चिंता करना छोड़ दें
“चिंता मत करो।” दिलासा देने वाले ये सरल शब्द हमारी ज़िंदगी में बार-बार दोहराए जाते हैं, जिनकी शुरुआत हमारी शुरुआती चिंताओं से होती है। बचपन में हम मुसीबत में पड़ने, दूसरों द्वारा सताए जाने या दोस्त बनाने की चिंता करते हैं। किशोरावस्था में हमारी चिंता की वजह साथियों जैसा बनना, परीक्षा में असफल हो जाने का डर और अपनी शक्ल-सूरत होता है। बालिग होने पर ये चिंताएँ हमारे व्यवसाय, आर्थिक सुरक्षा, घर ख़रीदने, बच्चों की परवरिश, अपने माता-पिता की देखभाल और अपनी सेहत की चिंताओं में बदल जाती हैं; चिंताओं की यह सूची कभी ख़त्म नहीं होती। कभी-कभी ऐसा लगता है जैसे कि हम अपनी पूरी ज़िंदगी किसी न किसी चीज़ की चिंता में ही बिता देते हैं।
जब संत-महात्मा यह समझाते हैं कि “चिंता मत करो” तब जिन चुनौतियों का हमें सामना करना पड़ता है उन्हें देखते हुए हम इस नसीहत के व्यावहारिक होने पर सवाल उठाए बिना नहीं रह सकते। क्या अपनी चिंताओं को छोड़ देना सच में मुमकिन है? इस सवाल का जवाब यह है कि हमें अपनी चिंताओं को नज़रअंदाज़ नहीं करना है बल्कि उन चिंताओं के कारण को जानना है और इस बात को समझना है कि उनका हम पर कितना बुरा असर पड़ता है। महाराज चरन सिंह जी पुस्तक संत संवाद, भाग 2 में हमारी इच्छाओं को हमारी चिंता का मूल कारण मानते हैं। आप हमें अपने प्रारब्ध को स्वीकार करने और परमात्मा की रज़ा में रहने के लिए प्रेरित करते हैं:
हम चिंता इसलिए करते हैं, क्योंकि हम चाहते हैं कि कुछ बातें वैसे ही हों जैसे हम चाहते हैं। हमारे अंदर कुछ ख़ास इच्छाएँ, कुछ ख़ास चाहतें, कुछ ख़ास उद्देश्य हैं जिन्हें हम पूरा करना चाहते हैं। हमें हर वक़्त यही चिंता रहती है कि हम उन चीज़ों को हासिल कर पायेंगे या नहीं, हम उन चाहतों को पूरा कर पायेंगे या नहीं। हमें यही चिंता सताती रहती है। अगर हम इसे परमात्मा पर छोड़ दें, अगर हम उसकी रज़ा में रहें, तो वही बेहतर जानता है कि हमें क्या देना है। हमें तो बस अपने आप को उसकी हर बख़्शिश के लिये तैयार करना है। फिर ऐसा क्या है जिसके बारे में चिंता की जाये?
महाराज जी द्वारा रज़ा में राज़ी रहने की नसीहत तब और भी प्रभावशाली हो जाती है जब हम अंग्रेजी भाषा के शब्द ‘वरी’ (worry) का इतिहास देखते हैं जोकि वाइर्गन (wyrgan) से बना है जिसका मतलब है गला घोंटकर मार डालना। इस शब्द का इतिहास चिंता के असर को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। चिंता सिर्फ़ हमें परेशान नहीं करती; यह हमें जकड़ लेती है। यह विवेक का नाश कर देती है, ख़ुशी का गला घोंट देती है और समझ को धुंधला कर देती है। इसलिए जब संत-महात्मा समझाते हैं, “चिंता मत करो,” तब वे हमारी परेशानियों को नज़रअंदाज़ नहीं कर रहे होते बल्कि चिंताओं के फँदे को काटने के लिए हमें एक अहम युक्ति समझा रहे होते हैं: भजन-सिमरन।
जैसा कि महाराज चरन सिंह जी आगे समझाते हैं, भजन-सिमरन का असली मक़सद है, “ख़ुद को ऐसा नज़रिया अपनाने के लिए तैयार करना… ऐसा नज़रिया बना लें कि जो कुछ भी हमारी ज़िंदगी में हो रहा है, उसे हम उसकी रज़ा मान लें।” जब हम चिंता करते हैं तब हमारा ध्यान पूरी तरह से ‘मुझ’ पर और ‘मैं’ पर केंद्रित होता है: क्या जो मैं सोचता हूँ वैसा होगा; इन चीज़ों का मुझ पर कैसा प्रभाव पड़ेगा; मैं कैसा महसूस करता हूँ। यह आत्म-केंद्रित मानसिकता हमें हमारी शक्ल-सूरत, व्यक्तिगत विशेषताओं, रिश्ते-नातों और प्राथमिकताओं के जाल में फँसा देती है। हालाँकि, भजन-सिमरन हमें ‘मैं’ और ‘मेरी परेशानियाँ’ की तुलना में बहुत बड़ी सत्ता के आगे समर्पण करना सिखाता है और इनसान होने के नाते हम जिस सीमित पहचान से जुड़े हैं उससे मुक्त कर देता है।
भजन-सिमरन कई और तरीकों से भी चिंता के असर को कम करता है और हमारे नज़रिए को सही कर देता है। जब हम चिंता करते हैं तब समस्याएँ अकसर इतनी बड़ी लगने लगती हैं जितनी वे असल में होती नहीं हैं और हमें उन्हें सुलझाने की अपनी क़ाबिलीयत पर ही संदेह होने लगता है। हमारा दिमाग उन काल्पनिक मुसीबतों में ही उलझा रहता है जो शायद कभी आएँ ही न। जब कभी मुश्किलें आती हैं तब भी असल में वे उतनी बड़ी नहीं होती हैं जितनी हमने अपने मन में बनाई होती हैं। भजन-सिमरन इस आदत पर रोक लगाकर हमारी चेतना को सोच-विचार के दायरे से ऊपर ले जाता है। बार-बार सिमरन करने से जब हमारे मन में आने वाले बेशुमार विचार बंद हो जाते हैं तब भजन का अभ्यास हमें ‘शब्द’ से एकसुर कर देता है, उस मूल स्पंदन से जो रचना के कण-कण में विद्यमान है। जब हमें शब्द-धुन सुनाई देने लगती है तब हम उन चीज़ों से और ज़्यादा उपराम हो जाते हैं जो पहले हमें परेशान किया करती थीं। अंतत: भजन-सिमरन ज़िंदगी के प्रति हमारे नज़रिए को पूरी तरह बदल देता है। हमें एहसास होता है कि सभी आपदाएँ, चाहे वे कितनी भी चुनौतीपूर्ण क्यों न हों, आरज़ी होती हैं और अंतर में सतगुरु के मार्गदर्शन से हम उनसे उबर जाएँगे।
महाराज चरन सिंह जी जीवत मरिए भवजल तरिए पुस्तक के नीचे दिए गए उद्धरण में हमें याद दिलाते हैं कि सतगुरु हमारी ज़िंदगी के ‘कर्णधार’ हैं, मतलब जब हम उनके बन जाते हैं, वह हमेशा हमारी मदद के लिए तैयार रहते हैं। अगर फिर भी हम चिंता करते हैं तो यह हमारे अंदर सतगुरु के प्रति विश्वास की कमी को दर्शाता है और हम उनके द्वारा दिए गए सहारे को अस्वीकार कर रहे होते हैं। अगर हम चिंता करने या दूसरों पर भरोसा करने का फ़ैसला करते हैं तो वह हमें रोकेंगे नहीं, लेकिन जब हम उनके बन जाते हैं और पूरी तरह से समर्पण कर देते हैं तब वह हमें सब कुछ दे देते हैं। तब हमारी ख़ुशी की कोई सीमा नहीं रहती और हमें किसी बात की चिंता नहीं होती। जैसा कि आप फ़रमाते हैं, शिष्य के हृदय में चिंता के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए:
हम अपने भाग्य में लिखी घटनाओं के चक्र को तो नहीं बदल सकते, लेकिन सतगुरु के हुक्म में रहकर और भजन-सुमिरन करके उन कर्मों का हिसाब देते हुए शांत और प्रसन्न रह सकेंगे। जीवन में जो कुछ भी आये उसे हम सतगुरु की दया-मेहर, सतगुरु की मौज और बख़्शिश समझकर स्वीकार कर सकेंगे। हमें विश्वास हो जाएगा कि सतगुरु ही हमारे जीवन के कर्णधार हैं और उनके हृदय में हमारे सुख और भलाई का ही ख़्याल है। अपनी दया से वे जितनी जल्दी हो सके हमें प्रभु के पास ला रहे हैं, ताकि जो कुछ भी प्रभु के पास है वह सब हमें दे सके। इसलिए शिष्य के हृदय में चिंता के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए।
जीवत मरिए भवजल तरिए