ख़ुदी और ख़ुदा
जब तक हम अपने सीमित वुजूद से ऊपर नहीं उठते तब तक ख़ुदा की पहचान मुमकिन नहीं है। ख़ुदी और ख़ुदा दोनों एक साथ नहीं रह सकते। इस सच को सतगुरु की दया-मेहर के बिना जाना नहीं जा सकता।
जब सौभाग्य से हमारा मिलाप पूर्ण सतगुरु से हो जाता है, वह हमें इस इंद्रिय और सीमित वुजूद से ऊपर उठने की युक्ति सिखा देते हैं। जब हौंमैं का नाश हो जाता है तब शंका और डर भी समाप्त हो जाते हैं और साथ ही जन्म-मरण का दु:ख भी समाप्त हो जाता है।
परम ज्ञान सतगुरु द्वारा ही प्राप्त होता है क्योंकि उनमें हमें परमात्मा का साक्षात्कार करवाने और उसके पास ले जाने का सामर्थ्य होता है।
गुरु नानक देव जी इस छोटे से शब्द की समाप्ति यह समझाते हुए करते हैं कि वह स्वयं परमात्मा में समा गए हैं और दोनों एक हो गए हैं।
हउ मै करी तां तू नाही तू होवह हउ नाहे॥
बूझहो गिआनी बूझणा एह अकथ कथा मन माहे॥
बिन गुर तत न पाईऐ अलख वसै सभ माहे॥
सतगुर मिलै त जाणीऐ जां सबद वसै मन माहे॥
आप गइआ भ्रम भउ गइआ जनम मरन दुख जाहे॥
गुरमत अलख लखाईऐ ऊतम मत तराहे॥
नानक सोहं हंसा जप जापहो त्रिभवण तिसै समाहे॥
गुरु नानक का रूहानी उपदेश