दुनियावी प्यार से रूहानी प्यार का सफ़र
इंसानी प्यार, जैसा कि हम आमतौर पर महसूस करते हैं, गहरे लगाव, ज़रूरतों और उम्मीदों से जुड़ा होता है। उदाहरण के लिए, माँ का अपने बच्चों के लिए प्यार, इस उम्मीद से जुड़ा है कि वह भविष्य में उसकी सँभाल करेंगे। प्रेमी और प्रेमिका का प्यार आपसी प्रेम से पनपता है जबकि शौक़ व धन-संपत्ति के लिए हमारा प्यार उनसे मिलने वाली ख़ुशी पर निर्भर करता है। हालाँकि ये सब प्यार शर्तों पर आधारित हैं, ये अनुभव एक ऐसा रिश्ता जोड़ने की हमारी क़ुदरती चाह को दर्शाते हैं जो शर्तों से परे हो।
जब हम किसी से प्यार करते हैं तब हमें उसमें कुछ असाधारण – कोई ऐसा गुण दिखाई देता है कि हम ग़लती से यह मानना शुरू कर देते हैं कि यह ख़ूबी सिर्फ़ उसी व्यक्ति में है। हम सोचते हैं, “वह किसी दूसरे के जैसा नहीं है।” यह सोच इसलिए पैदा होती है क्योंकि हमारे प्यार का आधार अकसर उसके बाहरी गुण, जैसे कि उसकी शक़्ल-सूरत या व्यक्तित्व होता है। हालाँकि, इस तरह का नज़रिया एक बुनियादी सच को नज़रअंदाज़ कर देता है: जिसे हम प्यार करते हैं, उसकी हस्ती का सार (आत्मा) सिर्फ़ उस तक ही सीमित नहीं है बल्कि वह हर किसी में मौजूद है।
हालाँकि दुनियावी प्यार हक़ीक़त की धुंधली-सी झलक देता है, फिर भी यह प्यार हमें दुनियावी स्तर से आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है। यह करनी के लिए आह्वान है जो हमें अपने हृदय और अपने मन को निर्मल करने की प्रेरणा देता है ताकि हम उस ऊँची क़िस्म के प्यार – परमात्मा के लिए प्रेम – के लिए तैयार हो सकें। दुनियावी प्यार के उलट, जिसका आधार हमारी ज़रूरतें और उम्मीदें हैं, दिव्य प्रेम निस्स्वार्थ और बिना किसी शर्त के होता है। अहंकार और इच्छा से मुक्त, दिव्य प्रेम शाश्वत आनंद और शांति प्रदान करता है। इस अवस्था में, प्रेमी और प्रियतम एक हो जाते हैं फलस्वरूप जुदाई का भ्रम ख़त्म हो जाता है। जैसा कि मौलाना रूम लिखते हैं, “आशिक़ आख़िरकार कहीं मिलते नहीं हैं। वे हमेशा एक-दूसरे में ही समाए होते हैं।” (‘द एसेंशियल रूमी’ से उद्धरित) यह मिलाप आत्मा की घर वापसी को दर्शाता है – पूर्णता की ओर वापसी, जिसे हम भूलवश दुनियावी प्यार से पाने की उम्मीद रखते हैं। अपने अंदर दिव्य प्रेम के सामर्थ्य को पहचानकर और उसे पाने का प्रयास करके, हम प्रेम के बारे में अपनी समझ और नज़रिए को बदल सकते हैं।
पूर्ण सतगुरु की भूमिका
रूहानी प्रेम कहानी का मरकज़ देहधारी सतगुरु होता है जो हमें प्यार करना सिखाता है। सभी पूर्ण संत-सतगुरुओं का मूल संदेश यह है कि प्रेम परिवार और दोस्तों के छोटे से दायरे तक सीमित न होकर सर्वव्यापी होना चाहिए। इसका अभिप्राय है कि जिससे भी मिलें, प्रेम से मिलें, उनसे भी जिन्हें हम पसंद नहीं करते हैं। हमारा मन इस बात को लेकर सवाल कर सकता है कि क्या यह मुमकिन है, लेकिन सतगुरु इस बात का जीता-जागता उदाहरण हैं कि सभी से प्रेम किया जा सकता है। भले ही बाहरी तौर पर सतगुरु हमें आम इनसान लगें, एक ऐसे इनसान जिसका नाम है, पहचान है और परिवार है मगर उनका असल स्वरूप बाहरी वुजूद से बिलकुल अलग होता है। वह दिव्य धुन के बारे में समझाते हैं जिसे वे कभी-कभी ‘शब्द’ या ‘परमात्मा की आवाज़’ भी कहते हैं; यह वही स्रोत है जिससे सारी सृष्टि पैदा होती है और जिसमें वापस समा जाती है।
पूर्ण देहधारी सतगुरु बिना किसी परख के जिज्ञासुओं को अपनी शरण में ले लेते हैं और उनकी कमियों-कमज़ोरियों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं; सतगुरु का उद्देश्य उनका मार्गदर्शन करना होता है ताकि वे स्वयं दिव्य प्रेम का अनुभव कर सकें। सतगुरु और शिष्य के बीच का नाता दुनियावी तर्क से परे होता है। जहाँ इंसानी प्यार में अकसर एक-दूसरे से कुछ पाने की उम्मीद होती है, वहीं सतगुरु का प्यार असीम और बिना किसी शर्त के होता है। उनकी दया-मेहर समय और स्थान से परे होती है, आंतरिक और बाहरी मार्गदर्शन के ज़रिए जिज्ञासु की सँभाल करती है। एक माँ की तरह जो अपने बच्चे को चलना सिखाती है, उसके लड़खड़ाने के बावजूद धैर्यपूर्वक उसका साहस बढ़ाती है, वैसे ही सतगुरु सदा करुणा के साथ परमार्थ के जिज्ञासुओं का मार्गदर्शन करते हैं, वह उनके अवगुणों या असफलताओं की ओर कभी ध्यान नहीं देते।
गुरु-शिष्य के रिश्ते की धुरी है दर्शन। शुरू-शुरू में, हम सतगुरु के देह स्वरूप को देखकर संतुष्ट हो सकते हैं। मगर जैसे-जैसे रिश्ता गहरा होता जाता है, हम सतगुरु के अहम संदेश को और अधिक ध्यान से सुनते हैं: हमारा असल वुजूद शरीर नहीं बल्कि आत्मा है जो अपने स्रोत, शब्द में समाना चाहती है। सतगुरु के देह स्वरूप से प्यार करना मंज़िल तक पहुँचने का ज़रिया है; यह दिव्य शब्द-धुन – अंतर में सच्चे गुरु – के प्रेम की ओर क़दम बढ़ाने का साधन है।
रूहानी प्रेम की क़ीमत
सतगुरु के देहस्वरूप के प्रेम से आगे बढ़कर उनके नूरी स्वरूप से प्रेम करने के लिए करनी ज़रूरी है: शांति से चुपचाप बैठना, सिमरन के ज़रिए ख़याल को दुनिया की ओर से हटाकर तीसरे तिल पर एकाग्र करना। जैसे एक किसान खेतों में हल चलाता है वैसे ही रोज़ाना सिमरन करने से मन सतगुरु की दया-मेहर प्राप्त करने के लायक़ बन जाता है। धीरे-धीरे, भजन-सिमरन प्रेम के इज़हार का ज़रिया बन जाता है जो एकाग्रता के बढ़ने के साथ बढ़ता जाता है। भजन-सिमरन के दौरान अंतर में ध्यान जितना ज़्यादा एकाग्र होता है, परमात्मा के साथ नाते का एहसास उतना ही गहरा होता है। उस दिव्य सत्ता से संबंध का एहसास जितना गहरा होता है, हमारा प्यार उतना ही बढ़ता है जो ‘शब्द’ की अपार दया-मेहर को दर्शाता है।
रूहानी प्रेम पैदा करने की क़ीमत देनी पड़ती है। संत कबीर द्वारा दिया प्रेम के बाज़ार का दृष्टांत इस कटु सत्य को पेश करता है, जहाँ प्रेम की क़ीमत शीश देकर चुकानी पड़ती है:
प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय।
राजा परजा जेहि रुचै, सीस देइ लै जाय॥
संत कबीर
अपने शीश (सीस) को अर्पित करना भजन-सिमरन के ज़रिए अपने अहंकार को ख़त्म करने का प्रतीक है। अहंकार को ख़त्म करने के लिए अभिमान और अपनी अलग पहचान को छोड़ना पड़ता है और शायद सबसे मुश्किल होता है परमात्मा की रज़ा में राज़ी रहना। पूर्ण समर्पण न तो ख़ुद-ब-ख़ुद होता है, न ही बिना कोशिश किए संभव है; इसके लिए इच्छाओं, अपनी परख और इस भ्रम को छोड़ना पड़ता है कि हमारे वश में कुछ है। इसके लिए अहं के सूक्ष्म से भी सूक्ष्म जाल में से निकलना पड़ता है जैसे कि रूहानी अनुभवों की इच्छा रखना या अपनी रूहानी तरक़्क़ी पर गर्व करना। संत-महात्मा चेतावनी देते हैं कि भजन-सिमरन को मशीनी ढंग से करने के बजाय हृदय में सच्ची तड़प लेकर किया जाना चाहिए। जैसा कि बाबा जैमल सिंह जी फ़रमाते हैं: “सौ-सौ वर्ष भजन करने से भी मन ऐसा शुद्ध नहीं होता जैसा कि सच्ची तड़प में बहे एक आँसू से होता है।”
रूहानी प्रेम की पूर्णता परम आनंद नहीं बल्कि स्थिरता है, एक ऐसा मिलाप जहाँ प्रेमी और प्रियतम पूर्ण रूप से एक-दूसरे में समा जाते हैं। उस अवस्था में ‘मैं’ और ‘तुम’ के द्वैत का भ्रम ख़त्म हो जाता है। 15वीं सदी के संत कबीर साहिब ने इस अवस्था का वर्णन इस तरह किया है:
कबीर तूं तूं करता तू हुआ मुझ मह रहा न हूं॥
जब आपा पर का मिट गइआ जत देखउ तत तू॥
संत कबीर
कबीर साहिब के ये वचन ऐसे पूर्ण प्रेम को प्रकट करते हैं जिसमें साधक की कोई हस्ती नहीं रहती, सिर्फ़ साध्य ही रह जाता है। ऐसा मिलाप जज़्बातों से ऊपर है; साधक प्रेमी न रहकर, प्रेम-रूप ही हो जाता है। ऐसा कायाकल्प छिपा नहीं रहता है। जो रिश्ते-नाते उम्मीदों की वजह से पहले बिगड़ गए थे, वे रहमदिली की वजह से फिर से जुड़ जाते हैं। फिर भी यह सफ़र चुनौतियों से ख़ाली नहीं होता। जब परख करने की पुरानी आदतें फिर से उभरती हैं और अपनी अलग पहचान का अहंकार हो जाता है तब सतगुरु का मार्गदर्शन बहुत अहम सिद्ध होता है। उनका उपदेश हमें याद दिलाता है कि असफलताएँ नाकामी नहीं होतीं बल्कि इनसे और दृढ़ता से समर्पण करने की प्रेरणा मिलती है। आख़िरकार हम विनम्रता से हर चीज़ को स्वीकार करना शुरू कर देते हैं।
सारांश
रूहानी प्रेम कोई आदर्श नहीं है बल्कि ख़ुद की पहचान का एक सफ़र है; हम इस दुनिया में सुरक्षित महसूस करने के लिए जिन चीज़ों से चिपके हुए हैं यह उनके भ्रम को ख़त्म करता है। भजन-सिमरन के ज़रिए प्राप्त जागरूकता हमें दुनियावी रिश्तों के मोह से मुक्त करती है। समर्पण द्वारा हम नश्वर सुखों के बजाय स्थायी शांति प्राप्त कर लेते हैं। जो बचता है वह ख़ालीपन नहीं बल्कि भ्रम से मुक्त हो गई आत्मा है जो अनंत-असीम सागर की बूँद के रूप में अपनी पहचान कर लेती है। इस कायाकल्प में हम यह जान लेते हैं कि प्रेम का असल मक़सद अपने स्रोत में वापस समाने के लिए हमारा मार्गदर्शन करना है।
सतगुरु का स्वरूप, सतगुरु की दृष्टि, शब्द-धुन – ये सब हमें आकर्षित करते हैं ताकि हम परमात्मा में समाकर अविनाशी सुख प्राप्त कर सकें। जब हम परछाइयों के पीछे भागना बंद कर देते हैं तब हमें समझ आता है कि दुनियावी प्रेम हमेशा किस ओर संकेत करता था: हम कभी खोए नहीं थे, बस कुछ पल के लिए भूल गए थे। हम कभी अलग थे ही नहीं बल्कि हमेशा एक थे।
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आत्मा प्रेम का रूप है। हमारा मक़सद प्रेम है। और उस मक़सद तक पहुँचने का रास्ता भी प्रेम है। हालाँकि कभी-कभी यह यक़ीन नहीं होता कि वक़्त के सतगुरु ने हमारा हाथ थामा हुआ है और वह हमें सिखा रहे हैं कि प्यार कैसे करना है।
सेवा