एक दोस्त को लिखा पत्र
24 अक्तूबर, 1972
मैं अच्छी तरह समझ सकता हूँ कि तुम कितना अकेलापन महसूस कर रहे होगे।…पर अगर तुम दूसरे दृष्टिकोण से देखो तो तुम्हें ख़ुश होना चाहिए कि कम से कम तुम्हें अपने लिए समय तो मिलता है और तुम कुछ समय अपने साथ शांति और चैन से तो बिता सकते हो।
अकेले रहना एक दुर्लभ दात और मौक़ा है, ख़ासकर तब जब हम पारिवारिक जीवन के इतने आदी हो चुके हों। अकेले रहकर हम सोच-विचार कर सकते हैं, अपने अंदर झाँक सकते हैं। तब हम देख पाते हैं कि हमें बेकार ही अपने आसपास के लोगों से इतना लगाव है और कैसे हम अपने आप को धोखा देने की कोशिश करते हैं कि कोई हमारा है या हम किसी के हैं। इस बात का एहसास हो जाना कि हम अकेले हैं और इस दुनिया में हमारा कुछ भी नहीं है, एक बहुत बड़ा वरदान और परमात्मा की दया-मेहर है। फिर स्वाभाविक तौर पर हम इस अकेलेपन को दूर करने के लिए उससे मार्गदर्शन और सहायता माँगते हैं जो आख़िरकार हमारा लक्ष्य है।…
फिर भी मैं इतना भाग्यशाली नहीं हूँ कि मैं अकेला रह सकूँ क्योंकि मैं या तो सेवा के कार्यों में व्यस्त रहता हूँ या मित्रों और परिवार में। मुझे अपने फ़र्ज़ को अच्छी तरह से निभाना है और अपने आप में ख़ुश रहना है।… मैंने अपने आप को उस कर्तव्य और ध्येय के प्रति पूरी तरह से अर्पित कर दिया है जो मुझे सौंपा गया है और मैं उसे पूरा करने की हर संभव कोशिश कर रहा हूँ। मैं अपने सतगुरु का बहुत आभारी हूँ कि उन्होंने मुझे इतनी ताक़त बख़्शी है कि रोज़ की इस दिनचर्या का पालन कर सकूँ और प्रशासन संबंधी समस्याओं का सामना कर सकूँ।…
बेशक कभी-कभी एक पति और पिता होने की ज़िम्मेदारी मुझे अपनी पत्नी और बच्चों का ध्यान दिलाती है, लेकिन मैं जानता हूँ कि मैं अपने आप कुछ नहीं कर सकता, क्योंकि सब कुछ महाराज जी के हाथ में है।
महाराज चरन सिंह जी, अनमोल ख़ज़ाना (से उद्धरित)