सेवा – प्रेरणा और नज़रिया
‘सेवा’ संस्कृत भाषा का शब्द है जिसका मतलब है ‘निस्स्वार्थ सेवा’ या ‘निष्काम कर्म’। सत्संगी होने के नाते, हमारी मुख्य सेवा हर रोज़ भजन-सिमरन के अभ्यास द्वारा सुरत की सेवा करना है। महाराज चरन सिंह जी अपनी पुस्तक संत संवाद, भाग 3 में समझाते हैं कि भजन-सिमरन को अपनी आत्मा और परमात्मा दोनों की सेवा क्यों कहा जाता है:
सेवा का मतलब है किसी की सेवा करना, इसलिये हम अपनी ही सेवा कर रहे हैं। यह आत्मा की सेवा है। …अभी हमें इस बात का ज्ञान नहीं कि हमारी असली हस्ती आत्मा है। हम सोचते हैं कि हमारी असली हस्ती हौंमैं, शरीर और मन है। आत्मा ही हमारा असल है, शरीर या हौंमैं नहीं, इस सत्य का ज्ञान होना भी सेवा है। …दरअसल यह आत्मा की सेवा है। हम एक तरह से अपने आप पर तरस खा रहे हैं, अपनी आत्मा पर तरस खा रहे हैं।
चूँकि अंत में आत्मा को परमपिता परमात्मा का ही रूप बनना है, इसलिये इसे परमात्मा की सेवा कहा जाता है।
जैसे बाहरी तौर पर संगत की सेवा करना सतगुरु की सेवा करना है, वैसे ही भजन-सिमरन के ज़रिए अपनी आत्मा की सेवा करना परमात्मा की सेवा करना है। जब हमें नामदान मिला था तब हमने यह वायदा किया था कि हम हर रोज़ ढाई घंटे भजन-सिमरन को देंगे। यह एक वायदा है जिसे निभाने की उम्मीद सतगुरु हमसे करते हैं। अगर हम सचमुच रूहानी सफ़र तय करके जन्म-मरण के चक्र से हमेशा के लिए मुक्ति पाना चाहते हैं तो इस वायदे को पूरा करने के अलावा कोई रास्ता नहीं है। असल में, संत-महात्माओं ने समझाया है कि अपने सतगुरु के लिए प्यार ज़ाहिर करने का हर रोज़ भजन-सिमरन करने से बेहतर कोई ज़रिया नहीं है।
हालाँकि भजन-सिमरन सतगुरु की सेवा करने का सबसे अच्छा तरीक़ा है लेकिन संत-महात्मा हमें नसीहत देते हैं कि हमें रोज़ाना भजन-सिमरन को समय देते हुए हद को पार नहीं करना चाहिए। इसके बजाय, हम अपना ख़ाली समय तन की सेवा में लगा सकते हैं जैसा कि नीचे दिए गए उद्धरण में बताया गया है, जिसका दोहरा फ़ायदा यह होता है कि इससे सतगुरु के लिए हमारा प्यार और ज़्यादा गहरा होता है तथा भजन-सिमरन भी बेहतर होता है:
असलियत यह है कि हम सारा दिन तो भजन-सिमरन कर नहीं सकते, और अपने रोज़मर्रा के कामकाज के बावजूद हमारे पास काफ़ी समय भी बच जाता है। उस वक़्त सेवा इस प्रेम को और अधिक सींचने का ज़रिया बनती है, जिससे दिन भर उस प्रेम के माहौल में रहने में मदद मिलती है; और इससे अगले दिन भजन-सिमरन में मदद मिलती है।
सेवा
सतगुरु के लिए हमारा प्यार और उनकी सेवा करने की इच्छा हमें तन की सेवा करने के मौके ढूँढ़ने के लिए प्रेरित करती है। हम अपने सत्संग-घर में फ़र्श धोकर हर हफ़्ते होने वाले सत्संग की तैयारी में मदद कर सकते हैं, संगत के लिए यातायात की व्यवस्था कर सकते हैं ताकि वे सतगुरु द्वारा दिए जानेवाले सत्संग प्रोग्राम में शामिल हो सकें या ट्रैफ़िक का संचालन कर सकते हैं। प्यार हमें सेवा करने के लिए प्रेरित कर सकता है लेकिन हमें सावधान रहना चाहिए कि जो ज़िम्मेदारी हमें सौंपी गई है उसे निभाते हुए हमारे अंदर अहंकार न आ जाए। उदाहरण के लिए, हो सकता है कि हम यह सोचना शुरू कर दें कि संगत को हमारी निष्ठा और सेवा करने की क़ाबिलीयत से फ़ायदा हो रहा है। सेवा पुस्तक में दिया गया एक किस्सा बड़े सुंदर ढंग से दर्शाता है कि हम इतने भी महत्वपूर्ण नहीं हैं। सतगुरु के सत्संग कार्यक्रम के दौरान, एक सेवादार को प्रबंधकीय ज़िम्मेदारी को छोड़कर किसी दूसरे काम पर ध्यान देने के लिए कहा गया। उसने ऐसा ही किया:
…लेकिन वह सारे समय यही सोचता रहा कि वहाँ सेवा पर उसकी ज़रूरत थी। उस काम से फ़ारिग होकर जब वह पुरानी जगह वापस पहुँचा जहाँ वह सेवा छोड़कर गया था, तो उसने देखा कि वहाँ पौधा लगा एक गमला रखा हुआ था… तब उसे अहसास हुआ कि सेवा में उसकी क्या हैसियत है: सतगुरु तो गमले से भी अपना काम करवा सकते हैं।
ऐसी छोटी-छोटी घटनाओं से, हम अहं-भाव को छोड़ना सीखते हैं और हमें एहसास होता है कि सच्ची सेवा सिर्फ़ सतगुरु के हुक्म से होती है। महाराज सावन सिंह जी पुस्तक प्रभात का प्रकाश में, हमें ऐसी सोच बनाने के लिए प्रेरित करते हैं कि हम सिर्फ़ परमात्मा के हाथों की कठपुतलियाँ हैं और सेवा वही कर रहा है – हम नहीं:
जितनी सहायता आप औरों की करेंगे, उतना ही अच्छा है। लेकिन यह ध्यान रखना चाहिये कि यह कार्य सतगुरु की सेवा समझ कर किया जाये और इसके बारे में अपने मन में लेश-मात्र भी अहंकार पैदा नहीं होने दिया जाये। यही सोचें कि जो कुछ किया जा रहा है वह सतगुरु कर रहा है, हम नहीं।
जैसा कि महाराज सावन सिंह जी फ़रमाते हैं कि सेवा हम नहीं करते बल्कि सेवा तो सतगुरु करवाते हैं। चूँकि सेवा का मक़सद अपने अहंकार को ख़त्म करना है, जबकि विडम्बना यह है कि अगर हम यह मानने लग जाएँ कि हमारी सेवा किसी और की सेवा से ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है तो इसका विपरीत असर हो सकता है। सतगुरु इस बात पर ज़ोर देते हैं कि सभी सेवाओं का महत्त्व समान है; एक तरह की सेवा दूसरी से ज़्यादा महत्त्वपूर्ण नहीं होती। इसलिए, विनम्रता से सेवा करने का एक तरीक़ा यह है कि सेवा करते समय सतगुरु के स्वरूप का ध्यान करते हुए या सिमरन करते हुए उन्हें लगातार याद करते रहें।
अपने अहंकार को धीरे-धीरे ख़त्म करने के साथ-साथ, सेवा हमारे अंदर ऐसे गुण पैदा करती है जो सिर्फ़ दूसरों के साथ काम करके ही विकसित किए जा सकते हैं: दया, करुणा, सहनशीलता और प्यार। जैसा कि फ़ारसी कवि मौलाना रूम ने ‘मसनवी’ में कहा है, अगर हर मुश्किल हमें निराश कर दे, तो हम अपना आईना कैसे चमकाएँगे? यह सोचकर सेवा करना बिलकुल गलत है कि नतीजा सबसे ज़्यादा अहम है। काम के प्रति जुनून इस हद तक बढ़ सकता है कि जब चीज़ें हमारी योजना के अनुसार नहीं होतीं तब हम दूसरे सेवादारों से निराश हो सकते हैं। हालाँकि, हमारी सेवा से किसी को तकलीफ़ नहीं पहुँचनी चाहिए; अगर हम अपने शब्दों या करनी से दूसरों को दु:ख पहुँचाते हैं तो हम यह समझ ही नहीं पाए हैं कि असल में सेवा किसे कहते हैं। दूसरों के साथ सेवा करके, हम धीरे-धीरे अपनी हौंमैं – घमंड, अभिमान और लगाव – से छुटकारा पा लेते हैं, जिससे हमारा हृदय रूपी आईना प्यार और करुणा से चमकने लगता है।
इस लेख की शुरुआत हमने इस कथन से की थी कि सेवा का मतलब है ‘निस्स्वार्थ सेवा’ या ‘निष्काम कर्म’ और संतमत में, हमारी मुख्य सेवा हर रोज़ भजन-सिमरन द्वारा सुरत की सेवा करना है। अलग-अलग तरह की बाहरी सेवा में हमारी ओर से दिए गए योगदान से संगत को लाभ प्राप्त हो सकता है, लेकिन मुख्य रूप से इसमें हमारा ही भला होता है। सेवा धीरे-धीरे हमारे अहं-भाव को कम करती है क्योंकि सेवा में हम अपने आप को सर्वोत्तम समझे बिना, अगुआई किए बिना या अपनी मर्ज़ी दूसरों पर थोपे बिना दूसरों के साथ मिल-जुलकर काम करना सीखते हैं। यह सब इस संसार में हमारे काम करने के ढंग के बिलकुल विपरीत है। जैसे-जैसे हम सत्संगी साथियों के साथ ज़्यादा सेवा करते हैं वैसे-वैसे हम इस स्थूल जगत से बेलाग होने लग जाते हैं। इससे हमारा ध्यान रूहानियत की तरफ़ हो जाता है और यह ‘ख़ुदी’ को भूलने में हमारी मदद करता है। बिना कोई उम्मीद रखे हम जितनी ज़्यादा सेवा करते हैं, असल में उतना ही ज़्यादा हमें इसमें आनंद आने लगता है।
इस सब से हमें प्रेरणा मिलती है कि तन की सेवा क्यों करनी है। पर अगर हम गहराई से सोचें तो इस सबके पीछे एक ही कारण है जो आख़िरकार सभी रुकावटों और चुनौतियों से ऊपर है और वह है: सतगुरु के लिए हमारा प्यार और उनकी सेवा करने की हमारी इच्छा। सतगुरु से प्यार करने का मतलब है उनकी संगति में रहने और अपने आप को उन्हें समर्पित कर देने की इच्छा। ‘आदि ग्रंथ’ में दर्ज गुरु अमरदास जी के शब्दों में:
तनु मनु धनु सभु सउपि गुर कउ हुकमि मंनिऐ पाईऐ॥