आत्मा के प्रेम का इकरार
हम ऐसी दुनिया में रहते हैं जो हमारे ध्यान को निरंतर बाहर की ओर खींचती है। हमारा मुख्य मक़सद अकसर धन-दौलत, सम्मान और ऊँचा रुतबा प्राप्त करना होता है। हम अपने दिन कड़ी मेहनत से अपने काम-काज करने और अपने प्रियजनों की देखभाल में ही बिता देते हैं। समय के साथ, हम यह मानने लग जाते हैं कि ज़िंदगी का उद्देश्य यही सब करना है लेकिन क्या वाक़ई ऐसा है?
जब हम पैदा होते हैं तब हमारा अपने माता-पिता, मित्रों या अध्यापकों – किसी न किसी से नाता जुड़ जाता है। ये संबंध महत्त्वपूर्ण हैं। ये हमारी ज़िंदगी को मक़सद देते हैं और हमारे जीवन के निर्माण में अहम भूमिका निभाते हैं। लेकिन फिर भी, शायद ही हम कभी सोचते हों कि जब एक दिन ये सब रिश्ते ख़त्म हो जाएँगे तब क्या होगा? सब रिश्ते-नाते अस्थाई हैं, यहाँ तक कि हमारे सबसे क़रीबी रिश्ते भी जिन पर हम निर्भर हैं। यदि वे हमें छोड़ जाएँ या निराश करें तो हम कहाँ जाएँ?
संत-महात्मा हमें समझाते हैं कि एक ऐसा रिश्ता है जो हमेशा साथ निभाता है, वह है आत्मा और परमात्मा का रिश्ता। दुनियावी रिश्तों की तरह यह रिश्ता ज़रूरतों, उम्मीदों और हालात पर निर्भर नहीं है। इस रिश्ते का आधार प्यार है और यह तब भी क़ायम रहता है जब बाक़ी सारे रिश्ते ख़त्म हो जाते हैं। पाँचवीं पातशाही, गुरु अर्जन देव जी इस सत्य को प्रकट करते हुए फ़रमाते हैं:
तूं मेरा पिता तूंहै मेरा माता॥
तूं मेरा बंधप तूं मेरा भ्राता॥
तूं मेरा राखा सभनी थाई ता भउ केहा काड़ा जीउ॥…
तूं मेरी ओट तूंहै मेरा माणा॥
आदि ग्रंथ
गुरु साहिब की ये पंक्तियाँ सिर्फ़ जज़्बातों का इज़हार ही नहीं हैं। यह परमात्मा के लिए आत्मा के प्रेम का इकरार और समर्पण है। संत-महात्माओं के लिए परमात्मा कोई ऐसी अज्ञात शक्ति नहीं है जो उनसे बहुत दूर है बल्कि उनके लिए परमात्मा अमर-अविनाशी सत्य है जो हर प्राणी के भीतर मौजूद है। उन्नीसवीं सदी के अंग्रेज़ी भाषा के कवि लॉर्ड टेनीसन लिखते हैं, “वह परमात्मा हमारी साँसों से भी ज़्यादा क़रीब है और हमारे हाथों-पैरों से भी अधिक नज़दीक है।” अगर परमात्मा हमारे इतना नज़दीक है तो फिर हमें इस बात का एहसास क्यों नहीं है? संत-महात्मा समझाते हैं कि चाहे हमारी आत्मा ऊँचे रूहानी मंडल ‘सचखंड’ से आई है पर यह दुनिया के प्रलोभनों में फँसकर अपने मूल स्रोत को भूल गई है।
गुरु अर्जन देव जी की ये पंक्तियाँ आत्मा की सच्ची पुकार है जो अपने निज-धाम को याद करती है और वापस अपने अमर-अविनाशी स्रोत में समाना चाहती है। आत्मा यह इकरार निराशा के कारण नहीं बल्कि अंतर्दृष्टि के कारण करती है। जब आत्मा अंतर्मुख हो जाती है और जान जाती है कि इस संसार में कुछ भी स्थायी नहीं है – न रिश्ते-नाते, न रुतबा, न उपलब्धियाँ और न ही ज़मीन-जायदाद – तब यह परमात्मा को ही अपना एकमात्र सच्चा साथी और अनादि पिता मानने लगती है। ऐसी सूझ से दृष्टिकोण में ज़बरदस्त बदलाव आता है। जिस प्यार, सहारे, मार्गदर्शन, ज्ञान, सुरक्षा को हम बाहर ढूँढ़ते हैं, वह पहले से ही सबसे निर्मल और स्थायी रूप में हमारे भीतर मौजूद है।
इस बात का एहसास कि जिसे हम बाहर ढूँढ़ रहे थे, वह सब हमारे अंदर ही था, हमें देहधारी सतगुरु द्वारा बख़्शे गए भजन-सिमरन के अभ्यास द्वारा होता है। जैसे अनजान जगह पर भटके हुए यात्री को किसी मार्गदर्शक की ज़रूरत होती है जिसे वहाँ का रास्ता मालूम हो, वैसे ही हमारी आत्मा को भी किसी ऐसे मार्गदर्शक की ज़रूरत होती है जो पहले से ही वह आंतरिक सफ़र तय कर चुका हो और निज-घर की राह भी बता सकता हो। सतगुरु ही वह मार्गदर्शक हैं।
नामदान के समय, सतगुरु भजन-सिमरन के अभ्यास का तरीक़ा समझाते हैं जिससे आत्मा उस स्थायी सुख का अनुभव करने के योग्य बन जाती है जो इस संसार में नहीं बल्कि आत्मा को अमर-अविनाशी शब्द-धुन से जोड़कर ही मिल सकता है। यह बौद्धिक ज्ञान नहीं है बल्कि यह तो दिल से महसूस किया जानेवाला गहरा अनुभव है। शब्द-धुन में लीन होकर, आत्मा परमात्मा के प्रेम और अपनेपन को महसूस करने लगती है और इसे उस शाश्वत आनंद का अनुभव होने लगता है जिसे यह बहुत लंबे समय से बाहर ढूँढ़ रही थी।
पूर्ण भरोसे के साथ सतगुरु के उपदेश का पालन करने से, शिष्य अंधकार से प्रकाश की ओर अथवा भ्रम से सत्य की ओर बढ़ने लग जाता है। जहाँ एक तरफ़ संसार के रिश्ते अस्थायी होते हैं और सुख चलायमान, वहीं दूसरी तरफ़ सतगुरु आत्मा को उसके अनादि-अविनाशी घर लौटने का रास्ता दिखाते हैं। जैसे काँच से ढकी मोमबत्ती को हवा नहीं बुझा सकती, वैसे ही भजन-सिमरन और सतगुरु की दया-मेहर के दायरे में आई हमारी आत्मा जीवन के तूफ़ानों व संकटों से घबराती नहीं, बल्कि दृढ़ता से आगे बढ़ती रहती है।
जब आत्मा को हर प्राणी में परमात्मा दिखाई देने लग जाता है तब हम पहले से अधिक कृतज्ञ हो जाते हैं और हमारे अंदर का डर व संशय कम होते जाते हैं। तब हर रिश्ता पवित्र बन जाता है क्योंकि फिर सब कुछ उस रचयिता का ही रूप प्रतीत होता है। जैसे-जैसे आत्मा परम शक्ति के प्रति अधिक जागरूक होने लगती है, गुरु अर्जन देव जी की बानी की ऊपर दी गई पंक्तियाँ जीवन के तूफ़ानों का सामना करने में मज़बूत सहारे का काम करती हैं। पीड़ा, हानि और बदलाव मनुष्य जीवन के अभिन्न अंग हैं। पर फिर ये सब आत्मा को विचलित नहीं कर सकते क्योंकि आत्मा उस परमात्मा रूपी परम सत्ता से जुड़ी होती है जिसका ज़िक्र लॉर्ड टेनीसन अपने एक सवाल में करते हैं, “जब आप हर जगह मेरे रखवाले बनकर मौजूद हैं तो मुझे किसी बात का डर या चिंता कैसे हो सकती है?”
सतगुरु अकसर हमें याद दिलाते रहते हैं कि मालिक की दया-मेहर हर समय हो रही है। भजन-सिमरन के ज़रिए हमें इस दया-मेहर का एहसास होने लगता है। भरोसा सिर्फ़ दलीलों से नहीं बल्कि प्रत्यक्ष आंतरिक अनुभव से गहरा होता है। जब भजन-सिमरन हमारी आत्मा का आधार बन जाता है तब हमें सुख और दु:ख दोनों में परमात्मा की रज़ा दिखाई देने लगती है और हम विचलित हुए बिना शांति से ज़िंदगी बिताते हैं। भरोसा जो पहले सिर्फ़ एक विचार था, अब एहसास और अनुभव में बदल जाता है जिसका आधार कोई मान्यता नहीं बल्कि अंतर में आत्मा का परमात्मा से मिलाप है।
सिमरन
जिसका भी हम सिमरन करते हैं, मन उनकी शक्लें हमारे सामने ले आता है। मिसाल के तौर पर, जब हम बेटे-बेटियों का सिमरन करते हैं तब उनकी शक्लें हमारी आँखों के सामने आ जाती हैं। इसे ‘ध्यान करना’ कहा जाता है। इस संसार के नाशवान् शक्लो-पदार्थ के सिमरन और ध्यान के कारण हम सदा इस रचना का हिस्सा बने रहते हैं और आवागमन के चक्कर में पड़कर दु:ख भोगते रहते हैं।
संत-महात्मा समझाते हैं कि हम किस तरह मन की इस आदत से लाभ उठा सकते हैं। परमात्मा के नाम का सिमरन, दुनियावी सिमरन की जगह ले लेता है और सतगुरु का ध्यान, दुनियावी ध्यान को काटता है। जब हम परमात्मा के नाम के सिमरन और ध्यान द्वारा ख़याल को तीसरे तिल पर इकट्ठा कर लेते हैं तो हम मन की नीचे और बाहर की ओर फैलने की प्रवृत्ति पर रोक लगा देते हैं जिससे यह स्थिर हो जाता है। तब नाम की ध्वनि और प्रकाश के सहारे हम अपना आंतरिक रूहानी सफ़र तय कर सकते हैं।
नाम एसेंस ऑफ़ स्पिरिचुएलिटी