अंतिम शब्द
रूहानी विरासत
हर संत हमें परमपिता परमात्मा से मिलाप करने की आवश्यकता को समझाने की कोशिश करता है। आत्मा, परमात्मा की अंश है और जब तक यह वापस जाकर परमात्मा में लीन नहीं होती, यह मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकती। हज़रत ईसा, गुरु नानक, कबीर साहिब, पलटू साहिब, स्वामी जी महाराज और अन्य संत हमें परमात्मा से मिलाप करने का मार्ग समझाने के लिए संसार में आये हैं, और वह साधन है – शब्द या नाम का मार्ग।
युगों-युगों से शब्द या नाम संतों की विरासत रहा है और उनके द्वारा, परमात्मा की प्राप्ति के लिए अमली साधन के रूप में हम तक आया है। परमात्मा की प्राप्ति का साधन आज भी वही है, पहले भी वही था और आगे भी सदा वही रहेगा। यह परमात्मा की प्राप्ति का मार्ग है जिसका किसी पूर्ण गुरु के मार्गदर्शन में अंतर में प्रत्यक्ष अनुभव किया जाता है। यह प्रेम का मार्ग है, प्रकाश का मार्ग है। पर हम इस शब्द के संपर्क में, उस दिव्य-धुन और रूहानी प्रकाश के संपर्क में तभी आ सकते हैं जब हम किसी पूरे सतगुरु की शरण प्राप्त कर लें। सतगुरु की शरण प्राप्त करने का अर्थ है उनसे दीक्षा यानी नामदान प्राप्त करना, या जैसा कि हज़रत ईसा ने कहा है – एक नया जन्म लेना।
संत कहते हैं कि मालिक की सच्ची भक्ति और प्रेम की महिमा का कभी वर्णन ही नहीं किया जा सकता। मनुष्य की जिह्वा उसका गुणगान नहीं कर सकती, कोई कलम उसकी प्रशंसा लिख नहीं सकती। संसार के सभी जीव किसी न किसी से प्यार करते हैं। कोई परिवार और बाल-बच्चों से प्यार करता है, कोई क़ौमों, मुल्कों की भक्ति करता है, तो कोई धन-दौलत, ओहदों की पूजा करता है। लेकिन संत हमें समझाते हैं कि ये शक्लें और पदार्थ हमारी भक्ति और प्रेम के योग्य नहीं हैं। केवल एक ही वस्तु हमारे प्रेम और भक्ति के योग्य है और वह है परमात्मा। दुनिया का प्यार हमें वापस दुनिया में लाता है, परमात्मा का प्यार हमें परमात्मा से मिला देता है।
आत्मा के अंदर परमात्मा से मिलने की क़ुदरती कशिश है। आत्मा सतनाम समुद्र की बूँद है और इसके अंदर वापस जाकर अपने मूल में समाने की स्वाभाविक तड़प है। किसी पूरे सतगुरु की शिक्षा के अनुसार भजन-सिमरन के अभ्यास द्वारा निर्मल होकर ही आत्मा परमात्मा को पहचानने के योग्य बनती है, वापस जाकर उसमें समाने के योग्य बनती है।
पारस से पारस