बसंत का वायदा
फागुन के दिन चार रे, होरी खेल मना रे॥
बिन करताल पखाबज बाजै, अनहद की झनकार रे।
बिनि सुर राग छतीसूँ गावै, रोम रोम रणकार रे॥
सील सँतोख की केसर घोली, प्रेम प्रीत पिचकार रे।
उड़त गुलाल लाल भयो अंबर, बरसत रंग अपार रे॥
घट के पट सब खोल दिये हैं, लोक लाज सब डार रे।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, चरण कँवल बलिहार रे॥
मीरा: प्रेम दीवानी
सदियों से संत-महात्माओं ने बसंत ऋतु को रूहानी आनंद से जोड़ा है। रूमी और हाफ़िज़ जैसे सूफ़ी क़ामिल दरवेशों के क़लाम में बाग़ के फूलों का वर्णन मिलता है जो आवाज़ देकर एक-दूसरे को पुकारते हैं। ख़ुशी के इस इज़हार से संकेत मिलता है कि जब मन और आत्मा आंतरिक आनंद का अनुभव करते हैं तो कैसा महसूस होता होगा। ऊपर दी गई बानी में, मीराबाई हिंदुस्तान में मनाए जानेवाले होली के त्योहार के साथ इस आंतरिक आनंद की तुलना करती हैं, जब परिवार और सगे-संबंधी हर्षोल्लास से एक-दूसरे पर रंग डालकर इस उत्सव को मनाते हैं।
बसंत ऋतु रूहानी तौर पर जागृत होने का सुन्दर उदाहरण है क्योंकि यह ख़ुशनुमा बदलाव का – शीतकाल के अंधेरे से नए जीवन में प्रवेश का समय है। सूर्य की खिली हुई धूप में उछल-कूद कर रहे नन्हें जानवरों, पेड़ों पर खिलती हुईं कोमल कलियों और धरती से बाहर निकलने की कोशिश करती हरी-हरी कोंपलों की कल्पना करें।
हम जानते हैं कि जन्म से संबंधित ये पीड़ाएँ जीवन की संपूर्ण यात्रा का एक ज़रूरी हिस्सा हैं जो हमें ये याद दिलाती हैं कि विकास और नवीनीकरण के लिए अकसर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। हालाँकि, सर्दी के उन अंधकारपूर्ण दिनों के साथ स्वाभाविक रूप से नई शुरुआत का उत्साह आता है, जब जीवन फिर से पनपना शुरू होता है। 20वीं सदी के कवि टी. एस. इलियट ने अपनी कविता‘द वेस्टलैंड’ में लिखा है, “अप्रैल का महीना सबसे निर्दयी है जो बंजर भूमि से सिरिंगा के फूल पैदा करता है।”
अप्रैल के महीने को निर्दयी क्यों कहा गया है? शायद इसलिए क्योंकि इसमें हर तरह के कायाकल्प और बदलाव की पीड़ा छिपी है। मौसम के बदलाव की शुरुआत सर्दी की समाप्ति पर होती है। पौधों से पत्ते झड़ जाते हैं, उनकी जीवनदायी शक्ति कम हो जाती है और वे सिकुड़कर ज़मीन पर गिर जाते हैं। यह प्रक्रिया अपने आप में पीड़ादायक है। इसी तरह, जब हम रूहानी जीवन-शैली को अपनाने का प्रण लेते हैं तो हमें आख़िरकार मनमर्ज़ी का जीवन त्यागना ही पड़ता है। इस संदर्भ में, महाराज चरन सिंह जी पुस्तक जीवत मरिए भवजल तरिए में फ़रमाते हैं:
इस राह पर चलना आसान नहीं है। अपनी मंज़िल पर पहुँचने के लिए हमें अपने जीवन में बहुत कुछ छोड़ना पड़ता है। आपको अपने मन से हमेशा सावधान रहना पड़ता है, मानों आप तलवार की धार पर चल रहे हों। …संतमत पर चलने के लिए पूरी तरह बदलने की ज़रूरत होती है, इसलिए यह आसान नहीं है।
सबसे पहला बदलाव यह आता है कि इंद्रियों के अधीन रहनेवाला अहंकारी व्यक्ति सांसारिक लगाव को त्याग देता है। संत-महात्मा समझाते हैं कि हमें ‘दिल का हुजरा साफ़ करना’ है यानी हमें अपने हृदय को ख़ाली करना है ताकि सतगुरु के प्रेम के लिए जगह बन सके जो हमें परमात्मा का अनुभव करवाते हैं। हृदय की यह सफ़ाई एक पीड़ादायक प्रक्रिया है जिस तरह सर्दी का मौसम। रूहानी प्रेम का जागृत होना भी उतना ही पीड़ादायक है जितना बसंत ऋतु के आने से पहले की हलचल। इस बात को जान लेना कि हम अपनी पुरानी नीरस ज़िंदगी से कुछ बेहतर पाना चाहते हैं – यानी कि हमने कुछ बेहतर देखा और महसूस किया है पर अभी कुछ समय के लिए उसे फिर से खो दिया है – प्रेम की यह कसक भी कष्टदायक है। महाराज चरन सिंह जी, पुस्तक जीवत मरिए भवजल तरिए के उसी प्रसंग में फ़रमाते हैं: “और फिर प्रभु की प्रीति और भक्ति प्राप्त करना, उसके मिलाप के लिए तड़पना, कोई सुखदायी बात नहीं है।”
आप जिज्ञासुओं को समझाते हैं कि इस सबके दौरान, “हमें साहस के साथ संघर्ष करते रहना चाहिए।” इसका मतलब है कि हमें साहस से अपनी इंद्रियों के दमन और बेहतर भविष्य के मार्ग में आनेवाली चुनौतियों को स्वीकार करना चाहिए। जिस सुख और पूर्णता की प्राप्ति की तलाश में हम निकले हैं वह तभी पूरी होगी जब हम अपने मन पर क़ाबू पा लेंगे और इसके लिए हमें अपने मन को भजन-सिमरन में लगाने के लिए संघर्ष करना पड़ेगा। पूर्ण सतगुरु का मिलाप और उनसे नामदान प्राप्त होना हमारे जीवन के बेहद अहम मोड़ हैं। सतगुरु हमें एक ऐसी सरल युक्ति बताते हैं जिसे आठ साल का बच्चा या अस्सी साल का बुज़ुर्ग भी अपना सकता है और साथ ही वह हमें प्रेरणा देते हुए हमारा मार्गदर्शन भी करते हैं। महाराज चरन सिंह जी फ़रमाते हैं, “हमें मन को एकाग्र करने की आदत डाल लेनी चाहिए… धीरे-धीरे हम इसमें सफल होंगे।” जब भजन-सिमरन में आनंद महसूस होने लगे तो यह हमारी सफलता की शुरुआत है। उस समय ऐसा लगता है मानो बसंत ऋतु आने ही वाली है।
सिमरन
महाराज चरन सिंह जी जिस एकाग्रता की बात करते हैं वह सिमरन के ज़रिए आती है। यह दो तरह से होता है: नामदान के समय, हमने हर रोज़ ढाई घंटे भजन-सिमरन करने का वायदा किया था इसलिए अनुशासन में रहकर जीवन जीने का मतलब है कि भजन-सिमरन नियमित रूप से हमारी दिनचर्या का हिस्सा होगा। दूसरा, भजन-बंदगी की प्रक्रिया सिमरन पर आधारित है। पहले दो घंटों में हम पाँच पवित्र नामों (सिमरन) को दोहराते हुए अपने इधर-उधर भटकते विचारों को शांत करने और अपने मन को तीसरे तिल पर एकाग्र करने की कोशिश करते हैं। अंधेरे में देखते हुए, हम सतगुरु के स्वरूप का ध्यान करने की कोशिश करते हैं। सतगुरु इसे प्रेम और श्रद्धा के साथ करने की नसीहत देते हैं। सिमरन इंजन के समान है, मगर प्रेम और श्रद्धा-भाव से किया गया अभ्यास ईंधन है। यह ईंधन दुर्लभ है – भजन-बंदगी करना नीरस और निष्फल लग सकता है और मन पहले ही बाग़ी है। इसलिए दिन में सिमरन करना – जब हम अपनी दिनचर्या में व्यस्त होते हैं – मन को क़ाबू में करने की कुंजी है; इससे धीरे-धीरे एकाग्रता बढ़ने लगती है। फिर हमें भजन-सिमरन में आनंद आने लगता है।
सिमरन – जिसमें हम अपने मन को तीसरे तिल पर एकाग्र करते हैं – के बाद हम शब्द-धुन (भजन) को सुनने की कोशिश करते हैं। मीराबाई कहती हैं, “बिन करताल पखाबज बाजै, अनहद की झनकार रे।” आप ‘शब्द’ – एक ऐसी जीवनदायी धारा जो धुन के रूप में सुनाई देती है और प्रकाश के रूप में दिखाई देती है – को सुनने का वर्णन इस ढंग से करती हैं। ‘शब्द’ के साथ जुड़ने का प्रभाव इतना गहरा होता है कि जो साधक इसकी अद्भुत सुरीली धुनों को सुनते हुए इसमें लीन हो जाते हैं वे ख़ुद-ब-ख़ुद तानाशाह मन और उसकी नकारात्मक प्रवृत्तियों से मुक्त हो जाते हैं जिससे उनमें सभी सद्गुण सहज ही प्रकट होने लगते हैं। मीराबाई फ़रमाती हैं कि ये गुण उसके प्यार की तरंगों पर इस तरह उभर कर आते हैं जिस तरह होली के त्योहार पर हवा में उड़ते हुए रंग।
सील सँतोख की केसर घोली, प्रेम प्रीत पिचकार रे।
महाराज चरन सिंह जी अपने शिष्यों को रूहानी तरक़्क़ी द्वारा आनेवाले ज़बरदस्त बदलाव का यक़ीन दिलाते हुए फ़रमाते हैं कि सच्चे दिल से मेहनत करनेवाले शिष्य में निश्चित रूप से ये गुण “दूध के ऊपर मलाई की तरह” आ जाएँगे। नम्रता, संतोष जैसे गुणों को धारण करने के लिए संघर्ष कर रहे सत्संगियों के सवालों के जवाब में महाराज जी ने उन्हें यह दिलासा दिया। हुज़ूर महाराज जी ने यह संदेश दिया कि हालाँकि हमें अपनी तरफ़ से मन को क़ाबू में करने के लिए पूरा प्रयास करना चाहिए पर मन वास्तव में तभी वश में आता है जब यह शब्द की दिव्य शक्ति से जुड़ जाता है। असल में, तीसरे तिल पर शब्द-धुन के प्रकट होने से पहले ही, अगर हम नामदान के समय दी गई हिदायतों के अनुसार पूरी ईमानदारी से भजन-सिमरन करते हैं तो महाराज चरन सिंह जी हमें यह याद दिलाते हैं:
आपको चाहे अंतर में अनुभव न हों पर आप भजन का प्रभाव अवश्य महसूस करेंगे। आप अपने अंदर आनंद, ख़ुशी और संतोष का अनुभव करेंगे और आपका जीवन के प्रति पूरा दृष्टिकोण ही बदल जायेगा।
ये शब्द हम सब निर्बल जीवों के लिए प्रेरणादायक हैं जो अभी तक इस दुनिया के कीचड़ में धँसे हुए हैं और हर रोज़ ढाई घंटे भजन-बंदगी करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यदि हम शिद्दत और लगन से भजन-सिमरन को पूरा समय दें तो आख़िरकार हम आकाश को रोशन होते हुए देखेंगे और बसंत ऋतु की हवा के झोंके महसूस करने लगेंगे।