हमारी असीम क्षमता
जितनी शिद्दत से हम अपने दुनियावी कामों को करते हैं, अपने आंतरिक रूहानी सफ़र को तय करने के लिए भी हममें उतनी ही शिद्दत होनी चाहिए। अपने छिपे हुए सामर्थ्य को पहचानने के मार्ग में बाधाएँ आ सकती हैं और हमें तनाव भी हो सकता है। मगर, जैसे-जैसे हम भीतर की गहराइयों में उतरते हैं, हमें एहसास होने लगता है कि हमारा असल वजूद हमारी कल्पना से कहीं परे है। यह सफ़र आसान नहीं है, ख़ासकर इसलिए क्योंकि यह हमारे द्वारा पहले तय किए गए किसी भी सफ़र से बिलकुल अलग है। किसी दूसरे का अनुभव हमें प्रेरित कर सकता है लेकिन यह कैसा होता है हम इसे तब तक महसूस नहीं कर सकते जब तक हम अपने अंदर नहीं जाते और अपने सामर्थ्य को नहीं जान लेते।
हम दुनिया के बारे में तो बहुत कुछ जानते हैं लेकिन क्या हम असल में ख़ुद को जानते हैं? हम यह तो मानते हैं कि जीवित रहने के लिए खाना, सोना और पैसे कमाना ज़रूरी है। हम ये सारे दुनियावी काम ख़ुद-ब-ख़ुद करते हैं बिना यह सवाल किए कि क्या जीवन में इससे बढ़कर भी कुछ है? यहाँ तक कि जब हम अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी से हटकर कुछ करना चाहते हैं तब भी हमारा ध्यान दुनियावी पदार्थों की तरफ़ जाता है; हमारा मक़सद कुछ ऐसा करना होता है जो पहले कभी किसी ने न किया हो, हम सबसे अधिक धन-दौलत कमाना चाहते हैं; सबसे अधिक संपत्ति के मालिक बनना चाहते हैं। इसके अलावा हम सामाजिक मेल-जोल बढ़ाना चाहते हैं और दुनिया का हर ऐशो-आराम को भोगना चाहते हैं। लेकिन यह सब किस लिए? मृत्यु जीवन का सबसे बड़ा सच है। मृत्यु के साथ ही वह सब कुछ ख़त्म हो जाता है जिसे हमने इकट्ठा किया था। हमने जीवन में जो कुछ भी कमाया या इकट्ठा किया होता है वह सब कुछ मृत्यु के वक़्त पीछे छूट जाता हैं। हम सब ने अकसर लोगों को यह कहते सुना है: “तुम्हारे साथ कुछ नहीं जाएगा।” लेकिन यह ‘तुम’ कौन है और तुम कहाँ जाओगे?
ये सवाल हमारा ध्यान अंदर की ओर मोड़ते हैं। कवि कोलमेन बार्क्स द्वारा प्रस्तुत एक कविता में मौलाना रूम कहते हैं: “दूसरों के साथ क्या हुआ, सिर्फ़ उन कहानियों से संतुष्ट मत होना। अपनी ख़ुद की कहानी को जानना।” अतीत और वर्तमान में हुए संत-महात्मा हमें बार-बार याद दिलाते हैं कि हमारा असल स्वरूप आत्मा है जो मानवीय जीवन का अनुभव कर रही है। इस बात को मानना थोड़ा मुश्किल लगता है क्योंकि हम हमेशा से यही मानते आए हैं कि शरीर और मन ही असल हैं। लेकिन ‘आत्मा’ का क्या जिसके बारे में कहा जाता है कि यह उसी परमात्मा का अंश है जिससे सारी सृष्टि की उत्पत्ति हुई है?
संत-महात्माओं ने इन सवालों को सिर्फ़ पूछा नहीं है बल्कि वे अपने निजी अनुभव के आधार पर इनका जवाब भी देते हैं। उन्होंने एक ऐसी संभावना पर रोशनी डाली है जिसकी कल्पना हम सपने में भी नहीं कर सकते: ख़ुद की पहचान द्वारा परमात्मा की पहचान करना।
महाराज जगत सिंह जी आत्म-ज्ञान में फ़रमाते हैं:
‘जो ब्रहमंडे सोई पिंडे’, अर्थात् सूक्ष्म रूप में सारा ब्रह्मांड हमारे अंदर है। वह सृष्टिकर्ता भी इस शरीर में ही बैठा है। आप तीसरे तिल पर पहुँचकर अपने शरीर के अंदर जाकर संपूर्ण ब्रह्मांड और उसकी सब वस्तुओं का पूरा दृश्य साफ़-साफ़ देख सकते हैं।
यदि हमारे अंदर ऐसी शानदार संभावना मौजूद है तो उसे हक़ीक़त में बदलना इतना आसान क्यों नहीं है? क्योंकि जिस तरह हम इस दुनिया में जीवित रहने के लिए भरपूर कोशिश करते हैं उसी तरह हमें अपने अंदर की ओर रुख़ करने के लिए पूरी कोशिश करनी पड़ती है। कोई भी क़ीमती चीज़ निरंतर कोशिश किए बिना नहीं मिलती – आत्म-ज्ञान (ख़ुद को पहचानना) तो बिलकुल भी नहीं।
इस सारी चर्चा का सार यह है कि हम दिल से अपने वचनों पर दृढ़ रहें। जिस तरह दुनिया में सफल होने के लिए हम सालों-साल अपनी पूरी ताक़त लगाकर कड़ी मेहनत करते रहते हैं उसी निष्ठा के साथ हमें अंदरूनी रूहानी सफ़र के लिए कोशिश करनी होगी। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि इस सफ़र में की गई कोशिश द्वारा हमारी आत्मा का हमेशा के लिए भला होता है जबकि संसार की किसी वस्तु को हासिल करने के लिए जी-जान से की गई कोशिश के बावजूद वह वस्तु साथ नहीं जाती। ज़रा इस बात पर ग़ौर करें: हम औसतन पंद्रह से बीस वर्ष शिक्षा प्राप्त करने में लगा देते हैं और उसके बाद भी थोड़ा-सा परिपक्व होने में दस से पंद्रह वर्ष और बीत जाते हैं। इतना लंबा समय बीत जाने के बाद भी हममें से बहुत कम लोग यह दावा कर सकते हैं कि वे जीवन को पूरी तरह समझ पाए हैं। इस सबसे केवल एक नींव बनी है ताकि हम आगे सीखते रहें। जब बाहर का सफ़र इतना लंबा है तो फिर हम यह अपेक्षा क्यों करते हैं कि अंदरूनी सफ़र इससे छोटा होगा? ख़ुद की पहचान करने के लिए भी इतने ही समय, प्रतिबद्धता, धैर्य और इस प्रक्रिया पर विश्वास करने की ज़रूरत है।
नामदान के समय, हमने यह वायदा किया था कि हम अपना बाक़ी का जीवन रोज़ाना ढाई घंटे भजन-सिमरन करने में लगाएँगे। लेकिन उस समय किए गए इस वायदे को पूरा करना अब हमें ज़्यादा मुश्किल लगता है। हम अपने सामर्थ्य को कभी भी पहचान नहीं पाते मगर सतगुरु पहचानते हैं। वह वे सब देख पाते हैं जो हम नहीं देख पाते कि हमारी क्षमता असीम है।