एक नई जागरूकता
हे प्रीतम! तेरे अलौकिक सौंदर्य
की कहानियाँ तो बहुत सुनी हैं,
पर अब जब अपने अंदर तेरा दीदार हुआ,
तो पाया कि तू वास्तव में
इन वर्णनों से हज़ार गुणा बढ़कर है।
ख़्वाजा हाफ़िज़
सतगुरु नामदान के समय साफ़-साफ़ समझा देते हैं कि सतगुरु का नूरी-स्वरूप सदा हमारे साथ है। यह मात्र एक कल्पना नहीं है बल्कि हम अभ्यास द्वारा स्वयं अपने अंतर में इस सच्चाई का प्रत्यक्ष अनुभव कर सकते हैं। हमारी अंतर्दृष्टि पर, आशंकाओं, मोह-ममता, विषय-वासनाओं, इच्छाओं-तृष्णाओं और भ्रमों की अनगिनत परतें चढ़ी हुई हैं, जिनके कारण इस सत्य का पता नहीं चलता।… सुमिरन द्वारा सुरत तीसरे तिल पर एकाग्र होती है और ध्यान द्वारा उसे वहाँ टिकाए रखने में सहायता मिलती है। नदी के बहाव के विरुद्ध तैरते समय हमें किसी चट्टान के सहारे की ज़रूरत पड़ती है ताकि उसे पकड़कर हम साँस ले सकें और अपनी मंज़िल तक पहुँचने के लिए फिर से बहाव के विपरीत तैरना जारी रख सकें। इसी प्रकार सुमिरन भी मन को पतन की ओर ले जानेवाली प्रवृत्तियों के विरुद्ध तैरने में हमारी सहायता करता है और ध्यान वह चट्टान है जिसका सहारा लेकर हम ऊपर की ओर तरक्की जारी रखते हैं।
आँखें बंद करने पर चाहे हमें अंदर अँधेरा ही दिखाई दे… इस अँधेरे में ही हमारे आंतरिक अभ्यास की शुरुआत होती है। जब ध्यान अँधेरे में पूरी तरह टिक जाए तो समझो हम घर की दहलीज़ पर पहुँच गए हैं। यही अमर जीवन की ओर खुलनेवाला दरवाज़ा है। फिर ज्यों-ज्यों सुमिरन करते हुए ध्यान अँधेरे में स्थिर होता जाता है, एकाग्रता धीरे-धीरे इतनी गहन हो जाती है कि आख़िर में हम आंतरिक साधना में इस हद तक लीन हो जाते हैं कि हमें शरीर की कोई सुध-बुध नहीं रहती। उस समय हमें अपनी चेतना के एक नए स्तर का आभास हो जाता है।
आँखें बंद करते ही जो अंधकारमय आकाश अंदर दिखायी देता है, वह सिनेमा के परदे के समान है। ध्यान के पूरी तरह एकाग्र और स्थिर होने पर इसी आंतरिक आकाश में तारा-मंडल, सूर्य-मंडल और चंद्र-मंडल प्रकट होते हैं और सतगुरु का नूरी-स्वरूप भी इसके अंदर ही प्रकट होता है। इसलिए यह अंधकार बहुत ज़रूरी है। हमें इससे डरना नहीं चाहिए बल्कि इसका स्वागत करते हुए इसमें प्रेमपूर्वक ध्यान टिकाना चाहिए। जब सुमिरन द्वारा एकाग्रता गहन हो जाती है तो निरत अपने आप ही जाग्रत हो जाती है और अंतर में अंधकार की जगह प्रकाश फैल जाएगा।
हउ जीवा नाम धिआए