कथनी से करनी भली
ऐसे लोग विरले होते हैं जिनकी कथनी और करनी समान होती है और हम ऐसे लोगों की तरफ़ खिंचे चले जाते हैं। उनकी दृढ़ता और ईमानदारी हमें प्रेरणा देती है और हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हमारी कथनी और करनी एक जैसी है। परमार्थ में हमारी करनी का हमारी कथनी के मुताबिक़ होना ख़ास तौर पर ज़रूरी है, जहाँ अभ्यास सबसे अहम है।
खोखली परमार्थी बातें
‘ए स्पिरिचुअल प्राइमर’ पुस्तक में, लेखक ने बताया है कि आधुनिक संस्कृति में इस भ्रम को बढ़ावा दिया जाता है कि सच्ची ख़ुशी और संतुष्टि “ज़्यादा धन-दौलत, ज़्यादा ऊँची पद्वियों, ज़्यादा शोहरत, ज़्यादा ज़मीन-जायदाद, हर चीज़ को ज़्यादा” हासिल करने से मिलती है। ऐसी जीवन-शैली अपनाना जिसका मक़सद आंतरिक शांति और संतोष की खोज है, इस प्रचलित सोच को चुनौती देता है। ऐसे में, जब हम दूसरे सत्संगियों से मिलते हैं तब हम स्वाभाविक तौर पर परमार्थ की चर्चा शुरू कर देते हैं। ये बातचीत न केवल संतमत में हमारी साझी दिलचस्पी को दर्शाती है बल्कि एक-दूसरे को प्रेरणा देने, ऊँचा उठाने और सहारा देने का एक अहम ज़रिया भी है। असल में, हममें से कई लोगों को रूहानियत के बारे में ऐसी बातचीत याद होगी जिसने ज़िंदगी की कड़ी चुनौतियों में हमें प्रोत्साहित किया हो, हमारा मार्गदर्शन किया हो या हमें तसल्ली दी हो।
हालाँकि अगर हम सिर्फ़ अपने ज्ञान का प्रदर्शन करने के लिए बातचीत करते हैं और रूहानी अभ्यास नहीं करते हैं तो रूहानियत के बारे में चर्चा करना व्यर्थ है। जब हम रूहानियत को सिर्फ़ कथनी तक सीमित रखते हैं तब हम संतमत का असली मक़सद समझ नहीं पाते और हम इस धोखे में रहते हैं कि हम संतमत की शिक्षाओं का पूरी निष्ठा से पालन कर रहे हैं। महाराज चरन सिंह जी प्रकाश की खोज पुस्तक में, संतमत के प्रति अपने उत्साह का बाहरी प्रदर्शन करने के बारे में चेतावनी देते हैं क्योंकि यह हमें लक्ष्य से भटका देता है जोकि मन को स्थिर करना है:
संतमत के प्रति अपने उत्साह को बाहर प्रकट नहीं करना चाहिये। असल में इस बाहरी उत्साह की वजह से मन और भी चंचल हो जाता है, जबकि संतमत में हमारी सब कोशिशें और मेहनत मन को शांत और स्थिर करने के लिये होती हैं। संतमत के उत्साह को भीतर हज़म करना चाहिये और इसे गहरी दीनता तथा परमात्मा और सतगुरु के प्रति अधिक प्रेम और भक्ति के रूप में बदल देना चाहिये। केवल शब्दों और भावनाओं के द्वारा व्यक्त किये गए ज़बानी प्रेम और भक्ति का संतमत में महत्त्व नहीं है। आवाज़ दिल से आनी चाहिये। हमारी सच्ची लगन का अंदाज़ा हमारे अंदर उत्पन्न दीनता और कोमलता से लगाया जाता है।
आप संतमत की शिक्षाओं पर अमल करने की अहमियत पर बल देते हुए फ़रमाते हैं कि यह करनी का मार्ग है, जीवन जीने का तरीक़ा है जिसे अपनाया जाना चाहिए। सिर्फ़ प्यार और श्रद्धा भरे लफ़्ज़ बोलना जज़्बातों को प्रकट करने के अलावा कुछ नहीं है जो समय के साथ ख़त्म हो जाते हैं। इसके बिलकुल उलट, सतगुरु के प्रति प्यार और भक्ति का इससे ज़्यादा बेहतर इज़हार और कोई नहीं है कि हम रोज़-रोज़ दृढ़ इरादे से भजन-सिमरन करें, ख़ासकर तब, जब हमारा ऐसा करने का बिलकुल मन न हो। जब हम मन के बहानों या दलीलों पर ध्यान देने के बजाय अपना भजन-सिमरन करते हैं तब यह हृदय से निकली सच्ची पुकार बन जाता है। भले ही हमें पाँच नाम के सिमरन को एक बार करने के लिए भी संघर्ष करना पड़े, मन के साथ यह लड़ाई और अपने भजन-सिमरन को न छोड़ना सतगुरु के लिए हमारे सच्चे प्यार को दर्शाता है। सच्चे दिल से किए गए इस तरह के समर्पण से धीरे-धीरे हमारे अंदर विनम्रता और करुणा आने लगती है। महाराज चरन सिंह जी फ़रमाते हैं कि यह शब्दों की तुलना में संतमत के प्रति हमारे उत्साह का ज़्यादा स्पष्ट संकेत है।
रूहानियत: किताबी ज्ञान से परे
रूहानियत का दिखावा करने की प्रवृत्ति सिर्फ़ बातचीत तक ही सीमित नहीं होती। जैसे करनी के बिना शब्द खोखले हो सकते हैं, वैसे ही ज़रूरत से ज़्यादा रूहानी साहित्य का अध्ययन करने से एक अन्य तरह के दिखावे में पड़ जाने का ख़तरा पैदा हो सकता है, जिसमें करनी के बजाय ज्ञान को प्राथमिकता दी जाती है। इसलिए, जिस तरह हमें रूहानी अभ्यास से विमुख करनेवाली खोखली बातें करने से बचना चाहिए, उसी तरह हमें इस बात को लेकर भी सचेत रहना चाहिए कि हमारा उत्साह ज्ञान प्राप्त करने के लिए सिर्फ़ किताबें पढ़ने तक ही सीमित न रह जाए। असल में, यह भावना परमार्थी किताबें ख़रीदने की हमारी उत्सुकता के रूप में भी प्रकट होती है। उदाहरण के लिए, संस्था द्वारा जब भी कोई नई पुस्तक प्रकाशित की जाती है तब हम उसे ख़रीदने के लिए आतुर रहते हैं। इसी तरह, जब किसी अन्य मत की शिक्षाएँ संतमत के साथ मिलती-जुलती लगती हैं तब हम उस ज्ञान को दूसरों के साथ साझा करने के लिए उतावले हो जाते हैं। यह उतावलापन इस बात का संकेत है कि हम परमार्थ को इस्तेमाल की वस्तु समझ रहे हैं, जो ज्ञान हासिल करने और उस ज्ञान का प्रदर्शन करके ख़ुद को आलिम-फ़ाज़िल (गुणी-ज्ञानी) साबित करने की हमारी आतुरता को दर्शाता है। फिर, चाहे हम दर्जन-भर किताबें पढ़ें या सौ, सार संदेश एक ही है: अहमियत इस बात की है कि हम देहधारी सतगुरु द्वारा सिखाए गए रूहानी अभ्यास के ज़रिए अपनी सुरत को शब्द के साथ जोड़ें।
परमार्थ के बारे में पढ़ने से हमारा ज्ञान बढ़ सकता है लेकिन न तो यह अंतर्ज्ञान प्रदान करता है और न ही सत्य का अनुभव करवाता है जिसकी हमें तलाश है। महाराज चरन सिंह जी संत-मार्ग पुस्तक में, तुलसी साहिब के एक दोहे का हवाला देते हैं जो रूहानी अभ्यास किए बिना धर्म-ग्रंथों को पढ़ने के जोखिम को दर्शाता है:
चार अठारह नौ पढ़े, षट पढ़ि खोया मूल।
सुरत सबद चीन्हे बिना, ज्यों पंछी चंडूल॥
तुलसी साहिब चेतावनी देते हैं कि हमें धर्म-ग्रंथों से प्राप्त ज्ञान को ही सच्चा आंतरिक अनुभव समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। हिंदू धर्म के मुख्य ग्रंथों – नौ व्याकरणों, अठारह पुराणों, चार वेदों, और छह दर्शनों – के विद्वान होने पर भी आत्मज्ञान प्राप्त नहीं होता। धर्म-ग्रंथ मार्गदर्शन के लिए हैं, ये प्रत्यक्ष आध्यात्मिक अनुभव की जगह नहीं ले सकते। जब तक आत्मा शब्द में अभेद नहीं हो जाती, सिर्फ़ किताबों पर आधारित हमारा रूहानी ज्ञान उस तोते की तरह है जो बिना मतलब समझे शब्दों को दोहराता रहता है।
हालाँकि तुलसी साहिब की बानी में ख़ास तौर पर हिंदू ग्रंथों का ज़िक्र है लेकिन यह सभी धर्म-ग्रंथों पर लागू होता है। धर्म-ग्रंथ सिर्फ़ ज़रिया हैं, अंतिम लक्ष्य नहीं – इस बात पर सिर्फ़ तुलसी साहिब ही बल नहीं देते बल्कि दूसरी धार्मिक परंपराओं का भी यही मानना है जैसे कि ज़ेन बौद्ध धर्म चाँद की ओर इशारा करनेवाली उंगली को चाँद समझने की भूल न करने की नसीहत देता है। जानकारी के इस युग में, यह एक उपयोगी सुझाव है कि परमार्थी किताबें, सत्संग और सवाल-जवाब को पढ़ने-सुनने की वजह से हमें भजन-सिमरन करना नहीं छोड़ देना चाहिए। तुलसी साहिब दृढ़तापूर्वक कहते हैं कि सत्य रूपी सार-तत्त्व बाहरी साधनों द्वारा नहीं, बल्कि आंतरिक शब्द-धुन को ध्यानपूर्वक सुनने से प्राप्त होता है।
रूहानी अभ्यास अपनाना
चूँकि संतमत के लिए अपने उत्साह को लफ़्ज़ों या अध्ययन द्वारा प्रकट करने का कोई ख़ास लाभ नहीं है, नीचे दिए गए उद्धरण भजन-सिमरन के महत्त्व की पुष्टि करते हैं जिसके बारे में हमें पहले ही समझाया जा चुका है:
केवल नाम पा लेने से ही कोई सत्संगी नहीं बन जाता। सत्संगी को अपने जीवन को संतमत के साँचे में ढालना चाहिए। उसका हर एक विचार, वचन और कर्म संतमत के उसूलों के अनुसार होना चाहिए। कथनी से करनी ज़्यादा ज़रूरी है।
महाराज जगत सिंह जी, आत्म-ज्ञान
संतमत करनी का मार्ग है, कथनी का नहीं। केवल वही समय आपके खाते में जमा होता है जो आप अपने सिमरन और भजन में लगाते हैं। उस संपूर्ण प्रेम को, जिसे आप शब्दों में प्रकट कर रहे हैं, भजन-सिमरन का रूप लेना चाहिये। केवल तभी वह फलप्रद होगा। तब वह कई गुना बढ़ेगा और मालिक की अपार दया लाएगा।
महाराज चरन सिंह जी, प्रकाश की खोज
कथनी के बजाय करनी पर ज़ोर देकर दोनों उद्धरण इस बात की तरफ़ संकेत करते हैं कि रूहानी सफ़र का प्रेम के दिखावे से कोई संबंध नहीं है। जैसा कि महाराज जगत सिंह जी नीचे दिए गए उद्धरण में फ़रमाते हैं, हमें अभ्यास करने, ज़्यादा अभ्यास करने, और भी ज़्यादा अभ्यास करने की ज़रूरत है। इस बात को समझते हुए, क्या हमें संतमत और सतगुरु के प्रति सम्मान को, अपने इरादों को करनी में बदलकर ज़ाहिर नहीं करना चाहिए?
परमार्थ के मार्ग में कामयाबी का गुर है—‘भजन, ज़्यादा भजन, और ज़्यादा भजन।’
महाराज जगत सिंह जी, आत्म-ज्ञान
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दरअसल, हम प्रकाशमय जीव हैं। हम प्रकाश के सिवाए कुछ नहीं है; लेकिन हमारा फैला हुआ मन इस बात से बेख़बर है और सिर्फ़ अंधकार देखता है। अंधकार में ध्यान लगाने से और उसका आनंद लेने से, अंधकार प्रकाश में बदल जाएगा। अंधेरे में ध्यान टिकाने का मक़सद अंतर्दृष्टि विकसित करना है ताकि प्रकाश दिखाई दे।
अवेयरनेस ऑफ़ द डिवाइन