हमारा दिल बेचैन है
इनसानों में एक गहरी, क़ुदरती तड़प होती है जो सिर्फ़ परमात्मा के मिलाप से ही पूरी हो सकती है। यह बेचैनी किसी कमी की निशानी नहीं है बल्कि यह किसी ऊँचे मक़सद और परमात्मा से रिश्ता जोड़ने की ओर इशारा करती है। स्थिरता, शरण और रूहानी अनुभव हमें घर वापस ले जाते हैं। जैसा कि सेंट ऑगस्टीन ने चौथी सदी में अपनी आत्मकथा कन्फेशन्स में लिखा था: “हे प्रभु, आपने हमें अपने लिए बनाया है और हमारा दिल तब तक बेचैन रहता है जब तक वह वापस आप में विश्राम न पा ले।”
परमात्मा की खोज करनेवालों को अपने भीतर एक गहरी तड़प महसूस होती है जो आसानी से शांत नहीं होती। जब किसी इनसान को अपने अंदर बेचैनी और ज़िंदगी के गहरे मक़सद की खोज करने की ज़रूरत महसूस होती है तो यह इस बात का संकेत है कि वह उस अज्ञात सफ़र के लिए तैयार है; एक ऐसे सफ़र के लिए जो रहस्यमय है, शायद डरानेवाला है, निस्संदेह मुश्किल भी है मगर फिर भी हमें अपनी ओर आकर्षित करता है। इस ख़याल को हक़ीक़त में बदलने के लिए, जिज्ञासु को अपनी बेचैनी को ज़रिया बनाकर अपना रुख़ अंदर की ओर मोड़कर अपने ध्यान को परमात्मा पर टिकाना चाहिए ताकि वह उससे मिलाप कर सके। यह आसान नहीं है क्योंकि परमात्मा एक रहस्य है।
हालाँकि इस रहस्यमय सफ़र के बारे में सबसे अच्छी बात यह है कि हमें इसके अंत के बारे में पता है: हम वापस अपने घर पहुँच जाएँगे। लेकिन इसमें समय लगता है और इसे अनुभव करने के लिए हमें इस रहस्यमय सफ़र पर निकलना पड़ता है। हमें परमात्मा से मिलाप के लिए प्रतिबद्ध होना पड़ता है और अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश करनी पड़ती है। यह तभी मुमकिन है जब हम संतमत का पालन करते हैं। हममें से ज़्यादातर लोगों के लिए रूहानी राज़ से पर्दा आसानी से या जल्दी नहीं उठाया जाता। इनसान की फितरत ही ऐसी है कि यह परमात्मा के अस्तित्व पर संदेह करता है और सवाल उठाता है। वह आशा और निराशा से जूझता रहता है। क्या हम इस मौक़े का लाभ उठाने और रूहानी शक्ति के अस्तित्व में भरोसा करने के लिए तैयार हैं?
परमात्मा से फिर से मिलाप का यह सफ़र अकेले तय करना पड़ता है। प्यार, भरोसा और भक्ति इस सफ़र की बुनियाद है। यह कोई ऐसा सफ़र नहीं है जिसे मित्र-मंडली के साथ, दुनियावी सुख-सुविधाओं को भोगते हुए तय किया जाता है। हालाँकि इस सफ़र में हमें अकेलापन महसूस हो सकता है मगर समय के साथ हम जान जाते हैं कि हम कभी अकेले नहीं होते। जब कोई सच्चे दिल से खोज करता हुआ परमात्मा के क़ाबिल बन जाता है तब परमात्मा ख़ुद ही प्रकट हो जाता है। लोग अकसर यह खोज इसलिए शुरू करते हैं क्योंकि वे दुनिया से असंतुष्ट, निराश और उचाट हो जाते हैं। हो सकता है कि हम दिल छोड़ चुके हों, हमने कुछ आँसू भी बहाए हों लेकिन हमें एक तड़प और कशिश महसूस होती है जिसे हम नज़रअंदाज़ नहीं कर पाते।
हमारा दिल बेचैन है फिर भी उम्मीद है कि रोज़मर्रा के इस संसार रूपी नाटक में हम जो कुछ अनुभव करते हैं हमें उससे कहीं ज़्यादा हासिल होगा। इस तैयारी और रोमांच के साथ, हम अंदर की तरफ़ रुख़ करके घर वापसी का लंबा सफ़र शुरू कर देते हैं। मगर जल्द ही हमें एहसास होता है कि परमात्मा की खोज का यह सफ़र इतना आसान नहीं है क्योंकि हम युगों-युगों से इस बाहरी दुनिया में भटक रहे हैं। हमें एक ऐसे मार्गदर्शक की ज़रूरत महसूस होती है जो ख़ुद यह सफ़र तय कर चुका हो, एक ऐसा देहधारी सतगुरु जो हमें हमारे असल घर वापस ले जाने के क़ाबिल हो। हुज़ूर महाराज सावन सिंह जी हमें फ़िलॉसफ़ी ऑफ़ द मास्टर्स, वॉल्यूम 5 में बताते हैं:
परमार्थ का मार्ग बड़ा कठिन है और बिना गुरु के इस पर नहीं चला जा सकता।…इस मार्ग पर चलना तलवार की धार पर चलना है। यहाँ पग-पग पर ख़तरे हैं। इसलिए जो इनसान हक़ीक़त को जानना चाहता है या सच्चा ज्ञान पाना चाहता है और परमात्मा से मिलना चाहता है, उसे ऐसे पूर्ण सतगुरु की खोज करनी चाहिए जो इस मार्ग का वाक़िफ़कार हो।
हमें देहधारी सतगुरु की ज़रूरत इसलिए भी है क्योंकि संत-महात्मा मौत के रहस्य को जान चुके होते हैं। वे जानते हैं कि परमात्मा के साथ मिलाप कैसे करना है, इस शरीर में रहते हुए ‘जीते-जी’ कैसे मरना है। अगर हमारा मिलाप पूर्ण सतगुरु से हो चुका है तो मौत के समय वह हमारी सँभाल करते हैं। जब आत्मा के शरीर रूपी पिंजरे से मुक्त होने का समय आता है तो सतगुरु हमें पहले से ही इसके लिए तैयार कर चुके होते हैं ताकि हम फिर से जन्म और मृत्यु के चक्र में न फँसें।
सिर्फ़ चुनी हुई आत्माओं को मनुष्य जामे में परमात्मा की पहचान करने और निज-घर वापस जाने का मौक़ा मिलता है इसीलिए मनुष्य का जामा मिलना बहुत बड़ा सौभाग्य है। लेकिन पिछले जन्मों के कर्मों के कारण, हम कर्मों के महाजाल में फँसे हुए हैं। हम इस जाल के भीतर अलग-अलग योनियों में जन्म तो ले सकते हैं लेकिन परमात्मा की मदद के बिना हम इस जाल से बाहर नहीं निकल सकते। हो सकता है कि यह जाल बड़ा होता जाए और हमें यह भ्रम हो जाए कि हमारा अपनी ज़िंदगी पर कुछ नियंत्रण है। लेकिन क्या सच में ऐसा है? या हम सिर्फ़ भ्रम में हैं तथा और ज़्यादा कर्म इकट्ठे करते जा रहे हैं?
पूर्ण सतगुरु के मार्गदर्शन में अंदर की ओर रुख़ करके ही हम इस मायामय दुनिया के प्रभाव को कम कर सकते हैं। अगर हम उनके बताए मार्ग पर चलते हैं तो परमात्मा की मदद से हम धीरे-धीरे समर्पण करना सीखकर इस संसार के कर्म-जाल से मुक्त हो जाते हैं।
अंदरूनी सफ़र के लिए जीवन-भर प्रतिबद्ध रहना पड़ता है। जब हम शुरुआत करते हैं तब अकसर हमें कोई अंदाज़ा नहीं होता कि हम कहाँ जा रहे हैं या वहाँ कैसे पहुँचना है। हम मार्ग भूल चुके हैं। शिष्यों को भजन-सिमरन की युक्ति समझाकर मार्ग में आनेवाले पड़ावों के बारे में बताया जाता है। प्यार, सहारा और मार्गदर्शन देने के लिए सतगुरु हमेशा साथ होते हैं। हालाँकि इस मार्ग पर चलने के लिए हमें ख़याल को भीतर मोड़ने की ज़रूरत होती है, हम अकेले नहीं हैं और सबसे महत्त्वपूर्ण बात हम अकेलापन महसूस नहीं करते। सतगुरु के साथ हमारा पवित्र रिश्ता उस एकांतमय माहौल को बनाए रखने में मदद करता है जो इस यात्रा के लिए ज़रूरी है। हालाँकि ऐसा लग सकता है कि आत्मा की मुक्ति के इस सफ़र पर हम अकेले हैं लेकिन भजन-सिमरन के एकांत के इन पलों में ही सतगुरु के साथ हमारा नाता मज़बूत हो रहा होता है। उन पर भरोसा रखते हुए, हम बिना किसी शर्त प्यार करना सीख जाते हैं जिससे परमात्मा तक वापस जाने का रास्ता खुल जाता है।
जब तक परमात्मा से मिलाप नहीं हो जाता, हमारा दिल यानी कि हमारी आत्मा बेचैन रहती है, परमात्मा की जुदाई में तड़पती रहती है। इस जुदाई और कमी के एहसास को ख़त्म करने का एकमात्र तरीक़ा अपने आप को उसके सुपुर्द कर देना और उसमें समा जाना है। सतगुरु हमें निज-घर वापस ले जाने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं मगर हमें भी अपनी ज़िम्मेदारी निभानी चाहिए। हमें भजन-सिमरन करने की कोशिश करनी चाहिए और सतगुरु पर भरोसा रखना चाहिए ताकि हम सब कुछ उन पर छोड़कर उनके आगे समर्पण कर सकें। हमें अपनी ज़िंदगी का कायाकल्प करके बाहर के बजाय भीतर की ओर रुख़ करने की ज़रूरत है।
मार्ग पर चलते हुए हमारे मन में ये विचार आ सकते हैं: मैं क्या सीख रहा हूँ? क्या मैं कोई तरक़्क़ी कर रहा हूँ? धीरे-धीरे हमें सतगुरु पर भरोसा होने लगता है। संत-महात्मा हमें समझाते हैं कि हमें अपनी तरक़्क़ी के बारे में चिंता नहीं करनी चाहिए। इसके बजाय वे हमें ‘अभी से करनी करने की’ नसीहत देते हैं। हमें सही वक़्त का इंतज़ार ही नहीं करते रहना – हमें उनका कहा मानना है। नामदान मिल जाने पर, उपदेश का पालन करने से हम रूहानी तौर पर आगे बढ़ते जाते हैं। इस दुनिया की हर वस्तु नश्वर है, निराश करती है और साथ छोड़ देती है। हम सीख जाते हैं कि अगर हम इस संसार और जन्म-मरण के कभी न ख़त्म होनेवाले चक्र से मुक्त होना चाहते हैं तो इस दुनिया में करने लायक़ एक ही काम है और वह है हमारा रूहानी अभ्यास जोकि सच्चा और स्थायी है। इस दुनिया में कुछ भी सदा रहनेवाला नहीं है। इस शरीर के बिना हमारी कोई पहचान नहीं है, हमारा यहाँ पर कोई अस्तित्व नहीं है। जन्म और मृत्यु दो ऐसी घटनाएँ हैं जो हर इनसान के साथ घटती हैं। हम इस संसार में जन्म लेते हैं और कुछ समय बाद यहाँ से चले जाते हैं। अहमियत इस बात की है कि हम जन्म और मृत्यु के बीच क्या करते हैं। क्या हम बिना किसी मक़सद के भटकते रहते हैं या हम अपनी आंतरिक चेतना, अपनी आत्मा को जागृत करने का यत्न करते हैं ताकि हम इस दुनिया से मुक्ति पा सकें? जन्म-जन्मांतरों तक हम ज़िंदगी के इस अहम मक़सद से अनजान रहे हैं। मगर परमपिता परमात्मा जिन चुनी हुई आत्माओं को अपने पास घर वापस बुलाना चाहता है उनके मार्गदर्शन के लिए वह देहधारी सतगुरु को इस दुनिया में भेज देता है जो उन्हें घर वापस पहुँचा देता है।
इस मार्ग को ‘आत्मा का विज्ञान’ कहा जाता है। जब हमें घर वापस बुलाया जाता है तब यह प्रयोग शुरू हो जाता है। यह खोज शरीर की प्रयोगशाला में की जाती है। हम शरीर, मन और आत्मा हैं। जब तक हम मन को वश में नहीं कर लेते, यह हमारी आत्मा पर हावी रहता है और इसे दुनिया में फँसाए रखने की पूरी कोशिश करता है। परमपिता परमात्मा की खोज में, सिर्फ़ चुनी हुई आत्माओं को ही अंदरूनी सफ़र पर ले जाया जाता है जहाँ आत्मा अपने कर्मों का लेखा-जोखा ख़त्म करके रूहानी तरक़्क़ी करती हुई मुक्ति प्राप्त कर लेती है।
चाहे हमें भजन-सिमरन और अपनी दुनियावी ज़िम्मेदारियों के बीच तालमेल बिठाने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ता है लेकिन अपने कर्मों का लेखा-जोखा ख़त्म करने के लिए हमें दोनों ही ज़िम्मेदारियाँ निभानी पड़ती हैं। मुक्ति मिलने पर शरीर और मन की ज़रूरत नहीं रहती।
हम इस रूहानी जागृति का अनुभव कर सकते हैं; यह महज़ सिद्धान्त या फ़ुज़ूल की बात नहीं हैं। यह आंतरिक बदलाव के ज़रिए संभव है जो हमारी कल्पना से परे है। इस आंतरिक बदलाव के लिए, हमें अपनी ऊर्जा को बाहरी दुनिया जैसे कि अपनी नौकरी, धन-संपत्ति, रिश्ते-नातों से हटाकर अपने भजन-सिमरन में लगाना होगा। जब परमात्मा का प्रेम हमारी प्राथमिकता बन जाता है तब बाक़ी सब कुछ महत्त्वहीन और व्यर्थ लगने लगता है। मृत्यु के समय हमारे साथ कुछ भी नहीं जाता। इसलिए जितनी जल्दी हम मोह-माया के इन सभी बंधनों को त्याग देते हैं उतनी ही जल्दी हमारी आत्मा उन्नति करती है। संत-महात्मा हमें समझाते हैं कि सिर्फ़ परमात्मा की भक्ति सदा क़ायम रहती है और इसमें लगाया समय ही सार्थक है। सूफ़ी पीर इनायत ख़ान के हवाले से पुस्तक अवेकनिंग: ए सूफ़ी एक्सपीरिएंस में लिखा गया है: “सिर्फ़ वही इनसान रूहानी मक़सद को पूरा कर पाते हैं जो परमात्मा के बारे में सचेत हैं।”
तो आओ हम भी परमात्मा के बारे में सचेत हों। अगर हम घर वापसी का सफ़र तय करना चाहते हैं तो हमें इस बात पर भरोसा होना चाहिए कि परमात्मा को जानना मुमकिन है और हमारे अंदर उसे जानने की सच्ची चाहत होनी चाहिए। हमें भरोसे, प्रेम और भक्ति-भाव से भजन-सिमरन करके इस रूहानी भेद को जानने की कोशिश करनी चाहिए। संत-महात्मा चाहते हैं कि शिष्य उन्हें अपना सब कुछ सौंप दें। वे हमारा दिल और हमारी रूह चाहते हैं क्योंकि सिर्फ़ वे ही प्यार से हमारी सँभाल कर सकते हैं। उन्हें इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि हम कितना कम, कितना धीरे, कितने बेमन से भजन-सिमरन करते हैं। सतगुरु हमारे हर प्रयास, हर कोशिश को देखते और क़बूल कर लेते हैं और गुरु-शिष्य के इस नाते के ज़रिए परमात्मा से हमारा रिश्ता दिन-ब-दिन ज़्यादा मज़बूत होता जाता है।
गुरु असल में शब्द ही है। वह इनसान और परमात्मा के बीच की कड़ी है। वही जीवों को मालिक के पास वापस ले जाने के लिए आता है। सौंपी गई ज़िम्मेदारी को पूरा करके वह वापस उस शब्द में ही जा समाता है। इसी तरह, आत्मा (सुरत) भी उस शब्द की ही किरण है और किसी सच्चे गुरु की दया-मेहर से ही वह वापस उस शब्द में समाने के लायक़ बनती है। गुरु नानक साहिब भी यही फ़रमाते हैं, “सबद गुरू सुरत धुन चेला॥”
महाराज चरन सिंह जी, संत-मार्ग
जब आत्मा शब्द में समा जाती है तब परमात्मा के साथ फिर से रूहानी रिश्ता क़ायम कर लेती है। फिर हमारे हृदय की बेचैनी ख़त्म हो जाती है।