कर्म के जाल से आज़ादी
पुनर्जन्म और कार्य-कारण का सिद्धांत – जिसे आमतौर पर कर्म-सिद्धांत कहा जाता है – दो आध्यात्मिक नियम हैं जो एक साथ काम करते हैं। आत्मा का एक शरीर से दूसरे शरीर में सफ़र संयोगवश नहीं होता; बल्कि यह कर्मों के नियम के अनुसार होता है जिसमें गलती की कोई गुंजाइश नहीं होती। यह नियम ब्रह्मांड के ताने-बाने में बुना हुआ है, जिसका मतलब यह है कि आत्मा को अपनी हर करनी का परिणाम भुगतना ही पड़ता है, ठीक वैसे ही जैसे आग में हाथ डालने से हाथ का जलना निश्चित है। हालाँकि, आग से जलने का उदाहरण कर्म-फल के तुरंत नतीजे को दिखाता है लेकिन यह आत्मा के जन्म-जन्मांतर के सफ़र की व्याख्या कैसे है? संक्षेप में, आत्मा कर्मों का भंडार क्यों इकट्ठा कर लेती है?
संत-महात्मा समझाते हैं कि कर्मों का कानून बहुत पेचीदा और सूक्ष्म होता है। इसकी कार्यविधि इतनी सूक्ष्म और पेचीदा है जैसा कि महाराज जगत सिंह जी ने साइंस ऑफ़ द सोल पुस्तक में फ़रमाया है, “अगर अनाज का एक भी दाना पड़ोसी के खेत से अनजाने में हमारे अनाज के भंडार में आ गया है तो उसका भी हिसाब चुकाना पड़ेगा।” कुछ कर्मों का फल तुरंत मिल जाता है, तो कुछ का बाद में मिलता है और इसी वजह से आत्मा जन्म-मरण के चक्कर में फँस जाती है।
इस मनुष्य-जन्म में हमारी आत्मा अपने ‘प्रारब्ध’ कर्मों के रूप में थोड़े-से कर्मों का भुगतान दे रही है – हमारे पिछले कर्म ही इस जीवन में फलीभूत हो रहे हैं। हमारे जीवन के हालात और जो भी घटनाएँ जीवन में घटती हैं, वे हमारे पिछले अनेक जन्मों में लिए गए फ़ैसलों का नतीजा हैं। जैसा कि बाइबल के न्यू टेस्टामेंट में कहा गया है, “तुम्हारे सिर के बाल भी गिने हुए हैं।” (ल्यूक 12:7-8) भले ही हमारे जीवन में बहुत कुछ पहले से ही निर्धारित है, फिर भी हम थोड़ी-बहुत मनमर्ज़ी कर सकते हैं। इसके फलस्वरूप, बकाया कर्ज़ चुकाते समय, हम नए कर्म भी बना सकते हैं, जिन्हें ‘क्रियमान’ कर्म कहते हैं। क्योंकि हम अपने वर्तमान जीवन में इन क्रियमान कर्मों का परिणाम नहीं भुगत सकते, इसलिए ये क्रियमान कर्म हमारे ‘संचित’ कर्मों के बहुत बड़े भंडार में जमा हो जाते हैं जो पिछले जन्मों के बकाया कर्मों का भंडार है। इसलिए हमारी आत्मा एक दुष्चक्र में फँस जाती है।
यहाँ एक विरोधाभास सामने आता है: अगर कर्मों का क़ानून अटल है तो इनसान अभी तक इस बात से बेख़बर क्यों है कि यह कैसे काम करता है? संत-महात्मा समझाते हैं कि पिछले जन्मों को याद न रख पाने के कारण स्वतंत्र इच्छा का भ्रम बना रहता है। हम ख़ुद को स्वतंत्र पात्र समझते हैं क्योंकि हम इस बात से अनजान हैं कि हमारे वर्तमान फ़ैसलों का आधार हमारे पिछले जन्मों के संचित कर्म हैं। ग्रीक शब्द ‘क्रिमा’ जिसका अर्थ है न्याय या रब्बी हुक्म का उल्लंघन करने वाले काम, इस सच्चाई को दर्शाता है: हम काँटे बो कर गुलाब की उम्मीद नहीं कर सकते। फिर भी, हमारी गलती यह है कि हम कर्म को वर्तमान जन्म तक ही सीमित समझते हैं। संत-महात्मा समझाते हैं कि हर कर्म का परिणाम होता है लेकिन इनसान की ज़िंदगी इतनी छोटी है कि सभी कर्मों का हिसाब-किताब एक ही जीवन में चुकता नहीं किया जा सकता।
संत-महात्मा समझाते हैं कि ज़िंदगी एक अदृश्य जेलख़ाना है। हम ब्रह्मांड रूपी मंच पर अपने संचित कर्मों के आधार पर लिखी हुई कहानी के अनुसार भूमिका निभाते हैं। मौत से नाटक का एक भाग समाप्त होता है, पूरा नाटक नहीं और हमें अगले भाग में एक नई भूमिका दे दी जाती है। सोलहवीं सदी की भक्त मीराबाई निम्नलिखित पंक्तियों में, अपने संचित कर्मों के बोझ पर दु:ख प्रकट करती हुई परमात्मा से विनती करती हैं कि वह उसे आवागमन के चक्कर से मुक्त कर दे:
कष्ट आपे मने कर्म ना बंधन, दूर तुं कर किर्तार॥
आ संसार वह्यो वह्यो जाय छे, लख चोराशी धार॥
मीराँ कहे प्रभु गिरधर नागर, आवागमन निवार॥
विनती और प्रार्थना के शब्द
इन पंक्तियों में दिए ‘चोराशी’ शब्द से भाव चौरासी लाख योनियों का चक्र है जिसमें जीव बार-बार जन्म लेते हैं। क्या जन्म और मृत्यु के इस चक्र से मुक्ति संभव है? संत-महात्मा दावे से कहते हैं कि यह संभव है लेकिन सिर्फ़ तभी, जब हम चार उसूलों का नियमपूर्वक पालन करें। पहले तीन उसूलों – शाकाहारी भोजन खाना जिसमें दूध भी शामिल है, मादक पदार्थों से परहेज़ करना और नैतिक जीवन जीना – का पालन करने से हम आगे के लिए कम कर्म इकट्ठे करते हैं। हालाँकि, सिर्फ़ इन उसूलों का पालन करने से न तो हमारे संचित कर्मों का विशाल भंडार समाप्त हो सकता है और न ही हमारी आत्मा जन्म और मृत्यु के कभी न समाप्त होनेवाले चक्र से आज़ाद हो सकती है। पुण्य कर्म भी हमें कर्मों के जाल से मुक्त नहीं कर सकते। सच्ची मुक्ति चौथे उसूल का पालन करने पर निर्भर है: पूरी निष्ठा के साथ पूर्ण देहधारी सतगुरु द्वारा सिखाए गए रूहानी अभ्यास को रोज़ाना करना।
भजन-सिमरन के दौरान, आत्मा ‘शब्द’ से जुड़ जाती है और यही वह शक्ति है जो कर्मों के बंधनों से मुक्त करती है। यद्यपि नैतिक आचरण ही हर रूहानी साधना की नींव होता है लेकिन सिर्फ़ ‘शब्द’ ही कर्मों के बोझ को समाप्त कर सकता है और कर्मों, प्रतिक्रियाओं और उनके परिणाम के चक्र को ख़त्म कर सकता है। गुरु नानक देव जी ने अपनी बानी में इस बात को स्पष्ट किया है और साथ ही फ़रमाया है कि सिर्फ़ नाम ही कर्मों की मैल को धो सकता है, साथ ही मन पर पड़े गहरे संस्कारों और इच्छाओं रूपी बीजों का नाश कर सकता है:
भरीऐ हथ पैर तन देह॥ पाणी धोतै उतरस खेह॥
मूत पलीती कपड़ होए॥ दे साबूण लईऐ ओह धोए॥
भरीऐ मत पापा कै संग॥ ओह धोपै नावै कै रंग॥
नाम सिद्धान्त
भले ही आत्मा की मुक्ति के लिए भजन-सिमरन ज़रूरी है लेकिन मीराबाई का पद एक बहुत गहरे रूहानी सत्य को प्रकट करता है: इनसान चाहे कितनी भी लगन से कोशिश क्यों न करे, परमात्मा की दया-मेहर के बिना कर्मों के जाल से छुटकारा पाना संभव नहीं है। जहाँ रूहानी अभ्यास मन को निर्मल करता है और कर्म के बंधनों को क्षीण करता है, वहीं मीराबाई की यह विनती “दूर तुं कर किर्तार,” परमात्मा की दया-मेहर के बिना इंसानी कोशिशों की निरर्थकता को दर्शाती है। अत: आत्मा के सफ़र के दो पहलू हैं। हालाँकि आत्मा ही अपने बंधन (कर्म के ज़रिए) का कारण है और यही अपनी मुक्ति (भजन-सिमरन के ज़रिए) की चाहत भी रखती है लेकिन यह मुक्ति भक्ति-भाव और दया-मेहर दोनों पर निर्भर है।
रूहानी अभ्यास द्वारा आत्मा की मुक्ति प्राप्त करने की चाहत बढ़ती जाती है और परमात्मा की दया-मेहर इसे पूरा करती है। आत्मा को कर्मों के बंधन से सदा के लिए मुक्ति सिर्फ़ चाहने या नेक आचरण से नहीं बल्कि रूहानी अभ्यास द्वारा परमात्मा की पहचान करने पर प्राप्त होती है। मीराबाई की प्रार्थना इन दोनों के संयोग को दर्शाती है: भक्ति उसके अंदर और अधिक तड़प पैदा करती है फिर भी उसकी मुक्ति परमपिता परमात्मा के हाथों में है। कोशिश और दया-मेहर के संयोग से चौरासी का पहिया घूमना बंद हो जाता है और आत्मा अंत में कर्मों की ज़ंजीरों से आज़ाद होकर रूहानी चढ़ाई करती हुई शाश्वत मुक्ति प्राप्त कर लेती है।