सत्य क्या है?
जब मैं अपने लैपटॉप पर टाइप कर रही थी तो मुझे अपने फोन पर एक ई-मेल नोटिफिकेशन और फिर एक टेक्स्ट मैसेज की बीप सुनाई दी। उन्हें देखने के लिए मैंने फोन उठाया और फिर वापस अपने लैपटॉप स्क्रीन पर देखने लगी। थोड़ी देर बाद, ब्रेक लेने के लिए मैं सोशल मीडिया पर स्क्रॉल करने लगी। आधा घंटा कैसे बीत गया मुझे पता भी नहीं चला। जिन लोगों से मैं अपनी ज़िंदगी में कभी नहीं मिली, उनकी रील्स और कहानियों से ध्यान हटाकर जब मैंने ऊपर देखा तब मुझे एहसास हुआ कि मेरी छोटी बेटी मेरे बगल में बैठी थी और मुझे पता भी नहीं था।
हममें से ज़्यादातर लोग कभी न कभी ख़ुद को ऐसी ही स्थिति में पाते हैं। अजनबी लोगों की ज़िंदगियों को देखते हुए और काम करना छोड़कर उसी स्क्रीन पर मैसेज का जवाब देते हुए मेरा ध्यान अपनी ही बेटी पर नहीं गया। मैं वर्चुअल रियलिटी में इतना खो गई कि मुझे उस इनसान के साथ का एहसास ही न रहा जिससे मैं बेहद प्यार करती हूँ और जो बिलकुल मेरे बगल में बैठी थी।
जैसे-जैसे हमारी दुनिया तकनीकी उन्नति की ओर तेज़ी से बढ़ रही है, हम ख़ुद को ऐसी दुनिया में उलझा हुआ पाते हैं जो सच से कोसों दूर है। यहाँ तक कि इस लेख को लिखते समय भी, आर्टीफिशियल इंटेलिजेंस ने मदद की पेशकश की। अगर हम अपने सभी कार्यों, अपने काम-काज और जीवन में टेक्नोलॉजी की मदद लेने लगें तो हमारी रचनात्मकता, हमारी सोचने-समझने की शक्ति का क्या होगा? हमारे दिमाग का क्या होगा, जिसे सुकून और सकारात्मक प्रेरणा दोनों की ज़रूरत है? और हमारे अस्तित्व के सामाजिक पहलू का क्या होगा जो इनसानों से नाता जोड़ना चाहता है।
बेशक़, टेक्नोलॉजी के फ़ायदे, इसकी ज़रूरत और दूरगामी प्रभावों पर सवाल नहीं उठाए जा रहे। लेकिन इसे बदलाव कहें या क्रांति – इस सब के बीच ख़ुद से ये सवाल करते रहना ज़रूरी है कि सत्य क्या है?
हमारी रूहानी खोज भी आख़िर यही सवाल पूछती है। संत-महात्मा समझाते हैं कि हम भ्रम में जन्म लेते हैं, भ्रम में जीते हैं और भ्रम में ही मर जाते हैं। टेक्नोलॉजी और वर्चुअल रियलिटी को एक तरफ़ छोड़ दें तो भी हम सच्चाई से कोसों दूर हैं। लेकिन क्या हम सचमुच जीवन-भर माया की मीठी नींद में सोए रहना चाहते हैं, अपने असल मक़सद और अपने असल स्वरूप से बेख़बर रहकर सपनों को सच समझने की भूल करना चाहते हैं?
हमारे अंदर सत्य के लिए जो तड़प है, वह दरअसल हमारी आत्मा की अपने मूल स्रोत को जानने की तड़प है। सिर्फ़ भजन-सिमरन द्वारा ही हम उस सत्य को जान सकते हैं। संत-महात्मा समझाते हैं कि हर चीज़ भ्रम है। केवल ‘शब्द’ ही सत्य है।
संत-महात्मा हमें समझाते हैं कि यह दुनिया, हमारे रिश्ते-नाते और यह शरीर जिसे हम इतना प्यार करते हैं सत्य की अनुभूति और परछाईं-मात्र है। ‘शब्द’ ही असल सत्य है। यह परमात्मा की वह शक्ति है जो इस सृष्टि के कण-कण में समाई हुई है, जो इस पूरी सृष्टि को चलाती है और इसकी सँभाल करती है। दुविधा और विडंबना यह है कि भले ही शब्द सभी चीज़ों का सार है पर हम माया में इतने उलझे हुए हैं कि हमें इसका एहसास ही नहीं होता।
माया क्या है? जो सत्य प्रतीत होती है पर सत्य होती नहीं है। यह सिर्फ़ सत्य पर पड़ा पर्दा है या उसकी परछाईं है। माया के इसी पर्दे की वजह से हम परिवर्तन और जुदाई का अनुभव करते हैं। हम अब वैसे नहीं हैं जैसे हम बचपन में थे और जैसे-जैसे हम बूढ़े होंगे हम अब जैसे नहीं रहेंगे और एक दिन हम मर जाएँगे। हमारे आस-पास की दुनिया हर पल बदलती है।
इसके विपरीत सत्य स्थायी, अविनाशी और पूर्ण है। हम इसी की खोज में हैं।
दाओ दे जिंग में हम इस सत्य – उस ऊर्जा या परमात्मा के शब्द के बारे में पढ़ते हैं जो सबमें व्याप्त है, जिसे प्राचीन चीनी संत ‘दाओ’ कहते थे:
दाओ छिपा हुआ है, अनामी है।
दाओ ही एकमात्र दाता है।
एक बार प्राप्त हो जाने पर यह अनन्त काल के लिए पर्याप्त है।
सतगुरु हमें इसी सत्य के बारे में समझाते हैं; दरअसल वह लगातार हमारे ध्यान को इस ओर खींचते हैं। वह हमें समझाते हैं कि ज़िंदगी के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को समझते हुए यह फ़ैसला हमें करना है कि हमने अपने ध्यान को कहाँ लगाना है और मिली हुई साँसों की पूंजी को कहाँ ख़र्च करना है। क्या हम इस माया में और गहरे डूबना चाहेंगे या फिर हम सजग होकर सत्य तक पहुँचना चाहेंगे?
तुम ते सेव तुम ते जप तापा तुम ते ततु पछानिओ॥
गुरु अर्जुन देव जी, आदि ग्रंथ