स्थिरता की मिठास
हमारे दिन अकसर एक घिसी-पिटी कहानी की तरह बीतते हैं। हम ख़ुद को वही नीरस दिनचर्या दोहराते हुए और मशीन की तरह अपने दायित्वों को पूरा करते हुए पाते हैं। हमारी ज़िम्मेदारियाँ और ध्यान भटकाने वाली चीज़ें चारों ओर से हमें घेरे रहती हैं, हमारे कार्यों की सूची व सोशल मीडिया सर्फ़िग का अंतहीन चक्र चलता रहता है और हम सफलता व सांसारिक समृद्धि के लिए अथक प्रयास करते रहते हैं। हम भूलवश यह मान लेते हैं कि ये सब काम हमें ख़ुशी और संतुष्टि देंगे जबकि इसके विपरीत, ये सिर्फ़ हमारे ख़ालीपन को बढ़ाते हैं।
लेकिन इस अथक प्रयास के पीछे एक गूढ़ सच छिपा है: पूर्ण संतुष्टि बाहरी दुनिया में नहीं बल्कि हमारे भीतर ही है जिसे खोजना चाहिए। कल्पना कीजिए कि जीवन चाय का एक प्याला है जिसमें चीनी तो डाल दी गई है लेकिन उसे मिलाया नहीं गया है, इसलिए उसकी मिठास नीचे ही रह जाती है। हम जल्दबाज़ी और समय सीमा के दबाव में चाय को गटक जाते हैं और प्याले में नीचे पड़ी मिठास का स्वाद लेने के लिए कुछ पल भी नहीं निकालते। चाय की कड़वाहट के कारण हम सोचते हैं कि दुनिया खोखली क्यों लगती है और उपचार पास होने के बावजूद हम उससे बेख़बर रहते हैं।
जैसे चम्मच चाय में मिठास घोलता है, वैसे ही भजन-सिमरन वह ज़रिया है जिससे धीरे-धीरे भीतर छिपी मिठास का अनुभव होने लगता है जिससे स्पष्टता, शांति और जीने का मक़सद मिल जाता है। भजन-सिमरन के बिना, हम जीवन को मशीनी ढंग से जीते रहते हैं और अपने असल स्वरूप को जानने से मिलनेवाली मिठास और अपार आनंद से बेख़बर रह जाते हैं।
लेकिन अकसर समाज की चकाचौंध भरी चीज़ों के लालच में आकर, हम ट्रेंड (trends) के पीछे भागते हैं, जानकारियों और झूठी प्रशंसा को असलियत समझने की भूल कर बैठते हैं। असल में ये मन को भटकानेवाले चोर हैं जो हमारे मुख्य कर्त्तव्य – आत्म-साक्षात्कार – की ओर हमारा ध्यान नहीं जाने देते। इनका छल हमें यह विश्वास दिलाता है कि हमें और अधिक चाहिए, हमें और क़ामयाब होना है, और अधिक हासिल करना है। भजन-सिमरन में सहायक सिद्ध होनेवाले कार्यों द्वारा ही हम जीवन में संतुलन बना सकते हैं; तभी हम इस मिठास का आनंद ले सकते हैं।
लेकिन हम अपने जीवन में दृढ़तापूर्वक यह बदलाव कैसे ला सकते हैं और जीवन की मिठास का अनुभव कैसे कर सकते हैं? उत्तर सरल है: अनुशासन। अनुशासन कोई बोझ नहीं है; यह ख़ुद से प्रेम करने का सबसे बढ़िया तरीक़ा है। जब संसार आपके ध्यान को अपनी ओर खींचने की पूरी कोशिश करता है उस समय भजन-सिमरन में स्थिर होकर बैठने का फ़ैसला लेना अनुशासन है। इसका अर्थ है ध्यान भटकानेवाली नश्वर चीज़ों के बजाय भजन-सिमरन को प्राथमिकता देना और तुच्छ चीज़ों को ‘न’ कहने का साहस रखना ताकि हम अलौकिक सत्य को ‘हाँ’ कह सकें। भजन-सिमरन में अनुशासन का अर्थ सब कुछ त्याग देना नहीं है; इसका अर्थ है प्रेम की ख़ातिर ख़ुद को समर्पित कर देना। जब संसार हमें अपनी ओर खींचने की निरंतर कोशिश करता है तब अनुशासन द्वारा ही हम अपने सर्वोच्च उद्देश्य की प्राप्ति के लिए करनी कर पाते हैं ताकि हम अस्थायी रोमांच के बजाय स्थायी शांति प्राप्त कर सकें।
अनुशासित होने के लिए, व्यक्ति को वर्तमान पल के महत्त्व को समझना चाहिए। हालाँकि, अब वर्तमान में रहने की कला आसानी से नहीं आ जाती। हम एक साथ कई काम करने (मल्टी-टास्किंग) के इतने आदी हो गए हैं कि एक ही कार्य पर ध्यान केंद्रित करने की हमारी क्षमता कम हो गई है। दुनिया हमेशा अपनी ज़रूरतों की पूर्ति के लिए हमें अपनी ओर खींचती रहेगी, लेकिन सांसारिक कर्त्तव्यों और रूहानी दायित्व के बीच संतुलन बनाए रखना संभव ही नहीं बल्कि आवश्यक भी है। अनुशासन द्वारा ही हम अपनी करनी को अपने सर्वोच्च उद्देश्य के अनुरूप ढाल सकते हैं।
हमारे रूहानी सफ़र में न तो ज्ञान और न ही इच्छा बल्कि नियमित रूप से और सच्चे दिल से किया गया रूहानी अभ्यास ही सबसे अमूल्य दौलत है। धन-संपत्ति नाशवान है और समय बीत जाता है। केवल भक्ति ही हमें अविनाशी परमात्मा तक ले जाती है। भजन-सिमरन हमारा सहारा है; इसी के ज़रिए हम काश ऐसा होता, काश वैसा होता की कश्मकश से मुक्त होते हैं और हमें एहसास होता है कि बकबक करनेवाला मन हमारी असलियत नहीं बल्कि उससे परे की शांति है। जैसे आकाश का प्रतिबिंब शांत तालाब में दिखाई देता है वैसे ही मन पूरी तरह स्थिर होने पर आत्मा अपने सबसे गहरे सत्य का साक्षात अनुभव करती है। इस स्थिरता में, हमें ऐसी मिठास का अनुभव होता है जो अस्थायी सुखों से परे है – ऐसी मिठास जो हमारी आत्मा को पोषित करती है और परमात्मा की प्राप्ति के हमारे सर्वोच्च उद्देश्य को पूरा करती है। भजन-सिमरन द्वारा हमारा परमात्मा से गहरा नाता जुड़ जाता है और हमें जीवन को अधिक स्पष्टता और उद्देश्यपूर्ण ढंग से जीने के लिए अंतर्दृष्टि और मार्गदर्शन प्राप्त हो जाता है।
हमारे सतगुरु हमसे बस यही अपेक्षा रखते हैं कि हम अपनी तरफ़ से नियमपूर्वक भजन-सिमरन करने की पूरी कोशिश करें। हो सकता है कि हमें अभी आत्मज्ञान की प्राप्ति न हो, लेकिन हमें हर रोज़ ध्यान को एकाग्र करने की कोशिश करनी चाहिए ताकि हम भजन-सिमरन की मिठास को अनुभव कर सकें। भजन-सिमरन करने से हम अपने सतगुरु के साथ किए वायदे का मान रखते हैं और परमात्मा से जुड़े रहते हैं। हम सीखते हैं कि परमात्मा हिसाब-किताब नहीं रखता बल्कि हमारी हर छोटी-बड़ी नाकामी को मंज़ूर कर लेता है। अहंकार बड़े-बड़े कार्यों को पूरा करना चाहता है जबकि आत्मा भरोसे के साथ किए गए छोटे-छोटे प्रयत्नों से सशक्त होती है जैसे: भोर से पहले भजन-सिमरन करना, सांसारिक ज़िम्मेदारियों को पूरा करते समय ख़ामोशी से प्रार्थना करना और प्रतिक्रिया देने से पहले थोड़ा-सा सोचना।
धीरे-धीरे कुछ है, जो बदल जाता है। जो मिठास दबी हुई थी, वह उभरने लगती है। आख़िरकार हमें यह एहसास होता है कि जिस आनंद के बारे में हम सोचते थे कि हमें कभी, कहीं मिलेगा, वह हमेशा से हमारे साथ ही था, उस शोर के नीचे दबा हुआ जिसे हम जीवन समझने की भूल कर रहे थे। तो चलिए, जहाँ हैं वहीं से शुरुआत करें। चलिए, प्याले को हिलाएँ और एक घूँट पिएँ। इस सरल कार्य में, हम अपने जन्मसिद्ध अधिकार को पुन: प्राप्त करते हैं: ज़िंदगी गुज़ारने के बजाय उसका आनंद लेना, मिठास के सुख के पीछे न भागकर स्वयं उसी का रूप बन जाना।