ऑस्कर पुरस्कार
मार्च के शुरू में अमेरिका के लॉस एंजेलिस शहर में हॉलीवुड फिल्म उद्योग का वार्षिक पुरस्कार समारोह आयोजित होता है। ‘द ऑस्कर्स’ के नाम से मशहूर इस समारोह में सर्वश्रेष्ठ फिल्म, सर्वश्रेष्ठ अभिनेता और सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री जैसी विभिन्न श्रेणियों में शानदार प्रदर्शन के लिए सम्मानित किया जाता है। ‘रेड कार्पेट’ से आगे बढ़कर अमर-अविनाशी जगत में पहुँच चुके संत-महात्मा अकसर स्थूल जगत को परमात्मा का खेल कहते हैं। अगर हम इसी उपमा को आगे बढ़ाते हुए कल्पना करें कि यह संसार एक भव्य फिल्म के रूप में हमारे सामने आता है तो हम दिव्य ऑस्कर कैसे जीत सकते हैं?
परमात्मा रूपी निर्माता दो आधारों पर हमें भूमिकाएँ सौंपता है: पहला, कर्मों को ख़त्म करने के लिए और दूसरा, जिन भूमिकाओं को पाने के लिए हमने पिछले जन्मों में ऑडिशन दिया था। ये ऑडिशन – जिनकी मूल वजह हमारी अधूरी रह गईं इच्छाएँ हैं – हमारे इस जीवन में प्रेम, आनंद या दु:ख-दर्द के रूप में प्रकट होते हैं। इसलिए, साथी कलाकारों द्वारा निभाई गई भूमिकाओं की चाहत रखना व्यर्थ है क्योंकि परमात्मा रूपी निर्माता बहुत ज़्यादा दयालु है और इसलिए वह हमें उन सभी भूमिकाओं को निभाने का मौक़ा देगा जिन्हें हम निभाना चाहते हैं। चूँकि हम एक समय में केवल एक ही भूमिका निभा सकते हैं तो दूसरी भूमिकाओं को निभाने की चाहत रखने का मतलब है जन्म और मृत्यु के अनंत चक्र में फँसे रहकर एक फिल्म पूरी करने के बाद दूसरी फ़िल्म शुरू करना।
ज़्यादा सोचे बिना, जो भी भूमिका हमें निभाने के लिए मिली है, उसे ख़ुशी-ख़ुशी स्वीकार कर लेना चाहिए। चाहे हम करोड़पति की भूमिका निभाएँ या भिखारी की, इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है? असली सूझ तभी आती है जब हमें इस बात का एहसास होने लगता है कि हमारे जीवन का घटनाक्रम केवल एक भ्रम है। इसका मतलब है कि हमें सौंपी गई भूमिकाओं को ईमानदारी से निभाना है मगर लिखी हुई इस कहानी को ही परम सत्य नहीं समझ लेना है। परिपक्वता के इस स्तर पर पहुँचने के लिए हमें अपनी पहचान को उन भूमिकाओं के साथ जोड़ने से बचना है जो हमें हमारे किरदारों से बाँध देती हैं और साथी कलाकारों के प्रति करुणा, उदारता और दया के रूप में लगाव पैदा कर देती हैं। जीवन रूपी नाटक के नश्वर पात्रों के साथ लगाव बढ़ाने के बजाय परमात्मा रूपी निर्माता को प्रेम करके हम इस नाटक के अंत में अलौकिक प्रकाश का अनुभव करके अपना चिरस्थायी पुरस्कार प्राप्त कर सकते हैं।
जिस तरह एक अभिनेता को पुरस्कार जीतने के लिए एक कुशल निर्देशक की ज़रूरत होती है, उसी तरह हमारे मार्गदर्शन के लिए भी ‘शब्द’ निर्देशक (शब्द गुरु) की आवश्यकता है। ऐसा विरला रूहानी मार्गदर्शक जो परमात्मा रूपी निर्माता से निकलती हुई शब्द-धुन से जुड़ा हुआ हो। केवल ‘शब्द’ निर्देशक के मार्गदर्शन में ही हम जीवन की इस भ्रमपूर्ण पटकथा से बेलाग होना सीख सकते हैं और दिव्य पुरस्कार अकादमी द्वारा प्रदान किया जानेवाला सर्वोच्च सम्मान प्राप्त कर सकते हैं: परमात्मा रूपी निर्माता के साथ मिलाप। इस दिव्य ऑस्कर को प्राप्त करने के लिए हमें ‘शब्द’ निर्देशक के साथ किए गए कॉन्ट्रैक्ट का पालन पूरी संजीदगी से करना होगा। इस कॉन्ट्रैक्ट में इस जीवन के रूप में मिली भूमिका को निभाने के लिए हमसे क्या उम्मीदें रखी गई हैं:
- ‘शब्द’ निर्देशक (सतगुरु) पर भरोसा करना, भले ही जीवन में जो कुछ हो रहा है, वह हमें पसंद न हो।
- दूसरे कलाकारों के साथ बहुत ज़्यादा लगाव न रखना, चाहे वे माता-पिता, पति-पत्नी या दोस्तों की भूमिका ही क्यों न निभा रहे हों। वे केवल इस दिव्य नाटक के पात्र हैं।
- अपने सबसे करीबी कलाकारों की विदाई (मृत्यु) पर शोक न मनाना। मृत्यु जीवन रूपी नाटक का एक अभिन्न अंग है और हमें इसे अपने अनुभव पर हावी नहीं होने देना चाहिए। फिल्मांकन (जीवन) चलता रहता है।
- जब भी कैमरे के सामने न हों, ‘शब्द’ निर्देशक द्वारा दिए गए मंत्र का जाप करें यानी कि पाँच नाम का सिमरन।
जब हम कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों को पूरा कर लेते हैं तब हम ख़ुद को भविष्य की भूमिकाओं और एक फिल्म पूरी करके दूसरी शुरू करने के अनंत चक्र से मुक्त कर लेते हैं। हमारा अभिनय चाहे कितना भी ख़राब क्यों न हो, ‘शब्द’ निर्देशक हमें सदा प्रोत्साहित करता है कि हमें कभी निराश नहीं होना है, अकेला महसूस नहीं करना है या हिम्मत नहीं हारनी है क्योंकि हर दृश्य हमें परमात्मा रूपी निर्माता के क़रीब ले जाता है। इसलिए मृत्यु के समय जब हमारी भूमिका समाप्त हो जाती है तब इस सृष्टि में से कुछ भी हमारे साथ नहीं जाता, यहाँ तक कि हमारा शरीर भी नहीं। केवल भजन-बंदगी ही हमारे साथ जाती है जो सचखंड पहुँचने के लिए पुल के समान है। इसलिए संसार रूपी मंच के कोलाहल और साथी कलाकारों के अहं – साथ ही अपने अहं – से बचने के लिए, हमें अपनी ज़िम्मेदारी को पूरा करना ही होगा। ‘शब्द’ निर्देशक द्वारा दिए निर्देशों और अपने कर्त्तव्य का पालन करके, हम यक़ीनन दिव्य ऑस्कर प्राप्त कर सकते हैं।
हॉलीवुड में होनेवाले पुरस्कार समारोह के विपरीत, जब हमें अपना दिव्य ऑस्कर मिलेगा तब हम सह-अभिनेताओं, फिल्म जगत के पेशेवरों और जानी-मानी हस्तियों के साथ बैठने के लिए वापस ऑडिटोरियम में नहीं जाएँगे। हम रंगमंच से उतरकर ‘शब्द’ निर्देशक की अगुआई में चलेंगे जो हमें निज-घर की ओर ले जाएगा, जहाँ कुछ भी असत्य नहीं है, जहाँ न किसी फिल्म का सेट है, न कोई अभिनेता है, वहाँ सिर्फ़ ‘शब्द-गुरु’ ही परम सत्य है।