एक वृद्ध सेवादार का क़बूल करना
हममें से कुछ लोगों का सेवा के प्रति मिला-जुला दृष्टिकोण है। हम सेवा करना चाहते हैं लेकिन कभी-कभी हममें वैसा उत्साह नहीं होता जैसा जवानी में हुआ करता था। बेशक़ अहंकारी व्यक्ति के लिए सेवा करना मुश्किल होता है लेकिन अगर आप उम्र के एक ख़ास पड़ाव पर हैं तो यह शारीरिक तौर पर भी मुश्किल हो सकता है। हम में से कुछ लोग जो दशकों से सेवा कर रहे हैं, साठ या सत्तर साल की उम्र में शारीरिक रूप से थकने लगते हैं और युवा सेवादारों को सेवा करते देखकर उन्हें हैरानी होने लगती है। उन्हें अपने वे दिन याद आ जाते हैं जब वे भी पूरी रात सेवा करने के बाद अगले दिन बिना किसी परेशानी के काम-काज पर जाकर आराम से काम किया करते थे। प्यार, जोश और जवानी के बल पर वे कठिन से कठिन सेवा भी कर पाए।
अब वे देखते हैं कि उनसे युवा सेवादार कैसे सामान खींचते हैं, उसे उठाते हैं, हथौड़ा चलाते हैं, आरी चलाते हैं और आम तौर पर सुबह से शाम तक (या उसके बाद भी) इधर-उधर दौड़ते हुए सेवा में लगे रहते हैं। वे सेवादार कई दिनों तक कई-कई घंटे सेवा करने में सक्षम होते हैं। और आर. एस. एस. बी. की वेबसाइट पर उपलब्ध सेवा पर बनी फिल्मों में उन सभी वृद्ध सेवादारनियों की तो बात ही क्या, जो अत्यधिक गर्मी के मौसम में गर्म लोहों पर रोटियाँ बनाती हैं, सोलह साल की लड़कियों की तरह बैठकर रास्तों और सड़कों पर पड़े पत्ते बुहारती हैं या ख़ुशी-ख़ुशी और बेफ़िक्री से ईंटें तोड़ती हैं?
क्या हम वृद्ध लोग सिर्फ़ आलसी बन रहे हैं? शायद हमें सतगुरु से या परमात्मा न करे संतमत से प्यार नहीं है? हमें 1960 और 70 के दशक के डेरा के पुराने सेवादार याद हैं: वे इतने बुद्धिमान और प्रेमी थे कि उन्हें देखकर हमें लगता था कि हम कभी भी उन जैसे नहीं बन पाएँगे। उनमें से कुछ ने अपने सतगुरु बड़े महाराज सावन सिंह जी के बिछुड़ने के दु:ख को सहा था और फिर उन्होंने महाराज जगत सिंह जी, महाराज चरन सिंह जी और यहाँ तक कि बाबा जी के लिए भी सेवा की। ज़रा सोचिए, चार सतगुरुओं की सेवा करना! हुज़ूर महाराज जी प्रोफ़ेसर भटनागर को हँसकर यह कहा करते थे कि मौत ही एकमात्र सेवानिवृत्ति है। और हुज़ूर महाराज जी के बारे में यह सच साबित हुआ और जल्द ही प्रोफ़ेसर भटनागर के लिए भी।
हम जैसे वृद्ध हो चुके सेवादार अकसर उन दिनों को याद करते हैं जब हम भी इन युवा सेवादारों की तरह ही उत्साह और ऊर्जा से भरे थे। हममें से कुछ ने उस ज़बरदस्त उत्साह को क़ायम रखा है और जितनी भी सेवा मिलती है उसे सँभाल लेते हैं उस कलाबाज़ की तरह जो एक रिंग से दूसरी रिंग पर झूलता रहता है। हममें से कुछ लोगों को स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं और बीमारियों से जूझना पड़ा जिनकी वजह से हम अपनी सेवा जारी नहीं रख पाए या पहले से बहुत कम सेवा कर पा रहे हैं। हममें से कुछ लोगों को बढ़ती उम्र की वजह से या दूसरों को वह मौक़ा देने के लिए उन सेवाओं से हटा दिया गया जिन्हें निभाकर हमने कई वर्षों तक आनंद लिया।
वेल्श कवि डायलन थॉमस ने कहा था: “रात होने से पहले सुख की नींद मत सो जाओ … प्रकाश के मंद होने से पहले जो कर सकते हो, करो।” लेकिन संतमत के अनुयायी होने के नाते हमें इसके बजाय अपने भजन-सिमरन में “हर रोज़ मरने”, अपने जीवन को सच्चे दिल से संतमत के उपदेश के अनुसार ढालने के लिए कहा जाता है ताकि हम ख़ुद को भ्रम और जन्म व मृत्यु के इस दुखदायी चक्र से मुक्त करके अपने भीतर के प्रकाश का अनुभव कर सकें। उस प्रकाश के प्रकट होने पर मन शांत हो जाता है; सिर्फ़ प्रेम ही रह जाता है।
जैसे-जैसे हम इस मार्ग पर आगे बढ़ते हैं, असल में हम धीरे-धीरे उस “सुखद नींद” की ओर बढ़ते जा रहे हैं। हम धीरे-धीरे बहुत-से भ्रमों से बाहर निकल रहे हैं: कि हम हमेशा जीवित रहेंगे, कि हम इस द्वैत की दुनिया में सच्चा सुख हासिल कर सकते हैं, कि हम अपने सपनों और इच्छाओं को पूरा कर सकते हैं, कि हमारा जीवन हमारी उम्मीदों के मुताबिक़ होगा हमारे कर्मों के अनुसार नहीं, कि हम महत्त्वपूर्ण हैं इत्यादि। कहा जाता है कि सिमरन हमारे जन्म-जन्मांतरों के कर्मों के हिसाब-किताब को चुकता कर देता है और इसलिए हर बार सिमरन करके हम अपने कर्मों के बहुत बड़े लेखों को धीरे-धीरे ख़त्म कर रहे हैं। हमें एहसास हो रहा है कि हम इस मुक्ति के मार्ग पर हैं। रूहानी तौर पर हम शायद वहाँ न पहुँच पाएँ हों जहाँ हम पहुँचना चाहते थे लेकिन हम निश्चित रूप से वहाँ भी नहीं हैं जहाँ हम पहले थे। ठोकरें खाने, लड़खड़ाने और कभी-कभी बुरे रवैये के बावजूद, हमारी दिशा साधारणतया अंदर और ऊपर की ओर होती है।
जैसा कि हुज़ूर महाराज जी ने अपने एक शिष्य को लिखा था: उन सभी चीज़ों को छोड़ देना जिनसे हमने कभी प्यार किया और जिनके लिए हम जिए, शायद इतना भी बुरा नहीं है। हमें समझाया जाता है कि पानी से भरे गिलास में चाय डालने के लिए पहले उस गिलास में पड़े पानी को गिराना पड़ता है। वास्तव में हमें हमारी सभी मलिनताओं – तृष्णाओं, कर्मों, धारणाओं, भ्रमों – से मुक्त किया जा रहा है ताकि हमें सतगुरु, परमपिता परमात्मा और शब्द के प्रेम से भर दिया जाए। जन्म-जन्मांतर से इकट्ठी की गई अज्ञानता की उन सभी परतों को हटाया जा रहा है ताकि हम अपने अहंकार को छोड़कर प्रकाश से भर जाएँ – हमें अपने अंदर शब्द-स्वरूप में मौजूद सतगुरु का बोध हो सके।
भले ही हमारा शरीर वृद्ध हो रहा है और इसमें आश्चर्यजनक और अजीब बदलाव आ रहे हैं जो वृद्ध हो रहे शरीर में आते हैं – लेकिन हमारी आत्मा जवान हो रही है। हमारा शारीरिक बल, स्टैमिना और चुस्ती-फुर्ती कम हो सकती है लेकिन सतगुरु की दया-मेहर से जीवन-भर की सेवा, सत्संग और भजन-सिमरन हमें रूहानी तौर पर परिपक्व कर देता है जिससे हमें उस दिव्य प्रकाश और प्रेम के स्रोत में समा जाने में मदद मिलती है जो अनंत जन्मों से हमारे इंतज़ार में है। अब हम उन युवा सेवादारों की प्रशंसा कर सकते हैं जो इतनी मेहनत कर रहे हैं तथा उनके और सतगुरु के प्रति आभारी हो सकते हैं जिनकी वजह से हम सुख की नींद सो सकते हैं।