क्या तुम ख़ुद को भाग्यशाली समझते हो?
महाराज चरन सिंह जी प्रकाश की खोज पुस्तक में एक विदेशी शिष्य को पत्र में लिखते हैं:
परमात्मा ने दयापूर्वक हमें इस रूहानी मार्ग के लिये चुना है, इस बात की हमें ख़ुशी होनी चाहिये। यदि हम ख़ुश नहीं हैं, तो इसका कारण यही है कि नामदान के महान प्रसाद और सौभाग्य का हमें अनुमान नहीं है। कृपया क्षण भर के लिये शांतिपूर्वक विचार करें। क्या आप अपने देश के उन सौभाग्यशाली व्यक्तियों में से नहीं हैं जिन्हें परमात्मा ने इस मार्ग के लिये चुना है? …क्या आप समझते हैं कि आपने अपने ही प्रयत्नों से इस मार्ग की खोज और प्राप्ति की है? तो फिर आप सतगुरु के पास अब आने के बजाय इसके पहले क्यों नहीं आए?
महाराज जी का अहम प्रश्न हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि हम कितने ज़्यादा भाग्यशाली हैं। कोई नहीं जानता कि हमारी आत्मा, नामदान की बख़्शिश होने से पहले कितने जन्म भटकती रही है या जो दात हमें बिना किसी ख़ास कोशिश के मिल गई है कितने ही जीव उसके लिए तड़प रहे हैं? निस्संदेह हम धरती के सबसे भाग्यशाली जीवों में से हैं। ख़ुद को ख़ुशनसीब समझने की इस भावना से हमारे अंदर शुक्राने का भाव और ख़ुशी पैदा होनी चाहिए। फिर भी हममें से बहुत कम लोग यह दावा कर सकते हैं कि वे इसी नज़रिए से जीवन जीते हैं। ज़्यादातर समय हम चिंता, उदासी, ग़फ़लत या ऐसी ही किसी अन्य भावना से जूझते रहते हैं जिसे बौद्ध धर्म मुख्य रूप से दु:ख ही मानता है।
हम ख़ुद को ख़ुशक़िस्मत इसलिए नहीं मानते क्योंकि अपने हालात को देखने का हमारा नज़रिया सही नहीं है। अगर हम संत-महात्माओं के उपदेश पर विचार करें और हमें इस बात का एहसास हो जाए कि एक पूर्ण सतगुरु का शिष्य बनने में क़िस्मत ने कितनी अहम भूमिका निभाई है तो हमारा नज़रिया पूरी तरह से बदल जाएगा। इस सृष्टि में अनगिनत युग बिताने के बाद, परमपिता परमात्मा ने हमारी आत्मा की सँभाल की ज़िम्मेदारी पूर्ण सतगुरु को सौंपी है ताकि वह हमें निज-घर वापस ले जा सकें। तीन कारणों की वजह से मनुष्य-जन्म एक बहुमूल्य दात है।
धर्म-ग्रंथों में बताया गया है कि मनुष्य-जन्म, मुक्ति की इच्छा और पूर्ण सतगुरु का मार्गदर्शन – यह तीनों आत्मा की उन्नति के लिए बहुत अहम पड़ाव हैं जोकि परमात्मा की दया-मेहर के बिना मुमकिन नहीं। दूसरे शब्दों में, यह एक अत्यंत दुर्लभ संयोग है। उदाहरण के लिए, हो सकता है कि कोई मनुष्य के रूप में जन्म ले मगर अलौकिक सत्य की मौजूदगी को मानने के लिए ही तैयार न हो या कोई मुक्ति प्राप्त करना चाहता हो मगर किसी रूहानी मार्गदर्शक से उसका मिलाप ही न हो। ऐसी दया-मेहर का प्राप्त होना अपने आप में अद्भुत है लेकिन इससे भी ज़्यादा ख़ास बात यह है कि हमने ऐसा कुछ भी नहीं किया जिसके कारण हम इस दात को पाने के क़ाबिल बने हों। महाराज चरन सिंह जी पुस्तक संत-संवाद, भाग 2 में फ़रमाते हैं:
हमें ज़रूरत है तो बस उसकी दया-मेहर की। जब उसकी बख़्शिश होती है, तो ऐसे हालात बन जाते हैं कि हम इस रचना से बाहर निकल जाना चाहते हैं। हम संतमार्ग पर आ जाते हैं, हमें भजन-सिमरन करने का मौक़ा मिल जाता है। हमें वे सहूलियतें, वह माहौल मिल जाता है। हमारे अंदर उसका प्यार, उसकी भक्ति पैदा हो जाती है और हम दुनिया से मुँह मोड़कर उसकी ओर रुख़ कर लेते हैं। ये सब चीज़ें सिर्फ़ उसकी दया-मेहर से ही आती हैं। ऐसा नहीं है कि हमने इन चीज़ों का हक़दार बनने के लिये कुछ किया है। हमने कुछ भी नहीं किया। …हम उसका प्यार पाने के हक़दार बनने के लिये कभी कुछ नहीं कर सकते। वही देता है और हमेशा देता ही रहता है। हम तो इतने तुच्छ हैं कि उससे दया-मेहर की याचना भी नहीं कर सकते, क्योंकि इस रचना में हम इनसान होने के नाते बिलकुल लाचार हैं। यह सब उसकी दया-मेहर ही है।
तीसरा कारण कि पूर्ण सतगुरु का शिष्य बनना असाधारण दात क्यों है – और जो हमारे लिए इस वक़्त सबसे ज़्यादा उपयुक्त है – वह यह है कि इससे हमारी आत्मा को जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होने का मौक़ा मिलता है। लेकिन हमें इसी बात से संतुष्ट नहीं हो जाना है। नामदान का मिलना मुक्ति प्राप्त करने के सफ़र की सिर्फ़ शुरुआत है। सतगुरु के मार्गदर्शन में सफलता तो यक़ीनी है लेकिन हमारी कोशिशों की वजह से हमारी रूहानी तरक़्क़ी जल्दी या देर से हो सकती है।
इसलिए आओ सतगुरु जो कुछ भी करने के लिए कहते हैं, उसे पूरा करने में उनका साथ दें। बहाने बनाना व्यर्थ है। यह कहना कि हम भजन-सिमरन नहीं कर सकते, ख़ुद को धोखा देना है। यदि हमारे मन में सतगुरु के लिए प्रेम और भरोसा है तो यक़ीनन हम उनकी ख़ुशी प्राप्त करना चाहेंगे। चूँकि सारी सृष्टि के रचयिता परमात्मा ने अनगिनत आत्माओं में से हमें नामदान के लिए चुना है, हमें दोबारा ख़ुद से यह पूछना चाहिए, “क्या मैं ख़ुद को भाग्यशाली समझता हूँ?”