहीं हिलता। कुछ भी इस हुक्म से बाहर नहीं है।
गुरु नानक देव जी समझाते हैं कि ‘हुक्म’ परमात्मा की सचेत रज़ा होने के साथ ही उन नियमों और क़ानूनों की ओर भी संकेत करता है जिनके द्वारा उसकी रज़ा इस सृष्टि में प्रकट होती है। जपुजी साहिब की तीसरी पउड़ी में गुरु नानक देव जी फ़रमाते हैं: “हुकमी हुकम चलाए राह।” यानी कि परमात्मा के हुक्म से ही पूरी सृष्टि अपने निर्धारित मार्ग पर चलती है। यहाँ ‘हुक्म’ से भाव उन भौतिक, नैतिक और आध्यात्मिक नियमों से है जो सृष्टि का संचालन करते हैं। ये नियम अचानक ही नहीं बन गए बल्कि परमात्मा ने इन्हें सोच-समझकर बनाया है। परमात्मा की रज़ा है कि नैतिक जीवन में भी हमारे ऊपर कर्म और फल का नियम लागू हो। सरल शब्दों में: जैसा हम बोएँगे, वैसा ही हम काटेंगे।
इसी ‘हुक्म’ के मुताबिक़ हमारा प्रारब्ध निर्धारित होता है और उसे हमें भोगना ही पड़ता है। यह हमें थोड़ा सख़्त, संवेदना रहित और निष्ठुर लग सकता है। इससे हमारे मन में बेबसी की भावना भी पैदा हो सकती है। लेकिन संत-महात्मा समझाते हैं कि परमात्मा का हुक्म उसकी अपार दया और प्रेम से परिपूर्ण है। वह जो भी करता है, उसी में जीवात्मा की भलाई होती है। ‘हुक्म’ में रहने का अर्थ है कि सुख और दु:ख दोनों को परमात्मा की रज़ा मानकर समान भाव से स्वीकार किया जाए। संत-महात्मा समझाते हैं कि यदि हम अपने सुखों को तो परमात्मा की दया-मेहर मानें लेकिन दु:खों को उसका हुक्म मानने से इंकार कर दें तो हम पूर्ण रूप से आज्ञाकारी नहीं हैं। सुख और दु:ख दोनों को समान भाव से देखना ही ‘हुक्म’ को पूर्ण रूप से मानना है। ईसाइयों द्वारा की जानेवाली प्रार्थना: “तेरी इच्छा के अनुसार हो” का यही मतलब होता है।
हालाँकि सिर्फ़ यह जान लेने से कि पूरी सृष्टि ‘हुक्म’ के अनुसार चलती है, हमारे अंदर रूहानी तौर पर कोई बदलाव नहीं आ जाता। सिर्फ़ यह समझ लेने से कि हमारा जीवन परमात्मा के बनाए कर्म के नियम के अनुसार चल रहा है, हमारे लिए ज़िंदगी के हालात को स्वीकार करना आसान नहीं हो जाता। असल में, हमारा घटनाओं को ‘अच्छी’ या ‘बुरी’ श्रेणी में बाँटना ही यह दर्शाता है कि अभी तक हमने सही मायनों में ‘हुक्म’ में रहना सीखा ही नहीं है। बुद्धि के दायरे से आगे बढ़कर ‘हुक्म’ में रहकर जीवन बिताने के लिए देहधारी सतगुरु का होना ज़रूरी है।
‘हुक्म’ में कैसे रहें?
जब किसी शिष्य को देहधारी सतगुरु से नामदान मिल जाता है तो सतगुरु अपने नूरी स्वरूप में उसके अंदर विराजमान हो जाते हैं और बदलाव लाने में जीवन के हर पड़ाव पर रहनुमाई करते हैं। सतगुरु कुम्हार की तरह होते हैं। जैसे कुम्हार अपना एक हाथ मिट्टी के बर्तन के अंदर रखकर उसे सहारा देता है जबकि उसका दूसरा हाथ बाहर से उसे आकार देता है। जीवन में जो कुछ भी होता है उसके पीछे कोई न कोई वजह होती है। अलग-अलग तरह के अनुभवों के ज़रिए सतगुरु शिष्य के अहंकार को धीरे-धीरे कम करते हैं क्योंकि यही अहंकार आत्मा जोकि असल शिष्य है और सतगुरु के नूरी स्वरूप के बीच जुदाई का भ्रम पैदा करता है।
शिष्य का कर्तव्य है कि वह सतगुरु के आगे समर्पण कर दे ताकि सतगुरु उसे जो बनाना चाहते हैं, वह बना सकें। महाराज चरन सिंह जी संत संवाद, भाग 3 में इसका अर्थ समझाते हुए फ़रमाते हैं: “अपनी हौमैं और मैं-मेरी की भावना को ख़त्म कर देना ही समर्पण है। जब तक आत्मा मन के अधीन है तब तक आत्म-समर्पण नहीं हो सकता।” आप आगे विस्तारपूर्वक समझाते हैं कि आत्मा, जो परमात्मा का अंश है, इस समय मन के अधीन है और मन इंद्रियों के अधीन है। इसका अर्थ है, “इंद्रियाँ मन की मालिक बनी हुईं हैं और मन आत्मा का मालिक बना हुआ है। जब तक यह सारा सिलसिला उलट नहीं जाता यानी इंद्रियाँ मन के नियंत्रण में और मन आत्मा के अधीन नहीं हो जाता, हम क्या समर्पित कर सकते हैं?”
यही इस विषय का सार है। सच्चा समर्पण जिसे सतगुरु ‘शरण’ कहते हैं तभी मुमकिन है जब आत्मा धीरे-धीरे मन पर क़ाबू पा लेती है और अंतत: अपने भीतर सतगुरु के नूरी स्वरूप का दर्शन करती है। महाराज चरन सिंह जी हमें इस अवस्था को प्राप्त करने की युक्ति समझाते हैं:
असल समर्पण, जिसे हम ‘शरण’ कहते हैं, को प्राप्त करने के लिए नामदान के समय बताए गए नियमों का और उस समय दी गई हिदायतों का पालन करना ज़रूरी है। हमें पूरी ईमानदारी के साथ संतमत के उसूलों पर चलना है और भजन-सिमरन को वक़्त देना है। यही एक तरह से सतगुरु के प्रति समर्पण है और यही समर्पण अंतर में बिना किसी शर्त के किये गये समर्पण का साधन बनेगा।
इस प्रकार धीरे-धीरे मन आत्मा के अधीन होने लगता है। फिर नामदान के समय समझाई गई ध्यान की युक्ति द्वारा साधक को अंदर सतगुरु के नूरी स्वरूप के दर्शन होने लगते हैं। महाराज सावन सिंह जी प्रभात का प्रकाश में फ़रमाते हैं:
जब हम ध्यान की इस विधि में सफल हो जाएँगे तो सतगुरु का नूरी स्वरूप हमारे अन्दर प्रकट हो जाएगा और आंतरिक यात्रा में हमारी रहनुमाई करेगा। इसके बाद हमें अपनी मंज़िल पर पहुँचाने की ज़िम्मेदारी उसकी हो जाती है और वह अंदर हर क़दम पर हमारा मार्गदर्शन करता है। यह नूरी स्वरूप अंत में शब्द के साथ, जो कि उसका ही असली स्वरूप है, एक हो जाता है।
सच्चे समर्पण की शुरुआत त्याग करने की घोषणा से नहीं होती बल्कि संतमत के चार मूल सिद्धांतों का पूरी निष्ठा से पालन करने से होती है – शुद्ध शाकाहारी भोजन करना जिसमें दूध भी शामिल है; हर तरह के मादक पदार्थों से दूर रहना; अच्छे इनसान बनने की कोशिश करना; हर रोज़ ढाई घंटे भजन-सिमरन करना। इन चारों में भजन-सिमरन इंजन की तरह सबसे महत्त्वपूर्ण है क्योंकि सिर्फ़ इसी के ज़रिए मन इंद्रियों के भोगों से मुँह मोड़कर रज़ा में राज़ी रहना सीखता है। लेकिन सही मायनों में ‘हुक्म’ में रहने के लिए संतमत के इन चार सिद्धांतों का पालन करने के साथ-साथ हमारे अंदर हर हालात को सहज भाव से स्वीकार करने की सच्ची भावना भी होनी चाहिए। इसमें अपने प्रारब्ध को सतगुरु का भाणा मानकर स्वीकार करना भी शामिल है – चाहे वह मीठा हो या कड़वा।
जब हम अपने प्रारब्ध को स्वीकार नहीं करते तब हम परमात्मा के हुक्म के ख़िलाफ़ जा रहे होते हैं। लेकिन जब हम उसे कृतज्ञता के साथ स्वीकार करते हैं, तब हम परमात्मा की मर्ज़ी के मुताबिक़ चल रहे होते हैं। परमात्मा के हुक्म में रहने के इसी भाव को समझाने के लिए महाराज चरन सिंह जी इनसानी प्रेम की मिसाल देते हैं। आप फ़रमाते हैं, “हम हमेशा वही करने की कोशिश करते हैं जो दूसरे को भाता है। हम दूसरे को अपने मुताबिक़ ढालने की, अपनी बात मनवाने की कोशिश नहीं करते, बल्कि अपने आप को उसके मुताबिक़ ढालते हैं। हम हमेशा दूसरे की मरज़ी के मुताबिक़ ढल जाते हैं।… रूहानी प्रेम में भी यही बात लागू होती है।” लेकिन फिर भी हुक्म को स्वीकार करने का यह नज़रिया सिर्फ़ अपनी कोशिशों से नहीं आता। यह सतगुरु के प्रति गहरे प्रेम से पैदा होता है और यह प्रेम भजन-सिमरन द्वारा ही बढ़ता है।
हम जितनी ईमानदारी और लगन से भजन-सिमरन करते हैं, उतना ही हम सच्चे आंतरिक समर्पण के क़रीब हो जाते हैं। असल में, संत-महात्मा भजन-सिमरन को समर्पण के लिए सिर्फ़ तैयारी नहीं मानते बल्कि वे भजन-सिमरन को ही समर्पण मानते हैं। महाराज चरन सिंह जी फ़रमाते हैं: “जो भी वक़्त हम भजन-सिमरन में लगाते हैं, समझो उस वक़्त हम ख़ुद को उसे समर्पित करने की कोशिश में लगे होते हैं। हम ख़ुद को परमपिता परमेश्वर के हवाले करने की कोशिश कर रहे हैं और केवल यही सच्चा समर्पण है।”
धीरे-धीरे हमारे भीतर बदलाव आने लगता है। हर रोज़ किया गया भजन-सिमरन हमें परमात्मा की दया-मेहर को ग्रहण करने के अधिक लायक़ बनाता जाता है। जैसे-जैसे हमारी ग्रहण करने की क्षमता बढ़ती है, वैसे-वैसे हमारा अहंकार भी कम होने लगता है और हम अपने जीवन में होने वाली घटनाओं को अधिक सहजता से स्वीकार करने लगते हैं। फिर हम उन्हें ‘अच्छा’ या ‘बुरा’ कहकर नहीं आँकते और न ही उन पर प्रतिक्रिया देते हैं।
जब हम रज़ा में राज़ी रहने की इस अवस्था तक पहुँच जाते हैं तब हमें इस गूढ़ सत्य का एहसास होता है कि वह कुल-मालिक ही एकमात्र कर्ता है। जब हम इस सत्य को जान जाते हैं कि हम कर्ता नहीं बल्कि उस शब्द-रूपी परमात्मा के हाथ की कठपुतलियाँ हैं तब हमारे अंदर किसी भी कार्य का श्रेय लेने का अहंकार ख़त्म हो जाता है। ऐसी अवस्था प्राप्त हो जाने पर हम निष्काम-भाव से कर्म करते हैं – बिना किसी स्वार्थ और फल की इच्छा के। फलस्वरूप हम नए कर्मों के बंधन में नहीं बँधते। लेकिन इस बात का एहसास हो जाने में एक विरोधाभास भी है। असल में, निरपेक्ष दृष्टिकोण से देखें तो न तो हम अपनी इच्छा से इस मार्ग पर चल सकते हैं और न ही अपनी कोशिश से परमात्मा की रज़ा में राज़ी रह सकते हैं। हमारा समर्पण भी सिर्फ़ परमात्मा की दया-मेहर से ही संभव है।
महाराज चरन सिंह जी समझाते हैं, “जब हम अंतर में सतगुरु के दर्शन करके अपने आप को भूलकर, उनकी मौज में, उनके प्रेम में खो जाएँगे तब हमें ऐसा महसूस होगा कि हम सतगुरु का रूप बन गए हैं और हमारी अपनी हस्ती ख़त्म हो गई है।”
हम परमात्मा रूपी कुम्हार के चाक पर चढ़ी हुई मिट्टी की तरह हैं। सतगुरु रूपी कुम्हार हमें अपने हाथों से गूँथकर मुलायम बना रहे हैं। वह हमें मिट्टी के एक साधारण ढेले से एक सुंदर पात्र (बर्तन) में बदल रहे हैं। यह पात्र अंदर से ख़ाली होता है, इसमें झूठा अहंकार नहीं रहता। लेकिन यह ख़ाली पात्र असल में ख़ाली नहीं होता; इसमें जगह होती है। पात्र के भीतर के रिक्त स्थान की तुलना आत्मा से करते हुए मांडूक्य उपनिषद् इस बात की ओर संकेत करता है कि पात्र के भीतर दिखाई देता सीमित-सा आकाश असल में पात्र के बाहर चारों ओर फैले अनंत आकाश से अभिन्न होता है। इसी प्रकार, जब सतगुरु इस पात्र को अंदर से ख़ाली करते हैं तब वह सत्य प्रकट होता है जो असल में कभी सीमित था ही नहीं।
आत्मा बदलती नहीं है। यह असीम है, सदा शब्द के साथ अभेद है।